हिन्दू फासीवाद और मीडिया - सेमिनार पत्र - सितम्बर 2015, दिल्ली कुछ समय पूर्व भारतीय अखबारों और खासकर इंटरनेट में एक तस्वीर सामने आयी थी। इस तस्वीर को एक पत्रकार ने शीर्षक दिया ‘‘प्रधानमंत्री की पीठ पर किसका हाथ?’’ तस्वीर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के सबसे बड़े पूंजीपति मुकेश अंबानी की पत्नी का अभिवादन कर रहे थे और उनकी पीठ पर मुकेश अंबानी ने बड़े स्नेह और अधिकार से अपना हाथ रखा हुआ था। तस्वीर दिलचस्प होने से अधिक उस संबंध को जाहिर कर रही थी जो भारत के प्रधानमंत्री और भारत के सबसे बड़े एकाधिकारी घराने के प्रमुख के बीच कायम है। यह तस्वीर बतलाती है कि हाल के कुछ दशकों और उसमें भी खासकर हालिया लोकसभा चुनाव के कुछ समय पहले से भारत के एकाधिकारी घरानों का उस पार्टी (या उसके मातृ संगठन) से क्या रिश्ता कायम हुआ है जो इस वक्त भारत की सत्ता में प्रचंड बहुमत से काबिज है। पिछली सदी के आठवें-नवें दशक के पहले भारत के एकाधिकारी घरानों का रुख इस पार्टी या संगठन के प्रति ऐसा नहीं था। उपेक्षा, संशय और बाज दफा तिरस्कार का भाव मौजूद था। नब्बे के दशक में जाकर ही उसके एक बड़े हिस्से ने यह रुख अपनाया कि ‘चलो एक बार इन्हें भी आजमाया जाय’ और हालिया लोकसभा चुनाव में वह इसे आजमाने के अलावा किसी और को आजमाना ही नहीं चाहता था। फलतः नरेंद्र मोदी देश के प्रधामनंत्री हैं और जिस संगठन के वे स्वयंसेवक हैं वह अपने इतिहास में सबसे मजबूत और ताकतवर स्थिति में है। भारत की एकाधिकारी पूंजी समग्र भारतीय पूंजी की सिरमौर है और वही भारत की सत्ता को मूलतः संचालित और निर्देशित करती है। एकाधिकारी पूंजी ने पिछले चुनाव में हिन्दू फासीवाद अधिक वैज्ञानिक शब्दों में हिन्दू फासीवादी आंदोलन से जो गठजोड़ कायम किया, उसे जो प्रश्य दिया उसके परिणाम आज हमारे सामने हैं। हिन्दू फासीवादी आंदोलन और एकाधिकारी पूंजी का अभी गठजोड़ ही कायम हुआ है, अभी वे एकाकार नहीं हुए हैं। जिस दिन वे एकाकार हो जायेंगे उस दिन भारत में हिन्दू फासीवादी सत्ता कायम हो जायेगी। और यह सत्ता एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की ऐसी नग्न तानाशाही होगी जिसका संचालन हिन्दू फासिस्ट कर रहे होंगे। पूरे देश में बर्बरता का राज होगा। अभी जो स्थिति है उसमें मोदी सरकार हिन्दू फासीवादी आंदोलन और एकाधिकारी पूंजी दोनों के हितों को एक साथ साध रही है। एकाधिकारी पूंजी के हितों के अनुरूप तेजी से आर्थिक व श्रम सुधार और हिन्दू फासीवादी आंदोलन को अपनी कार्यसूची लागू करने के लिए पूर्ण अवसर प्रदान करना। मोदी सरकार के दोनों से क्या रिश्ते हैं, यह सितंबर माह में हुई दो मीटिंगों से भी जाहिर हुये हैं। पहली मीटिंग जो तीन दिन चली, पूरी मोदी सरकार संघ के सामने नतमस्तक थी। संघी नेता दंभपूर्वक मंत्रियों से उनके कामकाज का ब्यौरा लेते और वे उन्हें आगे कैसे काम करना है इसका निर्देश देते रहे। दूसरी मीटिंग देश के प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने आवास पर बुलायी। इस बैठक में देश के प्रमुख पूंजीपति अंबानी से लेकर मित्तल तक शामिल थे। प्रधानमंत्री व