लेबिल (कुल समाचार - 76): कविता

लकड़बग्घा हंस रहा है - चन्द्रकांत देवताले


फिर से तपते हुए दिनों की शुरूआत 

हवा में अजीब सी गन्ध है 

और डोमों की चिता 

अभी भी दहक रही है,

वे कह रहे हैं

एक माह तक मुफ्त राशन

मृतकों के परिवार को

और लकड़बग्घा हंस रहा है......



हत्यारे सिर्फ मुअत्तिल आज

और घुस गये हैं न्याय की लम्बी सुरंग में

वे कभी भी निकल सकते हैं साबुत

और किसी दूसरे मुकाम पर

तैनात खुद मुख्त्यार

क...

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सोचो तो -गोरख पाण्डेय


बिलकुल मामूली चीजें हैं

आग और पानी

मगर सोचो तो कितना अजीब होता है

होना

आग और पानी का

जो विरोधी हैं

मगर मिलकर पहियों को गति देती हैं

वैसे, सोचो तो अंधेरे में चमकते

ये हजारों हाथ हैं

इतिहास के पहियों को

रोटी-रचना और मुक्ति के

पड़ावों की ओर बढ़ाते हुए

इतिहास की किताबों में

इनका जिक्र भी न होना

सोचो तो कितना अजीब है

स...

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दो कविताएं


तुम्हारी ही तरह     -राॅक डाल्टन



तुम्हारी ही तरह मैं

चाहता हूं प्रेम को, ज़िंदगी को

चीजों की खुशबू को

जनवरी के आसमानी-नीले भू-दृश्य को



और मेरा भी लहू गर्म हो उठता है

और मैं हंसता हूं आंखों में

और जानता हूं आंसुओं की कलियों को



मुझे भरोसा है कि बहुत खूबसूरत है यह दुनिया

और रोटी ही की तरह कविता भी है सभी के लिए



और...

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यह सेना है -जाकिर हुसैन


यह क्या है?

पत्थर मार रहे हो, सेना पर

भारतीय सेना पर

जिसने बचाया तुम्हें 

बाढ़ से,

भूकम्प से,

तूफान से

जिसने बचाया तुम्हें 

भूख से,

बीमारी से,

मौत से,

और तुम....?

क्यों मार रहे हो?

किसके कहने पर मार रहे हो,

पत्थर?

बेशक

तुम मार रहे हो, पत्थर

सेना के जरिये

सरकार पर!

उसकी नाकामी पर,

उसकी अनदेखी पर,

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क्योंकि वह जुनैद था - मदन कश्यप


चलती ट्रेन के खचाखच भरे डिब्बे में

चाकुओं से गोद-गोद कर मार दिया गया

क्योंकि वह जुनैद था



झगड़ा भले ही हुआ बैठने की जगह के लिए

लेकिन वह मारा गया

क्योंकि वह जुनैद था



न उसके पास कोई गाय थी

न ही फ्रिज में मांस का कोई टुकड़ा

फिर भी मारा गया क्योंकि वह जुनैद था



सारे तमाशबीन डरे हुए नहीं थे

लेकिन चुप सब थे क्योंकि वह जुनैद था 

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उम्मीद -दीपक कुमार


आकांक्षाएं कभी मरती नहीं

उम्मीदें कभी खत्म नहीं होतीं

ज्यों-त्यों बढ़ता है

दमन-शोषण उत्पीड़न

प्रबल होती है मुक्ति की चाह

कौन तानाशाह दबा सका

स्वतंत्रता-समानता-भाईचारे की चाह को

कौन सी राज्य मशीनरी नष्ट कर पाई

आजादी के सपनों को

शरीर को कैद किया जा सकता है

परन्तु.....

विचारों को कैद करने वाली जंजीर

आज तक नहीं बनी

कुर्बानिया...

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दियासलाई की तीली -सुकान्त भट्टाचार्य


मैं दियासलाई की एक छोटी तीली

अति नगण्य, सबकी नजर से ओझल

फिर भी बारूद कसमसाता है मुंह के भीतर

सीने में जल उठने को बेचैन एक सांस



मैं दियासलाई की एक छोटी तीली।



कैसी उथल-पुथल मच गई उस दिन

जब घर के एक कोने में जल उठी आग

बस, इसलिए कि नाफरमानी के साथ

बिन बुझाए फेंक दिया था मुझे

कितने घर जला कर किए खाक 

कितने प्रासाद धूल में मिला दिए

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हमारी जिन्दगी -केदारनाथ अग्रवाल


हमारी जिन्दगी के दिन,

बड़े संघर्ष के दिन हैं।

हमेशा काम करते हैं,

मगर कम दाम मिलते हैं।

प्रतिक्षण हम बुरे शासन--

बुरे शोषण से पिसते हैं!!

अपढ़, अज्ञान, अधिकारों से

वंचित हम कलपते हैं।

सड़क पर खूब चलते

पैर के जूते-से घिसते हैं।।

हमारी जिन्दगी के दिन, 

हमारी ग्लानि के दिन हैं!!



हमारी जिन्दगी के दिन, 

बड़े संघर्ष के दिन हैं!

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और कितना जज्ब करें -रेवती कुमार


(अफसोस भरे हमारे हालातों के नाम)

और कितना जज्ब करें

कितना और जज्ब करें

जख्मों से चाक सीना है

लख्ते जिगर लहूलुहान है

और कितना जज्ब करें

कितना और जज्ब करें

    आंखों से बहती नदियां हैं

    दुःखों से भरी सदियां हैं

    कहीं नहीं....रोशनियां हैं

    भंवर में फंसती सब कश्तियां हैं

    और कितनी देर करें

    कितन...

