लेबिल (कुल समाचार - 150): आलेख

रूसी क्रांति में मजदूर यूनियनों की भूमिका - ए. लोजोव्स्की


(प्रस्तुत भाषण ए.लोजोव्स्की ने 1920 के अंत में पश्चिमी यूरोप के किसी देश के मजदूर नेताओं के समक्ष दिया था। इसे इस उम्मीद से प्रकाशित किया जा रहा है कि पाठकों को मजदूर यूनियनों की क्रांतिकारी भूमिका को समझने में मदद मिल सके।- सम्पादक)

    कामरेडो, रूस के मजदूर आंदोलन पर अपनी रिपोर्ट की चर्चा करने से पहले मुझे इजाजत दीजिए कि मैं रूसी सर्वहारा वर्ग की तरफ से, उस रूसी सर्वहारा क...

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निजता का अधिकार : राज्य का कसता शिंकजा


    24 अगस्त को देश के सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय पीठ ने निजता का अधिकार को संविधान की धारा 21, खण्ड-3 के तहत मौलिक अधिकार घोषित कर दिया। अभी दो दिन पहले तत्कालीन तलाक के मामले में फैसले की तरह ही सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने तारीफ बटोरी। फर्क बस इतना था कि संघी सरकार और भाजपा इस तारीफ में अबकी बार शामिल नहीं थे। संघी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में निजता का अधिकार मौलिक अधिक...

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आज भी उनकी लड़ाई जारी है


सैक्को और वैन्जेटी की शहादत की 90 वीं वर्षगांठ पर


    सैक्को और वैंजेटी को फांसी दिये हुए 90 वर्ष हो चुके हैं। 23 अगस्त 1927 को उनको फांसी दी गयी थी। ये दोनों इटली से संयुक्त राज्य अमेरिका में काम की तलाश में आये थे। जब इनको फांसी हुए पचास वर्ष पूरे हो गये थे, तब मैसाचुसेट्स के राज्यपाल डूकासिस ने उस न्यायिक प्रक्रिया की जांच करने के लिए एक पैनल का गठन किया था, जिसके तहत उनको फांसी दी गयी थी। उस पैनल का निष्कर्ष था कि उन दोनों के मामले मे...

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आजादी की लड़ाई में हिन्दुत्ववादी व संघ


    जब भी आजादी की लड़ाई की चर्चा आती है तो हिन्दुत्ववादी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग बगलें झांकने लगते हैं। कारण स्पष्ट है कि आजादी की लड़ाई में इनका कोई योगदान नहीं रहा। वस्तुतः साम्राज्यवाद से मुक्ति ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति इनके एजेण्डे में कभी शामिल ही नहीं रहा। जब सारा देश अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष कर रहा था तो हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन हिन्दू मुस्लिम विद्वेष फै...

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पाकिस्तान की राजनीतिक उथल-पुथल के पीछे


    पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसले में इस पद के अयोग्य ठहरा दिया और इस तरह उन्हें इस पद से हटा दिया। नवाज शरीफ ने इस्तीफा देते हुए अपने भाई पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री को नया प्रधानमंत्री घोषित कर दिया। उनके संसद का सदस्य निर्वाचित होने तथा प्रधानमंत्री बनने तक एक अन्य निष्ठावान व्यक्ति को अंतरिम प्रधानमंत्री बना दिया गया है। 

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हिटलर के सामने ब्रिटिश और फ्रांस की घुटनाटेकू नीति-II


गतांक से आगे-

..........1939 के बसंत के पूरे काल के दौरान सोवियत संघ ने कुछ निश्चित समझौतों तक पहुंचने की कोशिश की जिससे कि हिटलर को रोकने के लिए कार्रवाई की एकता और सैनिक योजनाओं में तालमेल किया जा सके। 

    ब्रिटेन ने ....रूस को बाल्टिक राज्यों के संदर्भ में वैसी ही गारण्टी देने से इंकार कर दिया जैसी रूस बेल्जियम और हालैण्ड के ऊपर हमले होने की स्थिति में फ्रांस और ब्रिटे...

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चीन और भारत: भेड़िये और गीदड़ का टकराव


     पिछले करीब महीने भर से भारत के शासक वर्ग चीन से तनातनी की मुद्रा में है। खासकर देश का पूूंजीवादी प्रचारतंत्र कुछ ज्यादा ही बढ़-चढ़कर दावे कर रहा है। यह इसके बावजूद कि विदेश मंत्री ने बाकायदा संसदीय समिति के सामने बयान दिया कि टी.वी. चैनलों पर जो चल रहा है उससे सरकार की सहमति नहीं है। 

    यहां मुद्दा भारतीय पूंजीवादी प्रचारतंत्र का नहीं है जो आज सरकार के इशारे को समझक...

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हिटलर के सामने ब्रिटिश और फ्रांस की घुटनाटेकू नीति


द्वितीय विश्व युद्ध


    (प्रस्तुत लेख माइकेल सेयर्स और एलबर्ट ई. वाहन द्वारा 1946 में लिखित पुस्तक Great Conspiracy against Russia के 22 वें अध्याय का एक हिस्सा है। उपरोक्त लेेखक अमरीकी थे। लेकिन उन्होंने इस पुस्तक में सोवियत संघ को खत्म करने की साम्राज्यवादियों की साजिशों का 1917 से ही खुलासा किया है। इस लेख में संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के शासकों द्वारा हिटलर को सोवियत संघ प...

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वस्तु एवं सेवा कर (GST) के बारे में कुछ सवाल-जवाब


    वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी ने सभी लोगों को काफी हैरान-परेशान किया है- देश के बड़े पूंजीपतियों और मोदी-जेटली जैसे उनके चाकरों को छोड़कर। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक मंत्री से जब यह पूछा गया कि जीएसटी का पूरा नाम क्या है तो वे नहीं बता पाये। मजे की बात यह है कि वे मोदी के आदेश पर लोगों को जीएसटी के फायदे बता रहे थे।

    यहां इस लेख में जीएसटी के बारे में कुछ तकन...

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लिउद्मिला पब्लिचेंको का अमेरिकी अवाम के समक्ष दिया गया भाषण


(द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर द्वारा सोवियत संघ पर हमला करने के बाद सोवियत संघ और अमेरिकी व ब्रिटिश शासकों के बीच यह समझौता हुआ था कि अमेरिकी व ब्रिटिश फौजें हिटलर के विरुद्ध युद्ध में दूसरा मोर्चा पश्चिम की तरफ से खोलेंगी। लेकिन अमेरिकी व ब्रिटिश सरकारें दूसरा मोर्चा खोलने के सवाल पर हीला-हवाली कर रही थीं। इन सरकारों पर वहां की जनता का दबाव डालने के उद्देश्य से सोवियत सर...

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जाति समस्या


    केन्द्र की संघी-मोदी सरकार ने राष्ट्रपति पद के लिए एक संघी दलित रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार घोषित कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह दलितों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है। संघ और भाजपा की ओर से भी यही संदेश है कि वे दलितों को साथ लेना चाहते हैं। आज जबकि पूरे देश में स्वयं संघी कारकूनों द्वारा ही दलितों के उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ रही हैं तब इस तरह का संदेश जरूरी हो जाता है। <...

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फासीवाद विरोधी युद्व में सोवियत संघ की भूमिका


ब्रिटिश, फ्रांसीसी और अमरीकी साम्राज्यवादियों का दोगलापन


    22 जून 1941 को हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला करने के लिए 40 लाख फौज उतार दी थी। उसने इस हमले का नाम ऑपरेशन ‘बॉर बरोसा दिया था। यह यु़द्ध चार वर्ष तक चला। यह इतिहास का सबसे खूनी युद्ध था। इस युद्ध के पहले आठ घण्टों में ही सोवियत सेना के 1200 विमान नष्ट हो गये थे। नाजी जर्मनी ने चंद महीनों में ही सोवियत समाजवादी राज्य को खत्म करने का सपना देखा था। 23 जून 1941 को इटली और रोमानिया ने सोवियत संघ के ...

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पूंजीवादी राज्य और सेना


    कभी-कभार एकाध वाक्य भी उससे ज्यादा उद्घाटित कर देते हैं जितना भाषण-पर-भाषण नहीं कर सकते। थल सेना प्रमुख जनरल रावत का यह वाक्य भी ऐसा ही हैः जनता को सेना से डरना चाहिए। आशय यह था कि यदि जनता सेना से नहीं डरेगी तो सेना कानून-व्यवस्था नहीं बनाये रख सकेगी जिसके लिए उसे अक्सर देश के अलग-अलग हिस्सों में लगाया जाता है। 

    पूंजीवादी सरकारें और पूंजीवादी प्रचार माध्यम हमेश...

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कतर को साउदी अरब द्वारा अलगाव में डालने की कोशिश


    अमरीकी साम्राज्यवादी सरगना डोनाल्ड ट्रम्प की पश्चिम एशिया में यात्रा का पहला कुप्रभाव सामने आ गया है। साउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, बहरीन और यमन की शेखशाहियों ने कतर से कूटनीतिक सम्बन्ध समाप्त कर लिये हैं। कतर से आने जाने वाली सारी हवाई सेवाओं को अपने देशों से हवाई क्षेत्र से गुजरने पर प्रतिबंध लगा दिया है। सड़क और समुद्री यातायात पर भी अपने क्षेत्र से गुजरने पर रोक...

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सर्वोच्च न्यायालय और न्याय


    देश के सर्वोच्च न्यायालय में लोगों की गहरी आस्था है। पूंजीपति वर्ग और मध्यम वर्ग में तो यह आस्था है ही यह गैर चेतना सम्पन्न मजदूर वर्ग में भी है। ये सारे यह सोचते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय में कोई मामला पहुंचने पर वहां न्याय मिलेगा।

    आज सर्वोच्च न्यायालय स्वयं ही इस आस्था की जड़ खोदने में लगा हुआ है। यह भांति-भांति के मामलों में अपने व्यवहार के द्वारा यह साबित करने ...

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1500 फिलिस्तीनी कैदियों की भूख हड़ताल


    इजरायल की जेलों में कैद 6500 से अधिक फिलिस्तीनी कैदियों ने एक बार फिर अपने जनवादी अधिकारों को कुचले जाने के खिलाफ संघर्ष का निर्णय लिया है। लगभग 1500 फिलिस्तीनी कैदियों ने 17 अप्रैल से अनिश्तिकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है। यह भूख हड़ताल पिछले करीब 40 दिनों से जारी है पर निरंकुश इजरायली शासकों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है। वे न केवल भूख हड़ताल पर बैठे कैदियों का दमन कर रहे हैं बल...

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आत्मनिर्णय का अधिकार और भारतीय राजसत्ता


    इस समय कश्मीर में जनविद्रोह एक बार फिर चरम पर है। ज्यादातर पर्यवेक्षक इस बात पर सहमत हैं कि ये दो दशक में सबसे खराब हालात हैं। पर इसके बावजूद भारतीय राजसत्ता और इसकी चालक सीट पर इस समय बैठा संघी प्रधानमंत्री केवल यही सोच रहा है कि और तीखे दमन से कुछ समय में हालात सामान्य हो जायेंगे। संघी फासीवादी वैसे भी हर समस्या का समाधान डंडे में देखते हैं। 

    कश्मीर समस्या के ...

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इतिहास का हस्तगतकरण : संघी अंदाज


    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हाल में दो घोषणाएं कीं : एक तो यह कि संघ भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 160 वीं जयंती धूमधाम से मनायेगा और दूसरी यह कि संघ काजी नजरूल इस्लाम का आने वाला जन्मदिन पश्चिम बंगाल में मनायेगा। संघ नजरूल को एक राष्ट्रवादी कवि के रूप में पेश करेगा। 

    ये दोनों घोषणाएं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) द्वारा इतिहास का हस्तगतकरण है। यानी इतिह...

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अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा वेनेजुएला में हुकूमत परिवर्तन की साजिश


    डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादी और ज्यादा पागलपन के साथ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कहर बरपा रहे हैं। इसी कड़ी में वे वेनेजुएला में राष्ट्रपति मादुरो की हुकूमत को मिटाने की साजिश कर रहे हैं। वे अपनी इस साजिश को अंजाम देने के लिए वेनेजुएला के करोड़पतियों-अरबपतियों से बने विरोध पक्ष का इस्तेमाल कर रहे हैं। विरोध पक्ष राजधानी काराकस में सड़कों ...