पूंजीपतियों की बैठक का एजेंडा आर्थिक सुधार व गहराता आर्थिक संकट था। मोदी सरकार देश की जनता या संसद के प्रति नहीं एकाधिकारी घरानों और संघ के प्रति जवाबदेह है। एकाधिकारी पूंजी, संघ और सरकार के रिश्तों की ढेरों मिसालें पेश की जा सकती हैं। ये संबंध गुप्त नहीं हैं, बेहद खुले हैं और वीभत्स हैं, जुगुप्सा जगाते हैं और ये जुगुप्सा तब और जगाते हैं जब कोई लोेकतंत्र का हवाला देता है। देश में जब ऐसे हालात हों तो कोई सवाल पूछ सकता है कि देश का मीडिया ऐसे में क्या करता है? और वह क्या भूमिका निभाता है? आम प्रचलित धारणा और उससे भी अधिक आदर्शांे के अनुसार मीडिया को निष्पक्ष होना चाहिए। सत्य को स्थापित करना उसका मिशन होना चाहिए। आधुनिक मूल्यों जिसमें जनवाद, धर्मनिरपेक्षता, वैज्ञानिकता आदि, आदि का समावेश हो उस पर उसे खड़ा होना चाहिए। यह एक मिथक है कि मीडिया लोकतंत्र का चैथा खम्भा है। असल में वह एक औजार है जिसके जरिये सत्ताधारी वर्ग अपने हितों, मूल्यों, संस्कृति का प्रचार-प्रसार करता है। लोकमत का निर्माण व निदेशित करता है और इस तरह अपनी सत्ता बनाके रखता है जैसे समाज में ताकत, वर्चस्व, हैसियत पूंजी से तय होती है वैसे ही मीडिया में उसी का उतना ही जोर चलता है जितना कि पूंजी का मालिक वह होता है। भारत में सम्पूर्ण मीडिया को उसके संचालन में लगी विभिन्न मात्रा की पूंजियों के आधार पर इस प्रकार बांटा जा सकता हैः 1. एकाधिकारी पूंजी; 2. गैर एकाधिकारी और क्षेत्रीय पंूजी; 3. छोटी व स्थानीय पूंजी; 4. बेहद अल्प पूंजी (मूलतः समूहों, संगठनों या व्यक्तियांे से संचालित)। भारत के मीडिया के सभी तरह के हिस्सों यथा पिं्रट (अखबार, पत्रिकाएं, पुस्तकें) टेलीविजन, इंटरनेट, सिनेमा आदि में भारत के एकाधिकारी पूंजी का वर्चस्व कायम है। मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, जैन, चंद्रा, बिडला एकाधिकारी घरानों द्वारा भारत के सभी प्रमुख राष्ट्रीय, क्षेत्रीय अखबार, पत्रिकाएं, टेलीविजन चैनल और इंटरनेट में प्रकाशित समाचार, विचार आदि को संचालित किया जाता है। इसी कोटि में केन्द्र सरकार द्वारा संचालित मीडिया को भी रखा जा सकता है। गैर एकाधिकारी पूंजी व क्षेत्रीय पूंजी, जो एकाधिकारी पूंजी से काफी छोटी है, का इसके बाद दबदबा है। ये भी अखबार, पत्रिकाएं, चैनल आदि-आदि चीजों को संचालित करती है। जिलों, शहरों, कस्बों आदि में सीमित अखबार, पत्रिकाएं, चैनल छोटी व स्थानीय पंूजी द्वारा संचालित होते हैं। ये कामयाबी-नाकामयाबी के बीच में झूलते रहते हैं। सरकारी विज्ञापनों से लेकर सस्ती स्थानीय खबरों व मनोरंजन के आधार पर इनका धंधा चलता और बंद होता रहता है। बेहद अल्प संसाधनों में कुछ व्यक्तियों या छोटे राजनैतिक समूह, संगठनों (जिसमंे खासतौर पर प्रगतिशील, जनवादी, वामपंथी व क्रांतिकारी शामिल हैं) द्वारा संचालित अखबार, पत्रिकाएं, पुस्तकों का एक बेहद बिखरा हुआ और बेहद कम प्रभाव व आधार वालों की एक अलग ही कोटि है। कुछ जुनून, कुछ वैचारिक राजनीतिक संकल्प, कुछ कार्यकर्ताओं और कुछ पाठकों के आधार पर चलने वाली यह कोटि किसी स्तर पर आम जनता की आवाज के वाहक हैं। उनकी मांगों, उनके