लेबिल (कुल समाचार - 126): सम्पादकीय

हत्याओं का सिलसिला


    गौरी लंकेश की नृशंस हत्या ने कई सवाल और चुनौतियां एक साथ खड़ी कर दी हैं। उनकी हत्या ने ईद के समय जुनैद की हत्या की तरह लाखों लोगों को एक साथ झकझोर दिया। जुनैद एकदम मासूम नौजवान था तो गौरी लंकेश हिन्दू फासीवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके द्वारा संचालित भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, नीतियों की मुखर आलोचक थीं।

    जुनैद व गौरी लंकेश की हत्या से भले ही पूरा ह...

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संघर्ष की सजा


    पिछले दिनों ग्रेजियानो नोएडा के सालों से जेल में बंद मजदूरों पर अदालत ने अपना निर्णय सुना दिया। एक अधिकारी की हत्या के आरोप में 4 मजदूरों को उम्रकैद की सजा दे दी गयी। तीन तलाक व निजता के अधिकार पर निर्णय में अदालत की वाहवाही करने में जुटे पूंजीवादी मीडिया को मजदूरों को दी सजा को कवर करने का वक्त नहीं था। हाल के वर्षां में प्रिकाल, मारुति के बाद ग्रेजियानी तीसरी कम्पनी है जिसम...

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आस्था का संकट


    भारतीय समाज गहरे आत्मिक संकट के दौर से गुजर रहा है। इसकी वैसे हजारों अभिव्यक्तियां हैं परंतु सबसे गंभीर चीज तब सामने आती है, जब कोई किसी कारण से, आत्महत्या कर लेता है। 

     आत्महत्या का अर्थ है किसी व्यक्ति का किसी भी चीज पर आस्था का पूर्ण अभाव। न तो अपने आप पर और न ही समाज के किसी भी संबंध, मूल्यों पर विश्वास रह पाने के कारण व्यक्ति इस राह को चुनता है। आत्महत्या करने ...

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70 साल


    भारत सरकार, देश के शासक आजादी के 70 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहे हैं। 70 वर्ष पूर्व किसको, कैसी आजादी मिली थी यह आज के हालातों को देखकर अच्छे से समझा जा सकता है। मजदूरों-मेहनतकशों के जीवन के हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि प्रधानमंत्री का भाषण अब ऊब पैदा करता है। 15 अगस्त की छुट्टी रोज कमाने खाने वालों को भूखे पेट सोने को मजबूर कर देती है। देश के किसान आज आत्महत्या करने को मजबूर हैं...

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फिलवक्त युद्ध नहीं, युद्ध का माहौल चाहिये


    भारत के अपने दो विशाल पड़ोसी देशों चीन व पाकिस्तान के साथ रिश्ते तल्ख से तल्ख होते जा रहे हैं। चीन के साथ सिक्किम-भूटान सीमा पर चल रहा विवाद एक बड़े तनाव की ओर बढ़ रहा है। इस तनाव को बढ़ाने में भारत और चीन के राजनेता और सैन्य अधिकारी बढ़ चढ़ कर योगदान कर रहे हैं। इसी तनाव के बीच भारत, अमेरिका व जापान के साथ हिन्द महासागर में ‘मालाबार सैन्य अभ्यास’ कर रहा है। यह अभ्यास तनाव को और बढ़ा ...

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सौभाग्य नहीं दुर्भाग्य : जश्न नहीं मातम


    भारत में जबरन वस्तु एवं सेवा कर(जी.एस.टी.) थोप दिया गया है। इस मामले में सत्ता और विपक्षी पार्टियां खासकर भाजपा और कांग्रेस में अभूतपूर्व एकता है। आम मेहनतकश जनता इस कर सुधार को अजीबो गरीब निगाह से देख रही है तो छोटे-मझोले व्यापारी हैरान-परेशान हैं। 

    ‘एक राष्ट्र-एक कर’ का नारा उछालकर यह साबित किया जा रहा है कि यह देश को एकीकृत करेगा। यह देश की अर्थव्यवस्था में ...

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दिन में दिखाये तारे


    मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के किसानों के विद्रोह ने भारत के शासकों को दिन में तारे दिखा दिये। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के अहंकारी मुख्यमंत्री एकदम सीधे हो गये। एक तो अपने सिंहासन से जमीन पर बैठ गया तो दूसरा घोषणा करने लगा कि किसानों के सारे कर्ज माफ। 

    ये अच्छा हुआ कि किसानों ने आत्महत्या के बजाय संघर्ष की राह चुनी। ये अच्छा हुआ कि उन्होंने शासकों की मीठी बा...

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मोदी के तीन साल: नक्सलबाड़ी के पचास साल


    इसे तारीखों का दिलचस्प संयोग कहिए या फिर भारतीय समाज के यथार्थ का निष्ठुर वर्णन कि जिस तारीख को मोदी सरकार अपने तीन साल की उपलब्धियों का ढोल बजाने जा रही थी ठीक उसी वक्त इतिहास ने नक्सलबाड़ी के पचास साल होने के नगाड़े को बजा दिया।

    50 साल पहले नक्सलबाड़ी आजाद भारत के किसानों का ऐसा विद्रोह था जिसने भारत के इतिहास में अनेक लकीरें खींच दीं। किसान विद्रोह ने बतला दिया कि ...

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सहारनपुर से उपजते सवाल


    सहारनपुर की घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। गुजरात के ऊना की तरह ही पर कुछ अलग ढंग से यहां दलितों को निशाना बनाया गया और दलितों ने वैसे ही जवाब दिया जैसा एक हद तक दिया जाना चाहिये था।

    सहारनपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाल के वर्षों में मुस्लिमों और दलितों को भाजपा-संघ के नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा बार-बार निशाना बनाया गया है। धार्मिक व जातीय ...

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पूत ने अपने पांव पालने में ही दिखाये


    योगी सरकार को एक माह से अधिक समय हो चुका है। पूत ने अपने पांव पालने में ही दिखा दिये हैं। उन्होंने वही सब सबसे पहले किया जिसके लिये वे जाने जाते हैं या फिर जिसके लिये मोदी, संघ, भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री की गद्दी सौंपी।

    योगी की निजी सेना हिन्दू युवा वाहिनी ने अपने जलवे उनकी सत्ता के संभालते ही दिखा दिये। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा से जुड़े उपद्रवी संगठनों ...

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मई दिवस मनाने का मतलब


    हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी पूरी दुनिया में मई दिवस मनाया जायेगा। हर देश, हर शहर में मजदूर अपने लाल झण्डों और नारों के साथ अपनी एकता और मुक्ति का संकल्प लेंगे। लेकिन इस वर्ष का मई दिवस कई मामलों में भिन्न होगा। इस वर्ष का मई दिवस महान समाजवादी अक्टूबर क्रांति के शताब्दी वर्ष के साथ मनाया जायेगा। इस बात के ऐसे मायने निकलते हैं जो हमारे समय के आन्दोलन, संघर्ष और संगठनों की दिशा न...

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अन्याय जन प्रतिरोध को ही जन्म देगा


    मारुति के मजदूरों पर सेशन कोर्ट के फैसले पर पूरे देश के मजदूरों का व्याकुल और आक्रोशित होना स्वाभाविक है। यह फैसला दिखलाता है कि भारत की अदालतें मजदूरों और अन्य मेहनतकशों के साथ कैसा व्यवहार करती हैं। मजदूरों को दोषी ठहराने के लिए नाममात्र के प्रमाण भी न होने के बावजूद 13 मजदूरों को आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी। अदालत का लक्ष्य स्पष्ट था वह किसी भी तरह से मजदूरों को दोषी ...

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भगत सिंह को क्यों याद करें


    भगत सिंह को शहीद हुये आठ दशक से भी अधिक का समय हो चुका है। भारत में उनके शहीद होने के बाद लगभग दो पीढ़ियां गुजर चुकी हैं। जो देश किसी समय ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का गुलाम था आज खुद एक साम्राज्यवादी देश बनने के मंसूबे पालता है। समय काफी बदल चुका है और ऐसे में यह सवाल लाजिमी हो जाता है कि हम उन शहीदों को क्यों याद करें जो पिछली सदी में शहीद हुये थे। क्यों याद करें भगतसिंह, राजगुरू...

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यौन हिंसा और ‘‘आठ मार्च’’


    आज भारत में महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या को चिह्नित किया जाय तो वह महिलाओं के खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा है। इस हिंसा का शिकार मासूम अबोध बच्चियों से लेकर अति वृद्ध महिलाएं तक बन रही हैं। सरकारें, समाज महिलाओं को वह स्थान देने में एकदम अक्षम साबित हो रहे हैं जहां वे सुरक्षित व सम्मान के साथ जीवन जी सकें। वे हर जगह असुरक्षित हैं चाहे वह परिवार हो, अडोस-पड़ोस हो अथवा काम या सामाजिक जगहें ...

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झूठे दावे, खतरनाक इरादे


    हर कोई मानेगा कि बजट भले ही ऊपरी तौर पर आर्थिक मामला लगता हो पर वास्तव में यह एक राजनैतिक कार्यवाही है। ऐसी आर्थिक कार्यवाही जिसका मकसद सौ फीसदी राजनैतिक है। इस वर्ष पेश किये गये बजट की पहली लाइन पर ही जैसे ही गौर फरमाया जायेगा यह बात अपने आप स्पष्ट हो जायेगी। 

    नयी परम्परा शुरू करने वाला यह बजट ठीक चुनाव के मौके पर पेश किया गया है। और जिस दिन पेश किया गया उस दिन के ...

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जलीकट्टू के पीछे छिपे वास्तविक मुद्दे


    तमिलनाडु में मकर संक्रांति के बाद करीब एक सप्ताह तक ऐसा मुद्दा खड़ा रहा जो पहली नजर में एकदम ही तुच्छ लगता है। सांड़ों को साधने वाले खेल में जिसे तमिल में जलीकट्टू कहते हैं- हजारों युवाओं को सड़क पर ला दिया और 23 जनवरी को तमिलनाडु में विधानसभा में आनन-फानन एक कानून संशोधन विधेयक पास होने के बाद ही मामला काबू में आ पाया। 

    तमिलनाडु के चार-पांच जिलों में सांड़ों को काबू क...

