अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

एक चाय वाले का खत दूसरे चाय वाले के नाम


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प्रति 

    प्रधानमंत्री

महोदय,

    मेरा नाम राम शंकर है। मेरी उम्र 60 साल है। मैैं पिछले 15 साल से बरेली के एक नुक्कड़ पर चाय बेचकर अपना परिवार चला रहा हूं। बेटे-बेटियों की शादी के दौरान लिया गया कर्ज, पत्नी और अपनी दवाओं का खर्च सब कुछ इसी छोटी सी  चाय की दुकान से ही हो पाता है। मेरे दोनों लड़के भी चाउमिन-मोमो का ठेला लगाते हैं। वे भी बड़ी मुश्किल से ही थोड़ा पैसा बचा पाते हैं। इन हालात में जैसे-तैसे गरीबी में जीवन काट रहा था। किन्तु कुछ दिन पूर्व ‘स्वच्छ बरेली, सुन्दर बरेली’ के नाम पर मेरा चाय का ठेला उजाड़ दिया। मेरे बेटों का भी ठेला बंद हो गया। मेरा काम पूरी तरह बंद हो गया है। कैसे दाल-रोटी का इंतजाम करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा है। इसीलिए मजबूर होकर आपको पत्र लिख रहा हूं। इस उम्मीद से कि आप भी कभी चाय बेचते थे और आप जरूर मेरा दर्द समझेंगे। आप तो चाय बेचते-बेचते प्रधानमंत्री बन गये किन्तु मैं चाय बेचते-बेचते आज पूरी तरह बेरोजगार हो गया हूं। 

    2014 में आपको प्रधानमंत्री बनाते हुए बहुत जोश था। आपने कहा ‘अच्छे दिन आयेंगे’। फिर विधानसभा चुनाव और फिर नगर निगम चुनाव में हमने आपको विजयी बनाया ताकि अच्छे दिन आने में कोई कसर ना रह जाये। परन्तु हमारे हालात तो पहले से भी बुरे हो गये हैं। 

    मेरे फड़ के पास एक साइकिल का मिस्त्री दो-चार औजार लेकर अपना फड़ लगाता था। वह मुसलमान है। बेचारा बड़ा ही भला आदमी है। नगर निगम के सफाई अभियान में उसका भी फड़ उजड़ गया। उस दिन हम दोनों ही बहुत उदास थे। नगर निगम तो हमें उजाड़ रहा था पर उस भले आदमी ने ही मेरी दुकान का सामान ठेले में रखने में मेरी मदद की। नहीं तो यह सब सामान नगर निगम की गाड़ी में चला जाता।

    जब मेरा फड़ जो मेरा परिवार चलाने का सहारा था, उजाड़ा गया तो मन में बहुत गुस्सा आया। मन किया कि 2019 में आपको वोट नहीं दूंगा, अपने फड़ के उजड़ने का बदला पूरा करूंगा। फिर सोचा और सरकारों के राज में भी तो हमें उजाड़ा जाता रहा है। उजड़ना, फिर बसना यह तो हमारे साथ चलता ही रहता है। सरकार कोई भी आये यह सब ऐसे ही चलता रहता है। फिर सोचा ऐसी सरकारों से हमें फायदा ही क्या है। हम सरकार क्यों चुनते हैं और क्या इन सरकारों के बिना हम अपना जीवन नहीं चला सकते। 

    बहुत सोचकर मुझे लगता है हमें ऐसी सरकारों के बजाए अपने संगठनों की ज्यादा जरूरत है जो सरकार से अपने हकों के लिए लड़ सके। और यही मेहनत करने वाले संगठन ही देश की सरकार बनें। जो अमीरों के लिए नहीं गरीब मेहनत करने वालों के हितों में काम करें।

    प्रधानमंत्री जी! भले ही आपने कभी चाय बेची होगी। पर आप हम फड़-खोखे वालों का दर्द बिल्कुल नहीं समझते हैं। आप भी देश के चंद अमीरों के लिए काम करने वाले ही निकले। इसलिए मैं खुद को आपसे अलग करता हूं। आपकी खिलाफत करता हूं।                      - राम शंकर, बरेली

Labels: मजदूरों के पत्र


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