संघर्षों, उनकी व्यथा को स्वर देते हैं और कम या ज्यादा अपनी क्षमताभर शासक वर्ग से लोहा लेते हैं। भारत का मीडिया क्योंकि एकीकृत, समांग नहीं है; क्योंकि इसमें अलग-अलग आकार व किस्म की पूंजी लगी हुयी है; क्यांेकि अलग-अलग आकार की पूंजी अलग-अलग राजनैतिक पार्टियों से संबंधित है और उनके अलग-अलग हित बनते हैं। इसलिए मीडिया में कोई एक राय बनना, एक तरह के सिद्धांत-मूल्यों से संचालित मान लेने से गलत निष्कर्ष निकल सकते हैं। परंतु यह तो लगभग निश्चित ही है कि सभी प्रकार की पूंजियों से संचालित मीडिया के ऊपर एकाधिकारी पूंजी का वर्चस्व है। वही एक तरह से समाज में समाचारों, विचारों, मूल्यों व संस्कृति का निर्धारण, संचालन व निर्देशन करती है। उसके बनाये नियम, उपनियम, मूल्य, कार्य संस्कृति पर शेष पूूंजियों द्वारा संचालित मीडिया चलने को विवश है। उसकी वही दिशा और समाज के सभी विषयों पर वही पहुंच (एप्रोच) बनना लाजिमी है। पिछले चंद दशकों खासकर 1991 के बाद से यही हो रहा है। देश की कार्यसूची एकाधिकारी पूंजी तय करती है। इस कार्यसूची में कुछ कम या ज्यादा सलाह या आपत्तियों के साथ अन्य पूंजियां चलती हैं। पूंजी के क्षेत्र में जो नियम-उपनियम तय होते हैं उसके अनुरूप राजनैतिक दल, समूह, समाज में मूलतः व्यवहार करते हैं। कुछ रगड़घिस्सी, अंतर्विरोध चलते रहते हैं परंतु कार्यसूची बदलती नहीं है। मीडिया क्षेत्र में लगी अलग-अलग आकार की पूंजी के हित उसके आकार, प्रभाव, क्षमता आदि से क्योंकि तय हो रहे होते हैं अतः उनकी भाषा, विचार, पहुंच आदि सभी कुछ का निर्धारण यही कारक कर रहे होते हैं। ये बातें इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि इनके आधार पर ही हिन्दू फासीवादी आंदोलन और मीडिया के संबंधों को समझा जा सकता है। हिन्दू फासीवादी आंदोलन और एकाधिकारी पूंजी का हालिया चुनाव से पहले जो गठजोड़ कायम हुआ उसी की अभिव्यक्ति भारत के एकाधिकारी पूंजी से संचालित मीडिया में भी हुई। इस गठजोड़ के अनुरूप ही मीडिया के इस सबसे शक्तिशाली और प्रभावकारी हिस्से ने वह सब कुछ किया जो भारत की एकाधिकारी पूंजी चाहती थी। उसके चयन, उसके हित और योजनाओं को एकाधिकारी पूंजी से संचालित मीडिया ने युग का सत्य व कार्यभार बना दिया। नरंेद्र मोदी जिसे छोटी अंबानी ने राजाओं के राजा का संबोधन चुनाव पूर्व दिया था। इस चुनाव में उन्हें गुजरात नरसंहार के पापों से मुक्तकर मिथकीय, दैवीय स्वरूप प्रदान कर दिया गया। ‘‘नमोः नमोः’’, ‘‘हर-हर मोदी’’ जैसे पौराणिक दैवीय शक्तियों के समक्ष रखते हुए नारे गढ़े गये। एकाधिकारी घरानों के लगभग तीन-चैथाई ने मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए सब कुछ किया। 20 हजार से 30 हजार करोड़ रुपये उनके चुनाव में खर्च कर दिये जाने का अनुमान है, जो एक तरह से मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए एकाधिकारी घरानों का पूंजी निवेश था। अब वे इसके ‘रिटर्न’ को पाने के लिए आस लगाये हुए हैं। गहराते आर्थिक संकट ने इस रिटर्न को मुश्किल बना दिया है और बेचारे मोदी बहुत कूदा-फांदी के बाद भी अभी तक कुछ न कर सके हैं। एकाधिकारी पूंजी के वरदहस्त के साथ जमीनी स्तर पर मेहनत हिन्दू फासीवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने की। 