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क्या करूंगी मैं


(अरब देशों को युद्ध की आग में झोंकते अमरीकी प्रशासन को सम्बोधित)



मैं थिरकूंगी नहीं तुम्हारी रणभेरी पर

मैं अपनी अंतरात्मा भी नहीं करूंगी तुम्हारे हवाले

न ही समर्पित करूंगी अपनी अस्थियां

तुम्हारे युद्धोन्मादी उद्घोष के लिए



मैं थिरकूंगी नहीं तुम्हारी थाप पर

मुझे मालूम है प्राणहीन है यह थाप

मैं अच्छी तरह जानती हूं जिस चमड़ी पर तुम दे रहे ...

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रावणरंगी


-कुमार मुकुल


हुसैन साहब

पहले तो आपने देश छोडा

फिर छोड़ दी दुनिया

पर वे

जो हनुमान का मुखौटा लगाए

घूम रहे इस देश में

वे रावणरंगी

अमर हुए जा रहे

या कि पत्थर हुए जा रहे

राह के पत्थर ... रोडे बस...



परसों की ही तो बात है

वेलेंटाइन के नाम पर भोपाल में

उन्होंने दौड़ा मारा दो बहनों को

अपने अपने राम की अराधना में लगी थीं वे

कि पड़ गयीं हत्यारो...

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बाश्शा को इतिहास से बड़ी नफरत थी... -संध्या नवोदिता


बाश्शा को इतिहास से बड़ी नफरत थी...

भूगोल से भी.. विज्ञान को तो देखना भी न चाहे 

और भाषा 

उसका क्या

गालियों की क्या भाषा... 

जैसे मुंह फटे वैसे फोड़ो

इतिहास से ऐसी खुन्नस कि चन्द्रगुप्त मौर्य को गुप्ता जी बोलता

सिकंदर को गंगा किनारे घसीट कर बिहारियों से हरवा के भगा देता

और गंगा सतलुज के मुहाने पर जाकर खडी कर देता

सरदार की हजार फीट ऊंची मूर्ति...

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मचान पर बंदर और हुसैन की सरस्वती -प्रदीप सैनी


उन्हें नापसंद है

हमारी आस्था का ढंग

हमारी स्मृतियों का रंग



वे इतिहास को सम्पादित कर रहे हैं



उन्हें एतराज है

हमारे सपनों की गंध पर

पहनावे की पसंद पर 



वे सभी मसलों पर फतवे जारी कर रहे हैं



वे तय कर रहे हैं पाठयक्रम

हमें पढ़ा रहे हैं पाठ



हमें अपनी तरह सभ्य बनाने पर उतारू हैं वे



एक इमारत की तरह

हमार...

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चुनो -अमित श्रीवास्तव


5 राज्यों में चुनाव के अवसर पर


गालियों और नारों के बीच

चुनो

फतवों और निषेधाज्ञाओं के बीच

चुनो

हत्या और आत्महत्या के बीच

चुनो

अपनी आखि़री आवाज़

अगला बंकर

जंग खाए ताले

और उलझी बेड़ियों के बीच

चुनो

दरवाज़े चुनो

ये पर्दे फट चुके हैं

ढांपने को कुछ नहीं है

पर चुनो

कि बेशर्म साँसें उधड़ी पड़ी हैं



चुनो भूख चुनो

प्यास चुनो

चुनो बेघर ...

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पंकज चतुर्वेदी की 3 कविताएं


इमरजेंसी   



इमरजेंसी भी लौटकर

आती है इतिहास में

कहती हुई

मैं वह नहीं हूँ

जिसने तुम पर

अत्याचार किये थे



इस बार

मैं तुमसे

करने आयी हूँ

प्यार



पूर्ण बहुमत



जब पूर्ण बहुमत

दिया जाता है

तब सरकार

पूर्णता से

काम करती है

पूर्ण उपेक्षा

पूर्ण अत्याचार



दोस्तो,...

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इन दिनों


-अशोक कुमार पाण्डे


        (एक)

इन दिनों भरोसा एक घायल हिरण है 

उम्मीद झुण्ड से बिछड़ा पक्षी



इन दिनों सोचता हूँ देखता हूँ और कहता कुछ नहीं

ये सुनने के दिन हैं सोचने की रातें



सफे़दियों पर कोई पीलापन तारी हुआ जाता है

आवाज़ें आती हैं नहीं आती हैं

उनकी दहलीज पर ख़ामोश बैठ जाता है

एक सहमा हुआ सा बशर तन्हा



उसके कांधे पे हाथ धरता हूं

तो चौंक...

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सरगना -अशोक तिवारी


(ट्रम्प की जीत पर अशोक तिवारी की एक कविता यहां प्रस्तुत है- सम्पादक)

वो लौट रहा है

एक बार फिर अपने उसी रास्ते पर

जिनसे गुजरा है वो

अपने लश्कर के साथ

बार-बार खाता हुआ शिकस्त

वो लौट रहा है दुनिया को अपने ठेंगे पर रखते हुए 

पहले से बड़े और

पहले से ज्यादा विकसित कद के साथ

ज्यादा नियोजित ढंग से

हवा की खामोशियों को चीरता हुआ

काटता ह...

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कानून


लोहे के पैरों में भारी बूट

कंधे से लटकती बंदूक

कानून अपना रास्ता पकड़ेगा

हथकड़ियां डालकर हाथों में

तमाम ताकत से उन्हें

जेलों की ओर खींचता हुआ

गुजरेगा विचार और श्रम के बीच से

श्रम से फल को अलग करता

रखता हुआ चीजों को 

पहले से तय की हुई 

जगहों पर 

मसलन अपराधी को

न्यायाधीश की, गलत को सही की

और पूंजी के दलाल को

शासक की ज...

