अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

आपका नजरिया: पद्मावत के बहाने उत्पात मचाने की आजादी


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    संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ का करणी सेना व अन्य राजपूत या क्षत्रीय संगठनों द्वारा विरोध किये जाने के कारण नाम बदलकर पद्मावत कर दिया गया। विरोध भी क्या था तोड़-फोड़, बसें जलाना, फिल्म के कलाकारों व अन्य लोगों के सिर काटने की धमकी, आदि मानो उत्पात मचाने के लिये कुछ लोगों की भीड़ उतर आयी है। राजपूत ‘मर्यादा’ की रक्षा फिल्म के बनने के दौरान जयपुर (राजस्थान), कोल्हापुर (महाराष्ट्र) से लेकर फिल्म की रिलीज होते-होते राजस्थान-महाराष्ट्र के अन्य इलाकों, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, आदि राज्यों में होने लगी। सेंसर बोर्ड से लेकर न्यायालय तक इससे चिंतित थे और रिलीज की तारीखें बढ़ाते रहे। सरकारों का आलम ये था और है कि वे उत्पातियों के सामने विवश होने की बातें कर रही थीं। न्यायालय ने जबरन अपना फैसला लागू करवाना चाहा तो 25 जनवरी को भी हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र में फिल्म न चल सकी। रिलीज के अंतिम दिनों में मेन स्ट्रीम मीडिया ने ‘विरोध’ करने वालों पर आरोप लगाया कि फिल्म देखी नहीं विरोध कर रहे हैं और पत्रकारों ने बताया कि फिल्म अच्छी है और राजपूत ‘मर्यादा’ को आहत नहीं करती है।

    फिल्म पद्मावत मलिक मुहम्मद जायसी के एक मिथकीय-काल्पनिक काव्य ग्रन्थ पद्मावत पर आधारित है। मलिक मुहम्मद जायसी (जन्म 1397 से 1494 के बीच कभी व मृत्यु 1558 में, स्रोत-कविता कोश) का यह काव्य ग्रन्थ अल्लाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.) के काल के 250 साल बाद लिखा गया जिसमें कुछ वास्तविक चरित्रों के साथ पद्मावती जैसे काल्पनिक चरित्रों को भी जोड़ा गया है। इतिहासकार पद्मावती को ऐतिहासिक चरित्र नहीं मानते हैं। राजपूती ‘मर्यादा’ इस मिथकीय पात्र ‘पद्मावती’ पर टिकी है। हालांकि फिल्म निर्माताओं ने भी सारा ध्यान राजपूत मर्यादा पर ही दिया।

    फिल्म में राजपूत राजा रतन सिंह को उसूलों वाले, महिलाओं को सम्मान देने वाले, वीर योद्धा आदि गुणों वाला प्रदर्शित किया गया है। खिलजी राजाओं को मांसभक्षी, वहशी, खूंखार, सनकी, धोखेबाज, सत्ता के लालसी, आदि दुर्गुणों वाला प्रदर्शित किया गया है। अल्लाउद्दीन के पात्र में भी इन सब दुर्गुणों को बखूबी दिखाया गया है। हालांकि अभिनय के लिहाज से रणवीर सिंह को अल्लाउद्दीन का किरदार निभाते हुए पसंद किया जा रहा है जबकि राव रतन सिंह के किरदार में शाहिद कपूर को कम पसंद किया जा रहा है। रानी ‘पद्मावती’ विवेकशील, युद्ध नीति में कुशल, पति सेवक आदि राजपूत ‘मर्यादा’ के भीतर आने वाले गुणों वाली प्रदर्शित की गई हैं। अंततः जौहर की आग में जाते हुए वह राजपूत ‘मर्यादा’ का पालन करती है।

    फिल्म निर्माताओं ने पूरी तरह हिन्दू फासीवादी सोच के अनुरूप यह दिखाने की कोशिश की है कि मुस्लिम शासक बुरे थे और राजपूत राजा अच्छे थे। यहां तक कि राजा रतन सिंह एक रानी के होते हुए पद्मावती या पद्मिनी को भी रानी बनाते हैं पर इसका चित्रण उतना कुरूपतापूर्ण नहीं जितना अल्लाउद्दीन खिलजी का व्यभिचार। फिल्म को देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि फिल्म राजपूत मर्यादा वाली और मुस्लिम ‘आक्रांता’ विरोधी है। तब फिर राजपूतों द्वारा इतना हंगामा आखिर क्यों?