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मई दिवस - मजदूरों की शानदार विरासत


    1 मई मजदूरों की शानदार विरासतों में से एक है। काम के घंटे कम करने के संघर्ष से जुड़ा 1 मई का दिन आज भी पूरी दुनिया में मनाया जाता है और भविष्य में भी इसे मनाया जायेगा। रूस के क्रांतिकारी मजदूर वर्ग ने अपने संघर्ष में मई दिवस के दिन को क्रांतिकारी जोश व उत्साह को पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया। जब रूस में फरवरी क्रांति सम्पन्न हुयी और पूंजीवादी युद्ध बन्द नहीं हुआ तो 1 मई को उन्हों...

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सीरिया में साम्राज्यवादियों की खूनी जंग


    6 अपै्रल को संयुक्त राज्य अमेरिका के विदूषक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीरिया पर हमले का आदेश दे दिया और तत्काल करीब साठ मिसाइलें सीरिया पर जा गिरीं। डोनाल्ड ट्रंप ने सीरिया पर यह हमला वहां इडलिव शहर में, जो असद सरकार के विरोधियों के कब्जे में है, रसायनिक गैस से दर्जनों लोगों के मरने की रिपोर्ट आने के बाद किया। इन मौतों के लिए असद सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया। ट्रंप ने कह...

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समाजवादी समाज में प्रेम


रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका -XV


    अक्टूबर समाजवादी क्रांति के बाद रूसी नौजवानों और नवयुवतियों के बीच शुरूवाती दौर में हर पुरानी चीज को निर्ममता से कुचलने और त्याग देने की भावनायें जोर मारने लगी थीं। ऐसा ही प्रेम के संदर्भ में हुआ था। शुरूवाती दौर में हर भावना को पूंजीवादी विकृति और भावुकता कहकर तीखी नफरत के साथ देखा जाने लगा था। लेकिन बोल्शेविक पार्टी इस मामले में भी शुरू से ही ध्यान दे रही थी। लेनिन ने यौ...

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हिन्दू फासीवादियों की विजय और तद्जन्य चुनौतियां


    उत्तर प्रदेश के चुनावों में भाजपा की अप्रत्याशित जीत ने सबको हैरान कर दिया। यह जीत इतनी अप्रत्याशित थी कि चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा समर्थकों को वह मोदी लहर दिखाई देने लगी जो पहले किसी को नहीं दिखाई दे रही थी- न समर्थकों को, न विरोधियों को।

    मानो इतना ही न हो, सोने पर सुहागा वाली कहावत चरितार्थ करते हुये (या ज्यादा बेहतर कहें तो भांग में धतूरा) भाजपा ने उत्तर प्रद...

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रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका -XIV


समाजवादी समाज में परिवार- II


गतांक से आगे....

    रूस में यौन सम्बन्धों और वैवाहिक जीवन में मिली नयी आजादी का दुरुपयोग भारी पैमाने पर होता रहा है। न्यायालय में इनकी सूची भरी हुई है। इसी प्रकार दैनिक समाचार पत्रों में इनके समाचार और सम्पादकीय तथा पार्टी और सोवियतों के प्रस्ताव इनसे भरे रहे हैं। कई शहरों के पुरुषों ने इस लेखक को जो उन पर गुजरी उसे जो बताया वह वास्तव में चैंकाने वाला है। बहुत सारी लड़कियां ज...

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भगत सिंह का रास्ता अक्टूबर क्रांति का रास्ता है


शहीदे आजम भगत सिंह की शहादत दिवस के अवसर पर


    भारत के आजादी के आंदोलन में यदि क्रांतिकारी धारा की बात की जाये तो क्रांतिकारियों में भगतसिंह का नाम सबसे अधिक प्रसिद्ध है। एक समय भगत सिंह की लोकप्रियता गांधी के बराबर पहुंच गयी थी। खुद भगतसिंह ने एक अवसर पर कहा था कि अंग्रेजी सरकार के लिए जिन्दा भगतसिंह से ज्यादा खतरनाक मरा हुआ भगतसिंह होगा। 

    भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के शुरुआती काल में 1897 से 1913 तक धार्मिक द...

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बोलने की आजादी : वर्गीय परिप्रेक्ष्य


    बोलने की आजादी की बात उठने पर उसके समर्थक अक्सर ही फ्रांसीसी दार्शनिक वाल्तेयर का हवाला देते हैं। वाल्तेयर ने कहा थाः तुम जो कहते हो मैं उसकी भर्त्सना करता हूं, पर मैं इस बात के लिए लड़ूंगा कि तुम्हें अपनी बात कहने का अधिकार हो। (असल में यह वक्तव्य किसी और का है जो वाल्तेयर के नाम से प्रचलित है) यह बात बहुत अच्छी है। पर क्या वास्तव में ऐसा संभव है? क्या बोलने की आजादी के समर्थक वा...

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समाजवादी समाज में परिवार की स्थिति


रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका-XIII


(प्रस्तुत लेख मॉरिस हिंदुस की 1929 में प्रकाशित पुस्तक ह्यूमैनिटी अपरूटेड (Humanity Uprooted) के सातवें अध्याय फैमिली, टेस्ट एण्ड ट्रायल्स (Family, Test and Trials) के एक हिस्से का भावानुवाद है। मॉरिस हिंदुस रूस में जन्मे और संयुक्त राज्य अमेरिका में पले-बढ़े थे। अक्टूबर क्रांति के बाद वह रूस के अपने पैतृक गांव में आए थे। इसी समय उन्होंने रूस में जो परिवर्तन दे...

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वैश्वीकरण : वास्तविकता और प्रचार


    जब से यू.के. के जनमत संग्रह में यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला हुआ तब से ही यह बात होने लगी है कि अब वैश्वीकरण की उल्टी गति शुरू हो गयी है। इसे तब और बल मिला जब प्रवासियों को अमेरिका से खदेड़ने की बात करने वाले डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत गये। इसके पहले यूरोप के कई देशों में प्रवासी मजदूरों के खिलाफ विषवमन करने वाले नेता और पार्टियां लगातार अपनी स्थित...

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क्या महिलाओं की जगह घर में है?


रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका -XII


    एक जर्मन कहावत है, ‘‘चर्च, रसोई और बच्चे’’ ये ही महिलाओं की जगहें हैं। 1933 में हिटलर के सत्ता में आने के बाद यह व्यापक सरकारी लोकप्रियता पा चुकी है। ये सामाजिक जीवन के तीन क्षेत्र हैं जिन्हें तीसरी राइख (जर्मन संसद) ने महिलाओं के लिए तय कर रखा है। और अंग्रेजी भाषा में भी एक पुरानी कहावत है कि महिला का स्थान घर में है। इसको कई हलकों में अभी भी मान्यता प्राप्त है, विशेष तौर पर ...

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मोदी सरकार का चौथा बजट: वही अंबानी-अदाणी वाला बजट


    मोदी सरकार के बड़बोले वित्तमंत्री अरुण जेटली ने एक फरवरी को भारत सरकार को बजट पेश किया। पहले यह बजट फरवरी महीने की अंतिम तारीख को पेश किया जाता था लेकिन इस बार इसे महीनेभर पहले कर दिया गया। विपक्षी दलों की राष्ट्रपति और चुनाव आयोग से गुहार का कोई असर नहीं हुआ। ये पार्टियां इस बिना पर बजट को आगे टालने की बात कर रही थीं कि इससे पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा को अतिरिक्त फायदा मि...

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रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका-II


-क्लारा जेटकिन


(महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर 8 नवम्बर 1927 को विदेशों से आने वाली प्रतिनिधि मेहमानों के समक्ष दिया गया भाषण)      

    कामरेडो, अत्र्युकिन और क्रुप्सकाया की टिप्पणियों से आप लोगों ने ऐसा बहुत कुछ जान लिया होगा जो महिलाओं की मुक्ति के लिए, मेहनतकश जन समुदाय की मुक्ति के लिए -जो ऐसा संघर्ष है जिसे हम अपना साझा संघर्ष समझते हैं और ...

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सार्वभौमिक बुनियादी आय : एक और जनविरोधी छल योजना


    पिछले समय में अचानक एक अजीबोगरीब मुद्दे पर चर्चा शुरू हो गयी है। इस पर अखबारां में, खासकर व्यवसाय से संबंधित अखबारों में, लेख छप रहे हैं और बहस हो रही है। कुछ लोग यह कयास लगा रहे हैं कि अचानक बहस में लाये गये इस मुद्दे का आने वाले बजट से भी संबंध है। यानी हो सकता है कि आने वाले केंद्रीय बजट में इससे संबंधित कुछ प्रावधान हों। 

    यह मुद्दा है- सार्वभौमिक बुनियादी आय (यू...

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​अर्त्यूखिन का भाषण


रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका-X


(रूसी अक्टूबर क्रांति की दसवार्षिकी समारोह के अवसर पर अंतर्राष्ट्रीय महिला कामगारों के समक्ष दिया गया 7 नवम्बर, 1927 का भाषण)

साथियों, 

    यह मेरे लिए अत्यधिक प्रसन्नता का विषय है कि मैं हमारे पास सोवियत संघ पहुंची कामकाजी महिलाओं का स्वागत कर रही हूं। 

    कामकाजी महिलाओं की मुक्ति के मामले में हमारी सफलता का प्रश्न एक बहुत व्यापक प्रश्न ह...

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चुनावी राजनीति में सांप्रदायिक गोलबंदी


    हाल ही में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। उसकी एक सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने चार-तीन के बहुमत से यह फैसला सुनाया कि यदि कोई उम्मीदवार अपने या मतदाताओं की जाति, धर्म, भाषा या नस्ल का चुनावों में वोट पाने के लिए इस्तेमाल करता है। इनके आधार पर वोट देने या न देने के लिए कहता है तो वह चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन करता होगा। इसलिए चुनावों में इनका इस्तेम...

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गुजरे साल में पश्चिमी साम्राज्यवादी दुनिया


    गुजरे साल में पश्चिमी साम्राज्यवादी दुनिया ने कुछ ऐसी चीजें देखीं जो आमतौर पर तीसरी दुनिया के पिछड़े पूंजीवादी देशों में ही देखने को मिलती हैं और जिनकी ओर साम्राज्यवादियों की नजरें हमेशा तिरस्कार पूर्ण होती हैं। अब जैसा कि अंग्रेजी में मुहावरा है चूजे घर वापस लौट रहे हैं।  

    सबसे पहले दुनिया के चौधरी संयुक्त राज्य अमेरिका को ही लें। वहां अमेरिकी साम्राज्यवाद...

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समाजवादी समाज में महिलायें


रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका-VIII


    जब पुरानी व्यवस्था ध्वस्त हो गयी और नयी व्यवस्था ने उसका स्थान ले लिया, तब महिलाओं को अधीनता की स्थिति में धकेलने वाले पुराने कानूनों के प्रत्येक अवशेष को झाड़-बुहार दिया गया। 

    कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले कहा था, ‘‘किसी भी तरह की परिपक्व या पूर्ण जनवाद की बात, किसी भी तरह के समाजवाद की बात करना तो दूर की बात है, तब तक नहीं की जा सकती, जब तक किसी देश के राजनीतिक जीवन...

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भारत का पूंजीवादी लोकतंत्र: अधिनायकवाद की ओर ढुलकते खम्भे


    पिछले दिनों भारत के पूंजीवादी लोकतंत्र के सभी तथाकथित खम्भों द्वारा ऐसे निर्णय लिए गये हैं या फैसले किये हैं जो पूंजीवादी लोकतंत्र की बुनियादों की धज्जियां उड़ाते हैं। वे भावना में ही नहीं शब्दों में भी पूंजीवादी लोकतंत्र के संविधान के खिलाफ जाते हैं। ये कुछ और नहीं बल्कि भारतीय समाज में मजबूत हो रही अधिनायकवादी-फासीवादी प्रवृत्तियों के संकेत हैं। 

    सबसे पह...

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रूसी क्रांति में लेनिन की बहनों की भूमिका


रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका - VII


​(गतांक से आगे)

    1908-1912 के काल के दौरान विदेश स्थित रूसी क्रांतिकारियों मुख्यतः बाल्शेविकांें और मेंशेविकों के बीच टकराव और दूरियां लगातार बढ़ती जा रही थीं। जनवरी, 1910 में सभी किस्म की गुुटबाजी की कार्यवाहियों के समाप्त करने के प्रस्ताव के बावजूद वे बंद नहीं हो रही थीं। 

    लेकिन आन्ना, उनके पति मार्क और मारिया सरातोव नामक औद्योगिक शहर में सामाजिक जनवादी मज...