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दो कविताएं


मैं अवाम हूं - अहमद फोयेद नेगम



मैं अवाम हूं...आगे कदम बढ़ाता हुआ...और मंजिल मालूम है मुझे

संघर्ष मेरा हथियार और पक्का इरादा मेरा दोस्त है

अंधेरे के खिलाफ लड़ता हूं

मेरी उम्मीद की तेज आंखें देख लेती हैं

कहां दुबका बैठा हुआ है सुबह का उजाला

मैं अवाम हूं...आगे कदम बढ़ाता हुआ...और मंजिल मालूम है मुझे।



मैं अवाम हूं...मेरे हाथों से रोशन ह...

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राजनीति से परहेज करने वाले बुद्धिजीवी -आतो रीनो कास्तिलो


एक दिन हमारे देश के 

राजनीति से परहेज करने वाले

तमाम बुद्धिजीवियों से सवाल करेंगे

हमारे देश के

मामूली से मामूली लोग

उनसे पूछा जायेगा

क्या कर रहे थे वे

जब मर रहा था उनका देश

तिल तिल कर

शातिर खामोशी से

सब कुछ खाक करती जाती

छोटी और मामूली आग से?

कोई नहीं पूछेगा उनके कपड़े लत्तों के बारे में

या दोपहर के खाने के बाद

कितनी...

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शोर की जुबान और मौन का शोर


जो गरजता है हरदम

बरसता है बात बेबात बेजगह 

हिन्दू और हिंदी स्वाभिमान की दुकान लगाते हुए

वाइब्रेंट, इनक्रेडिबल जैसे स्वाभिमान-सोख

विलायती शब्दों पर रहता है

पूरी दयनीयता से निर्भर

स्वदेश में निर्माण की सीख देते

जब वह अंग्रेजी में करता है

मेक इन इण्डिया का ऐलान

तो यकीन मानिए

उसका हिसाबी स्वदेश प्रेम भी

खुद उसे चिकोटी काट कर

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पैसा


पैसा पैसा पैसा पैसा

हाय पैसा पैसा पैसा

पैसे की तुम माया देखो 

पैसे के पीछे भागते लोग देखो

पैसे का तुम योग देखो

पैसे से ठीक होते रोग देखो

पैसे से बनती दोस्ती देखो

पैसे से बनती दुश्मनी देखो

पैसे से ठनती दुश्मनी देखो

पैसा पैसा पैसा पैसा

हाय पैसा पैसा पैसा

पैसे की सबको दरकार है

पैसे से होता प्यार है

पैसे से होती तरकार है

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आजादी के सत्तर साल बाद


उन सपनों का क्या हुआ?

जो मैकू किसान ने देखे थे,

अपना खेत, अपना गांव, अपना देश,

मगर गरीबी, बेकारी और बीमारी के अलावा,

यहां सब कुछ तो उनका है।



वो समाजवाद के वायदे क्या हुए?

जो देश के करोड़ों मजदूरों से किये थे,

अपना शहर, अपना घर, अपने कारखाने,

मगर भूख से तड़पते बच्चे, फटी हुई साड़ी में झांकता

पत्नी का तन, पिंजरा बन चुके बदन के अलावा,

यहां सब कुछ ...

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अंततः ये पुरुषों की दुनिया है




सीधी सीधी बात है

कि मैं एक स्त्री हूं...

मेरी ओर ताकना गुनाह है

मुझे तो बुर्के में ढंका लिपटा होना चाहिए

सर से पैर तक

मेरी आवाज सुन कर

डोल बहक सकता है किसी का भी मन

और इस पर तानाशाही अंकुश रखना होगा...

मेरे लिए तो

किसी तरह का सोच विचार वर्जित है

इसीलिए स्कूलों से रखो मुझे मीलों दूर...

यह सब बर्दाश्त करना होगा मुझे

और मरना भी होग...

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सबूत - नीलाभ


(पिछले दिनों 23 जुलाई को नीलाभ व 28 जुलाई को लेखिका महाश्वेता देवी का निधन हो गया। उनकी याद में नीलाभ की एक कविता व महाश्वेता देवी की चंद पंक्तियां प्रस्तुत हैं)



कदम कदम पर

वे मांगते रहे सबूत

हम देते चले आये



मुसलमान होने पर

अपनी देशभक्ति का सबूत

औरत होने पर

अपने सतीत्व का सबूत

हरिजन होने पर

अपनी मेधा का सबूत

बलत्कृत होने पर

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संतुष्टि


- आतो रीनी कास्तिलो


जीवन भर संघर्ष करते रहने वालों के लिए

सबसे सुन्दर चीज है

सफर के अंत में खड़े होकर स्वीकार करना

हमारा अटूट भरोसा था लोगों में...और जीवन में

और न जीवन ने...और न ही लोेगों ने

कभी हमें निराश किया...नीचा दिखाया



यही एक ढंग है जिससे 

मर्द बनते हैं मर्द

और औरतें बनती हैं औरतें

लड़ते हुए दिन और रात अनथक

लोगों की...और जीवन की खातिर 

जब पूरी क...

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पांच कविताएं


1.मजदूर

             -वर्द्धन

 रुकते वे हैं,

 जो आराम करते हैं।

 थकते वे हैं

 जो विश्राम करते हैं।

 हमने तो सोचा,

 कभी ना रुकेंगे।

 इसीलिए तो हम

 दिन-रात काम करते हैं। 



2.क्या आज हम स्वतंत्र है?                           