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चुनावी मकड़जाल


    पांच राज्यों के चुनावों की घोषणा के साथ भारतीय राजनीति का चरित्र एक बार फिर खुलकर सामने आ रहा है। उच्चतम न्यायालय के जाति-धर्म सम्बन्धी नैतिक आदेश के बावजूद हर राजनैतिक पार्टी इसी गणित में उलझी है। घोर दक्षिणपंथी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नेता धार्मिक आधार पर मतों के ध्रुवीकरण के लिए अपनी जहरीली बातेें जोर-शोर से कर रहे हैं। यही स्थिति जाति के आधार पर मतों के ध्रुवीकरण ...

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बीता साल, आया नया साल


    दुनिया भर में चलन है; जाते हुए साल को अलविदा कहना और नये साल का स्वागत करना। और इस चलन के तहत बीते साल की अच्छी-बुरी बातों को याद करना और नये साल के लिए आशा पालना, नये इरादे जाहिर करना और कुछ नया करने का संकल्प लेना। क्योंकि हम भी इसी दुनिया के वासी हैं इसलिए हमें भी ऐसा करना होगा। अन्यथा तो पृथ्वी रोज ही अपनी धुरी पर घूमती है और हर वर्ष सूर्य का चक्कर लगाती है। रोज ही नया दिन है, रो...

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नोटबंदी: मेहनतकशों के लिए दुःस्वप्न


    जब 8 नवम्बर को प्रधानमंत्री ने 500 व 1000 रूपये के नोटों पर ‘‘ मैं धारक को 500 व 1000 रुपये अदा करने का वचन नहीं देता हूं’’ का ऐलान किया तब संघी व भाजपाई ही नहीं खुश थे तमाम वे लोग भी खुश थे जिनका कालेधन से दूर-दूर तक का कोई वास्ता नहीं था। उपरोक्त ऐलान का उददे्श्य कालेधन पर हमला भ्रष्टचार, आतंकवाद पर हमला बताया गया।

    नोटबंदी की घोषणा हुए एक महीना बीत गया है। 8 नवंबर की घोषण...

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मंदी की आहट


    धीमी और थरथराती आवाज में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक ऐसे सच का उद्घाटन कर दिया जिसने प्रधानमंत्री मोदी सहित उनके सब भक्त मण्डलियों के मुंह पर लगाम लगा दी। राज्य सभा में उनके भाषण ने पूरे देश के पूंजीपति वर्ग को उस सत्य से रूबरू करा दिया जिसे वह किसी भी कीमत में नहीं सुनना चाहते हैं। बात कुछ ऐसी है जैसे गम्भीर रोग से ग्रसित किसी व्यक्ति को बताया जाये कि जो उसका इलाज क...

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मोदी-बिन-तुगलक


    देश के प्रधानमंत्री जिस वक्त जापान में अपने जलवे बिखेर रहे थे ठीक उसी वक्त आम हिन्दुस्तानी सड़कों पर हैरान-परेशान होकर धूल फांक रहे थे। मोदी जी जिस वक्त बुलेट ट्रेन में बैठकर खुली-बंद आंखों से हसीन नजारे व सपने देख रहे थे ठीक उसी वक्त आम हिन्दुस्तानी घंटों से लाइन में खड़े होकर ‘नोट बदलने के चक्कर’ में गश खाकर गिर रहे थे। 

    काले धन से निपटने की मोदी जी की हरकत ने ...

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संकटग्रस्त पूंजीवाद जवाब समाजवाद


महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति का शताब्दी वर्ष


    पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) ने विश्व अर्थव्यवस्था के बारे में जो पूर्वानुमान वर्ष 2017 के लिए व्यक्त किया वह बेहद निराशाजनक है। विश्व अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर घटने और मंदी के खतरे की घोषणा की गयी। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, यूरोपीय यूनियन और जापान के बारे में कुछ भी सकारात्मक बातें नहीं कही गयीं। जो कहा गया उसका आशय यह ...

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‘‘सर्जिकल स्ट्राइक’’


    मोदी सरकार एक नये जुमले ‘‘सर्जिकल स्ट्राइक’’ के साथ पूरे देश को संघी देशभक्ति का पाठ पढ़ाने को तैयार है। ‘‘अच्छे दिन’’ का जुमला ढाई साल के भीतर ही मोदी और उनके मंत्रियों की गले की हड्डी बन चुका है। और अब उस हड्डी को ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के जरिये हटाया जा रहा है।

    ‘‘सर्जिकल स्ट्राइक’’ जैसे कदम सही हैं या गलत? सवाल इससे आगे वहां चला गया जहां सरकार, ...

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युद्ध कौन चाहता है


    उरी में सेना की छावनी पर हुए हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच घोर ‘शब्द युद्ध’ छिड़ गया है। भारत की ओर से पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए पूंजीवादी पार्टियां और उनके नेता एक से बढ़कर एक युद्धोंमादी बयान दे रहे हैं। कोई कुछ कह रहा है तो कोई कुछ। पाकिस्तान की ओर से इसे कश्मीर में भारत के द्वारा किये जा रहे दमन की प्रतिक्रिया बताया जा रहा है और युद्ध के मैदान में दो-दो हाथ कर ले...

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आम हड़ताल से निकलते कुछ सबक


    2 सितम्बर की हड़ताल पिछले वर्ष की भांति विभिन्न तरह के दावों के बीच सम्पन हो गयी। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने दावा किया कि इस हड़ताल में 15 करोड़ से अधिक कामगार शामिल हुये। भारतीय जनता पार्टी-संघ का मजदूर संगठन ‘भारतीय मजदूर संघ’ हड़ताल से विमुख रहा।

    एसोचैम ने पिछले वर्ष की हड़ताल में 25 हजार करोड़ रुपये के नुकसान की बात की थी इस वर्ष उसने बताया कि 18 हजार करोड़ रुपये का न...

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गरीब बिरयानी विक्रेताओं पर संघी सरकार की गाज


    ऊना में गौ रक्षकों द्वारा दलितों की पिटाई से उपजे आक्रोश के बाद प्रधानमंत्री मोदी और संघ दोनों को गौ रक्षकों से अपने आप को अलग दिखाने के लिये ढेर सारे शीर्षासन करने पड़े। लेकिन जैसे ही यह मामला थोड़ा शांत हुआ है भाजपा फिर से गाय की राजनीति को गरमाने की कोशिश कर रही है। इस बार इसके निशाने पर हरियाणा के मेवात जिले के बिरयानी बेचने वाले गरीब रेहड़ी वाले हैं। हरियाणा पुलिस ने यहां स...

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मोदी की पाकिस्तान नीति?


    जब से नरेंद्र मोदी ने भारत की सत्ता संभाली है तब से उनकी पाकिस्तान की नीति अजीब किस्म के विरोधाभास से भरी है। सत्ता संभालते ही अपने शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाया। फिर एक दिन पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ की मां के पांव छू आये। काबुल से लौटते हुए यकायक पाकिस्तान चले गये और ट्वीट करने लगे कि नाश्ता काबुल में तो लंच लाहौर में। और अब दो व...

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संघी मोदी का दलित प्रेम


    अचानक संघी प्रधानमंत्री मोदी को यह ज्ञान हो गया है कि देश में नियमों-कानूनों से स्वयं को ऊपर मानने वाले गौ-रक्षकों में अस्सी प्रतिशत से ज्यादा लोग असामाजिक तत्व हैं। ये असामाजिक तत्व रात में अन्य धंधों में लिप्त रहते हैं और दिन में गौ-रक्षा का दिखावा करते हैं। 

    इसी तरह मोदी को दलित उत्पीड़न से अचानक बहुत कष्ट होने लगा है। उन्होंने अपने संघी कार्यकर्ताओं से कहा ...

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ओह! कश्मीर!!


    दो हफ्ते से भी अधिक समय बीत चुका है परन्तु भारतीय शासक अपने क्रूर दमन और राजनैतिक पैंतरेबाजी के बावजूद कश्मीर को ‘‘काबू’’ में नहीं ला सके हैं। भारत के राजनैतिक नेतृत्व को सूझ ही नहीं रहा है कि वे क्या करें। 

    कई राजनेता कश्मीर के मसले पर जो कुछ वे कर सकते थे वह कर चुके हैं। सिवाय प्रधानमंत्री के। जो ये बात तो याद रखते हैं कि किस देश के राष्ट्रपति का कब जन्मदि...

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समान नागरिक संहिता: संघियों की कुटिल चाल


    समान नागरिक संहिता भाजपा और उसके संघ परिवार का पुराना एजेण्डा रहा है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण तथा जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में संविधान की धारा-370 के साथ यह एक ऐसा मुद्दा रहा है जिसे भाजपा अक्सर ही चुनावों के पूर्व उठाती रही है। एक बार फिर 2017 में होने वाले प्रदेश चुनावों के मद्देनजर भाजपा ने इस मुद्दे को उठाने का फैसला किया है। 

    इस बार भाजपा ने इस मुद्दे को उठा...

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ब्रिटेन के अलग होने के मायने


    ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से अलग होने के फैसले से विश्व राजनीति में एक नये चरण की शुरूआत हो गयी है। यूरोपीय यूनियन के भविष्य पर प्रश्न चिह्न लगने शुरू हो गये हैं। स्वयं ब्रिटेन के भी एकजुट बने रहने पर भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है। क्योंकि कुछ समय पूर्व हुए जनमत संग्रह में बहुत कम मत से ही स्काटलैंड के लोगों ने ब्रिटेन का हिस्सा बने रहने के पक्ष में मत दिया था।

    यू...