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नोट वापसी: कुछ सवाल और जवाब


    राजनीतिक स्टंट के लिए मशहूर या बदनाम संघी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपये के वर्तमान नोटों की वापसी का एलान कर देश में न केवल भयानक अफरा-तफरी पैदा कर दी बल्कि कई तरह की बहसों को भी जन्म दे दिया। इस बहस में कई बेसिर-पैर की बातें भी की जा रही हैं। यहां नोट वापसी से पैदा हुई बहस में सही-गलत को समझने के लिए जरूरी कुछ सवालों को उठाया जा रहा है और उनका जवाब दिया जा रह...

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रूसी क्रांति में लेनिन की बहनों की भूमिका


रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका - VI


    लेनिन की तीन बहनों और दो भाइयों में आन्ना सबसे बड़ी थीं। लेनिन के बड़े भाई एलेक्सांद्र को जार की हत्या करने की साजिश करने के लिए 1887 में फांसी दे दी गयी थी। एलेक्सांद्र के साथ आन्ना को भी गिरफ्तार किया गया था। लेकिन उन्हें निर्वासन की सजा दी गयी। बाद में जब लेनिन को कजान विश्वविद्यालय के छात्र प्रदर्शन में शामिल होने के कारण निर्वासन की सजा मिली तो दोनों- आन्ना और लेनिन- ने कोकुश...

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संघियों और संघ सरकार का सैन्य उन्माद


    भारत के संघियों को इस्राइल से विशेष लगाव है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह जब इस्राइल की यात्रा पर गये थे तो उन्होंने यरुशलम की पवित्र दीवार के पास जाकर यहूदियों की तरह ही पूजा की थी। यही काम वे सऊदी अरब जाने पर मक्का में नहीं करते। 

    अभी संघी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दावा किया है कि नियंत्रण रेखा पार कर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की कार्रवाई यह दिखाती है कि भारत ने इस...

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महान अक्टूबर क्रान्ति के दिनों की वीरांगनाएं


रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका - IV


    महान अक्टूबर क्रान्ति में हिस्सा लेने वाली महिलाएं कौन थीं? क्या वे अलग-थलग व्यक्ति थीं? नहीं, वे बहुतायत में थीं, वे दसियों हजार या लाखों में अनाम वीरांगनाएं थीं, जो लाल झंडे के पीछे और सोवियतों के नारों के साथ मजदूरों और किसानों से कदम मिलाते हुए आगे बढ़ीं और जारशाही, धर्म तंत्र के खंडहरों को नष्ट करते हुए नए भविष्य की ओर आगे बढीं।

    यदि कोई पीछे की ओर मुड़ कर देखे तो इ...

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नयी नवेली स्वराज इंडिया पार्टी


    लम्बी तैयारी के बाद प्रशान्त भूषण और योगेन्द्र यादव ने अपनी नयी राजनीतिक पार्टी की घोषणा कर दी। पार्टी का नाम स्वराज इंडिया होगा। इसके अध्यक्ष योगेन्द्र यादव होंगे। इस पार्टी के अस्तित्वमान होने के बाद भी इनका स्वराज अभियान जारी रहेगा। इस अभियान के मुखिया प्रशान्त भूषण होंगे। इसमें वे लोग शामिल हो सकते हैं जो राजनीतिक पार्टी या राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल नहीं होना चा...

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रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका - III


फरवरी क्रांति में महिलाओं की शानदार भूमिका


    इस लेख श्रृंखला के पहले हिस्से में बताया जा चुका है कि 23 फरवरी 1917 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन महिलाओं के व्यापक प्रदर्शन से जारशाही को समाप्त करने का आंदोलन उग्र हो गया था। वैसे 1914 से ही बोल्शेविक पार्टी महिला मजदूरों और सैनिकों की पत्नियों को संगठित करने के काम में लगी हुई थी। फरवरी क्रांति की शुरूआत में महिला बोल्शेविक कार्यकर्ता मजदूरों और सैनिकों की पत्नियों की ...

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रूस की क्रांति में महिलाओं की भूमिका - II


    1905 की क्रांति ने मजदूर व अन्य महिलाओं को सदियों पुरानी निद्रा से झकझोर कर जाग्रत कर दिया था। वे राजनीतिक सरगर्मी में जोश-खरोश के साथ हिस्सेदारी कर रही थीं। इसके पहले तक वे सिर्फ अपनी मांगों- आर्थिक मांगों के लिए लड़ती थीं। लेकिन अब वे ‘आम हड़ताल’ में शिरकत कर रही थीं। 1905 के पहले ट्रेड यूनियनें भी कानूनी नहीं होती थीं। अब ट्रेड यूनियनों को कानूनी तौर पर गठित किया जा सकता था। पह...

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रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका - I


    रूस की फरवरी क्रांति का सूत्रपात अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन से व्यापक महिला मजदूरों के प्रदर्शन के साथ हुआ था। इन महिला मजदूरों के साथ बड़े पैमाने पर वे महिलायें भी हिस्सेदारी कर रही थीं, जिनके पतियों को जारशाही ने प्रथम विश्व युद्ध में झोंक रखा था। लेकिन यह अचानक नहीं हुआ था। रूस में क्रांतिकारी महिलाओं को संगठित करने का प्रयास लम्बे समय से चल रहा था। 

    द...

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पूंजीवादी जनतंत्र का टेस्ट केस : ब्राजील


    ब्राजील के वर्कर्स पार्टी का उत्थान और पतन पूंजीवादी जनतंत्र का एक ठोस नमूना पेश करता है। साथ ही यह उदारीकरण के दौर में पूंजीवादी जनतंत्र के चरित्र का भी नमूना पेश करता है। इस चरित्र का उद्घाटन ही डिल्मा रुसेफ को राष्ट्रपति पद से फर्जी तरीके से हटाये जाने का सही प्रतिरोध है न कि सुधारवादियों के अंदाज में डिल्मा रुसेफ और वर्कर्स पार्टी की रक्षा में उतरना। 

    ब्र...

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गीता गोपीनाथ, पीनाराई विजयन, बुद्धदेव भट्टाचार्य और माकपा


    गीता गोपीनाथ अमेरिका के नामी हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं। वे अपने निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण समर्थक विचारों के लिए जानी जाती हैं।

    इन्हीं गीता गोपीनाथ को केरल के नये मुख्यमंत्री पीनाराई विजयन ने अपना एक आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया। विजयन अभी हाल में ही केरल में माकपा की जीत के बाद मुख्यमंत्री बने हैं।

    भारत की कम्युनि...

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गहराता आर्थिक संकट


    हर वर्ष अगस्त माह में अमेरिका के जैक्सन हाॅल में दुनिया भर के केन्द्रीय बैंकों के बैंकर्स इकट्ठा होते हैं और आपस में विश्व अर्थव्यवस्था की स्थिति एवं केन्द्रीय बैंकों व मौद्रिक नीति की भूमिका पर चर्चा करते हैं। जाने माने अर्थशास्त्री यहां बैंकरों के सामने अपने पत्र पेश करते हैं और इस सबसे बढ़कर दुनिया भर के केन्द्रीय बैंकों के सिरमौर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के प्रमुख अमेरि...

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समान नागरिक संहिता


    समान नागरिक संहिता का सवाल समाज के जनवादीकरण से जुड़ा हुआ है। समाज का जनवादीकरण स्वयं यह मांग करता है कि धर्म का सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप खत्म हो और धर्म को व्यक्ति का निजी मामला बना दिया जाये। इसी तरह यह भी सुनिश्चित हो कि धर्म, जाति, नस्ल और लिंग इत्यादि के आधार पर भेदभाव खत्म हो। ऐसे में यह सवाल सहज ही पैदा होता है कि जो पार्टी या राजनीतिक गिरोह (भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं...

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भारत छोड़ो आंदोलनः एक स्वतः स्फूर्त साम्राज्यवाद विरोधी जन उभार


भारत छोड़ो आंदोलन की 75 वीं वर्षगांठ पर


    भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 9 अगस्त 1942 को शुरू हुआ यह आंदोलन भारतीय इतिहास के सबसे बड़े जनान्दोलनों में से एक है। इस आंदोलन ने जहां ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को यह अहसास दिला दिया कि भारतीय जनता अब किसी भी स्थिति में ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के अधीन रहने को तैयार नहीं है कि बलपूर्वक भारत में राज करने के ब्रिटिश सा...

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निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की रजत जयंती


    इस समय भारत की पूंजीवादी राजनीति रोचक मोड़ पर है। इसमें रोचक घटनाएं हो रही हैं। इनमें से एक है भाजपा द्वारा कांगे्रस पार्टी के पुराने नेताओं का अधिग्रहण। सरदार पटेल और मदनमोहन मालवीय से शुरू कर यह अब नरसिंह राव तक पहुंच गया है। मजे की बात यह है कि इसमें मनमोहन सिंह को भी लपेटने की कोशिश की जा रही है। 

    अभी भाजपा की ओर से बयान आया है कि 1991 में जो नई आर्थिक नीति लागू की ...

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रघुराम राजन, अरविंद सुब्रमणियम इत्यादि की देशभक्ति का सवाल


    कभी-कभी गीदड़ भी आदमखोर होने के सपने पाल सकता है। कम से कम सुब्रमणियम स्वामी यही साबित करने में लगे हुए हैं। रघुराम राजन के बाद अब उन्होंने वित्तमंत्री के आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियम पर निशाना साधा है। उनके अनुसार ये सज्जन भी भारत विरोधी हैं। क्योंकि एक बार उन्होंने भारत के खिलाफ अमेरिकी सरकार को सलाह दी थी। हालांकि रघुराम राजन मामले के विपरीत इस मामले में अरूण जेटली ...

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यूरोप का एकीकरण: एक संकटग्रस्त परियोजना


    जब प्रथम विश्वयुद्ध में यूरोप के देश आपस में एक भीषण युद्ध में उलझ गये तो यह सवाल सभी को मथने लगा कि इस तरह के युद्ध से कैसे बचा जाये। यह युद्ध पहले के यूरोपीय युद्धों से अलग था। एक तो इसमें यूरोप के ज्यादातर देश शामिल थे। दूसरे इसमें नरसंहार की जिस तकनीक और औजारों का इस्तेमाल हो रहा था, उसकी पहले कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।

    भविष्य में इस तरह के युद्ध से बचने के लि...

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सोवियत संघ पर नाजी हमला


हिटलर की विश्वव्यापी पराजय की शुरूआत


    आज 75 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है जब हिटलर की नाजी फौजों ने सोवियत संघ पर व्यापक हमला किया था। 22 जून, 1941 को यह हमला हुआ था। मजदूर वर्ग के प्रथम समाजवादी राज्य को खत्म करने की हिटलर की यह कोशिश थी। इसके पहले हिटलर पूर्वी यूरोप के कई देशों को कुचलकर अपने अधीन कर चुका था। हिटलर ने तीन महीने के भीतर सोवियत संघ को तहस-नहस करने की अपनी योजना बनायी थी। संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और फ्...

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सुभाष चन्द्र बोस: मिथक और यथार्थ


    कभी पौराणिक मिथकों से गले तक डूबा रहने वाला भारतीय समाज सामंती जमाने से पूंजीवादी जमाने में प्रवेश कर जाने के बावजूद अभी भी मिथकों से मुक्ति नहीं पा सका है। सांस्कृतिक स्तर पर उसकी जिंदगी उसे मिथकों की ओर ले जाती है तो शासक वर्ग सचेत तौर पर भी इस दिशा में प्रयास करता है। स्कूली किताबों से लेकर टी.वी. चैनलों में पौराणिक नाटक इस दिशा में योगदानों में से कुछ प्रमुख योगदान हैं। म...

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भारतीय विदेश नीति को अमरीकी साम्राज्यवाद के युद्धरथ में बांधने की ओर एक कदम


नरेन्द्र मोदी की अमेरिका यात्रा


    नरेन्द्र मोदी की संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा और अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ विभिन्न किस्म के विशेष तौर पर सुरक्षा सम्बन्धी समझौते ऐसे समय में हुए हैं जब अमरीकी साम्राज्यवादी नाटो के साथ मिल कर पोलैण्ड में भारी युद्धाभ्यास कर रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व में नाटो द्वारा पौलेण्ड में किया जाने वाला यह फौजी प्रदर्शन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबस...