                             -वर्द्धन

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दीपक कुमार की दो कवितायें


दरअसल

जो धर्म का इस्तेमाल कर 

सत्ता पाते हैं

धर्म के छल प्रपंचों द्वारा

उसे टिकाए रखना चाहते हैं

चाहे वे किसी भी धर्म का दिखावा करें

जनता को बरगलाएं या झूठे वादे करें

दरअसल 

ये ही इंसानियत के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं

(02-06-2014)



कीमत

चुकानी ही होती है कीमत

प्रेम, सफलता और आजादी की

खैरात में कोई चीज नहीं मि...

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फासिस्ट - देवी प्रसाद मिश्र


मैंने कहा कि आप फासिस्ट हैं

तो उसने कहा कि वह मनुष्य है



मैंने कहा कि आप फासिस्ट हैं

तो उसने कहा कि वह जनप्रतिनिधि है



मैंने कहा कि आप फासिस्ट हैं

तो उसने कहा कि उसके पास आधार-कार्ड है



मैंने कहा कि आप फासिस्ट हैं

तो उसने कहा कि वह शाकाहारी है



मैंने कहा कि आप फासिस्ट हैं

तो उसने कहा कि मुद्दा विकास है



(मैंने विनाश ...

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मन की बात - दिनकर कुमार


प्रजा को सम्बोधित करता है शासक

रविवार की छुट्टी के दिन

डिजाइनर पोशाक पहनकर

किराये के भाषण-लेखक का लिखा हुआ भाषण

वह रेडियो पर पढ़ने से पहले

मन ही मन दोहराता है

स्वयं को दीनबंधु प्रजा वत्सल जतलाने के लिए

अपनी आवाज में घोलने की कोशिश करता है

कृत्रिम मिठास 

अपने अहंकार पर डालने की कोशिश करता है

विनम्रमा की चादर



प्रजा को सम्ब...

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बहुत हो चुका नाटक -अलखदेव प्रसाद अचल


बहुत हो चुका नाटक

अब तो रहने दो

तुम्हारे गिरगिटी रंगों की पोल

खुल चुकी है

अपनी बात मुझे कहने दो।



तुम्हारा अंदाज

क्लाइमेक्स फिल्म या नाटक के कलाकारों से

कुछ कम नहीं था

चुनावी मंच पर

तुम्हारे जोशीले शब्दों के आगे

विरोधियों में दम नहीं था

देश प्रेम, हिन्दुत्व प्रेम

किसान और मजदूर प्रेम की बाढ़

तुम्हारे हृदय में हिल...

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रघुवीर सहाय की तीन कविताएं


गुलामी 



मनुष्य के कल्याण के लिए

पहले उसे इतना भूखा रखो कि वह और कुछ

सोच न पाए

फिर उसे कहो कि तुम्हारी पहली जरूरत रोटी है

जिसके लिए वह गुलाम होना भी मंजूर करेगा

फिर तो उसे यह बताना रह जाएगा कि

अपनों की गुलामी विदेशियों की गुलामी से बेहतर है

और विदेशियों की गुलामी वे अपने करते हों

जिनकी गुलामी तुम करते हो तो वह भी क्या ...

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नीलाभ की दो कविताएं


यह ऐसा समय है



यह ऐसा समय है

जब बड़े-से-बड़े सच के बारे में

बड़े-से-बड़ा झूठ बोलना सम्भव है

सम्भव है अपने हक की मांग बुलन्द करने वालों को

देश और जनता से द्रोह करने वाले करार देना

सम्भव है

विदेशी लुटेरों के सामने घुटने टेकने वाले प्रधान को

सन्त और साधु बताना

यह ऐसा समय है

जब प्रेम करने वाले मारे जाते हैं

पशुओं स...

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तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है -अवतार सिंह संधू ‘पाश’


यदि देश की सुरक्षा यही होती है कि

बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाये

आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द 

अश्लील हो 

और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे

तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है।

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज

जिसमें उमस नहीं होती

आदमी बरसते मेह की गूंज की तरह गलियों में बहता है

गेहूं की बालियों की तरह खेत...

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कानून - गोरख पाण्डेय


लोहे के पैरों में भारी बूट

कंधों से लटकती बंदूक

कानून अपना रास्ता पकड़ेगा

हथकडि़यां डाल कर हाथों में

तमाम ताकत से उन्हें

जेलों की ओर खींचता हुआ

गुजरेगा विचार और श्रम के बीच से

श्रम से फल को अलग करता

रखता हुआ चीजों को

पहले से तय की हुई

जगहों पर

मसलन अपराधी को

न्यायाधीश की, गलत को सही की

और पूंजी के दलाल को

शासक की जगह ...

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बर्तोल ब्रेख्त की दो कविताएं


आलोचनात्मक रवैये पर



बहुत-से लोगों को

आलोचनात्मक रवैया कारगर नहीं लगता

ऐसा इसलिए कि वे पाते हैं

सत्ता पर उनकी आलोचना का कोई असर नहीं पड़ता।



लेकिन इस मामले में जो रवैया कारगर नहीं है

वह दरअसल कमजोर रवैया है।



आलोचना को हासिल कराये जायें

अगर हाथ और हथियार

तो राज्य नष्ट किये जा सकते हैं उससे



नदी को बांधना

...

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वेणु गोपाल की दो कवितायें


सुनो हिटलर



हम गाएंगे / अंधेरों में भी /

जंगलों में भी / बस्तियों में भी /

पहाड़ों पे भी / मैदानों में भी /



आंखों से / होठों से /

हाथों से / पांवों से /

समूचे जिस्म से /



ओ हिटलर!



हमारे घाव / हमारी झुर्रियां /

हमारी बिवाइयां / हमारे बेवक्त पके बाल /

हमारी मार खाई पीठ / घुटता गला /



सभी तो

आकाश गुनगुना रहे हैं।

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नागार्जुन की तीन कविताएं


हाथ लगे आज पहली बार



हाथ लगे आज पहली बार

तीन सर्कुलर, साइक्लोस्टाइलवाले

न्छ। द्वारा प्रचारित

पहली बार आज लगे हाथ

अहसास हुआ पहली बार आज..