2011 से ही पूरे देश में घोर हिन्दू सांप्रदायिक माहौल बनाया गया। इन वर्षों में देश के हर छोटे-बड़े शहर में हजारों की संख्या में दंगे प्रायोजित करवाये गये। एकाधिकारी पूंजी से संचालित मीडिया के एक बड़े हिस्से ने देश में सांप्रदायिक माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बस उसने इस काम को बहुत सूक्ष्म और पेशेवर ढंग से अंजाम दिया। उसने हिन्दू फासीवादी आंदोलन के नेताओं को अपना मंच उपलब्ध कराया और पूर्ण कवरेज दिया। और यह प्रक्रिया अभी भी जारी है। हिन्दू फासीवादी आंदोलन के विरोध या आलोचना की खबरों का इस्तेमाल इतनी सफाई व कुशलता से किया गया कि अक्सर ही उसका परिणाम हिन्दू फासीवादी आंदोलन के प्रभाव के और विस्तार के रूप में ही हुआ। गैर एकाधिकारी और क्षेत्रीय पूंजी से संचालित मीडिया ने अखिल भारतीय स्तर पर कुछ इलाकों (दक्षिण व पूर्वी भारत) को छोड़कर वही गति और दिशा पकड़ी जो एकाधिकारी पूंजी की थी। एकाधिकारी पूंजी की रीति-नीति का अनुसरण करने को बाध्य यह पूंजी इससे इतर कुछ और खास नहीं कर सकती थी। और फिर हिन्दू फासीवादी आंदोलन ने मध्य व पश्चिमी भारत में लम्बे समय से अपनी पकड़ पहले से ही बना रखी थी। गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में एक दशक से अधिक समय से लगातार भाजपा की सरकार रही है। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार में एकाधिकारी पूंजी व हिन्दू फासीवादी आंदोलन की पुकार व सोशल इंजीनियरिंग की सफलता को सुनिश्चित करने में गैर एकाधिकारी पूंजी से संचालित मीडिया का कम बड़ा योगदान नहीं था। स्थानीय व छोटी पूंजी से संचालित मीडिया में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कई दशकों से परंपरागत प्रभाव रहा है। हिन्दू सवर्ण खासकर बनिये संघ को पुराने समय से पीढ़ी दर पीढ़ी कैडर उपलब्ध कराते रहे हैं। हिन्दू सवर्ण मध्यम वर्ग ने एकाधिकारी पूंजी के स्वर में स्वर मिलाने के लिए आधुनिक संचार उपकरणों इंटरनेट, फेसबुक, ट्वीटर, व्हाटसएप आदि का खूब इस्तेमाल किया। एक तरह से इन उपकरणों में हिन्दू फासीवादी आंदोलन का ही वर्चस्व हाल के वर्षों में पूरी तरह से कायम है। सांप्रदायिक दंगे भड़काने के लिए भी संघ के कार्यकर्ताओं व समर्थकों ने इन उपकरणों का खूब इस्तेमाल किया। विदेशों में बसे भारतीय प्रवासियों की दो कोटियों अमीर अरबपतियों व मध्यम वर्ग (जिसमें भारी संख्या में पेशेवर व तकनीशियन शामिल हैं) के लोगों ने भारत के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की चाहत को अपनी चाहत बना लिया। वैसे भी हिन्दू फासीवादी आंदोलन ने हाल के वर्षों में इनके बीच अपनी अच्छी पकड़ बनायी है। इन लोगों ने खुले हाथ से न केवल इस आंदोलन को धन उपलब्ध कराया बल्कि वे पूर्णकालिक से लेकर अल्पकालिक स्वयंसेवक तक बन गये। आधुनिक संचार उपकरणों को इन लोगों खासकर पेशेवर मध्यम वर्ग के लोगों ने हिन्दू फासीवादी आंदोलन का भौंपू बना दिया। हिन्दू फासीवादी आंदोलन अपने इतिहास के अब तक के सबसे