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वियतनामी शासन द्वारा वियतनामी जनता के शौर्यपूर्ण बलिदानों का अपमान


ओबामा का वियतनाम में पाखण्डपूर्ण उपदेश


    ओबामा ने मई के अंतिम सप्ताह में वियतनाम की यात्रा की। उन्होंने वियतनामी नेतृत्व से कहा कि किसी भी सम्प्रभुता सम्पन्न छोटे देश को कोई शक्तिशाली देश डरा-धमका नहीं सकता। अमरीकी साम्राज्यवादी सरगना इतनी बेशर्मी के साथ यह बात कह गया। वह शायद वियतनामी अवाम की आंखों में धूल झोंकने के लिए यह बात कह रहा था। क्योंकि वियतनाम को गुलाम बनाने के मकसद से अमरीकी साम्राज्यवादियों ने फ्रा...

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ट्रोल्स, गाली-गलौच, लंपट और संघ परिवार


    फेसबुक ओर ट्विटर इस्तेमाल करने वालों में ट्रोल्स एक जाना-पहचाना शब्द है। इसका अर्थ है किसी व्यक्ति पर हमले की बौछार। यह बौछार मजाक  के रूप में भी हो सकती है अथवा गाली-गलौच के रूप में। अक्सर ही यह गाली-गलौच के रूप में होती है। 

    संघ परिवार के समर्थक आज बड़े पैमाने पर इंटरनेट पर दुनिया में सक्रिय हैं। ये संगठित भी हैं। ये अपने विरोधियों पर खास नजर रखते हैं। ट्रोल्स ...

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भ्रष्टाचार के आरोप


    2013 के मध्य में ब्राजील की पुलिस ने एक तस्कर अल्बर्टो युसूफ को गिरफ्तार किया। वह धन तस्करी के मामले में 9 बार पहले भी गिरफ्तार हो चुका था। लेकिन इस बार उसने जो खुलासा किया उसने ब्राजील में राजनैतिक हलचल पैदा कर दी। 

    युसूफ ने कहा कि अगर उसने मुंह खोला तो गणतंत्र ढह जायेगा। उसने बताया कि ब्राजील की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी पेट्रोब्रास में लम्बे समय से भ्रष्टाचार चल र...

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ब्राजील एक नए राजनीतिक संकट की और


दिलमा राउसेफ पर महाभियोग लगाने का प्रयास


    17 अप्रैल को ब्राजील की संसद के निचले सदन ने अपने देश के राष्ट्रपति दिलमा राउसेफ पर महाभियोग लगाने का प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित कर दिया है। अब संसद के उच्च सदन में इसे पारित करके यह कार्रवाई करनी होगी। इस दौरान उन्हें छह महीने के लिए राष्ट्रपति का पद छोड़ना होगा। उनके स्थान पर उप-राष्ट्रपति, राष्ट्रपति का पद संभालेंगे। महाभियोग लगाने के बाद ब्राजील फिर से एक गंभीर राज...

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बदलाव, संगठन और मुक्ति


मई दिवस के अवसर पर


    भारत का हर मजदूर जानता है कि इस वक्त देश-दुनिया के हालात अच्छे नहीं हैं। हर मजदूर अपने निजी जीवन में इतनी तरह की समस्याओं का सामना कर रहा है कि उसे लगता है कि किसके बारे में बात करे और किसके बारे में नहीं। वह भली-भांति जानता है कि जैसे उसके हाल हैं वैसे ही पूरे देश के बाकी मजदूरों के भी हैं। 

    गहराते आर्थिक संकट ने रोजी-रोटी पर ही सवाल खड़े कर दिये हैं। आये दिन खबर आती...

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राष्ट्रवाद पर जारी बहस के बीच में - II


    पिछले लेख में हमने यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय, उसके पूंजीपति वर्ग के साथ रिश्तों के सम्बन्ध में लिखा था। हमने यह भी लिखा था कि जनता के बीच राष्ट्रवादी सोच सामंतवाद के विरुद्ध संघर्ष की उपज थी और कि यूरोप में सामंतवाद के खात्मे के साथ राष्ट्रवाद की सोच जनता को सकारात्मक तौर पर आंदोलित नहीं कर सकती। आज राष्ट्र और राष्ट्रवाद की विचारधारा ऐतिहासिक तौर पर अतीत की वस्तु बनकर रह ...

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राजसत्ता की क्रूरता और सोनी सोरी


    20 फरवरी को बस्तर के बास्तानार इलाके में आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता सेानी सोरी पर एसिड से हमला किया गया। यह एसिड काले रंग के ग्रीस जैसा था जिसके कारण जगदलपुर के महारानी अस्पताल के डाॅक्टर आखिर तक इसे ग्रीस मानकर इलाज करते रहे। लेकिन चेहरे पर जलन, सूजन व आंखों में दिक्कत बढ़ने पर इलाज के लिए उन्हें दिल्ली ले जाया गया। सोनी सोरी ने बस्तर रेंज के आई. जी., एस. आर. पी कल्लूरी पर अपने ऊपर ...

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जनवाद का गला घोंट मोहन भागवत का कद बढ़ाने का प्रयास


    जब से संघ ने अपनी पोशाक खाकी नेकर की जगह भूरी पेंट कर ली, तब से मानो संघ ने कुछ नये निर्देश भी अपनी सरकारों को दे दिये। इन निर्देशों में शायद यह भी था कि मोहन भागवत हिन्दू भावना के प्रतीक हैं इसलिए उनका कोई मजाक, विरोध स्वीकार्य नहीं होगा। इसके साथ ही शायद यह भी कहा गया होगा कि भूरी पेंट भी हिन्दू प्रतीक है और भविष्य में इसका राष्ट्रध्वज की तरह सम्मान हो।

    यह सब बातें ...

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गौ-रक्षकों ने ली दो और निर्दोषों की जान


लातेहर प्रकरण


    झारखण्ड में 18 मार्च को लातेहर के बालुमथ जंगलों में दो मुस्लिम लोगोें का शव पेड़ से लटका पाया गया। मोहम्मद मजलूम अंसारी (35 वर्ष) व इनायतुल्लाह खान (12 वर्ष) वहां के बालूगोन व नवादा गांवों के निवासी थे। ये अपनी 8 भैंसों के साथ पड़ोस के पशु मेले में जा रहे थे जिन्हें रास्ते में एक भीड़ द्वारा रोका गया और पीट कर पेड़ पर फांसी के रूप में लटका दिया गया। 

    जब गांवों के अन्य लोग...

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राष्ट्रवाद पर जारी बहस के बीच में


    आजकल राष्ट्र, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय हित, राष्ट्रद्रोह पर चर्चा जोरों पर है। दुर्भाग्य से यह चर्चा अभी भी देश के व्यापक जन को आकर्षित नहीं कर पायी। अगर ऐसा होता तो हिन्दुस्तान के वर्तमान और भविष्य को यह बहुत व्यापक तौर पर प्रभावित करता। दुर्भाग्य इस बात का भी है कि उपरोक्त प्रश्नों पर बहस खुले मन से नहीं राष्ट्रद्रोह के आरोपों के बीच हो रही है। अगर आम भारतीय जनमानस- विशेषकर प...

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हिलेरी क्लिण्टन या डोनाल्ड ट्रम्प?


    संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव का दौर चल रहा है। पहले दौर में दोनों बड़ी पार्टियां अपने-अपने उम्मीदवारों को चुनती हैं। इस चुनाव में प्रत्येक पार्टी के उम्मीदवारों को उन्हीं के समर्थक चुनते हैं। ये चुनाव सभी 50 प्रांतों में होते हैं। इन चुनावों में जो विजयी होकर उभरते हैं वे फिर उस पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हैं तब फिर कोई खा...

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सीरिया में रूसी साम्राज्यवादियों को तात्कालिक सफलता


    सीरिया में अमरीकी साम्राज्यवादी तात्कालिक तौर पर ‘हुकूमत परिवर्तन’ के अपने अभियान में पीछे हट गये प्रतीत हो रहे हैं। पिछले 5 वर्षों से ज्यादा समय से वे असद को सत्ताच्युत करने में हर तरह के आतंकवादी समूहों की मदद कर रहे थे। उनके इस अभियान में तुर्की, साउदी अरब और कतर की हुकूमतें प्रत्यक्षतः मदद कर रही थीं। सीरिया में गृहयुद्ध भड़काकर लाखों लाख आबादी को यूरोप के विभिन्न द...

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अमेरिका का जनवाद विरोधी युद्ध मैनुअल


    संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग ने युद्ध मैनुअल के नये कानून जारी किए हैं। ये नये कानून वस्तुतः अंतर्राष्ट्रीय और अमरीकी कानूनों का उल्लंघन करने वाले कानून हैं। ये युद्ध अपराध करने वाले कानून हैं। ये कानून जून, 2015 में जारी किये गये हैं। 

    इस युद्ध मैनुअल के अनुसार,‘‘युद्ध के कानून’’ (यानी कि अमरीकी रक्षा विभाग के अनुसार युद्ध के कानून) खुद अमरीकी संव...

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बात तीसरे विश्व युद्ध की


    हिन्दी के खबरिया चैनल अपनी सनसनीखेज प्रकृति के लिए जाने जाते हैं। उन्हें रोज कोई ऐसा विषय चाहिए जिसे वे सनसनीखेज ढंग से पेश कर सकें और कम से कम कुछ देर दर्शकों को अपने खास चैनल पर ‘‘केबल’’ चैनल पर बांधे रख सकें। इसके लिए उनमें तीखी प्रतियोगिता होती है और इसी क्रम में विषय अजीबो गरीब होते चले जाते हैं। 

    इन खबरिया चैनलों के लिए विदेशों में चलने वाले गृह युद्...

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अफ्रीकी महाद्वीप की वर्तमान स्थिति


    2010 में ट्यूनीशिया में बेन अली की तानाशाह हुकूमत के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी विद्रोह फूट पड़ा था। तानाशाही के खात्मे के लिए छात्र, नौजवान और छोटे व्यापारी उठ खड़े हुए थे। बेन अली की तानाशाही का फ्रांसीसी और अमरीकी साम्राज्यवादी समर्थन कर रहे थे। 

    2011 की जनवरी के मध्य तक बेन अली की हुकूमत भहरा कर गिर गयी और वह साऊदी अरब भाग गया। एक अंतरिम सरकार अस्तित्व में आयी और उसन...

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वस्तु और सेवा कर: छुट्टे पूंजीवाद की परियोजना


    इस समय वस्तु और सेवा कर विधेयक (Goods and Services Tex-GST), जिसे संक्षेप में जी.एस.टी. भी कहा जा रहा है, चर्चा में है। चर्चा में इसलिए है कि नरेंद्र मोदी की संघी सरकार इस विधेयक को किसी भी तरह पास करवाना चाहती है। इस सरकार की घोषणा है कि एक अप्रैल, 2016 से यह कानून देश भर में लागू हो जाये। 

    इसी विधेयक को पास करवाने के मद्देनजर मोदी ने इस समय विपक्षी पार्टियों के प्रति सुलह-समझौते की नीति ...

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लातिन अमरीकी देशों में दक्षिणपंथी उभार


    अभी हाल के चुनाव में वेनेजुएला में ह्यूगो चावेज की पार्टी वेनेजुएला की एकीकृत सोशलिस्ट पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। वहां दक्षिणपंथी पार्टी एम.यू.डी को दो तिहाई सीटों पर विजय मिली है। वेनेजुएला में अमेरिकी साम्राज्यवादी करोड़ों डालर खर्च करके मादुरो सरकार के विरुद्ध दक्षिणपंथी ताकतों की न सिर्फ चुनावों में मदद करते रहे हैं बल्कि संसद से बाहर हिंसक प्रदर्शनों के ...

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पूंजीवादी चुनावी प्रबंधन और पूंजीवादी राजनीति


    1970 के दशक में एक फिल्म बनी थी। उसका नाम था ‘आंधी’। यह फिल्म कमलेश्वर के उपन्यास ‘पीली आंधी’ पर आधारित थी। बंबईया सिनेमा के दायरे में अपनी कलात्मकता के अलावा यह फिल्म इसलिए भी चर्चित हुई कि इसके मुख्य नारी चरित्र को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का प्रतीक माना गया। 

    पर यहां इस फिल्म की चर्चा इसकी कलात्मकता या इंदिरा गांधी के लिए नहीं की जा रही है। इस...