गत वर्ष की प्रज्वलित अग्निशिखा

जल रही है कहीं-न-कहीं, देश के किसी कोने में

सुलग रही है वो आंच किन्हीं दिलों के अन्दर..

‘अन्डर ग्राउण्ड न्यूज एजेन्सी’ यानि न्छ।

फंक्शन कर रही है कहीं न कही...

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अनिकेत की दो कविताएं


1. भेडि़यों का मांगपत्र

भेडि़ये आजकल बहुत दुःखी हैं

और गुस्से से भी भरे हुए भी

मेमने एकदम असहिष्णु हो गये हैं

न अपना खून पीने देते हैं

न अपना मांस खाने



भेडि़यों का सरदार चीखता है

यह सरासर अन्याय है

वह चिल्लाता है

यह बर्दाश्त नहीं किया जायेगा

वह दहाड़ता है

मेमनों को देख लिया जायेगा



यह अजब-गजब नजारा...

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लोकतंत्र की धूल -पूनम तुषामड़


देखा आज

रास्ते में

घर जाते एक जीवित नर-कंकाल

हाथों की हड्डियों में थाम

कुछ खाता हुआ।



चिलचिलाती 

धूप में

नंगे पांव

ट्रैफिक के बीच

दौड़ता 

एक बचपन

अखबार-अखबार

आवाज लगाता हुआ।



पास से गुजरती 

सर-सर करती

पसीने से

तर-बतर

मलीन हाथों में थमी

एक लंबी झाडू

अपना काम कर जाती है

मेरी ...

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नैतिक हत्यारे -विष्णु नागर


हां जो हुआ दुखद था 

लेकिन हमारे हत्यारे सहृदय थे

उन्होंने बाप की हत्या की 

मगर बेटे को अधमरा छोड़ दिया

हां! उन्होंने पूरा घर उजाड़ दिया

मगर हत्यारों की नैतिकता तो देखिए

उन्होंने सत्रह साल की बेटी को

उंगली से भी छुआ तक नहीं 

मैं नमन करता हूं उन हत्यारों को

हमारा धर्म करुणा सिखाता है

और हमारा संगठन नैतिकता 

हम नैतिक हैं

...

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वीरेन डंगवाल को याद करते हुए उनकी दो कविताएं


(28 सितम्बर को लम्बी बीमारी के बाद उनकी बरेली में मृत्यु हो गयी। -सम्पादक)



1. परम्परा



पहले उस ने हमारी स्मृति पर डंडे बरसाए

और कहा -‘असल में यह तुम्हारी स्मृति है’

फिर उस ने हमारे विवेक को सुन्न किया

और कहा- ‘अब जा कर हुए तुम विवेकवान’

फिर उस ने हमारी आंखों पर पट्टी बांधी

और कहा- ‘चलो अब उपनिषद पढ़ो’

...

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हंसराज ‘रहबर’ की दो कविताएं


उनकी फितरत है कि वे धोखा करें 



उनकी फितरत है कि वे धोखा करें

हम पे लाजिम है कि हम सोचा करें। 



बज्म का माहौल कुछ ऐसा है आज

हर कोई ये पूछता है ‘‘क्या करें?’’।



फिर जवां हो जाएं दिल की हसरतें

कुछ न कुछ ऐ हमनशीं ऐसा करें।



वो जो फरमाते हैं सच होगा मगर

हम भी अपनी सोच को ताजा करें।



जो हुआ मालूम सब मालूम है,

...

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मुजफ्फरनगर 94-शेखर जोशी


    (संदर्भः उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन)

जुलूस से लौटकर आई वह औरत

माचिस मांगने गयी है पड़ोसन के पास।

दरवाजे पर खड़ी-खड़ी 

बतिया रही हैं दोनों

नहीं सुनाई देती उनकी आवाज

नहीं स्पष्ट होता आशय

पर लगता है

चूल्हे-चैके से हटकर

कुछ और ही मुद्दा है बातों का।



फ...

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त्रिलोचन की दो कविताएं


यही लोकतंत्र है



जंगल में जिन्हें बसना पड़ा है

देखा है मैंने उन्हें 

उनके किये धरे का लाभ तो

दिक्कू ही उठाते हैं



कछुए, सांप, मेढ़क उनके आहार हैं

उनको शराब दे कर बदले में

दिक्कू बनिया साग भाजी, फल, मूल, मधु

मनमाने मोल पर लेता है।

आज भी ये मकान और दुकान की

पहेलियां समझ नहीं पाते।



लुटेरे इन्हें लूटते हैं

नेत...

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सुबह-ए-आज़ादी- ये दाग़ दाग़ उजाला- फैज अहमद फैज


ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर

वो इंतजार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं



ये वो सहर तो नहीं जिस की आरजू लेकर

चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं

फलक के दश्त में तरों की आखरी मंजिल 

कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल

कहीं तो जा के रूकेगा सफिना-ए-गम-ए-दिल

जवां लहू की पुर-असरार शाहराहों से

चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े

दयार-ए-हुस्न की...

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सुखी लोग -संजय कुंदन


सुखी लोगों ने तय किया था कि अब केवल सुख पर बात होगी

सुख के नाना रूपों-प्रकारों पर बात करना

एक फैशन बन गया था यहां



सरकार भी हमेशा सुख की ही बात करती थी

उसका कहना था कि वह सबको सुखी तो बना ही चुकी है

अब और सुखी बनाना चाहती है

उसके प्रवक्ता रोज सुख के नए आंकड़े प्रस्तुत करते थे



सरकार के हर फैसले को सुख कायम करने की दिशा में

उठाया गया कदम बताय...