स्वर्णिम युग में है। केन्द्र में उसकी पूर्ण बहुमत की सरकार है। मोदी सरकार के सामने वाजपेयी के ‘भानुमति के कुनबे’ वाली सरकार की तरह दबाव नहीं है। मोदी के कुनबे में जो आकर जुड़ा है वह उसकी ही ज्यादा मजबूरी है। हिन्दू फासीवादी आंदोलन का व्यापक सामाजिक आधार है। भाजपा के हालिया दावे के अनुसार वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है। संघ की मजदूर शाखा भारत का सबसे बड़ा मजदूर संगठन है। सबसे अधिक संख्या वाला उसका छात्र संगठन है। ढेरों राज्यों में भाजपा की सरकार है और कई राज्यों में उसके नेतृत्व में गठबंधन की सरकार है। एकाधिकारी पूंजी के साथ गठजोड़ और केन्द्रीय सत्ता में उसके कब्जे ने उसे बेहद सशक्त स्थिति में पहुंचा दिया है। उसने देश की हर संस्था को अपने भगवा रंग में रंग देने का अभियान छेड़ा हुआ है। इस अभियान में उसे काफी हद तक सफलता भी मिली है। वाजपेयी सरकार के जमाने में केन्द्रीय गुप्तचर ब्यूरो (आई.बी.) को इस हद तक संघ ने अपने रंग में रंग दिया था कि सालों तक उसके अनुषंगी संगठनों द्वारा की गयी आतंकी कार्यवाहियों का खुलासा नहीं हो पाया। हिन्दू सांप्रदायिक भावनाओं से ओत-प्रोत मीडिया ने उसी धुन में नृत्य किया जिस धुन को हिन्दू फासीवादी आंदोलन के हेडक्वार्टर नागपुर ने तैयार किया था। मक्का-मस्जिद, माले गांव, समझौता एक्सपे्रस जैसे बहुचर्चित मामलों के अलावा दर्जनों आतंकी हमलों में इस फासीवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं और समर्थकों का हाथ था परंतु गुप्तचर ब्यूरो में बैठे संघी मानसिकता के अधिकारियों व सुरक्षा बलों के षड्यंत्र के फलस्वरूप सैकड़ों निर्दोष मुस्लिम युवक जेल में ठूंस दिये गये। असली अपराधी खुलेआम घूमते रहे, नयी योजनाएं बनाते रहे। मोदी सरकार के गठन के बाद आज स्थिति यह है कि हिन्दू फासीवादी आंदोलन के हेडक्वार्टर की सुरक्षा भारत का केन्द्रीय अर्द्धसैनिक बल, केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) कर रहा है। संघ प्रमुख अनौपचारिक तौर पर राष्ट्र प्रमुख का दर्जा हासिल कर चुके हैं। उनके दौरों के समय वही माहौल बनाया जाता है मानो देश के संवैधानिक पद पर बैठे भारत के प्रथम नागरिक दौरे पर निकले हों। ऐसे मौके पर मीडिया क्या करता है। जाहिर तौर पर वह अघोषित राष्ट्र प्रमुख की चरण वंदना करता है। संघ की पाठशाला से निकले स्वयंसेवक, संघ के कार्यकर्ता की तरह गणवेश में सज-धजकर संघ प्रमुख को सलामी देता है। ऐसी स्थिति में जब हिन्दू फासीवादी आंदोलन राज्य की हर संस्था को, अपने रंग में रंग रहा हो, मोदी सरकार अधिनायकवादी ढंग से कार्य कर रही हो, तब कई बुद्धिजीवी, राजनैतिक चिंतक भारत के वर्तमान राज्य को ‘अर्द्ध फासीवादी राज्य’ या ‘नरम फासीवादी राज्य’ की संज्ञा दे रहे हों तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ठोस वैज्ञानिक अर्थ में वर्तमान भारतीय राज्य ऐसा नहीं भी हो परंतु अलंकारिक रूप में ऐसा रहने को बाध्य होना कई बातों की ओर इशारा कर देता है, भविष्य के खतरे से निपटने को तैयार रहने का आह्वान करता है। आत्मा को झकझोरता है और हिन्दू फासीवादी आंदोलन को