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फ्रांस पर आतंकी हमले के बाद की विश्व राजनीति


    13 नवम्बर को फ्रांस की राजधानी पेरिस में कई जगहों पर आतंकवादी हमले हुए। इन आतंकवादी हमलों में 129 लोगों की जानें गयीं और 300 से ज्यादा लोग घायल हो गये। इससे 10 महीने पहले शार्ली आब्दो अखबार के दफ्तर में आतंकवादी हमले हुए थे। इन आतंकवादी हमलों की जिम्मेदारी आई.एस.आई.एस. ने ली है। इस आतंकवादी संगठन का कहना है कि सीरिया में फ्रांस की भूमिका के जवाब में ये हमले किये गये हैं। आई.एस.आई.एस. ने...

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असहनशीलता विवादः हंगामा यूं ही नहीं बरपा है


    हिटलर को अपना आदर्श मानने वाले संघी इस समय बहुत रोष में हैं या कम से कम वे रोष में होने का दिखावा कर रहे हैं। वे बहुत रोष में हैं कि तमाम साहित्यकार, कलाकार, फिल्मकार, इतिहासकार, वैज्ञानिक एवं अन्य बुद्धिजीवी उनके ऊपर असहिष्णुता या असहनशीलता का आरोप लगा रहे हैं, कि ये आरोप लगाकर वे उन्हें कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। संघी रोष से उबल र...

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आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा का प्रश्न


    गुजरात के पटेल आंदोलन और संघ प्रमुख मोहनभागवत के बयान के बाद जाति आधारित आरक्षण का प्रश्न आरक्षण विरोधियों द्वारा फिर से कई रूपों में उठाया जाने लगा है। जहां मोहन भागवत ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग की वहीं कई अन्य ने कहा कि आरक्षण को जाति के बदले आर्थिक आधार पर लागू किया जाना चाहिए। 

    जाति आरक्षण के विरोध में उठती इन आवाजों का बिहार के विधानसभा चुनावों...

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‘गुलाबी क्रान्ति’ और भारत सरकार का दोहरापन -अर्जुन प्रसाद सिंह


     हमारे देश में बीफ (गाय एवं अन्य पशुओं के मांस) का उत्पादन एवं व्यापार काफी अरसे से होता आ रहा है। बीफ भारतवासियों के एक बड़े हिस्से (हिन्दू-मुस्लिम समेत) के भोज्य सामग्रियों में शामिल रहा है। बीफ उत्पादन एवं उससे जुड़े हुए उद्योगों में हमारे देश की अच्छी खासी आबादी, जिनमें 50 प्रतिशत से अधिक हिन्दू हैं, को रोजगार मिला हुआ है। यूपीए की मनमोहन सरकार के कार्यकाल के दौरान बीफ के उत...

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नागरिक अधिकारों के लिए बड़ा खतरा है फासिस्ट संघी


    बिसाहड़ा की घटना ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। राजनीतिक दलों, साहित्यकारों, सामाजिक संगठनों, कलाकारों और यहां तक कि देश के विभिन्न हिस्सों के संवेदनशील नागरिकों को भी कुछ सोचने को बाध्य किया है। सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक सभी पर यह हत्याकांड छाया हुआ है। इस देश के राष्ट्रपति को भी प्रकारांतर से इस हत्याकांड पर टिप्पणी करनी पड़ी।

    इस ...

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नेपाल में नया संविधान: परिवर्तन और निरंतरता


    नेपाल की संविधान सभा ने 16 सितंबर को नया संविधान पास कर दिया और वह 20 सितंबर को लागू हो गया। इसी के साथ पिछले सात साल से चल रही संविधान निर्माण की प्रक्रिया का पटाक्षेप हो गया। 

    नेपाल में नया संविधान बनाने के लिए संविधान सभा के चुनाव मई, 2008 में हुए थे। इस संविधान सभा को दो साल में नये संविधान का निर्माण करना था। पर वह यह नहीं कर पाई। उसने संविधान बनाने के लिए अपना कार्य...

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सीरिया में रूसी भालू


अमरीकी साम्राज्यवाद की एक ध्रुवीय दुनिया के लिए चुनौती


    30 सितम्बर से जारी रूसी हवाई हमलों से सीरिया में ही नहीं समूचे पश्चिम एशिया, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनीतिक हलकों में समीकरण बदलने के आसार मिलने लगे हैं और शासक वर्गों के भीतर उथल-पुथल मची हुयी है। सीरिया की हुकूमत के साथ मिलकर और उसके बुलावे पर रूसी बमवर्षक विमानों ने आई.एस.आई.एस., अल-नुसरा और अन्य आतंकवादी ग्रुपों के ठिकानों को हमलों का निशाना बनाया है। कैस्पियन ...

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अलेक्सी सिप्रास, जेरेमी कोरबिन, बर्नी सैन्डर्स इत्यादि-इत्यादि


    8 अगस्त को फिरोज वरूण गांधी, जिन्हें लोग वरूण गांधी के नाम से जानते हैं, ने ‘द हिन्दू’ अखबार में एक लेख लिखा। लेख का शीर्षक था- ‘द राइज आव न्यू लेफ्ट इन वेस्ट’ यानी पश्चिम में नये वाम का उदय। 

    वरूण गांधी भाजपा के सांसद हैं। आज लोग उन्हें आम तौर पर उस नेहरू गांधी परिवार का हिस्सा या वारिस नहीं मानते जिसके पुरखों में जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी थे। नेहरू ने ...

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‘नान स्टेट ऐक्टर्स’ बनाम ‘स्टेट ऐक्टर्स’


    भारत के संघी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा कि आज दुनिया में एक बड़े हिस्से पर ‘नान स्टेट एक्टर्स’ का कब्जा है और अभूतपूर्व बर्बरता ढा रहा है। उन्होंने इसे वैश्विक शांति व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बताया। 

    मोदी की यह ‘नान स्टेट एक्टर्स’ की धारणा उनकी कोई अपनी मौलिक खोज नहीं है और न ही इससे पैदा होने वाले खतरे के बारे में। यह धारणा बहुत सा...

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अमेरिकी साम्राज्यवाद और लातिन अमेरिका के तथाकथित वामपंथी


    अगस्त महीने की शुरूआत में मैक्सिको शहर में लातिन अमेरिका के तरह-तरह के तथाकथित वामपंथी साओ पाउलो मंच के तत्वाधान में इकट्ठे हुए। ज्ञात हो कि उक्त मंच की स्थापना 1990 में हुई थी। 25 वर्ष पहले जब इस मंच की स्थापना हुई, उस समय समूचे लातिन अमेरिका में अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोधी एकमात्र सरकार क्यूबा की थी। आज 10 से अधिक देशों में अलग-अलग मात्रा में अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध करने...

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भारत-पाक संबंध: शासकों की धींगा-मुश्ती


    एक समय था जब भारत की सभी पूंजीवादी पार्टियों में देश की विदेश नीति पर आम सहमति थी। यह आम जुमला था कि देश के बाहर हम सब लोग एक हैं। नेहरू और इंदिरा गांधी के शासनकाल में भाकपा और माकपा जैसी खुद को कम्युनिस्ट कहने वाली पार्टियां भी इस विदेशी नीति की समर्थक थीं। 

    तब से अब कह सकते हैं गंगा-जमुना में काफी पानी गुजर चुका है। अब स्थितियां बदल गयी हैं। अब देश के संघी प्रधान...

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डर को त्यागो और साम्राज्यवाद-पूंजीवाद का विरोध करो


    आज की दुनिया में नवउदारवादी तानाशाहों, अपराधियों और बेईमानों का प्रभुत्व है। साम्राज्यवादी देशों का अधिकांश मध्यम वर्ग मानवीय सनकों का शिकार है। वह अधिकाधिक डर से आक्रांत होता जा रहा है। वहां की मेहनतकश अवाम में लगातार डर बैठाया जा रहा है। उनके अंदर कार्यवाई करने का डर बैठाया जा रहा है। उन्हें अनागत से डर लगता है। उन्हें ऐसा लगता है कि कहीं जो कुछ भी उन्हें उपलब्द्ध है, उस...

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किस्सा दो मुसलमानों का: एक ‘‘अच्छा’’ और एक ‘‘बुरा’’


    अबुल पकीर जैनुलउद्दीन अब्दुल कलाम और याकूब रज्जाक मेमन भारत के दो मुसलमान नागरिक थे या ऐसे दो भारतीय नागरिक थे जिनका धर्म इस्लाम था। दोनों ही 30 जुलाई को दफन किये गये पहले को तोपों की सलामी के साथ तो दूसरे को भारत सरकार द्वारा प्रतिबंध के साये में। पहले की 27 जुलाई को स्वाभाविक मृत्यु हुई थी चैरासी साल की उम्र में तो दूसरे को तिरपन साल की उम्र में भारत सरकार द्वारा फांसी पर लटका...

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चोरी व वर्गीय ध्रुवीकरण: आपराधिक पूंजीवाद का उभार -जेम्स पेत्रास


    संयुक्त राज्य अमेरिका में तकरीबन 75 प्रतिशत कर्मचारी सप्ताह में 40 घण्टे या इससे ज्यादा काम करते हैं। पौलेण्ड को छोड़कर सभी ओ.ई.सी.डी. देशों में सबसे बड़े काम के दिन हैं। दक्षिण कोरिया में लगभग इतने बड़े ही काम के दिन हैं। इसके विपरीत डेनमार्क के महज 10 प्रतिशत मजदूर, नार्वे के 15 प्रतिशत मजदूर, फ्रांस के 30 प्रतिशत मजदूर, यू.के. के 43 फीसदी मजदूर और जर्मनी के 50 प्रतिशत मजदूर सप्ताह में ...

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ग्रीस, वित्तीय सट्टेबाज और साम्राज्यवादी


    जुलाई माह में ग्रीस के साथ साम्राज्यवादियों ने जो किया उससे किसी जमाने में तीसरी दुनिया के संकटग्रस्त देशों के साथ साम्राज्यवादियों द्वारा किये जाने वाले व्यवहार की याद ताजा हो गयी। ग्रीस एक विकसित देश है और यूरोपीय साम्राज्यवादी ताने-बाने का हिस्सा भी (ग्रीस यूरोपीय संघ और यूरो क्षेत्र का सदस्य है)। पर जब वित्तीय पूंजी के हितों की बात आई तो खुद यूरोपीय साम्राज्यवादियों ...

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ईरान नाभिकीय समझौता: अमेरिकी साम्राज्यवादियों की बदलती रणनीति


    इजरायल के प्रधानमंत्री बैंजामिन नेतन्याहू ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस ईरानी सत्ता से वह वर्षों से दुश्मनी गांठता रहा है उससे इजरायल का हर कदम पर मददगार अमेरिका कोई समझौता कर लेगा। कल तक जिस ईरान को घेरने के लिए इजरायल-अमेरिका वर्षों पुरानी योजना पर काम कर रहे थे उसे ताक पर रखकर अमेरिका ईरान से नये सम्बन्धों की शुरूआत कर देगा। नेतन्याहू की तरह ही सऊदी शासक भी हैरान...

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गरीबी, भूखमरी और असमानता


​    पिछले दिनों भारत सरकार ने सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के कुछ आंकड़े जारी किये। ये सर्वेक्षण 2011 की जनगणना के साथ-साथ ही करवाये गये थे। इसका घोषित उद्देश्य देश की सारी जनता की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति को जानना था। 

    देश में भूखमरी की रेखा के नीचे रहने वाली आबादी के बारे में अक्सर ही विवाद होता रहता है। इसके निर्धारण के लिए न जाने कितनी समितियां और आयोग बन चुके है...

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मोदी सरकार द्वारा मजदूरों पर भीषण हमला


श्रम कानूनों को विघटित करने की पूरी तैयारी


    यूं तो मोदी सरकार ने पिछले वर्ष सत्ता ग्रहण करते ही पांच केन्द्रीय श्रम कानूनों में प्रस्तावित संशोधनों के द्वारा अपने घोर पूंजीपरस्त व मजदूर विरोधी चरित्र का खुलासा कर दिया था लेकिन एक वर्ष बीतते-बीतते श्रम कानूनों के पूरे तंत्र को कांट-छांट कर विघटित करने व उन्हें पूरी तरह पूंजी के हित में ढालने की एक नयी योजना के साथ मोदी सरकार ने मजदूरों पर एक बहुत भीषण हमला बोल दिया है...