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अदम गोंडवी की दो कविताएं


जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे



जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे

कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे।



ये वंदे-मातरम् का गीत गाते हैं सुबह उठ कर

मगर बाजार में चीजों का दुगुना दाम कर देंगे



सदन में घूस दे कर बच गयी कुर्सी तो देखोगे

वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे



वो जिसके हाथ में छाले हैं पैंर...

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हर पहाड़ी का दिल रोता है- रेवती कुमार


छूट गया गांव 

छूट गया पहाड़

छूट गया हिमालय

छूट गया जंगल।

    मेरी प्यारी नदियां

    बहती हैं अभी भी अविरल

    तुम्हारे लिए मैं रोता हूं

    आंसू बहते हैं अविकल

कनाट प्लेस में खड़ा हूं

या अंधेरी ईस्ट में रहता हूं

काम करता हूं अनथक

दौड़ता ही रहता हूं इधर-उधर

    सब कुछ के बीच हूक उठती है

    पहाड़ों क...

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बीज


 बीज 

‘... ..... ....’

ठीक है।

काटी जा सकती है जुबान

पर उसे बंद करना

किसके बस का रोग है?

‘... .... .....’

ठीक है!

किया जा सकता है लफ्जों को जब्त

पर मन में छुपी आग को

कैसे चुराओगे?

‘... ..... .....’

ठहरो! 

मुझे हथकड़ी पहनाने से पहले

संविधान की उस धारा को बदलना होगा

जिसमें सच बोलने की छूट दी गयी है



‘.... .... .....’

जानता ...

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साधो, मिली-जुली ये कुश्ती -महेन्द्र नेह


साधों, मिली-जुली ये कुश्ती।

लोकतंत्र की ढपली ले कर करते धींगा-मुश्ती।।



जनता की मेहनत से बनती अरबों-खरबों पूंजी।

उसे लूट कर बन जाते हैं, चंद लुटेरे मूंजी।।



उन्हीं लुटेरों की सेवा में रहते हैं ये पण्डे।

जनता को ताबीज बांटते कभी बांटते गण्डे।।



इनका काम दलाली करना धर्म न दूजा इनका।

भले लूटेरा पश्छिम का हो या उत्तर-दक्खिन का।।



...

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हमारे समय में - शुभा


हम महसूस करते रहते हैं 

एक दूसरे की असहायता 

हमारे समय में यही है

जनतंत्र का स्वरूप



कई तरह की स्वाधीनता

है हमारे पास



एक सूनी जगह है

जहां हम अपनी असहमति

व्यक्त कर सकते हैं

या जंगल की ओर निकल सकते हैं



आत्महत्या करते हुए हम

एक नोट भी छोड़ सकते हैं

या एक नरबलि पर चलते

उत्सव में नाक तक डूब सकते हैं



...

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मनहूस आजादी -नाजिम हिकमत


तुम बेच देते हो --

अपनी आंखों की सतर्कता, अपने हाथों की चमक.

तुम गूंथते हो लोइयां जिन्दगी की रोटी के लिए,

पर कभी एक टुकड़े का स्वाद भी नहीं चखते

तुम एक गुलाम हो अपनी महान आजादी में खटनेवाले ।

अमीरों को और अमीर बनाने के लिए नरक भोगने की आजादी के साथ

तुम आजाद हो !



जैसे ही तुम जन्म लेते हो, करने लगते हो काम और चिन्ता,

झूठ की पवनचक्कियां गाड़ दी जाती ह...

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जब फासिस्ट मजबूत हो रहे थे


ब्रेख्त की याद मेंः जन्म दिन 10 फरवरी 1898


जर्मनी में

जब फासिस्ट मजबूत हो रहे थे

और यहां तक कि

मजदूर भी 

बड़ी तादाद में 

उनके साथ जा रहे थे

हमने सोचा

हमारे संघर्ष का तरीका गलत था

और हमारी पूरी बर्लिन में 

लाल बर्लिन में 

नाजी इतराते फिरते थे

चार-पांच की टुकड़ी में 

हमारे साथियों की हत्या करते हुए

पर मृतकों में उनके लोग भी थे

और हमारे भी

इसलिए हमने...

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तुम जो हाकि़मे-वक्त हो -महेश्वर


करोगे....?

करोगे तुम...?

सत्य को सेन्सर करोगे...?

और झूठ के सर धरोगे

पग्गड़ और जैतून की टहनी...?

और तुम समझते हो-

इतना खरदिमाग है वसंत

कि गर्दन में अमरबेल का फंदा डाल

लटक जायेगा नीम की डाल पर चुपचाप..?



गर्ज कि धमकाओगे...?

धमकाओगे तुम

हजारों-हजार वर्गमील धरती पर

जर्रे-जर्रे तक पहुंची हुयी धूप को...?

और

हमारे सतरंगे सपनों के उस ...

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नए साल की शुभकामनाएं! -सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


नए साल की शुभकामनाएं

खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पांव को

कुहरे में लिपटे उस छोटे से गांव को

नए साल की शुभकामनाएं!



जांते के गीतों को बैलों की चाल को

करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को

नए साल की शुभकामनाएं!



इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को

चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को

नए साल की शुभकामनाएं!



वीराने जंगल को तारों को रात को

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जवाब देना है -वेणु गोपाल


जवाब देना है

किसी ऐरे-गैरे को नहीं

बल्कि मुझे समंदर को जवाब देना है।



जिस धरती के टुकडे पर खड़ा हूं इस वक्त

उसे ही 

दरवाजे की तरह खोलकर

झांकता हूं- बाहर भी धरती ही है।



‘जमा-पूंजी कितनी है?’ खुद से पूछता हूं

और गुल्लक फोड़कर 

वे सारे खनखनाते दिन निकाल लेता हूं

जो 

नदियों ने दिए थे। समन्दर के लिए।



वे

सा...