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कानूनों की परवाह


    हमारे देश में अजब स्थिति है जो लोग कानून बनाते हैं या जिनके ऊपर कानून को लागू करने की जिम्मेदारी है, वे कानून की सबसे कम परवाह करते हैं। परंतु जिनकी कानून बनाने या लागू करवाने में कोई भूमिका नहीं है, वे इसकी सबसे ज्यादा परवाह करते हैं।

    भारत की संसद में सैकड़ों लोग ऐसे बैठे हैं जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन या व्यक्तिगत आर्थिक हितों के लिए कानूनों की कतई परवाह नहीं ...

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कांग्रेस का भविष्य


    पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद यह चर्चा आम हो गयी कि कांग्रेस पार्टी का देश में भविष्य कुछ शेष नहीं रहा। ऐसी चर्चा खास तौर से संघ-भाजपा और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों की ओर से उठ रही है। असम, केरल में कांग्रेस के हाथ से सत्ता के जाने और बंगाल, तमिलनाडु में प्रमुख विपक्षी दलों से गठबंधन करने के बाद भी सत्ता हाथ न लगने को इन बातों के प्रमाण के रूप में पेश किया गया।...

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आत्म मुग्धता


    किसी का किसी पर मुग्ध हो जाना सामान्य बात मानी जा सकती है परन्तु यदि कोई अपने आप पर ही मुग्ध हो जाये तो इसे सामान्य बात नहीं माना जा सकता है। 

    आत्ममुग्धता क्या चीज होती है इसको यदि किसी को समझना हो तो वह उन क्षणों को याद कर सकता है जब हमारे देश के प्रधानमंत्री अपने ही मोम के पुतले के सामने खड़े थे। आत्मविभोर हुए प्रधानमंत्री शायद कलाकार के करिश्मे पर उतने फिदा नहीं...

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‘‘संघ मुक्त भारत’’


    बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने अपनी पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद एक दिलचस्प नारा दिया ‘‘संघ मुक्त भारत’’। यह नारा मोदी-शाह के ‘‘कांग्रेस मुक्त भारत’’ की तर्ज पर गढ़ा गया है। 

    सवाल यह उठता है कि क्या यह नारा सही है। और उसके बाद यह सवाल उठता है कि क्या नारा देने वाले वाकई अपने नारे के अनुसार काम करने को तैयार हैं? क्या नारा देने वालों का अतीत ऐसा र...

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वाह! लोकतंत्र अहा! लोकतंत्र


     पूंजीवादी लोकतंत्र में कैसे-कैसे दृश्य उत्पन्न हो सकते हैं इसका नजारा देखना हो तो उत्तराखंड को देखना चाहिए। 

    यहां ऐसी कोई संस्था नहीं बची जिसने अपनी फजीहत नहीं करायी। उत्तराखंड में जो कसर बची थी उसकी पूर्ति केन्द्र सरकार ने कर दी।    सत्ता लोलुपत्ता क्या-क्या करवा सकती है वह कांग्रेस भाजपा के व्यवहार से दिखता है। भारतीय कानून और न्याय व्यवस्था खुद कैसे अप...

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गृह कलह


    आये दिन अखबारों में गृह कलह के कारण होने वाली आत्महत्याओं की खबरें छपती रहती हैं। कई बार मियां-बीबी के झगड़े घर की सरहद नाप कर थाने तक पहुंच जाते हैं। और जब ऐसा होता है तो इन खबरों को खूब मिर्च-मसाला लगाकर दूर-दूर तक पहुंचाया जाता है। 

    ऐसा नहीं है कि गृह कलह के दायरे में सिर्फ मियां-बीबी के सम्बन्ध हैं बल्कि शायद ही ऐसा कोई सम्बन्ध हो जो इस दायरे में न हो। पिता-पुत्...

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चीखो ! और जोर से चीखो !


    कुछेक टी.वी. न्यूज चैनलों के एंकरों को छोड़ दिया जाये तो बाकियों को चीखने का दौरा पड़ा है। कई न्यूज चैनलों के एंकर तो इतने जोर से चीख रहे हैं कि यह समझना ही मुश्किल हो जाता है कि वह क्यों चीख रहे हैं। इतने आधुनिक संवेदनशील उपकरणों के होते हुए चीखने की क्या जरूरत है। यही हालात न्यूज चैनलों द्वारा आयोजित/प्रायोजित बहसों के समय होते हैं। सब चीख रहे होते हैं, एंकर, भागी, प्रतिभागी स...

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उल्टी पड़ती चाल


    हरियाणा में जाटों द्वारा आरक्षण की मांग के साथ आरक्षण के सवाल पर फिर गरमागरम बहस समाज में छिड़ गयी। और एक तरह से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कर्ता-धर्ता मोहन भागवत की ‘आरक्षण पर पुनर्विचार’ की बात पर समाज में चर्चा आरम्भ हो गयी। परन्तु यह चर्चा अपने दारुण अंत के लिए अभिशप्त है। 

    सवर्ण जातियों के मध्यमवर्गीयों ने जाट आंदोलन के दौरान मचे ताण्डव को आधार बनाकर ...

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एक घर जो बस न सका


    यह कहानी एक ऐसे घर की है जिसे बसाने की बहुत सी कोशिशें हुयीं परन्तु वह बसते-बसते बस नहीं पाया। घर बहुत बड़ा है, सदस्य भी बहुत हैं। घर के हर प्राणी के दिल में कभी न कभी यह ख्याल आ जाता है कि काश! हम एक हो जायें। 

    एक होने की कल्पना में ही वे इतने भाव विभोर हो जाते हैं कि घर को एकजुट करने का वास्तविक जरूरी काम ठीक से कभी नहीं हो पाता। कल्पना में वे सब विरोधियों को परास्त कर ...

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गणतंत्र दिवस का महत्व


    पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी भारतीय गणतंत्र दिवस की शोभा एक ऐसा व्यक्ति बढ़ा रहा होगा जिसके हाथ खून से सने होंगे। एक ऐसा व्यक्ति जिसने जब से फ्रांस के राष्ट्रपति का पद संभाला है तब से फ्रांस ने एक के बाद दूसरे देश की सम्प्रभुता को अपने पांव तले रौंदा है।

    क्यों ऐसा हो रहा है कि भारत के गणतंत्र दिवस के अवसर पर ऐसे देशों के प्रमुखों को बुलाया जाता है जिनका इतिहास दू...

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संसद और कामकाज


    भारत की संसद का शीतकालीन सत्र पिछले दिनों समाप्त हो गया। इस सत्र की समाप्ति के बाद काफी हो-हल्ला मचा कि संसद में इतने ही घंटे काम हुआ। इतने महत्वपूर्ण बिल संसद के सामने मौजूद थे परन्तु पास नहीं किये गये। बिला-वजह के मामलों को तूल देकर विपक्षी पार्टियों ने संसद के नेक इरादों और कामों पर पानी फेर दिया। संसद की महान परम्पराओं का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। 

    यह भी कम मज...

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नायकों और तिथियों की तलाश


    शायद ही दुनिया में ऐसा किसी के साथ हुआ हो जैसा भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा के साथ हो रहा है। इनका बेहद दरिद्र इतिहास इन्हें मजबूर कर रहा है कि वे उन व्यक्तियों को भी अपना लें जो अपने जीवनकाल में इनके घोर विरोधी रहे हैं। भारत की आजादी की लड़ाई में इनके पास अपने इतिहास का एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसकी भारत की जनता में कोई प्रतिष्ठा हो। उनकी कोई छवि भारत की जनता के...

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यह गर्व की नहीं शर्म की बात है


    भारत का गणतंत्र दिवस साम्राज्यवादी देशों के साथ एकजुटता का प्रतीक बनता जा रहा है। इस वर्ष दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्यवादी देश स.रा.अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि थे। अगले वर्ष 2016 में दुनिया की एक और बड़ी आक्रामक साम्राज्यवादी शक्ति फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद मुख्य अतिथि होंगे।

    भारत के शासक ऐसा क्यों कर रहे हैं। वे क...

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अपने जाल में फंसते मोदी


    नरेन्द्र मोदी उनकी पार्टी और हिन्दू फासीवादी संगठन संघ ने बिहार चुनाव में जीतने के लिए वह सब कुछ किया जो वे कर सकते थे। या दूसरे शब्दों में चुनावों में जीत हासिल करने के लिए वे जो कुछ करते रहे हैं, वही किया। 

    यह जगजाहिर बात है कि आम चुनाव में मोदी को प्रचण्ड बहुमत दिलाने में हमारे देश की दो प्रमुख ताकतों: एकाधिकारी पूंजी और हिन्दू फासिस्टवादी आंदोलन चलाने वाले र...

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भारत और अफ्रीका


    26-29 अक्टूबर को भारत और अफ्रीका महाद्वीप के 54 देशों के नेताओं के बीच तीसरा सम्मेलन आयोजित हुआ। इससे पहले दो ऐसे सम्मेलन 2008 में दिल्ली तथा 2011 में इथियोपिया की राजधानी आदिस अबाबा में आयोजित किये जा चुके हैं। यह सम्मेलन इस मामले में अलग है कि इस बार सभी अफ्रीकी देशों के प्रमुख नेता इसमें भाग ले रहे हैं जिनमें से 40 राष्ट्राध्यक्ष हैं। इतने बड़े पैमाने पर अफ्रीकी राष्ट्राध्यक्षों क...

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बिहार का चुनाव


    बिहार में विधानसभा के चुनाव ने इस बार ऐसा महत्व ग्रहण कर लिया है मानो वह कोई आम चुनाव हो। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने इस चुनाव में अपनी ताकत फिर उसी तरह से झोंक दी जिस तरह दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय झोंकी थी। 

    खबर है कि बिहार विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री 40 से अधिक चुनाव सभाएं कर रहे हैं। भाजपा के तडीपार रह चुके अध्यक्ष कई हफ्तो...