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भारतीय संस्कृति, योग और बाबा-मोदी


    प्राचीन भारतीय संस्कृति के बारे में जो अनेक किवदंतियां प्रचलित हैं उनमें से कुछ योग से भी संबंधित हैं। इनमें जहां अधिकांश भारतीय विश्वास करते हैं वहीं विदेशियों के लिए वे कौतूहल का विषय होती हैं। पहले विदेशियों के लिए यह सांपों और सन्यासियों का देश था और सन्यासियों का संबंध योग से भी था। सन्यासियों की अजीबोगरीब योग क्रियाओं और योग सिद्धियों के बारे में बातें आम थीं। 
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जन धन से जनसुरक्षा - जनता का पैसा बैंक-बीमा कंपनियों को लुटाना


    मोदी सरकार आजकल अपने एक वर्ष की उपलब्धियों को गिनाने में जुटी है। टी.वी. चैनलों से लेकर रेडियो, सोशल मीडिया से लेकर भाजपा नेताओं के भाषणों में सरकार सर्वाधिक जिस चीज का ढिंढोरा पीट रही है वह है जनधन व जनसुरक्षा योजना। सरकार के दावे के मुताबिक उसने देश भर के गरीब मेहनतकशों के लिए ऐसी योजनाएं पेश की हैं जिससे गरीबों का जीवन सुरक्षित हो चुका है। सरकार का दावा है कि उसकी नई सामाजि...

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भारतीय किसान और पूंजीवादी व्यवस्था


    2015 के पांच महीने बीत चुके हैं। इन चार महीनों में सबसे बड़ा मुद्दा किसानों द्वारा आत्महत्या करने का रहा। किसानों द्वारा आत्महत्या करने का कारण उनकी फसल का बरबाद होना था जो बेमौसम बारिश व ओलावृष्टि से तबाह हो गयी। किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर आत्महत्या करना समाज में हलचल का विषय बना और फिर पूंजीवादी बुद्धिजीवियों ...

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‘अच्छे दिनों का जश्न’ या झूठ-फरेब की मार्केटिंग


    ‘अच्छे दिनों का वायदा करके’ 2014 में सत्तासीन हुई भारतीय जनता पार्टी नीत राजग सरकार या मोदी सरकार का एक वर्ष पूरा हो गया है। इस एक वर्ष में देश की जनता की हालत में कोई तब्दीली आई हो या नहीं आयी हो, वह बेहतर हुई या बदतर, इस सबसे अलग मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों का बखान करने के लिए महाअभियान चलाने जा रही है। इस महाअभियान के...

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आपातकाल के चालीस साल


    जून, 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा के अब चालीस साल हो चुके हैं। हालांकि यह आपातकाल केवल डेढ़ साल ही लागू रहा पर देश की पूंजीवादी राजनीति में एक महत्वपूर्ण मुकाम के नाते यह आज भी चर्चा करने योग्य है। 

    इंदिरा गांधी की कांग्रेसी सरकार द्वारा 1975 में आपातकाल लागू करने का तात्कालिक कारण इलाहाबाद उच्च न्याया...

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1974 की विशाल रेलवे हड़ताल


चालीस साल बाद


    भारतीय रेल की मई 1974 की हड़ताल में रेल मजदूरों और कर्मचारियों की व्यापक भागीदारी थी। लगभग 15 लाख मजदूरों ने हड़ताल में भागीदारी की और यह तीन सप्ताह चली। यह 8 मई से एक मांग पत्र जिसमें बोनस, काम के घंटे, कार्य स्थिति की सुरक्षा और अन्य मुद्दे शामिल थे, से शुरू हुई। सरकार ने दसियों हजार मजदूरों को गिरफ्तार और जेल भेजकर, सैकड़ों को बर्खास्त और निष्कासित कर और आखेटीकरण के अन्य रूपों क...

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मोदी की भाजपा सरकार के एक साल


    नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के एक साल हो गये हैं। इस एक सल में मोदी ने अपने भाति-भांति के समर्थकों को निराश किया हालांकि पूंजीपति वर्ग ने अभी भी उनसे उम्मीद नहीं छोड़ी है। 

    नरेंद्र मोदी से तीन प्रमुख उम्मीदें थीं। भारत का पूंजीपति वर्ग यह उम्मीद करता था कि मोदी वे नीतिगत फैसले तेजी से करेंगे जिससे पूंजी निवेश तेजी से बढे़गा और साथ ही मुनाफे की दर मे...

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मास्को की लड़ाई हिटलर की पराजय की शुरूआत थी


द्वितीय विश्व 70 वीं वर्षगांठ पर


 (प्रस्तुत लेख जैक आर पावेल्स के लेख के अधिकांश हिस्सों को भावानुवाद है। इसे गूगल सर्च डाट काॅम सी.ए. से साभार लिया गया है। उम्मीद है कि फासीवादी विरोधी संघर्ष में समाजवादी सोवियत संघ की निर्णायक भूमिका को समझने में यह मददगार होना-सम्पादक)   द्वितीय विश्व युद्ध की शुरूआत 1939 में जर्मनी द्वारा पोलेंण्ड पर कब्जा करने से हुई थी। लगभग 6 माह बाद जर्मनी ने बेल्जियम, नी...

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चिकित्सकों व रोगी के बीच बढ़ता टकराव


    दुनिया में सबसे सम्मानित पेशों में एक चिकित्सक का पेशा है। उसे भगवान के तुल्य समझा जाता रहा है। दिन-रात मेहनत से पढ़ाई करके लोगों को शारीरिक तौर पर स्वस्थ रखने के लिए वे उससे भी ज्यादा मेहनत से लगे रहते हैं। गरीब-अमीर हर कोई उसके आगे शीश नवाता है। जनसेवा में लगे रहने वाले डाक्टर दिन-रात दौड़ते-भागते रहते हैं। 

    हमारे देश के लोगों की सेवा में जी-जान से लगे रहने वाले...

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बुद्धू बक्सा: सफल पूंजीवादी प्रचारतंत्र


    जब 1960 के दशक में विकसित पूंजीवादी देशों में बड़े पैमाने पर टी.वी. का प्रसार हुआ तो विश्लेषकों ने इसे ‘‘इडियट बाक्स अथवा बुद्धू बक्सा’’ का नाम दिया। आशय यह था कि टी.वी. के कार्यक्रम इस तरह से बनाये जाते हैं कि वे अपने दर्शकों की सोचने-समझने की क्षमता को कुंद कर देते हैं। वे उसे बुद्धू बना डालते हैं। इस निष्कर्ष में यह निहित था कि इस माध्यम में दर्शकों को प्रभावित करने की बड...

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वियतनाम युद्ध के बारे में अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा झूठ का जारी सिलसिला


    2015 में अमरीकी साम्राज्यवादी राष्ट्रपति जानसन द्वारा वियतनाम युद्ध का विस्तार करने की पचासवीं वर्षगांठ मना चुके हैं। वे इसकी तैयारियां 2008 से शुरू कर चुके थे। इसी वर्ष वियतनाम युद्ध में अमेरिका की पराजय के चालीस वर्ष पूरे हो गये हैं। 30 अप्रैल, 1975 के दिन दक्षिण वियतनाम की राजधानी पर राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा का कब्जा होने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद की वियतनाम युद्ध में पराजय ...

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लातिन अमरीकी महान साहित्यकार एडुवर्डो गलीनो का निधन


    दक्षिणी अमरीका के महान साहित्यकार एडुवर्डो गलीनो नहीं रहे। अप्रैल महीने में उनकी मौत हो गयी। वे दक्षिण अमरीकी मानववाद और इसकी क्रांतियों के सबसे शक्तिशाली प्रतीक थे। फिडेल कास्त्रो और चे ग्वेरा सल्वाडोर अलेन्दे द्वारा की गयी क्रांति ने उनके व्यक्तित्व का निर्माण किया। इसके बाद उन्होंने कविताओं-कहानियों और सप...

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किसान आत्महत्यायें: रास्ता इधर है


    बेमौसमी बारिश और ओलावृष्टि ने उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्सों में कहर बरपाया हुआ है। गेहूं, सरसों आदि फसलों की बरबादी देख या तो किसान आत्महत्या कर रहे हैं या फिर सदमे में दम तोड़ रहे हैं। निराश किसानों का एक ओर जीवन समाप्त करने का सिलसिला थम नहीं रहा है तो दूसरी ओर शेष किसान आबादी का जीवन बहुत मुश्किल होता जा रहा है। 

    आखिर आत्महत्या या सदमें में दम तोड़ते ये किसा...

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राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2015: अमेरिकी माडल चुपके-चुपके


    संघी नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश के लिए एक नई स्वास्थ्य नीति का मसौदा जारी किया है। यह नीति देश में सभी लोगों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने का लक्ष्य सामने रखती है और वह भी मुफ्त। इस मुफ्त सार्विक स्वास्थ्य सेवा के वादे से हर किसी को खुश होना चाहिए। पर जैसे ही मसौदे को बारीकी से पढ़ते हैं, तो पाते हैं कि इसमें खुश ...

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भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के भगवा कायाकल्प की कोशिशें


    भारतीय इतिहास लेखन के इतिहास में एक नया दौर शुरू होने जा रहा है। मार्च माह के पहले सप्ताह में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आई.सी.एच.आर.) की कमान भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त ऐसे विद्वानों की टीम संभालने जा रही है जिन्होंने इतिहास के वैज्ञानिक शोध के बजाय राम, अयोध्या, हिंदू देवी-देवताओं एवं हिंदुओं के पवित्र कहलाने वाले पशु जैसे विषयों पर काम किया है और संघ की कृपादृष्टि प्रा...

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दक्षिण कोरिया के ‘जनतंत्र’ का असली तानाशाह राक्षसी चेहरा


      कोई भी पूंजीवादी जनतंत्र मजदूर वर्ग और मेहनतकश अवाम के ऊपर तानाशाही होता है जबकि पूंजीपति वर्ग और सम्पतिशाली वर्गों के लिए जनतंत्र होता है। इस सच्चाई को हमारे देश में और समूची दुनिया के पूंजीवादी जनतंत्रों में कोई भी सचेत मजदूर व मेहनतकश अपने अनुभव से जानता है। किसी भी पूंजीवादी जनतंत्र की यही बुनियादी सच्चाई है। लेकिन मध्यम वर्ग और खासकर इसका पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी कहा ...

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आम आदमी पार्टी की नियति


    पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों को राजनीति करना सिखाने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी अब बहुमत के साथ दिल्ली में सत्ताशीन हो चुकी है। वह अपनी चुनावी जीत से तो खुश है ही, उसके समर्थक बुद्धिजीवी आगे बढ़-चढ़कर उसके बारे में एक से एक दावे कर रहे हैं। वे बाकी सारी पार्टियों को एक रंग में रंगते हुए यह कह रहे हैं कि यह देश में एक नई राजनीति की शुरूआत है। 

    आम आदमी पार्टी क...

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संघ, मदर टेरेसा और ईसाई मिशनरियां


    संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल में ही बयान दिया है कि मदर टेरेसा का मूल उद्देश्य धर्मांतरण था। दूसरे शब्दों में मदर टेरेसा का सारा सेवाकर्म लोगों को ईसाई बनाने के उद्देश्य से संचालित था। संघ प्रमुख के इस बयान से एक बार फिर धर्मांतरण को लेकर बहस तेज हो गयी जो नरेन्द्र मोदी को अपने प्यारे मित्र बराक ओबामा द्वारा दी गयी नसीहत और इस नसीहत पर अमल करते हुए मोदी द्वारा साम्प्रदायिक ह...

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सीरिजा, पोडेमास एवं अन्य


    ग्रीस में सीरिजा (उग्र वाम का गठबंधन) ने हालिया चुनाव जीतकर वहां सरकार बना ली है। उसके नेता अलेक्स सिपारा प्रधानमंत्री बन चुके हैं। सीरिजा ने यह जीत ग्रीस पर बाहर से लादे जा रहे किफायत कदमों के अपने सर्वप्रमुख एजेंडे से हासिल की। 

    ग्रीस पर ये किफायत कदम यूरोपीय केंद्रीय बैंक, यूरोपीय संघ तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष द्वारा लादे गये हैं। ये ग्रीस सरकार को दिय...

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मध्यमवर्गीय आंदोलन की परिणति


    अन्ना आंदोलन चार साल के छोटे अंतराल में ही अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया। उस आंदोलन के कुछ नेताओं ने स्वयं अज्ञातवास की शरण ली जिसमें अन्ना स्वयं भी शामिल हैं। कुछ नेता अपनी गैर सरकारी संगठनों की धंधेबाजी में मशगूल हो गये जिन्हें 2011 में भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने व लोकपाल का दौरा पड़ा था। कुछ नेताओं ने उसी राजनीतिक गंदगी में लोट लगाने की ठानी जिसके बारे में रामलीला मैदान म...