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सदा रहे फिलिस्तीन -फदवा तूकान


महान

महान देश

चक्की का पाट घूम सकता है

बदल सकता है

संघर्ष की धुंधली रातों में

पर वे नहीं बदल सकते

बहुत कमजोर हैं वे

तुम्हारी रोशनी खत्म करने के लिए



तुम्हारी आशाओं में से

फांसी पर लटके विश्वास में से

चोरी गई शुभ्र मुस्कानों में से

खिलखिलाते हैं तुम्हारे बच्चे



तुम्हारी बर्बादी में से

घोर यंत्रणा में से

ज...

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वाम वाम वाम दिशा -शमशेर बहादुर सिंह


वाम वाम वाम दिशा,

समय: साम्यवादी।

पृष्ठभूमि का विरोध अंधकार-लीन। व्यक्ति --

कुहास्पष्ट हृदय-भार, आज हीन।

हीनभाव, हीनभाव

मध्यवर्ग का समाज, दीन।

 

किंतु उधर

        पथ-प्रदर्शिका मशाल

कमकर की मुट्ठी में - किंतु उधर:

        आगे-आगे जलती चलती है

        लाल-लाल

वज्र-कठिन कमकर की मुट्ठी में

        पथ-प्रदर्शिका म...

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सरमायेदारी -मजाज ‘लखनवी’


कलेजा फुंक रहा है और जबां कहने से आरी है,

बताऊं क्या तुम्हें क्या चीज यह सरमायेदारी है,



ये वो आंधी है जिसकी रौ में मुफलिस का नशेमन है,

ये वो बिजली है जिसकी जद में हर दहकन का खर्मन है



ये अपने हाथ में तहजीब का फानूस लेती है,

मगर मजदूर के तन से लहू तक चूस लेती है



यह इंसानी बला खुद खूने इंसानी की गाहक है,

वबा1 से बढ़कर मुहलक2, मौत से बढ़कर भयानक ह...

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अदम गोंडवी की दो कविताएं


मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की 



मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की

यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की



आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत

वो कहानी है महज प्रतिरोध की, संत्रास की



यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी

ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमा...

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आदमी और देश -केशव


सरहद के आर-पार

देश होते हैं

आदमी 

सरहद पर



आदमी 

देश के लिए लड़ता है

आदमी से 

देश के लिए

आदमी 

बस एक बंदूक होती है



आदमी के कंधे पर होती है

आदमी की आजादी 

देश के कंधे पर

आदमी का कब्रिस्तान होता है



आदमी 

सैनिक हैं

देश की हिफाजत के लिए

देश कुख्यात हैं

अदावत के लिए

गोली के सा...

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कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं (कवितांश)


मुक्तिबोध की याद में


तुम्हारे पास, हमारे पास,

सिर्फ़ एक चीज है-

ईमान का डंडा है,

बुद्धि का बल्लम है,

अभय की गेती है

हृदय की तगारी है - तसला है

नए-नए बनाने के लिए भवन

आत्मा के,

मनुष्य के,

हृदय की तगारी में ढोते हैं हमीं लोग

जीवन की गीली और

महकती हुई मिट्टी को।

जीवन-मैदानों में

लक्ष्य के शिखरों पर

नए किले बनाने में

व्यस्त हैं हमीं लोग

...

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चट्टान- केदार नाथ सिंह


चट्टान को तोड़ो

वह सुन्दर हो जायेगी

उसे तोड़ो

वह और, और सुन्दर होती जायेगी



अब उसे उठा लो

रख लो कंधे पर

ले जाओ शहर या कस्बे में 

डाल दो किसी चैराहे पर

तेज धूप में तपने दो उसे



जब बच्चे हो जायेंगे

उसमें अपने चेहरे तलाश करेंगे

अब उसे फिर से उठाओ

अबकी ले जाओ उसे किसी नदी या समुद्र के किनारे

छोड़ दो पानी में

उस पर...

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कुंअर बैचेन की दो कविताएं


कुछ काले कोट



कुछ काले कोट कचहरी के।



ये उतरें रोज अखाड़े में

सिर से भी ऊंचे भाड़े में

पूरे हैं नंगे झाड़े में



ये कंठ लंगोट कचहरी के।



बैठे रहते मौनी साधे

गद्दी पै कानूनी पाधे

पूरे में से उनके आधे



हैं आधे नोट कचहरी के



छलनी कर देते आंतों को

अच्छे-अच्छों के दांतों को

तोड़े सब रिश्ते-नातों को

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गुलाम देश का मजदूर गीत -दिविक रमेश


एक और दिन बीता

बीत क्या

जीता है पहाड़-सा



अब

सो जाऐंगे

थककर।



टूटी देह की

यह फूटी बीन-सी

कोई और बजाए

तो बजा ले

हम क्या गाएँ ?



हम तो

सो जाएंगे

थककर।



कल फिर चढ़ना है

कल फिर जीना है

जाने कैसा हो पहाड़ ?



फिर उतरेंगे



बस यूं ही

अपने तो

दिन बीतेंगे।



सच में तो

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शत्रु एक है -सुकान्त भट्टाचार्य


आज यह देश विपन्न है; निरन्न है जीवन आज,

मौत का निरन्तर साथ है, रोज-रोज दुश्मनों के हमले

रक्त की अल्पना आंकते हैं, कानों में गूंजता है आर्तनाद;

फिर भी मजबूत हूं मैं, मैं एक भूखा मजदूर।

हमारे सामने आज एक शत्रु है: एक लाल पथ है,

शत्रु की चोट और भूख से उद्दीप्त शपथ है।

कठिन प्रतिज्ञा से स्तब्ध हमारे जोशीले कारखाने में

हर गूंगी मशीन प्रतिरोध का संकल्प बताती ह...