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धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाम् वास्तविक धर्मनिरपेक्षता


    कहा जाता है कि किसी सच को झूठ से ढंकना हो तो उस झूठ को 100 बार दोहराया जाना चाहिए। भारत की संघ-भाजपा मंडली इस काम में सिद्धहस्त है और सबसे ज्यादा सिद्धहस्त हैं इसके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। पिछले लोकसभा चुनावों में इनके बारम्बार झूठ से गुजरात के विकास माॅडल को स्थापित किया गया और गुुजरात हर किसी को विकसित नजर आने लगा। लोकसभा चुनावों के एक वर्ष बाद भी प्रधानमंत्री अपनी वाक...

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हड़ताल से उपजे प्रश्न


    2 सितम्बर की हड़ताल का देश के कई हिस्सों में व्यापक असर रहा। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों का दावा है कि इस हड़ताल में भाग लेने वाले मजदूरों की संख्या 15 करोड़ से अधिक थी। पूंजीपतियों के एक संगठन ने अनुमान जताया कि इस हड़ताल से 25 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। 

    हड़ताल का क्योंकि व्यापक प्रभाव पड़ा इसलिए उसे नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया था इसलिए हड़ताल के खिलाफ खूब डट...

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समस्यायें और उनके प्रति नजरिया


    हमारे समाज में बेशुमार समस्यायें हैं। ये समस्यायें आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, आत्मिक सभी तरह की हैं। आम अहसास यही है कि हमारे समाज की समस्यायें हल होने के स्थान पर रोज-ब-रोज गहराती जा रही है। 

    समाज की अधिकांश समस्याओं के बारे में आम लोग अपनी-अपनी राय रखते हैं परन्तु ‘वे कुछ कर नहीं सकते’ का बोध बहुत गहरा है। अधिकांश लोग जब इन समस्याओं के बारे में सोचते हैं तो व...

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अनिवार्य मतदान का विरोध जरूरी


    गुजरात सरकार ने स्थानीय निकाय चुनाव में मतदान करना अनिवार्य बनाते हुए मतदान न करने पर 100 रु. जुर्माना भरने का प्रावधान तय कर दिया है। सरकार इस प्रावधान को और कड़ा बनाते हुए मतदान न करने वालों को विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित करने पर विचाररत है। हालांकि पहले सरकार का इरादा 500 रुपये जुर्माना तय करने का था पर विरोध की आशंका के मद्देनजर इसे फिलहाल 100 रु. रखा गया है। विकला...

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दक्षिण पंथियों की जल्लादी मानसिकता


    याकूब मेमन को फांसी के सिलसिले में एक बार फिर यह देखने में आया कि दक्षिणपंथी सोच के लोग जल्लादी मानसिकता के होते हैं। वे बड़े अपराध के लिए अपराधियों को फांसी चढ़ाने या मौत की सजा देने के पक्षधर होते हैं। वे आमतौर पर ही अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा देने के पक्ष में होते हैं। उनके अनुसार इसी से अपराधों को रोका जा सकता है और समाज को सुरक्षित बनाया जा सकता है।

    दक्षिणप...

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आजादी आज


    भारत को आजाद हुए कई बरस बीत गये। और बीतते ही जा रहे हैं परन्तु जैसे ही पन्द्रह अगस्त आता है वैसे ही देश की फि़जा में कुछ ऐसी बातें गूंजने लगती हैं कि बस दिल चाहता है कि इस फसाने को कोई न छेड़े। कोई यह न याद दिलाये कि हम क्यों और कैसे आजाद हुए। कोई शहीदों की बातें न करे और न कोई हमें यह बताये कि आज हम क्या करें।         

    ऐसा लगता है भारत के हृदय में कोई गहरा जख्म है ज...

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और गहराता विश्व आर्थिक संकट


    जून-जुलाई माह में तीन प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं विश्व बैंक, आर्गनाइजेशन फार इकोनोमिक को-आपरेशन एण्ड डेवलपमेंट (ओईसीडी) व अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष(आईएमएफ) की रिपोर्ट जारी हुयी। वर्ष 2007 से जारी आर्थिक संकट के इस दौर में ये रिपोर्ट जो सबसे महत्वपूर्ण काम करती है वह यह कि वे वृद्धि दर में घोषित अपने पूर्वानुमानों को घटा देती हैं। विकसित देशों के समूह ओईसीडी की रिपोर्ट न...

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ये सब क्या है ?


    पिछले दिनों भारतीय पूंजीवादी राजनैतिक दायरे में ललित मोदी प्रकरण के बाद नजारा बहुत दिलचस्प हो गया है। वाचाल एकदम मौन हो गये हैं तो अपनी हार के बाद से मौन धारण किये हुए वाचाल हो गये हैं। चीजें अपने विपरीत में बदल गयीं। जो कल तक आक्रामक मुद्रा में थे वे रक्षात्मक हो गये। इधर-उधर छिपने वाले हमलावर हो गये। भारतीय जनता पार्टी अब कल की कांग्रेस हो गयी और आज की कांग्रेस कल की भाजपा ह...

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नैतिक प्राधिकार


    सामाजिक संघर्षों में नैतिक प्राधिकार का प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है। किसी भी संघर्ष की जीत या हार सबसे पहले नैतिक क्षेत्र में तय हो जाती है। नैतिक जीत वास्तविक जीत को बेहद आसान बना देती है। नैतिक जीत संघर्ष करने वालों के मनोबल को ऊंचाकर उनकी वास्तविक जीत की पटकथा तैयार कर देती है। 

    नैतिक प्राधिकार का निर्माण मूलतः सिद्धांतों और मूल्यों से होता है। जाहिर है आज ...

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अच्छे दिन


    दुनिया भर में छाये आर्थिक संकट को लगभग आठ वर्ष का समय हो गया है। स्थिति इन वर्षों में यह हो गयी है कि जितने दावे इसमें सुधार के किये जाते हैं वे एक माह तो क्या एक हफ्ते तक भी नहीं टिक पाते हैं। 

    अच्छे दिन के वायदों के साथ आयी भारत के राॅक स्टार प्रधानमंत्री की सरकार को भी भारी शोर-शराबे के बीच एक साल हो गया है। भारत की अर्थव्यवस्था में अभी तक सुधार के कोई खास चिह्न नह...

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सहायता बनाम राजनैतिक मौका


    सड़ता-गलता पूंजीवादी समाज इससे ज्यादा और क्या वीभत्स दृश्य उत्पन्न कर सकता था जो पिछले दिनों नेपाल में आये भूकंप के बाद राहत और सहायता के नाम पर पैदा किये गये। 

    भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री अपने अतीत के अनुभवों से अच्छी तरह जानते थे कि इस ‘मौके’ का लाभ कैसे उठाया जा सकता है, कैसे लाशें राजनैतिक सीढ़ी का काम करने लगती हैं। भुज में आया भूकंप रहा हो अथवा गोधरा क...

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दलितवाद


    कोई कह सकता है कि जिस समाज में शोषण-उत्पीड़न होगा उस समाज में उसके खिलाफ प्रतिकार भी होगा। यह बात अपने आप में ठीक लग सकती है परन्तु जैसे ही इसे समाज के विकास के संदर्भ में लागू करेंगे तो भिन्न बातें सामने आने लगेंगी।

    असल में शोषण-उत्पीड़न हो सकता है कि लम्बे समय से मौजूद हो और यह लम्बा समय सदियों का भी हो सकता है परन्तु उस लम्बे समय में अपने शोषण-उत्पीड़न के प्रति जो...

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किसानों के मित्र


    जब से मोदी सरकार भू-अधिग्रहण अध्यादेश लायी तब से पूरे देश में किसानों के हजारों की संख्या में मित्र सामने आ गये हंै। इन मित्रों में स्वयं प्रधानमंत्री मोदी, कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गांधी से लेकर हजारों चर्चित-अचर्चित चेहरे हैं। कुछ तो इन्हीं दिनों विज्ञापन ग्रस्त खबरिया हिन्दी चैनलों के कारण चर्चित हुये हैं।

    किसानों के इतने मित्र हैं फिर भी किसान ...

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भारतीय क्रांति के प्रतीक भगतसिंह


    जैसे हमारे देश के हालात हैं और जिस ढंग से वे बद से बदतर होते जा रहे हैं। ऐसे मौके पर भगतसिंह की याद आना स्वाभाविक है। उन्हें याद करने का सीधा अर्थ है, ‘‘आओ मुकाबला करें’’।

    भगतसिंह भारतीय क्रांति के प्रतीक हैं। वे ऐसी क्रांति के प्रतीक हैं जो आज तक उस मंजिल को हासिल नहीं कर सकी जिसे हासिल करने के लिए उनके पहले और बाद में हजारों-हजार लोगों ने एक नये भविष्य को भार...

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आठ मार्च


    इतिहास में प्रतीकों का कभी-कभी बड़ा महत्व हो जाता है। चाहे-अनचाहे सभी को ऐसे प्रतीकों के संदर्भ में कुछ कहना पड़ता, कुछ करना पड़ता है। आठ मार्च का दिन एक ऐसा ही प्रतीक है जिस दिन सभी को औपचारिक या वास्तविक तौर पर महिला मुक्ति के संदर्भ में कुछ कहना पड़ता है। असली या रस्मी तौर पर सभी को कुछ न कुछ करना पड़ता है। 

    आठ मार्च महिला मुक्ति खासकर महिला श्रमिकों की मुक्ति ...

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वक्त बड़ा बलवान


    दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम सब को चौंकाने वाले रहे। जीतने वाला अच्छी जीत से डर गया और हारने वालों की बोलती बंद हो गयी। भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव में ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दिया और उसे लोकसभा में इस लायक भी नहीं समझा कि उसे विपक्षी पार्टी का दर्जा मिल सके। कदाचित यही स्थिति भाजपा की दिल्ली विधानसभा में हो गयी। देशी कहावत है वक्त बड़ा बलवान।

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जुगुप्सा जगाते सम्बन्ध


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का बहु प्रचारित तीन दिवसीय भारतीय दौरा भारत के शासकों को उनकी हैसियत बताते हुए समाप्त हो गया। इन तीन दिनों में यह नहीं लगा कि कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह में शरीक होने आया हुआ बल्कि ऐसा महसूस हुआ कि पूरा ही गणतंत्र जैसे उसके सामने बंधक हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति की चमक-धमक में भारतीय गणतंत्र समारोह की गरिमा कहीं लु...