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद


    फ्रांस की कार्टून पत्रिका शार्ली एब्दों पर मुस्लिम आतंकवादियों द्वारा हमला कर इसके सम्पादकों की हत्या किये जाने के बाद साम्राज्यवादी हलकों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बड़ी लम्बी-चौड़ी डींगें हांकी जा रही हैं। सबसे अदभुत नजारा वह था जिसमें फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैण्ड जैसे कई साम्राज्यवादी देशों के नेता इजरायल के बेंजामिन नेतन्याहू के साथ पेरिस में ‘एकता मार्च’ क...

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बिहार में जनसंहार और न्याय का उपहास - अर्जुन प्रसाद सिंह


     हमारे देश के बुद्धिजीवियों का एक अच्छा खासा हिस्सा भारतीय न्यायपालिका को ‘लोकतान्त्रिक व्यवस्था’ के एक निष्पक्ष अंग के रूप में मान्यता देता है। उनकी ओर से लगातार प्रचारित किया जाता है कि ‘कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं’ और ‘न्यायपालिका की देवी के हाथों में इंसाफ का तराजू है’। खासकर, देश की मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई लूटने वाले शासक-शोषक समूह और उनके दल व संगठन ...

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विज्ञान, विज्ञान का इतिहास और पोंगापंथ


इस समय संघी पोंगापंथी बहुत सक्रिय हैं। वे ज्ञान के हर क्षेत्र में अपने पोंगापंथ का प्रसार करना चाहते हैं। इतिहास से लेकर विज्ञान तक वे सब चीजों को उलट-पुलट कर अपने पोंगापंथ के हिसाब से ढाल देना चाहते हैं। 

 एक लम्बे समय से संघी पोंगापंथियों ने यह प्रचारित कर रखा है कि प्राचीन भारत में विज्ञान इतना विकसित था कि आज का विज्ञान उसके सामने कुछ भी नहीं है। आज का विज्ञान, मुख्यतः प...

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इस्लामी कट्टरपंथी और जिहादी आतंकवाद


    इस्लामी कट्टरपंथ और जिहादी आतंकवाद पूरी दुनिया के स्तर पर आज एक बड़ी चर्चा का विषय है। जहां पिछले एक दशक से अधिक समय से इस्लामी जिहादियों के खिलाफ ‘‘आतंकवाद के विरुद्ध’’ युद्ध के नाम पर इसे अपने कब्जाकारी युद्ध अभियानों का बहाना बनाया है तो वहीं बोस्निया से लेकर चेचन्या, सीरिया व लीबिया आदि में अपने विरोधियों को अस्थिर करने व ठिकाने लगाने के लिए इस्लामी जिहादियों क...

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संस्कृत और संस्कृति


    केन्द्र की संघी सरकार ने अपनी संघी परियोजनाओं को परवान चढ़ाने के लिए जो कदम उठाये हैं उनमें एक है संस्कृत भाषा को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में अनिवार्य करना। यह आदेश जारी किया गया है कि स्कूलों में तीसरी भाषा के तौर पर संस्कृत को पढ़ाया जाये और अंग्रेजी के अलावा अन्य किसी भाषा को अतिरिक्त भाषा के तौर पर ही जगह दिया जाये। 

    संघियों का कहना है कि संस्कृत भारत की ...

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साम्राज्यवादियों की शह पर खड़ा इस्लामी आतंकवाद


    इस्लामी कट्टरपंथ और आम तौर पर अरब व मुस्लिम लोगों के बारे में धारणायें दुनिया के पैमाने पर जोर-शोर से फैलाई गयी है। इस्लामी कट्टरपंथ को पैदा करने वाले और बढ़ाने वाले साम्राज्यवादी ताकतें हैं और अरबों और मुसलमानों को सनकी कहकर पुकारने का काम भी साम्राज्यवादी मीडिया कर रहा है। फाॅक्स न्यूज जैसे चैनल लगातार यह काम कर रहे हैं। आई.एस.आई.एस. जैसे कट्टरपंथी संगठनों का इस्लाम धर्म...

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धर्मांतरण, घृणा प्रचार व प्रायोजित दंगों की एक सुनियोजित परियोजना


साम्प्रदायिक फासीवाद की नयी लहर


    भारतीय जनता पार्टी के सत्तासीन होते ही अल्पसंख्यकों के खिलाफ सुनियोजित हमलों, खुलेआम घृणा प्रचार, बलात व प्रलोभन देकर धर्मांतरण और प्रायोजित दंगों की बाढ़ आ गयी है। इन सब घटनाओं में भारतीय जनता पार्टी व संघ परिवार के लोग या तो प्रत्यक्ष रूप से शामिल रहे हैं अथवा उनके इशारों पर यह सब संचालित होता रहा है। 

    दरअसल भाजपा की जीत में ऊपरी तौर पर विकास का मुद्दा रहा हो ...

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गुलशन नंदा, चेतन भगत, चवन्निया उपन्यास और पल्प फिक्शन


इस समय अंग्रेजी जानने-समझने वाले मध्यमवर्गीय हलकों में चेतन भगत का उपन्यास ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ चर्चा में है। इसे कई मध्यमवर्गीय युवकों के हाथों में देखा जा सकता है। यह इसलिए और भी चर्चा में है कि उपन्यास प्रकाशित होने से पहले ही इस पर फिल्म बनाने की घोषणा हो गयी थी। चेतन भगत के उपन्यासों पर पहले भी फिल्में ...

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फासीवाद के विविध रूप- इतिहास के आइने में


(गतांक से आगे)

    यह पहली किस्त में कहा जा चुका है कि यूरोप के देशों में पूंजीवादी राजनीतिज्ञ फासीवाद के प्रति खुशामदी दृष्टिकोण रखते थे। इसके साथ ही फासीवाद का कैथोलिक चर्च के साथ निरंतर गठजोड़ बना हुआ था। हिटलर के यहूदी विरोधी अभियान के प्रति तीव्र घृणा बहुत बाद में उस समय पैदा हुई जब यह अपनी अंतिम मंजिल नरसंहार के पागलपन तक पहुंच गयी थी। हिटलर के भाषणों में ‘‘य...

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हैमलेट, हैदर और कश्मीर: हों कि न हों?


    शेक्सपीयर का एक नाटक है हैमलेट। हैमलेट डेनमार्क का राजकुमार है। उसके पिता की हत्या उसके चाचा ने उनके कान में जहर डालकर उस समय की होती है जब वे बाग में सो रहे होते हैं। चाचा यह प्रचारित कर कि सम्राट हैमलेट की मौत सांप के काटने से हुई थी डेनमार्क का राजा बन बैठता है तथा हैमलेट की मां से विवाह कर लेता है। यह दो महीने के भीतर हो जाता है। अपने भाई के इस कुकृत्य से दुःखी सम्राट हैमलेट ...

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फासीवाद के विविध रूप- इतिहास के आइने में


    (हमारे देश में नरेन्द्र मोदी सरकार आने के बाद फासीवाद पर बहस तेज हो गयी है। कुछ लोग इसे फासीवादी सरकर कहना शुरू कर चुके हैं। कुछ हैं कि फासीवाद का खतरा आसन्न बता रहे हैं। ऐसे लोग आसन्न फांसीवादी खतरे से निपटने के लिए तमाम पूंजीवादी शक्तियों के साथ फासीवाद विरोधी व्यापक संयुक्त मोर्चे की हिमायत कर रहे हैं।

    ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि फासीवाद के चरित...

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‘लव जेहाद’: हिन्दू साम्प्रदायिकों की स्त्री विरोधी मुहिम


    उत्तर प्रदेश में विधान सभा के उपचुनावों के ठीक पहले भाजपा और संघ परिवार द्वारा ‘लव जेहाद’ का मामला खूब उछाला जा रहा है। इसके द्वारा हिंदुओं में मुसलमानों के प्रति एक खास किस्म की नफरत पैदा की जा रही है। 

    संघियों द्वारा यह प्रचारित किया जा रहा है कि मुस्लिम युवक जान-बूझकर षड्यंत्रकारी तरीके से हिन्दू युवतियों को अपने प्रेम जाल में फंसाकर उनसे विवाह कर रहे ह...

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योजना आयोग का विसर्जनः एक पूर्व घोषित मौत


    भारतीय पूंजीपतियों के दुलारे और भूतपूर्व संघी प्रचारक नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की हैसियत से लाल किले से 15 अगस्त को अपने संबोधन में एक महत्वपूर्ण घोषणा यह की कि योजना आयोग को भंग कर दिया जायेगा और उसकी जगह एक नयी संस्था का गठन किया जायेगा। उनकी घोषणा के चंद दिनों बाद ही योजना आयोग के विसर्जन की प्रक्रिया शुरू हो गयी। इसके सदस्यों को इस्तीफा देने के लिए कह दिया गया और स्...

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सिविल सेवा, अंग्रेजी, भारतीय भाषाएं और शासक वर्ग


    इस समय भारत की केंद्रीय सिविल सेवा की परीक्षाओं में अंगे्रजी के वर्चस्व को लेकर इसके विरोधी छात्रों का आंदोलन चल रहा है। इस आंदोलन में हिन्दी भाषी छात्र प्रमुख हैं। ये छात्र इन परीक्षाओं में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। केंद्रीय कार्मिक मंत्री के अनुसार 24 अगस्त को होने वाली सी सेट (सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूट टेस्ट) में करीब नौ लाख छात्र बैठेंगे। हर साल सिविल सेवा के लिए करीब ए...

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हां! मैं एक औरत हूं! -शालू निगम


एक नारीवादी के कुछ सकारात्मक विचार


    इस स्वाधीनता दिवस के अवसर पर मैं एक आम औरत के बतौर, इस स्वतंत्र राष्ट्र के एक नागरिक के बतौर तथा ज्यादा महत्वपूर्ण बात एक मानव होने के बतौर अपनी आजादी की लड़ाई जारी रखे हुये हूं। 

    हां, मैं एक औरत हूं और मुझे अपने पर गर्व है। मैं मजबूत हूं और प्रत्येक बीतते क्षण में और ज्यादा मजबूत होती जा रही हूं। मैं एक स्वतंत्र, निर्भीक, प्रत्येक कदम पर अपना चुनाव करने वाली स्वतं...

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प्रथम विश्व युद्ध और उसके बाद


    प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत के अब पूरे सौ वर्ष बीत चुके हैं। यह पहला ऐसा बड़ा युद्ध था जो सही मायनों में विश्व युद्ध था। यह युद्ध दुनिया के एक बड़े हिस्से में लड़ा गया और दुनिया की सारी बड़ी शक्तियों ने इसमें भाग लिया। 

    यह युद्ध अपनी नृशंसता और तबाही में अप्रतिम था। ऐसा दुनिया ने अभी तक नहीं देखा था। इसमें नये-नये हथियार और यंत्र इस्तेमाल किये गये। टैंक, हवाई जहा...

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रंगा-बिल्ला, अंबानी-अदानी और मोदी-शाह


    सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता है जिसका भाव यह कि रंगा-बिल्ला भाई-भाई थे, उन्हें फांसी दी गयी, टाटा-बिडला भी भाई-भाई हैं, पर उन्हें फांसी नहीं हुई। रंगा-बिल्ला दो अपराधी थे जिन्हें 1980 के दशक में चोपड़ा बच्चों के अपहरण, बलात्कार और हत्या के लिए फांसी दी गयी थी। 

    1980 के दशक में देश के सबसे बड़े पूंजीपति टाटा-बिडला थे। तब पूंजीपति वर्ग के पर्यायवाची के तौर पर टाटा-बि...

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राजन के अधीन रिजर्व बैंकः जबावदेह किसके प्रति?


(यह लेख आस्पेक्ट्स आॅफ इण्डियाज इकोनोमी के अंक 56 में RBI Under Rajan: Answerable to Whom? शीर्षक में छपा था। अनुवाद हमारा है। अंग्रेजी में इस लेख को इसके ब्लाॅग rupeindia.wordpress.com पर भी देखा जा सकता है।-सम्पादक)

    भारतीय रिजर्व बैंक आजकल अक्सर खबरों में है। हालांकि अधिकांशतः अनजान रहते हैं कि यह क्या करता है और किसलिए करता है। अखबार हमें जो बताते हैं वह सत्य है कि जब रिजर्व बैंक ‘रेपो रेट’ बढ़ात...