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अछूत की शिकायत -हीरा डोम


हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी

हमनी के साहेब से मिनती सुनाइबि।

हमनी के दुख भगवानओं ने देखता ते,

हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।

पदरी सहेब के कचहरी में जाइबिजां,

बेधरम होके रंगरेज बानि जाइबिजां,

हाय राम! धसरम न छोड़त बनत बा जे,

बे-धरम होके कैसे मुंहवा दिखइबि।।1।।



खंभवा के फारी पहलाद के बंचवले।

ग्राह के मुंह से गजराज के बचवले।

धोती जु...

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शेखर जोशी की दो कविताएं


कारखाना-1 

यह कारखाना है

पुर्जों का ताना-बाना है

पुर्जे कुछ बड़े हैं 

पुर्जे कुछ छोटे हैं 

पुर्जे कुछ पतले हैं

पुर्जे कुछ मोटे हैं



मोटों की रगड़ से छोटे कभी जलते हैं

अरे भाई! दुनिया के काम यूं ही चलते हैं।



‘रगड़ कुछ कम हो

ग्रीज दो, तेल दो

जि़न्दगानी ड्रामा है

चार दिन खेल लो’



मन में नफरत हो पर म...

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चुनाव के पहले -केदारनाथ अग्रवाल


चुनाव के पहले

        आम आदमी रहा वह

पांव-पांव चलने का आदी रहा वह



अब 

    इमसाल 

    चुनाव के बाद

जीत की कुरसी हुआ वह

आम आदमी के बजाय चैपाया हुआ वह।



लोग 

        अब

        आदमी को नहीं-

चौपाये को- 

        जीत की कुरसी को

        सादर सलाम करते हैं

उसी के जिलाये ज...

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सूराज! सुराज! -केदारनाथ अग्रवाल


सुराज! सुराज!

मौत के घाट पर मारे गये आदमियों का



भौंडा अट्टहास!



न हुई चौबिस आदमियों की मृत्यु

दारुण राजतंत्र की मृत्यु

परेशान घूमती-फिरती है मेरी कविता

क्रांति के प्रवाह का विश्वास लिए।



समाधान खोजते

        और टटोलते हैं

मनबहलाऊ नरक के नायक

फाइलों में

प्रचारित विज्ञप्तियों की रोशनी जलाये,

कुर्सियों ...

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देवी प्रसाद मिश्र की दो कविताएं


  अस्वीकार की अनन्य

इन्द्र, आप यहां से जाएं

तो पानी बरसे



मारूत, आप यहां से कूच करें

तो हवा चले



बृहस्पति, आप यहां से हटें

तो बुद्धि कुछ काम करना शुरू करे



अदिति, आप यहां से चलें

तो कुछ ढंग की संततियां जन्म लें



रूद्र, आप यहां से दफा हों

तो कुछ क्रोध आना शुरू हो



देवियों-देवताओं! हम आपसे

जो कुछ कह रहें...

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अमीरी रेखा(कविता) -कुमार अंबुज


मनुष्य होने की परंपरा है कि वह किसी कंधे पर सिर रख देता है

और अपनी पीठ पर टिकने देता है कोई दूसरी पीठ

ऐसा होता आया है, बावजूद इसके

कि कई चीजें इस बात को हमेशा कठिन बनाती रही हैं

और कई बार आदमी होने की शुरूआत

एक आधी अधूरी दीवार हो जाने से, पतंगा, ग्वारपाठा

या एक पोखर बन जाने से भी होती है

या जब सब रफ्तार में हों तब पीछे छूट जाना भी एक शुरूआत है 

बशर्ते...

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हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं-मुकुल सरल


हमारे राज में

फूलों की ख़ुशबू!

कुफ्ऱ है ये तो!



हमारे राज में

शम्मां है रौशन!

कुफ्ऱ है ये तो! 



हमारे राज में

कोयल भला ये

कैसे गाती है?

कोई जासूस लगती है

किसे ये भेद बताती है?



हमारे राज में

क्यों तारे चमके?

चांद क्यों निकला?

दिलों में रौशनी कैसी? 

ये सूरज क्यों भला चमका?



हमारां राज है तो

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अमीरों का कोरस- गोरख पाण्डेय


जो हैं गरीब उनकी जरूरतें कम हैं

कम हैं जरूरतें तो मुसीबतें कम हैं

हम मिल-जुल के गाते गरीबों की महिमा

हम महज अमीरों के तो गम ही गम हैं



वे नंगे रहते हैं बड़े मजे में

वे भूखों रह लेते हैं बड़े मजे में

हमको कपड़ों पर और चाहिए कपड़े

खाते-खाते अपनी नाकों में दम है



वे कभी-कभी कानून भंग करते हैं

पर भले लोग हैं, ईश्वर से डरते हैं

जिसमें श...

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उन्हीं के लिए


-महेन्द्र नेह


अब 

उन्हीं के लिए यह कविता

जिनके हाथों से

छीन लिए गए औजार



यह जिंदगी

अब 

उन्हीं के लिए

जिनके मुंह से

झपट लिए गए निवाले



उन्हीं के लिए 

ये आंखे

जिनके सपनों को

कुचल दिया गया

और डाल दी गयी उन पर राख



ये कलम 

उन्हीं के लिए

सच्चाई और न्याय के

रास्ते पर चलने के जुर्म में



कत्ल कर दि...

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