    राजपूत संगठनों के पूरे उत्पात को यदि मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक माहौल में देखा जाए तो समझना आसान होगा जब केन्द्र व कई राज्यों को राष्ट्र निर्माता पार्टी चला रही है तो हिन्दू राजपूतों की भावना किसी भी बात से आहत हो सकती है या कभी बिना बात के भी आहत हो सकती है। इसका ख्याल रखना सरकार का कर्तव्य है। पिछले दिनों कई राज्यों में हुए चुनाव के समय राजपूत वोटरों को रिझाने के लिए भी उन्हें याद दिलाना जरूरी था कि वे राजपूत हैं। 

    इसका लाभ आगे राजस्थान में होने वाले चुनावों में भी मिलने की संभावना है। इसका स्वाभाविक नतीजा यह होगा कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ निर्माता पार्टी भाजपा को ही अधिक वोट प्राप्त होंगे। हालांकि कांग्रेस या अन्य पार्टियों ने भी पूरी कोशिश की कि वे हिन्दू राजपूत समर्थक दिखें, उन्होंने भी पूरी कोशिश की कि उनकी जुबान से राजपूतों के कारनामों के विरोध में कोई शब्द न निकल सकें। भाजपा के शासित राज्यों में से चार में तो मुख्यमंत्रियों ने न्यायालय को कह ही दिया कि हम फिल्म नहीं चला सकते ‘माहौल खराब हो जाएगा’। सवाल उठने लाजिमी थे और उठे भी कि ‘‘कश्मीर में पत्थरबाजों से निपटने में तत्परता तो बाकि देश में उत्पात मचाने, आगजनी करने वालों से क्यों नहीं निपटते?

    इस पूरे घटनाक्रम में सरकारों का गणित साफ था कि फिल्म जैसी है हो, राजपूत उत्पात मचाते हैं मचाते रहे, जब तक जान-माल का कुछ नुकसान न हो चुप रहा जाए ताकि राजनीति की चमक बढ़ सके। मीडिया की भूमिका कुछ ऐसी थी कि आग भड़काई जाये और जब आग भड़क ही गई तो उसे ठण्डा करने में ही सबका हित था। क्या निर्माता, क्या सरकारें सभी यही चाहते थे। तब मीडिया ने यह तर्क रचा कि फिल्म देखो तब भला-बुरा कहो जबकि खुद मीडिया ने फिल्म देखे बिना यह हवा बनाई कि अल्लाउद्दीन और पद्मावती के बीच ‘ड्रीम सीक्वेन्स’ है। अक्सर ही फिल्मों के विवादित हो जाने से निर्माताओं के व्यापार में इजाफा ही होता है। बहुत संभव है इतने हंगामे, उत्पात, आगजनी के बाद फिल्म का मुनाफा बढ़ जाए, मीडिया की टी.आर.पी. चढ़ जाये, पार्टियों की राजनीति भी चमक जाए, तब राजपूत नौजवान; जो आज सड़को में हैं; पाएंगे कि शासकों-निर्माताओं के इस चोखे धंधे में उनका भद्दे ढंग से इस्तेमाल हुआ। तब वे थके हारे अपने बेरोजगारी, शिक्षा, महंगाई आदि जरूरी मुद्दों पर केवल सोचने भर की ही ताकत में होंगें। उम्मीद है आगे से नौजवान अपने को इस्तेमाल होने से बचा लेगें। इस घटनाक्रम का यही सबक निकालें।    -चंदन, काशीपुर

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