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गांधी, अंबेडकर, अरूंधती राय और दलित बुद्धिजीवी


    अरूंधती राय अपने को दलितों-आदिवासियों की समर्थक समझती हैं। स्वभावतः वे चाहती होंगी कि उन्हें इसी रूप में देखा भी जाये। इसके लिए वे अपनी उस आलोचनात्मक दृष्टि को छोड़ने को भी तैयार हैं जो उन्होंने ‘छोटी-छोटी की देवता’ से लेकर अपने हाल तक के लेखों में प्रदर्शित किया है। लेकिन दलित बुद्धिजीवी एक सवर्ण को इस सबके बावजूद यह अधिकार देने को तैयार नहीं हैं कि वह अंबेडकर पर कुछ लि...

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सर्वे का धंधा चोखा है इसलिए तो लहरों पर मोदी जी सवार हैं -स्वतंत्र मिश्र


   लगभग दो-ढाई दशक से चुनाव के नतीजों के रुझान को समझने और बताने के लिए चुनाव के आसपास सर्वेक्षण आयोजित करवाए जाने लगे हैं। इस सर्वेक्षण को सर्वाधिक विश्वसनीयता सीएसडीएस के सर्वेक्षणों से मिली। आज भी सीएसडीएस का सर्वेक्षण ही सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है। सीएसडीएस अपने सर्वेक्षण में किन-किन नमूनों का सहारा लेते हैं, सबका विस्तार से जिक्र होता है। इनके किए गए अब तक के सर्वे...

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प्रतीकों और वायदों की राजनीति


    देश में इस समय चुनावी मौसम है। पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों द्वारा किये जाने वाले वायदों की इस समय बहार है। इसके साथ ही प्रतीकों (सिम्बलस) का भी जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। इनके जरिये मतदाताओं तक अपनी पैंठ बनाकर सत्ता हथियाने की हर संभव कोशिश की जा रही है। 

    प्रतीकों के एक उदाहरण को लें। कुछ समय पहले भारतीय जनता पार्टी ने यह घोषित किया कि उसके प्रधानमंत्री पद ...

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सवाल विचारधारा काः फासीवाद की आहटें


    पिछले कुछ महीनों में आम आदमी पार्टी (आआप) के नेताओं से लगातार यह सवाल पूछा जाता रहा है कि आप की विचारधारा क्या है? यह सवाल पूछने वालों में कांग्रेस पार्टी के नेता थे तो ‘वामपंथी’ पार्टियों या भाकपा और माकपा के नेता भी। कुछ वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भी यह सवाल उठाया है कि इस बच्चा पार्टी की विचारधारा क्या है?

    इसके जवाब में आआप के नेता आम तौर पर यह जवाब देते आ रहे है...

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‘दूसरी आजादी’ तीसरी बार अथवा पूंजीवादी राजनीति का छिछोरापन


    पिछले तीन सालों में जब से अन्ना हजारे व अरविंद केजरीवाल का आंदोलन शुरू हुआ व फिर आआपा बनी, ‘दूसरी आजादी’ की बात बार-बार सुनाई पड़़ी है। कहा गया कि भारत को या भारत के लोगों को दूसरी आजादी चाहिए। इसमें प्रमुखतः है भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों से आजादी। बिना कहे ही यह सबके लिए स्पष्ट था कि पहली आजादी 1947 में मिली थी। अब दूसरी आजादी चाहिए।

    पूंजीवादी राजनीति की विस्मरण...

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भारत की पूंजीवादी राजनीति की तीसरी जगह और ‘आप’ का भविष्य


    एक उत्तर-आधुनिकतावादी बुद्धिजीवी आदित्य निगम ने 28 दिसंबर को काफिला डाट आर्ग वेबसाइट पर एक लेख लिखाः ‘आप्स ह्यूगो चावेज मोमेंट’। इसमें उन्होंने ह्यूगो चावेज के खिलाफ वेनेजुएला के कारपोरेट घरानों के संघर्ष का हवाला दिया जो चावेज की जनपक्षधर नीतियों के खिलाफ थे। इन कारपारेट घरानों ने चावेज का तख्तापलट कराने तक की कोशिश की थी। 

    आम आदमी पार्टी के संदर्भ में ...

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फेंकू, पप्पू और ऐरी पाटर


    बहुत समय पहले 1939 में अमेरिका में एक फिल्म बनी थी ‘‘मिस्टर स्मिथ गोज टू वाशिंगटन’’। यह अमेरिकी जनतंत्र में पूंजीपतियों की भूमिका पर थी। फिल्म की कथा इस प्रकार है-

    अमेरिकी सीनेट के एक सिनेटर की मृत्यु हो जाती है। वहां के नियमों के अनुसार अगले नियमित चुनाव होने तक एक स्थानापन्न सीनेटर को नियुक्त करने का अधिकार संबंधित प्रदेश के गर्वनर का है। मृतक सीनेटर की प...

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‘आप’ की सफलता के निहितार्थ


    हालिया विधानसभा चुनावों में अगर कोई बात अप्रत्याशित थी तो वह थी आम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा में भारी सफलता। 70 में से 28 सीटें जीत यह पार्टी भले ही अपने दावे के मुताबिक बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी पर इसने दूसरी बड़ी पार्टी बन कांग्रेस को बहुत पीछे धकेल दिया। आने वाले पांच वर्षों में जहां दिल्ली विधानसभा में इसकी धमक सुनाई देती रहेगी वहीं अपनी सफलता से उत्साहित यह प...

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नेल्सन मण्डेलाः एक राष्ट्रीय मुक्ति योद्धा का दुःखद अंतिम अध्याय


    नेल्सन मण्डेला की मौत 95 वर्ष की उम्र में 5 दिसम्बर को हो गयी। वे लम्बे समय से बीमार थे। उनकी मौत पर श्रंद्धाजलि देने वालों में वे सब भी शामिल हैं जिन्होंने उनको आतंकवादी घोषित कर रखा था। अमरीकी साम्राज्यवादी इसमें सर्वोपरि हैं। सी.आई.ए. ने उनको गिरफ्तार कराने में महती भूमिका अदा की थी। उनकी मौत पर अमरीकी साम्राज्यवादी और यूरोपीय साम्राज्यवादी तरह-तरह के तारीफों  के पुल बां...

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जाना राजेन्द्र यादव का


    हाल के वर्षों में राजेन्द्र यादव हिन्दी साहित्य जगत में ‘हंस’ पत्रिका के कारण जाने जाते थे। उन्होंने 1986 में ‘हंस’ पत्रिका का पुनः प्रकाशन शुरू किया था और घोषित किया था कि वे प्रेमचंद की पत्रिका को ही फिर से प्रकाशित कर रहे हैं।

    इस पर विवाद हो सकता है, और वास्तव में पर्याप्त विवाद रहा है, कि क्या राजेन्द्र यादव की ‘हंस’ प्रेमचंद्र की ‘हंस’ है? पर इस पर व...

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सरदार पटेल, नेहरू, कांग्रेस और भाजपा


    इन दिनों सरदार पटेल को हथियाने को लेकर कांग्रेस पार्टी और भाजपा पार्टी में जंग छिड़ी हुयी है। भाजपा के अपने लौह पुरुष द्वितीय यानी नरेन्द्र मोदी पटेल की एक बड़ी मूर्ति स्थापित करने में लगे हुए हैं जिसके बारे में कहा जा सकता है कि वह दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति होगी। इसके निर्माण के लिए देश के हर गांव से लोहा मंगवाया जा रहा है जैसे कभी अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए हर गा...

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साम्राज्यवाद द्वारा अफ्रीकी शासक वर्ग को पालतू बनाने की कोशिशें


    नार्वे में पैदा हुई एक महिला विरजिट ब्राक-उत्ने ने 2000 में एक पुस्तक लिखी थी जिसमें उन्होंने लिखा था

    ‘‘जब यूरोपीय लोग पन्द्रहवीं शताब्दी की शुरूआत में अफ्रीका में आये तो उन्होंने यहां एक उन्नत सभ्यता और प्रचुर समृद्धि देखी। उस समय कृषि और पशुपालन, लोहे के काम, बर्तन निर्माण, मछली पालन, नमक का खनन, सोने को शुद्ध करने का काम तथा आभूषण बनाना, बुनाई, शिकार और दूर दूर ...

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साधु, सोना और सरकार


    बहुत साल पहले हरिशंकर परसाई ने एक व्यंग्य लिखा था: साधू और सांप। इसमें जमीन में गड़े हुए सोने की बात की गई थी। सांप उसकी रक्षा करता था। उसमें देश के वित्त मंत्री को सांप के पास बीन बजाते दिखाया गया था ताकि सांप बिल में छिपा सोना सौंप दे और देश की जरूरतें पूरी हो जायें। 

    अब पांच दशक बाद वास्तव में भारत सरक...

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आसाराम जी बापू और अन्य धर्मगुरू


    एक नाबालिग लड़की का यौन उत्पीड़न करने के आरोप में आसाराम जी बापू के जेल जाने के बाद इस तरह के सभी धर्मगुरूओं पर चर्चा आम हो गयी। इसके पहले निर्मल बाबा ही किसी हद तक चर्चा में आये थे। अपने देश में धर्म एक ऐसा मुद्दा है जिस पर आमतौर पर विवादास्पद चर्चा करने से बचा जाता है। इसे संवेदनशील मुद्दा मान लिया जाता है और किसी हद तक यह है भी। 

    लेकिन तब यदि आसूमल उर्फ आसाराम बा...

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रंगभेद, अमेरिका और ओबामा


    अमेरिका में एक बार फिर रंगभेद को लेकर बहस तेज हो गयी है। 13 जुलाई को एक अमरीकी फेडरल कोर्ट ने अश्वेत नौजवान ट्राइवन मार्टिन के हत्यारे गोरे युवक जिम्मरवान को बाईज्जत बरी कर दिया। जिम्मरवान को निर्दोष बताने के संबंध में न्यायाधीशों का कहना था कि उसने केवल आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई थी। न्यायपालिका का यह निर्णय अमरीकी अश्वेतों के लिए इस कदर क्षोभकारी था कि पूरे अमेरिका में अ...

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एक बार फिर भुखमरी की रेखा


    एक बार फिर भुखमरी की रेखा चर्चा में है। चर्चा की वजह मोंटेक सिंह अहलूवालिया के योजना आयोग द्वारा भुखमरी की रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या के नये आंकड़े हैं। योजना आयोग ने इस संख्या में भारी कमी दिखाते हुए घोषित किया कि ‘‘अब केवल 21.9 प्रतिशत लोग ही भुखमरी के शिकार हैं। (अब यानी 2011-12 के वित्तीय वर्ष में) भुखमरी की रेखा गांवों के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 27.2 रुपया तथा शहरों क...

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‘मिड डे मील’, प्राथमिक शिक्षा और पूंजीपति वर्ग


    बिहार में 16 जुलाई को विषाख्त ‘मिड डे मील’ से हुई बच्चों की मौत के बाद देश के प्राथमिक विद्यालयों में दोपहर के भोजन की योजना अचानक चर्चा में आ गई। तब तक समाज के मध्यम और उच्च वर्गीय हलकों में बहुत थोडे़ से लोगों को ही इस योजना का पता रहा होगा।

    बच्चों की मौत की अत्यन्त दुःखद घटना की चर्चा में भी ज्यादातर बातें इस योजना में भ्रष्टाचार और इस खास घटना में किसी षड्यंत...

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रूसी साम्राज्यवादी, पुतिन एवं अन्य साम्राज्यवादी


    जब 1980 के दशक के उत्तरार्ध में सोवियत खेमे का विघटन हुआ और 1991 में स्वयं सोवियत संघ विघटित हो गया तब पश्चिमी साम्राज्यवादी बहुत खुश हुये। उनका मुख्य प्रतिद्वन्द्वी धराशाई हो गया था। अब वे सोवियत खेमे के देशों को समेट सकते थे। स्वयं सोवियत संघ के विघटन के बाद पैदा हुए देशों में अपने पांव पसार सकते थे और फिर सारी दुनिया में पहले से ज्यादा लूट-मार मचा सकते थे। उनके लिए स्थितियां इस...

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विश्व आर्थिक संकट, ग्रीस और साम्राज्यवादी


    मई के महीने में दुनिया में पिछले पांच साल से चल रहे आर्थिक संकट में घटनाक्रम तेजी से बदला है। इसकी शुरूआत 6 मई को ग्रीस में हुए चुनावों से हुयी। 

    ग्रीस इस समय यूरोप के सबसे ज्यादा संकटग्रस्त देशों में से एक है। साम्राज्यवादी वित्तीय अधिपति इसे और ज्यादा निचोड़ने में लगे हुए हैं। इसमें यूरोपीय संघ, यूरोपीय केन्द्रीय बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष उनकी पूरी म...

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