चुनौती देने के लिए मजदूर वर्ग को केन्द्र में रखकर व्यापक जन-गोलबंदी की आवश्यकता पर बल देता है। हिन्दू फासीवादी आंदोलन के विस्तार और बढ़ते प्रभाव के कारणों की तलाश की जाय तो हम पायेंगे कि इसमें सबसे प्रमुख भारतीय पूंजीवादी समाज का समग्र संकट रहा है। इस संकट का प्रमुख आयाम जहां आर्थिक बनता है वहां राजनैतिक व सामाजिक संकट अन्य आयाम बनते हैं। भारतीय पूंजीवाद ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के भारत छोड़ने के बाद से अलग-अलग किस्म के संकट का सामना करता रहा है और यह आज भी जारी है। मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले माॅडल से यह नवउदारवादी माॅडल तक सब अपना चुका है। मिश्रित अर्थव्यवस्था के काल में भारत में जहां एक तरफ इंदिरा गांधी के नेतृत्व में संकट के गहरा जाने पर सिविल तानाशाही की हद तक चला गया था, वहां नवउदारवादी काल में संकट के गहराने पर हिन्दू फासीवादी आंदोलन को गोद ले बैठा है और यहां पर यह बात भी गौर करने की है कि यदि हिन्दू फासीवादी आंदोलन के नेता, पार्टी या संगठन एकाधिकारी पूंजी को मनवांछित सफलता या व्यवस्था के संकट को कम नहीं कर सके तो वह उनसे विमुख होकर तानाशाही या फासीवाद के अन्य रूपों को भी अपना सकता है। सिविल तानाशाही, सैन्य तानाशाही, गैर धार्मिक फासीवाद (‘धर्मनिरपेक्ष फासीवाद’) जैसे कई विकल्प उसके शस्त्रागार में मौजूद हैं। अरविंद केजरीवाल जैसे व्यक्तियों को जिस ढंग से पाला-पोसा जा रहा है वह इस बात की ओर इशारा कर रहा है। हिन्दू फासीवादी आंदोलन को संकटग्रस्त समाज से भारी पैमाने पर नेता, कार्यकर्ता व समर्थक पिछले दशकों में मिलते रहे हैं। इनमें वैसे तो सभी वर्गों के लोग रहे हैं परंतु अपनी दंगा-मशीनरी के लिए इन्हें बेरोजगार, हिन्दू निम्न मध्यमवर्गीय नवयुवक खासतौर पर मिलते रहे हैं। अंधराष्ट्रवादी भावनाओं से लेकर हिन्दू सांप्रदायिक जहर से आसानी से प्रभावित होने वाले बेहद अस्थिर स्थिति व असुरक्षित भविष्य वाले मध्यम, निम्न वर्ग ने हिन्दू फासीवादी आंदोलन को नई ऊंचाइयों में पहुंचाया है। भारतीय समाज में पहले से मौजूद हिन्दू ब्राह्मणवादी मध्ययुगीन विचारों, मूल्यों व संस्कृति ने हिन्दू फासीवादी आंदोलन की बढ़ती में अहम भूमिका निभाई है। इनको बनाये रखने में आजादी के बाद कायम हुई भारतीय पूंजीवादी सत्ता ने पूरी भूमिका निभाई है। गौरतलब है कि नब्बे के दशक में बाबरी मस्जिद के विध्वंस की पटकथा तो नेहरू के शासनकाल में ‘भारत रत्न’ गोविंद बल्लभ पंत ने ही तैयार कर दी थी। इस संदर्भ में भारत के मीडिया की बात की जाय तो यह कम या ज्यादा इन्हीं मूल्यों व संस्कृति से संचालित होता रहा है। इस संदर्भ में भारतीय मीडिया में सवर्णों की बहुलता काफी कुछ कह देती है। अखबार, पत्रिकाओं, टी.