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उनका गणतंत्र, उनका अतिथि


किसी भी देश के इतिहास में कई घटनाएं ऐसी घटती हैं जो अपने चरित्र में निर्णायक साबित होती हैं। इन घटनाओं के बाद देश पहले जैसा नहीं रह जाता है और वह एक नई जमीन पर खड़ा हो जाता है। इस नई जमीन पर खड़े देश के कर्ता-धर्ता यह तय कर देते हैं कि अब भविष्य क्या होगा?

 भारत के आधुनिक इतिहास में पहले ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के प्रत्यक्ष शासन से मुक्ति और फिर एक गणतंत्र की घोषणा ऐसी घटनाओं में ...

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शर्म! शर्म!! शर्म!!!


    26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस पर संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को मुख्य अतिथि के बतौर बुलाकर नरेन्द्र मोदी ने भारत के इतिहास की सबसे बड़ी शर्मनाक घटना को अंजाम दे दिया। यह घटना ऐेसी ही है कि इसकी जितनी निंदा की जाये उतनी कम है। जितना इसका विरोध किया जाये उतना कम है। 

    बराक ओबामा एक ऐसे देश के राष्ट्रपति हैं जिसने पिछली एक सदी से भी ज्यादा ...

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भारत के मजदूर और चुनौतियां


    भारत का मजदूर आंदोलन इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है। यह मोड़ मजदूर आंदोलन में मजदूर वर्ग की नयी सक्रियता के वजह से आ गया है। पूरे भारत में मजदूर वर्ग में हाल के वर्षोंं में खासकर गहराते आर्थिक संकट के साथ पुराने जमाने की ट्रेड यूनियनें अपने चरित्र के कारण सक्षम नहीं हो पा रही हैं। वे पीछे छूट रही हैं। वे अक्सर ही अपने चरित्र के कारण मजदूर आंदोलन में जो भूमिका निभा रही हैं व...

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संघ और मोदी का विज्ञान


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक लम्बे समय से यह प्रचारित करता रहा है कि प्राचीन भारत में विज्ञान और तकनालाजी बहुत उन्नत थी, इतनी कि आज भी उसका कोई मुकाबला नहीं है। आज की हर नयी तकनालाजी को वे अपने वेद-पुराणों में खोज निकालते हैं।

    जब तक विज्ञान और तकनालाजी के बारे में यह धारण केवल संघ से जुड़े हुए अर्धशिक्षित कस्बाई कूपमंडूकों तक सीमित थी तब तक इसे मजे से नजरअंदाज किया जा सकता ...

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ओबामा, मोदी और गणतंत्र दिवस


 अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत आ रहे हैं। पूंजीवादी मीडिया, भारत सरकार सभी बहुत खुश हैं। उनकी खुशी कुछ उसी तरह की है जैसी किसी सड़क छाप गुंडे को शहर के डाॅन के अपने घर आने पर होती है। खुशी दो गुनी तब हो गयी जब डाॅन ने पड़ोस...

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सफलता में छुपी असफलता


    हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों के बाद मीडिया द्वारा नरेन्द्र मोदी का सितारा और बुलंद घोषित किया गया। इस वक्त पूंजीवादी मीडिया में नरेन्द्र मोदी के नाम का डंका बज रहा है। हद तो यह है कि अब निजी पूंजीवादी मीडिया सरकारी मीडिया की भौंडी नकल बन चुका है। सत्य कहने का साहस इस मीडिया में पहले भी नहीं था। अब तो लगता है कि हम एक ऐेसे जमाने में प्रवेश कर चुके हैं जहां जुमले, फिक...

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जवाहर लाल नेहरू


    भारत का शासक वर्ग जवाहर लाल नेहरू की 125 वीं जन्मशती मना रहा है। नेहरू के जन्मशती के समय केन्द्र में यदि कांग्रेस की सरकार रही होती तो शायद ज्यादा तड़क-भड़क होती, परंतु मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जन्मशती के जलवों में तो कमी आ जायेगी परंतु उनके लिए कांग्रेस मुक्त भारत के नारे के बीच भी नेहरू की जन्मशती को मनाना वर्गीय मजबूरी और दायित्व है।

    जवाहर लाल नेहरू की आ...

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भारत और अमेरिका


    पिछले दिनों भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा बेहद फूहड़ ढंग से भारतीय मीडिया में चर्चा का विषय बनी। हालांकि इसके लिए मीडिया से ज्यादा स्वयं मोदी के तौर-तरीके और भाषा-शैली जिम्मेदार है। 

    नरेन्द्र मोदी का हालिया वर्षों का राजनैतिक उत्थान भारतीय किस्म का नहीं खालिस अमेरिकी किस्म का है। एकाधिकारी पूंजी के द्वारा अपने घृणि...

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‘मेक इन इण्डिया’


    भारत के नये प्रधानमंत्री की कई खूबियां हैं परन्तु एक खूबी यह है कि वे एक से बढ़कर एक जुमले उछालते हैं। साथ ही प्रचलित शब्दों या वाक्यों के नये अर्थ भरने के लिए सस्ती तुकबंदी करते हैं। वह ऐसा क्यों करते हैं ऐसा तो वे ही जानें। परन्तु इस बात का एक गहरा अर्थ यह है कि सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का यह स्कूली किताबी तरीका अपने आप में हमारे प्रधानमंत्री और शासक वर्ग की ज्ञान और विचा...

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कांग्रेस का संकट


     आम चुनाव के परिणामों के बाद अगर देश में किसी संकट की सबसे ज्यादा चर्चा है तो वह है कांग्रेस का संकट। कांग्रेस का संकट वस्तुतः क्या है?

    कांग्रेस पार्टी की इन चुनावों में इतनी दुर्गति होगी इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। जिस प्रकार भारतीय जनता पार्टी की बड़ी सफलता की कल्पना नहीं की गयी थी। कांग्रेस की दुर्गति और भाजपा की सफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और यह सि...

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राज्य के भीतर कितने राज्य


    भारतीय राज्य (इण्डियन स्टेट) के भीतर राज्यों(स्टेट्स) की संख्या अनगिनत है और इनमें विभिन्न तरीकों से निरन्तर इजाफा हो रहा है। भारतीय राज्य की तरह ये राज्य भी अपनी सीमाओं में सम्प्रभु हैं और इन्हें भारतीय संविधान से कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इन राज्यों के भीतर कम और ज्यादा वे सभी चीजें दृष्टिगोचर होती है जो एक राज्य की निशानी मानी जाती है। 

    एक शासक, उसका मंत्र...

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प्रतिक्रियावाद की आंधी


    भारत की एकाधिकारी पूंजी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठजोड़ के जो नतीजे निकलने थे, वे सामने आने लगे हैं। केन्द्र में काबिज सरकार जहां तेजी से आर्थिक व श्रम सुधार के कार्यक्रम में लगी है वहां संघ और उसके अनुषंगी संगठन पूरे देश के हिन्दुत्वकरण में। सरकार और संघ की इस जुगलबंदी की चपेट में देश की हर संस्था आती जा रही है। संघ की पाठशाला में दोहराये जाने वाली बातें और कुतर्क आज ट...

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पन्द्रह अगस्त


    15 अगस्त के आते ही पूरे देश में भारत की आजादी के बारे में कई किस्म की बातें एक साथ सुनाई देने लगती हैं। शासक वर्ग का जश्न जहां विक्षुब्ध करता है वहां प्रधानमंत्री का भाषण ऊब। देश के मजदूर-किसान सहित करोड़ों शोषित-उत्पीडि़तों का जीवन आजादी पर स्वाभाविक प्रश्न खड़ा कर देता है। 

    1947 से अब तक भारत की यात्रा के दौरान भारत के मजदूर-मेहनतकशों, शोषित-उत्पीडि़तों ने गुलाम भ...

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प्रथम विश्व युद्ध


    आज से ठीक सौ वर्ष पहले 1914 में (28 जुलाई से प्रारम्भ) प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ था। यह युद्ध 1919 तक किसी न किसी रूप में जारी रहा हालांकि औपचारिक तौर पर 11 नवम्बर 1918 को जर्मनी के आत्मसमर्पण के साथ इसे समाप्त मान लिया गया है। निर्णायक तौर पर प्रथम विश्व युद्ध वर्साय की संधि के साथ समाप्त हुआ। लगभग पांच वर्ष तक चले इस युद्ध ने यूरोप के नक्शे को ही बदल दिया। और इस युद्ध में एक करोड़ से अधिक ...

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क्षत-विक्षत इराक


    हाल के दशकों में अमेरिका सहित पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने जहां कहीं भी हस्तक्षेप किया उस देश को क्षत-विक्षत करके रख दिया। यूगोस्लाविया, सूडान, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया, यूक्रेन, इराक आदि देश इसके उदाहरण हैं। इराक के मौजूदा हालात ऐसे हैं कि देश तीन भागों में बंट सकता है। लाखों लोग अमेरिका द्वारा थोपे गये युद्ध और उसके बाद अपनायी गयी घृणित नीतियों के कारण मारे जा चुके हैं...

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बढ़ती यौन हिंसा


    भारतीय समाज का वीभत्स यथार्थ एक के बाद दूसरी घटना से सामने आता रहता है। बदायूं की घटना ने निर्भया कांड जैसी राजनैतिक सनसनी और हलचल को जन्म दिया। शासक वर्ग का हर व्यक्ति, हर संस्था अपनी संवेदनशीलता का ऐसा प्रदर्शन कर रही थी कि खुद संवेदनशीलता शरमा जाए।

    कठोर कानून की मांग से लेकर बेशर्म राजनीतिज्ञों की भोंथरी दलीलों के बीच यह सवाल खड़ा है कि स्त्रियों के खिलाफ यौ...

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अंधकार का विकल्प घोर अंधकार नहीं केवल प्रकाश है


    भारत के पूंजीपति वर्ग को इन आम चुनावों के जरिये वह सब कुछ फिलहाल हासिल हो गया जो वह चाहता था। उनका पसंदीदा आदमी देश का प्रधानमंत्री बन चुका है। उनकी ‘ड्रीम सरकार’ अस्तित्व में आ गयी है।

    भारत के एकाधिकारी घराने इस चुनाव में मोदी और भाजपा के साथ मूलतः खड़े थे। उन्होंने वह सब कुछ किया जो वे इस चुनाव के जरिये हासिल करने के लिए कर सकते थे। झूठ, अर्द्धसत्य, मक्कारी की ...

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आम चुनाव में मजदूर वर्ग


    भारत के आम चुनाव में मजदूर वर्ग कहीं नहीं है। वह न तो पूंजीवादी पार्टियों के घोषणापत्र में है और न ही नेताओं के सम्बोधन में है। गाहे बगाहे किसी ने कुछ कह दिया तो कह दिया। यही हाल मजदूरों के नाम पर राजनीति करने वाली तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियों की है। सुधारवाद और संशोधनवाद के जिस दलदल में वे उतरी थीं आज उसमें पूरी तरह से समा चुकी हैं। वे भौतिक और आत्मिक तौर पर इस स्थिति में बची...

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आम चुनाव और मध्यम वर्ग


    भारतीय समाज में मध्यम वर्ग मुखर वर्ग है। इसकी मुखरता को इस आम चुनाव के समय देखा जा सकता है। सोशल साइट्स से लेकर सामाजिक जीवन में इस वर्ग के सदस्य मुखरता से अपने विचारों को रख रहे हैं। 

    जाति, धर्म, भाषा, नस्ल आदि-आदि में बंटे भारतीय समाज की तरह यह वर्ग कई तरह से विभाजित है। यह समांग वर्ग नहीं है। उच्च और निम्न आय वर्ग के विभाजन के साथ इसका एक प्रमुख विभाजन परम्परागत ...

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महानुभावो! हम भिखारी नहीं हैं


    लोकसभा चुनाव की तारीख जैसे-जैसे करीब आती जा रही है वैसे-वैसे एक से बढ़कर एक घोषणाएं पार्टियों द्वारा की जा रही हैं। चुनावी घोषणापत्र सामने आ रहे हैं। ऐसे-ऐसे वायदे किये जा रहे हैं जो इस व्यवस्था में कभी हकीकत नहीं बन सकते हैं। 

    कांग्रेस पार्टी हर किसी को घर दिलाने और दस करोड़ नये रोजगार पैदा करने की बात कर रही है। ऐेसे ही कोई लैपटाॅप तो कोई किसी अन्य चीज का वायदा ...

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जैसी प्रजा वैसा राजा


    लोकसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा के साथ यह सवाल बिल्कुल फिल्मी अंदाज में पेश और चिन्तन का विषय बन चुका है कि ‘कौन बनेगा प्रधानमंत्री’। पूरा पूंजीवादी प्रचार तन्त्र जिसे करोड़ो-अरबों रुपया विभिन्न पूंजीवादी पार्टियों और सरकारों से प्राप्त हो रहा है, इस सवाल को इस ढंग से पेश कर रहा है मानो अमुक के प्रधानमंत्री बनने से यह हो जायेगा और अमुक बन गया तो वह हो जायेगा। यहां सवा...

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आम चुनाव और महिलाएं


    महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए देश की प्रमुख राजनैतिक पार्टियां एक से बढ़कर एक जुमलेबाजी और उथली घोषणाएं कर रही हैं। भांड राजनीतिज्ञ महिलाओं के मसीहा बनने का दावा कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि वे महिलाओं को अधिकार देने को पक्षधर हैं तो कोई कह रहा है कि उसे ‘होम मेकर’ से ‘नेशन मेकर’ बनना चाहिए। ये वही पार्टियां हैं जो शाहबानो केस में अदालत के ठीक फैसले को पलट देती हैं, जो...

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राहुल गांधी का व्यवस्था परिवर्तन


    ‘टाइम्स नाऊ’ टी वी चैनल को दिये गये एक साक्षात्कार में राहुल गांधी ने बार-बार व्यवस्था परिवर्तन की बात की। उनकी बातों से लगा कि वे किसी भी हालत में व्यवस्था परिवर्तन के लिए दृढ संकल्प हैं।

    अब कोई भी सीधा-सादा आदमी पूछ सकता है कि आप किस व्यवस्था को बदलना चाहते हैं। पिछले 67 सालों से जो व्यवस्था चली आ रही है वह उन्हीं की पार्टी की बनाई हुयी है। इन 67 सालों में 55 साल तो ...

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राष्ट्रपति के भाषण के निहितार्थ


    गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत के राष्ट्रपति का भाषण कई दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लेकिन सर्वोपरि इसका महत्व आगामी लोकसभा के चुनाव की दृष्टि से है। यह भाषण लोकसभा चुनाव के बाद बनने वाली सरकार में ‘स्थायित्व’, ‘ईमानदारी’ और ‘भारत के विकास के प्रति अटूट प्रतिबद्धता’ चाहता है। यह भाषण मतदाताओं को चेताता है कि वे ‘मनमौजी अवसरवादियों’ और ‘लोक-लुभावन अराजकत...

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पूंजीवादी प्रचार माध्यम: पहुंच और प्रभाव


    अक्सर ही पूंजीवादी बुद्धिजीवी ही नहीं क्रांतिकारी भी आज के पूंजीवादी प्रचारतंत्र को मीडिया के नाम से संबोधित करते हैं। मीडिया एक निष्क्रिय शब्द है जो इन प्रचार माध्यमों के वास्तविक चरित्र को ढंक लेता है। वह इन्हें निष्पक्ष सूचना माध्यम के रूप में प्रस्तुत कर देता है। पूंजीपति वर्ग की कोशिश भी है कि इसे इसी रूप में प्रस्तुत किया जाय। 

    असल में पूं...

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नया वर्ष


    नये वर्ष की पूर्व संध्या पर जश्न का माहौल होता है। जश्न मनाने वालों में वैसे तो सभी वर्ग-तबके के लोग होते हैं परन्तु पूंजीपतियों व उच्च मध्यमवर्गीय लोगों के लिए तो यह संध्या खास ही होती है। बीता वर्ष भी उन्हें खुशी दे गया होता है और आने वाला वर्ष उन्हें अपनी दौलत में इजाफे की नयी संभावना वाला लगता है। पूंजीवादी समाज में इस संध्या-रात्रि ने त्यौहार का सा दर्जा हासिल कर लिया है...

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बदलाव


    पांच विधानसभाओं के चुनाव के नतीजों खासकर दिल्ली विधानसभा के चुनाव के नतीजे और उसमें भी अरविन्द केजरीवाल की पार्टी की सफलता ने मध्यवर्गीय लोगों के एक हिस्से को खुश कर दिया है। इन मध्यमवर्गीय लोगों की खुशी के दो कारण हैं- पहला कांग्रेस की दुर्गति और दूसरा आप पार्टी को मिला जनसमर्थन। वे इसे बदलाव का महासंकेत मान रहे हैं। साफ सुथरी राजनीति की शुरूवात मान रहे हैं। वे मान रहे है...

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संघ और साम्राज्यवाद


    राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके अनुषंगी संगठन अपने को राष्ट्रवादी व देशभक्त कहते हैं। अक्सर अन्यों पर उनका आरोप होता है कि वे राष्ट्र की चिन्ता और पैरवी वैसे नहीं करते जैसे कि वे करते हैं। सच्चाई में यह एक मिथक है कि संघ एक राष्ट्रवादी संगठन है। और यह ऐसा मिथक है जो कि इनका ही गढ़ा हुआ है। इनका न तो अतीत और न ही वर्तमान इस बात की तस्दीक करता है कि ये राष्ट्रवादी हैं या देशभक्त ...

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रास्ता उधर नहीं इधर है


    भारतीय समाज में छाया सर्वव्यापी संकट हल होने के बजाय तीव्र हो रहा है। यह संकट जीवन के हर क्षेत्र में फैला हुआ है। भारत के शासक वर्ग के पास वर्तमान संकट के समाधान का रास्ता कहता है उन नीतियों को और तेजी से लागू करो वस्तुतः जिन्होंने इस संकट को जन्म दिया है। शासक वर्ग के दो प्रमुख गुटों के बीच विवाद यह है कि कौन इन नीतियों को बेहतर ढंग से व शीघ्र लागू कर सकता है। इसे वे विकास कहते ...

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पोर्नोग्राफी


    अश्लील साहित्य व फिल्मों का भारतीय समाज में पिछले दो दशकों में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ है। इण्टरनेट के बढ़ते प्रयोग के साथ अश्लील फिल्में व साहित्य सर्व सुलभ है। टेलीविजन में पोर्नोग्राफी की तो नहीं परन्तु इरोटिक(काम विषयक) चीजों की भरमार है। पोर्नोग्राफी और इरोटिक साहित्य व फिल्मों में फर्क है यद्यपि कई बार यह फर्क धूमिल पड़ जाता है। इरोटिक साहित्य व फिल्मों से कई-कई ग...

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भारतीय राजनीति का गहराता संकट


    भारत के शासक वर्ग का संकट चौतरफा है। आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां इसकी अभिव्यक्ति नहीं हो रही हो। परन्तु अगर इसकी तीव्र और घनीभूत अभिव्यक्ति को देखना हो तो उसे राजनीति में देखा जा सकता है। उसे भारत के शासक वर्ग की दो प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और संघ निर्देशित भाजपा में देखा जा सकता है। उसे इन दो प्रमुख पार्टियों के प्रमुख नेता राहुल गांधी उर्फ पप्पू तथा नरेन्द्र मोदी उर...