वी. चैनलों में समाज की उत्पीडि़त, वंचित समुदाय-तबकों की अनुपस्थिती अपनी कहानी आप कह देता। दलित, स्त्रियों, आदिवासी, धार्मिक अल्पसंख्यकों की मीडिया में नाममात्र की उपस्थिति है। जातिवाद, भाई-भतीजावाद, स्त्रीविरोधी व सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त मीडियाकर्मियों की भरमार हिन्दू फासीवादी आंदोलन को मीडिया में वह सब कुछ उपलब्ध करा देता है जिसकी उन्हंे दरकार होती है। यहां यह बात कहने की नहीं है कि निजी सम्पत्ति, पूंजी और मुनाफे के तर्क से संचालित होने वाला मीडिया अपने चरित्र व पहुंच में घोर मजदूर मेहनतकश विरोधी है। इन अर्थों में हिन्दू फासीवादी आंदोलन और वर्तमान मीडिया (अल्प हिस्से को छोड़कर) स्वाभाविक मित्र और परस्पर एक-दूसरे का पक्ष-पोषण करने वाले बन जाते हैं और अब जब हिन्दू फासीवादी आंदोलन और एकाधिकारी पंूजी का गठजोड़ कायम हो गया है तब वही सब कुछ होता जो मीडिया में आजकल चल रहा है। मोदी का गुणगान, मोहन भागवत का विजयीदशमी पर संघियों को संबोधन का दूरदर्शन से सीधा प्रसारण, प्रवीण तोगडि़या, योगी आदित्यनाथ जैसों की हर ओछी बातों का व्यापक प्रचार इत्यादि। हिन्दू फासीवादी आंदोलन आज बहुत सशक्त स्थिति में भले ही हो; एकाधिकारी पूंजी से उसका गठजोड़ भले ही कायम हो; भारतीय राज्य में उसका दखल अभूतपूर्व स्थिति में भले ही हो; मीडिया के सभी अंगों-उपांगों में उसका प्रभुत्व भले ही हो परंतु उसका आगे का विकास और सफलता आसान नहीं है। इसके ठोस ऐतिहासिक, सामाजिक आदि कारण मौजूद हैं। हिन्दू फासीवादी आंदोलन एक ऐसा राजनीतिक आंदोलन है जो मिथक, झूठ पर खड़ा है। इसके विचार, मूल्य, संस्कृति, उद्देश्य किसी में ऐसा कोई हिस्सा नहीं है जो झूठ, मिथक, अवैज्ञानिक तर्कों से ना निर्मित हों। कूपमंडूकता इसकी उर्वरक जमीन है। इन्हीं सब बातों का प्रदर्शन आये दिन इस आंदोलन के नेता और उन्हीं की पाठशाला से निकले भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री करते रहते हैं। भारतीय इतिहास के बारे में बेहद हास्यास्पद बातें करके वे भले ही कुछ कूपमंडूकों का दिल जीत लें लेकिन इक्कीसवीं सदी के समाज में व्यापक जनता को लम्बे अर्से तक इन बातों से कोई मूर्ख नहीं बना सकता। ‘स्टेम सेल’, ‘प्लास्टिक सर्जरी’, ‘विमान तकनीक’ आदि के बारे में मोदी जी या संघ की पाठशाला के शिक्षकों ने जो बातें कहीं, वह इनकी दयनीयता और वैचारिक दिवालियेपन को दिखला देती हैं और इन संदर्भ में जब-जब ये अपना मुंह खोलेंगे तब-तब ये अपनी नींव खोदेंगे। भारत के करोड़ों शोषित-उत्पीडि़तों, नौजवानों को संघी दर्शन, विचार बहुत दिन तक अपने प्रभाव में नहीं ले सकते और एक बड़ी चुनौती इनके सामने यह है कि पूंजीवादी समाज जो विभिन्न किस्म के पार्थक्य, अलगाव को अपने जन्म के पहले दिन से तोड़ रहा है, उसमें ये कैसे अपने घटिया, विकृत, क्षुद्र हिन्दू राष्ट्र को कायम कर सकते हंै। बीसवीं सदी के फासिस्ट आंदोलनों का हस्र अभी बहुत पुरानी बात नहीं है। अभी तो एक सदी भी नहीं गुजरी है, ऐसों के पैदा होने और फिर मिट जाने की बातें कैसे कोई इतिहास के पटल से मिटा सकता है। लोक स्मृतियों से नष्ट कर सकता है। भारतीय समाज की समग्र संरचना इतनी जटिल और विविधिता से युक्त है कि उसका काली टोपी, खाकी निकर और ‘भगवा झंडे’ के हिसाब से पुनर्रचित करना बेहद मुश्किल ही नहीं असम्भव है। भारतीय समाज की व्यापक मजदूर मेहनतकश आबादी के समग्र हित इनकी योजनाओं, इनकी सनकों के खिलाफ हैं। भारत के करोड़ों-करोड़ उत्पीडित जन