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सपने


    लोकसभा के चुनाव करीब हैं। देश में सपनों का बाजार खुला है। यह बाजार रंग-बिरंगे सपनों से अटा है। सपनों के सौदागर देश को नापते हैं। मीडिया में हर ओर सपनों के विज्ञापन छाते हैं। 

    सपनों के सौदागरों की समस्या है। खरीददार बाजार से नाखुश हैं। वे आशंकित हैं। हिकारत से सौदागरों को देखते हैं। जीवन की समस्याओं का समाधान चाहते हैं। हर सौदागर एक सपना थमा देता है। हर सपना गैस ...

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बौद्धिक पैदावार


    पिछले कुछ समय से पूरे हिन्दुस्तान ने धर्म के नाम पर कई नायाब व खतरनाक चीजों को देखा। 20 अगस्त को डा. नरेन्द्र दाभोलकर जो कि अंधविश्वास व कालाजादू के खिलाफ संघर्षरत थे, की निर्मम हत्या, आसाराम बाबू प्रकरण, किश्तवाड़ व मुजफ्फरनगर में भयानक सांप्रदायिक हिंसा।

    डा. नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या में हिन्दू धार्मिक कट्टरपंथियों का हाथ था। आसाराम बापू एक नाबालिग छात्रा के ...

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आगामी लोकसभा चुनाव और तय किये जाती कार्यसूची


    खाद्य सुरक्षा विधेयक को लोकसभा में पारित करवा कर कांग्रेस ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति का एक पैंतरा चला है तो भाजपा ने राममंदिर जैसे मुद्दों के तहत साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति तैयार की है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के संघ के दिशा निर्देश के बाद अब यह सुस्पष्ट है कि भाजपा, आगामी लोकसभा चुनाव के पूर्व, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति को पूरी त...

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मीडिया और देशभक्ति


    पिछले दिनों भारत का राष्ट्रीय हिन्दी मीडिया उन्माद की अवस्था में आ गया। इस उन्माद की वजह तथाकथित रूप से पाकिस्तान सेना द्वारा पांच भारतीय सैनिकों की हत्या थी। इस हत्या के साथ पूरे देश में उन्मादी माहौल तैयार करने के लिए मीडिया ने मानो कमर कस ली। पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़वाने के लिए मीडिया ने अपने तरफ से हरचन्द कोशिश की। मीडिया सहित समाज में युद्धोन्माद को भड़काने में रा...

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मोदी का राष्ट्रवाद और देशभक्ति


    पिछले दिनों देश के प्रधानमंत्री पद की दौड़ में जुटे नरेन्द्र मोदी ने एक साक्षात्कार में खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी घोषित करते हुए देशभक्त करार दिया। इसी दौरान मोदी ने गुजरात नरसंहार में मारे गये लोगों की तुलना कुत्ते के पिल्ले से करते हुए उनके मरने पर अपना दुःख प्रकट किया और साथ ही कांग्रेस पर अपनी असफलता छिपाने के लिए धर्मनिरपेक्षता का बुर्का पहनने का आरोप लगाया।

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इस आपदा का दोषी कौन? प्रकृति अथवा मनुष्य


    जून माह में उत्तराखण्ड में आयी आपदा को सरकारी तंत्र और मीडिया प्राकृतिक तो कुछ लोग मानवीय आपदा की संज्ञा दे रहे हैं। उत्तराखण्ड में हजारों लोगों की मौत और करोड़ों-करोड़ रुपये के सम्पत्ति के नुकसान के साथ यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि इसके लिए जिम्मेवार कौन है? प्रकृति अथवा मनुष्य!

    प्रकृति को जिम्मेवार ठहराकर वे सभी लोग एकबारगी में ही बरी हो जाते हैं जिनके द्वारा शास...

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नागरिकों की निजता और देश की सम्प्रभुता


    एडवर्ड स्नोडेन के भंडाफोड ने एक बार फिर राज्य और नागरिकों के बीच के सम्बंधों पर ही नहीं बल्कि अमेरिका और अन्य देशों के सम्बंधों पर भी प्रश्न खडे़ कर दिये हैं। एडवर्ड स्नोडेन अमेरिकी खुफिया एजेन्सी ‘सीआईए’ के पूर्व कर्मचारी हैं जिन्होंने इंटरनेट और फोन के जरिये आम नागरिकों पर की जा रही निगरानी के बारे में खुलासा किया। नागरिकों की निजता और देशों की सम्प्रभुता पर हमला बो...

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‘कठोर कानून बने’


    आजकल देश में फिर से कठोर कानून का शोर है। कठोर कानून की एक मांग तो आईपीएल मैच में हुयी स्पाट फिक्सिंग की घटना के बाद सामने आयी तो दूसरी मांग छत्तीसगढ़ में माओवादी संगठन के हाथों कई बड़े कांग्रेसी नेताओं के मारे जाने के बाद आयी।

    आईपीएल मैच फिक्सिंग में फंसे बड़े-बड़े नामों और खेल की पवित्रता से आहत लोगों को और कुछ समझ में नहीं आया। उन्हें लगा कि क्योंकि इस क्षेत्र ...

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बेताब नायक


    किसी समाज में नायक कैसे जन्म लेते हैं या उसके नायक कैसे उभरते हैं? यह सवाल इस समय बड़ा मौजूं हैं क्योंकि जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव करीब आते जा रहे है वैसे-वैसे कुछ व्यक्ति भारत को नेतृत्व देने के लिए बेहद बेताब हैं। उनकी बेताबी उनके नट नृत्यों में देखी जा सकती है। असल में आज भारत के नायकत्व का अर्थ यह है कि कौन व्यक्ति अगला प्रधानमंत्री होगा। भारत के भावी प्रधानमंत्री के रूप में ...

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बदलती दुनिया और दुनिया बदलने का सवाल


    कहते हैं दुनिया रोज बदलती है। लेकिन जो दुनिया अप्रैल, 2007 से बदलनी शुरू हुई उसने ऐसे प्रश्न दुनिया के शासकों के सामने खड़े कर दिये कि वे लगभग हक्के-बक्के से रह गये। 2007 से शुरू हुआ विश्व पूंजीवादी दुनिया का संकट 6 वर्ष गुजर जाने के बाद भी हल होता नहीं दिख रहा है। संकट को हल करने के लिए उठाये जाने वाले कदम और गंभीर संकट को जन्म दे रहे हैं।

    2007 में आज की तरह का राजनैतिक संकट भ...

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शान्ति अभियानों की हकीकत


    पिछले दिनों दक्षिणी सूडान में पांच भारतीय शांति सैनिक विद्रोहियों के हमले में मारे गये। आम परिवारों से सम्बन्धित इन सैनिकों की दक्षिणी सूडान में हुई मौत ने आम भारतीयों को शोक से ज्यादा हैरत में डाल दिया। एक मृत सैनिक के परिवार के लोगों को तो दक्षिणी सूडान का ही पता नहीं था कि यह देश है कहां। सामान्य ज्ञान की जानकारी-गैरजानकारी से ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि भारतीय सैनिक वहां ...

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नाम में.. बहुत कुछ रखा है


    देश-दुनिया की राजनीति अथवा समाज में किसी घटना के बारे में किन शब्दों में बात की जा रही है अथवा उन्हें क्या नाम दिया जा रहा है, इसका बहुत फर्क पड़ता है और अक्सर ही उसके बहुत गहरे निहितार्थ होते हैं। शब्दों में चयनकर्ता अथवा संज्ञा प्रदान करने वाले व्यक्ति की सोच, दर्शन, विचारधारा और यहां तक कि उसके हित भी मौजूद रहते हैं। कहने को कहा जा सकता है कि ‘नाम में क्या रखा है’ परन्तु ऐ...

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आक्रामक साम्राज्यवाद


     हाल के वर्षों में भारत में विभिन्न साम्राज्यवादी देशों के शासकों की आवाजाही बहुत तेजी से बढ़ गयी है। पिछले सात-आठ माह में जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस के शासनाध्यक्ष भारत की यात्रा कर चुके हैं और इन्होंने भारत से हथियारों की बिक्री सहित कई किस्म के सौदे हासिल किए हैं। साम्राज्यवाद के सिरमौर अमेरिका के साथ भारत के शासकों की बढ़ती निकटता जगजाहिर है और इसी तरह रूसी साम्राज्यवादि...

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नारी मुक्ति और पूंजीवाद


    पूंजीवादी समाज में मुक्ति का प्रश्न किस तरह और कैसे औपचारिकता व रस्म अदायगी की चीज बन जाता है यदि इसकी कोई तीखी बानगी देखनी हो तो उसे अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन देखा जा सकता है। और कुछ मामलों में तो यह ऐसा रूप धर लेता है जहां शोषक और उत्पीड़क ही मुक्ति की बातें करते हैं और उसके प्रस्तोता बनने का स्वांग रचते हैं। यह सब कुछ वैसा ही है जैसा दस वर्ष पूर्व अमेरिकी साम्राज्...

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आवेसी, नंदी और विश्वरूपम


    पिछले करीब एक महीने में भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में तीन ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने सबका ध्यान खींचा। इन सबमें एक या दूसरे रूप में पूंजीवादी पार्टियां, पूंजीवादी प्रचार माध्यम और सरकारें शामिल थीं।

    हैदराबाद की स्थानीय राजनीति में ओवेसी बंधु जानी-मानी हस्ती हैं। वे कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं से कम ख्यात या कुख्यात व्यक्ति नहीं हैं। इन्होंने अ...

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शासकों का दुःख


    अभी हाल ही में जसपुर में सम्पन्न हुए कांग्रेस पार्टी के चिंतन शिविर में कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा नये-नये बनाये गये उपाध्यक्ष उनके सुपुत्र राहुल गांधी ने बहुत आंसू बहाये। उन्होंने देश के लोगों की दुर्दशा का रोना रोया। गरीब लोगों तक सत्ता का लाभ न पहुंचने की बात की। राहुल गांधी तो, जिसे कहते हैं, और ‘पर्सनल’ हो गये। उन्होंने अपनी दादी की हत्या के समय अपन...

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भारतीय गणतंत्र


    26 जनवरी के दिन भारत की राजधानी नई दिल्ली में भारतीय गणतंत्र की सालगिरह का जश्न का नजारा अब इतना औपचारिक और रस्मी हो चुका है कि उसके बारे में सरकारी मीडिया को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई एक अक्षर भी दिल से कहना चाहे। भारतीय फौज की टुकडि़यों द्वारा आधुनिक हथियारों के प्रदर्शन में शायद ही किसी की कोई दिलचस्पी होती है। ऐसा लगता है मानो सब कुछ दिखावटी, रस्मी और यहां तक कि इतना थका ...

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पूंजीपति वर्ग की नजर में मजदूर वर्ग और मध्यम वर्ग


    दिल्ली में बलात्कार की घटना के विरोध में मध्यमवर्गीय छात्रों-नौजवानों ने सराहनीय सक्रियता का परिचय दिया। इस मामले में विरोध प्रदर्शन आयोजित करने में जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय के छात्रों और वहां छात्र संघ ने पहलकदमी ली। उनके विरोध प्रदर्शन की प्रेरणा से दिल्ली के अन्य मध्यमवर्गीय रिहायशी इलाकों में विरोध प्रदर्शन आयोजित हुए। फिर इन्हीं छात्रों ने 22 दिसम्बर को इंड...

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जनांदोलन और उनकी दिशा


हमारे देश में इस वक्त सैकड़ों किस्म के छोटे-बड़े आंदोलन चल रहे हैं। इनमें से कई तो ऐसे हैं जिन्हें लम्बा समय हो गया है। इन आंदोलनों की मांगों को देखा जाए तो कहीं पुलिस के जुल्म का विरोध है, कहीं बड़े बांधों का विरोध, कहीं किसान मांग कर रहे हैं कि उनकी जमीन न छीनी जाए तो कहीं आदिवासी मांग कर रहे हैं कि उनकी सदियों पुरानी रिहायश से उन्हें उजाड़ा ना जाए। हर शहर, हर कस्बे में सामान्य जन संघर...

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भाजपा की दुर्गति के मायने


भारतीय जनता पार्टी के भीतर घमासान मचा हुआ है। नितिन गडकरी के घोटाले के उजागर होने के बाद पार्टी के कई नेता बगावती तेवर अपनाये हुए हैं। रामजेठमलानी को बाहर का रास्ता दिखाकर भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है कि नेतृत्व कितना ही भ्रष्ट व ओछा हो उसकी पूजा की जानी चाहिए। ‘चाल-चलन-चरित्र-चेहरा’ का नारा लगाने वाली इस पार्टी के तीन चेहरों- गडकरी, येदुरप्पा, नामधारी पर नजर डालते ही स्पष्ट हो जाय...

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औपनिवेशिक विरासत और भारतीय राज्य


अक्सर ही वामपंथी से लेकर घोर दक्षिणपंथी क्षेत्रों में भारतीय शासन व्यवस्था के चरित्र के बारे में टिप्पणियां होती हैं। और बेहद लोकप्रिय ढंग से यह कहा जाता है कि ‘अंग्रेज चले गये पर अपनी औलाद छोड़ गये’। भारतीय संविधान, कानून, सेना और पुलिस चरित्र व तौर-तरीके, भूमि सम्बन्धित कानून व परम्परायें, शिक्षा, संस्कृति व साहित्य, मूल्य-मान्यताओं आदि में स्पष्ट तौर पर औपनिवेशिक अतीत का अस...

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सामाजिक बदलाव और जनता


सामाजिक बदलाव में जनता की क्या भूमिका है? अक्सर यह प्रश्न आढ़े-तिरछे ढंग से उठता रहता है और आजकल तो एक महानुभाव ‘मैं आम आदमी हूं’’ की टोपी पहनकर घूम रहे हैं और भारतीय समाज के मसीहा बनने के लिए छटपटा रहे हैं। उनकी यह छटपटाहट उनके पूंजीवादी पार्टियों के सिरमौरों के ताजे-बासी खुलासों के साथ जनता को ललकारने और कुछ जनलोकपालनुमा रामबाण औषधि पेश करने में देखी जा सकती है। आधुनिक समाज म...

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भ्रष्टाचार और वर्तमान समाज


पिछले दिनों मीडिया में कई गणमान्य चेहरों से नकाब राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के तहत उतारी गयी। राबर्ट वाड्रा, नितिन गडकरी, सलमान खुर्शीद जैसे कई नाम सामने आये। इन लोगों ने अपनी राजनीतिक हैसियत का इस्तेमाल करके करोड़ों के वारे-न्यारे खुद या अपने करीबियों के लिए करवाये। पूंजीवादी राजनीति के हमाम में सभी नंगे हैं इस धारणा ने इस कदर जोर पकड़ा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘धर्मयुद्ध’ छे...

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देश को समाजवाद की जरूरत है


अन्ततः मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार नये आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाने की दिशा में बढ़ ही गयी। मल्टी ब्रान्ड रिटेल सेक्टर में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देकर इसे लागू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी गयी। इसके साथ ही उड्डयन, पाॅवर एक्सचेन्ज, प्रसारण क्षेत्र में भी विदेशी निवेश को और बढाने की मंजूरी दे दी गयी है। एमएमटीसी, सेल, हिंदुस्तान काॅपर, आॅयल ...

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‘‘तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ’’


पूरी पूंजीवादी व्यवस्था समग्र रूप से संकट ग्रस्त है। इसका कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जो संकट से ना घिरा हो, पतन की ओर न बढ़ रहा हो। अर्थव्यवस्था, राजनीति, सामाजिक व्यवस्था, मानवीय जीवन के विविध पक्ष किसी भी चीज को उठा कर देखिये वह रोगग्रस्त है। यही बात दुनिया के सभी पूंजीवादी राष्ट्रों पर भी लागू होती है। अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन, जापान सभी देशों में आपको पूंजीवादी व्यवस्था के दुष्...

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विश्व आर्थिक संकट के पांच साल


इस जुलाई में वर्तमान विश्व आर्थिक संकट के पांच साल हो गये। जुलाई 2007 के अंत में बियरस्टनर्स के दो हेज फंडों के दीवालिया होने के साथ अमेरिका और यूरोप में उस वित्तीय संकट की शुरूआत हुयी थी जिसने बाद में भीषण रूप धारण करते हुए समूचे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया। तब से आज पांच साल बीत चुके हैं इस समय दुनिया की अर्थव्यवस्था कहां खड़ी है? इन पांच सालों मंे दुनिया के पूंजीपतियों ने एक से ज्य...

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साम्प्रदायिकता, धार्मिक उन्माद के खात्मे के लिए मजदूर वर्ग को आगे आना होगा


असम में फैली हिंसा पर राज्य व केंद्र सरकार भारी दमन के बावजूद अभी काबू पा भी नहीं सकी थी कि मुंबई में पुलिस की गोलीबारी से दो मुस्लिम मारे गये और पूरे महाराष्ट्र में तनाव फैल गया। इसी प्रकार कई हफ्तों से बरेली शहर साम्प्रदायिक तनाव और कफ्र्यू का शिकार है और अभी पुनः जब लग रहा था कि शहर शांति की ओर बढ़ रहा है तब हिन्दू मुस्लिम कट्टरपंथियों ने उसे पुनः उसी जगह पर लाकर खड़ा कर दिया। पूरा ...

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भारतीय शासक वर्ग और आदिवासी


राष्ट्रपति चुनाव के दौरान पी.ए.संगमा ने आदिवासी होने का खूब ढोल पीटा और जब वे चुनाव हार गये तब भी उन्होंने इस बात का आरोप अपने चुनने वालों पर लगाया कि वे एक आदिवासी को देश का राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते। इस आदमी को अपना आदिवासी होना तब याद नहीं आया जब छत्तीसगढ़ के बीजापुर में दर्जनों आदिवासियों को घेर कर निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी गयी। इस घटना पर यह आदमी एक दम चुप लगा गया। एक भी ल...

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गहराता आर्थिक संकट और बढ़ता राजनैतिक संकट


जैसे-जैसे विश्व आर्थिक संकट गहराता जा रहा है और अपने आपको नये-नये रूपों और क्षेत्रों में अभिव्यक्त कर रहा है, वैसे-वैसे पूंजीवाद के बारे में पिछले चार-पांच दशक में गढ़े गये मिथक एक-एक कर टूटते जा रहे हैं। ढहता हुआ पूंजीवादी समाज पूरी मानव जाति के लिए कितने बडे़ संकट पैदा कर सकता है इसकी गवाह बीसवीं सदी बहुत अच्छे ढंग से रही हैं। बीसवीं सदी में हुए दोनों विश्व युद्धों ने मानव समाज के स...

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ये हंगामा क्यों है बरपा


जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार पी ए संगमा ने अपने आदिवासी होने और इस नाते अपने को देश का राष्ट्रपति होने के लिए उपयुक्त उम्मीदवार बताया है। भारत के राष्ट्रपति के लिए जो पात्रता की अघोषित शर्तें हैं उनमें पी ए संगमा का ऐसी बातें करना लाजिमी है। पूंजीवादी राजनीति की बढ़ती सड़ांध को इस चुनाव में भी उसी तरह से महसूस किया जा सकता है जिस तरह से ग्राम सभा से ...

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भारतीय अर्थव्यवस्था की पतली होती हालत


    भारत का पूंजीपति वर्ग अक्सर ही यह कहता रहता है कि उसकी अर्थव्यवस्था के बुनियादी तत्व मजबूत हैं। वह साथ ही यह भी दोहराता रहता है कि दुनिया भले ही आर्थिक संकट से गुजर रही हो परंतु उसकी अपनी अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़ती रहेगी।

    परंतु मई के मध्य में भारत सरकार के सुर बदल गये। पहले तो मार्च महीने के औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े आये। उन्होंने दिखाया कि इस महीने औद्योग...

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