जिसमें स्त्रियां, दलित, आदिवासी, धर्मिक अल्पसंख्यक, उत्पीडि़त राष्ट्रीयतायें, विभिन्न भाषायी समूह आदि शामिल हैं, को हिन्दू फासिस्ट आंदोलन कुछ भी ऐसा देने में सक्षम नहीं है जो इनके दिलों को स्थायी तौर पर जीत सके। इनकी आकांक्षाओं को स्वर दे सके। उल्टे अपने जन्म के पहले दिन से यह आंदोलन समाज के शोषित-उत्पीडि़त वर्गो-तबकों के हितों, आकांक्षाओं को स्वर देने वाले हर आंदोलन का विरोधी रहा है। चाहे वह स्त्रियों की बराबरी की मांग वाले अंदोलन हों, दलितों के आंदोलन हों या फिर उत्पीडि़त राष्ट्रीयताओं के मुक्ति के आंदोलन रहे हों। ‘एक देश, एक धर्म, एक भाषा’ की बाहियात बातें भारतीय समाज में कभी भी ऐसा आधार नहीं बन सकती हैं कि समाज के करोड़ों लोग अपने दिलो-दिमाग से काम लेना बंद कर दें और इन हिन्दू फासिस्टों के सामने आत्मसमर्पण कर दें। हिन्दू फासीवादी आंदोलन के सामने अपने आगे के विकास में खुद भारतीय पूंजी की संरचना भी एक बाधा है। क्षेत्रीय, देहाती, छोटे पैमाने की स्थानीय पंूजी ही नहीं बल्कि एकाधिकारी पूंजी के कतिपय हिस्से इनकी भावी योजनाओं के आगे आ सकते हैं। इन्हें जीतने के लिए इन्हें उन आधारों पर कुठाराघात करना पडे़गा जिस पर अब तक इन्होंने अपना आंदोलन खड़ा किया है। ऐसे में इनकी भावी प्रगति इनकी अवनीति का जरिया बन जायेगी। हिन्दू फासीवादी आंदोलन का मुकाबला आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा भारत के मजदूर और क्रांतिकारी आंदोलन से होना है। जिन सामाजिक आर्थिक कारणों ने इस फासिस्ट आंदोलन को यह ऊंचाई प्रदान की है वही कारक भारत के क्रांतिकारी व मजदूर आंदोलन के आधार को मजबूत कर रहे हैं। पूरा भारतीय समाज सामान्य संकट से क्रांतिकारी संकट की दिशा में बढ़ रहा है। समाज बर्बरता या सभ्यता के निर्णायक बिन्दु की ओर बढ़ रहा है। समाज फासीवाद या समाजवाद के फैसलाकुन क्षणों की ओर बढ़ रहा है। आज भले ही बर्बरता, फासीवाद का आंदोलन मजबूत दिखायी दे रहा है परंतु भारत के गर्भ में वे शक्तियां बहुत दिनों से पल रही हैं जो एक नये समाजवादी भारत को जन्म देना चाहती हैं। ये शक्तियां इतिहास के पटल पर अपनी दस्तक दे रही हैं। इनकी आवाजें भले ही क्षीण हांे परंतु समय साबित करेगा कि ये आवाजें भारत की मुक्ति की आवाज बनकर भारतीय समाज को बर्बरता के अंधे कुंए में धकेले जाने से बचा लेंगी और भारत में सभ्यता के महान सूर्य का जन्म होगा। महान सूर्य हमारे देश के क्षितिज पर उग सके इसके लिए इस सूर्य का स्वागत करने वालों को बहुत-बहुत अधिक मेहनत करनी होगी। पाताललोक से सूर्य को खींचकर बाहर निकाल कर अपने आसमां में स्थापित करना होगा। भारत की महान जनता, इतिहास उन लोगों का साथ देने को तत्पर है जो इस कार्य को करने के लिए आगे आना चाहते हैं।
मीडिया और मजदूर वर्ग - सेमिनार पत्र -मार्च 2014, फरीदाबाद (हरियाणा) मीडिया को आमतौर पर किसी भी समाज का दर्पण समझा जाता है। भारत में तो मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ कहा जाता है। अपने लिए यह उपाधि खुद मीडिया ने स्वघोषित रूप से अर्जित की है। हम एक वर्ग विभाजित समाज में रहते हैं, यह इस युग का सबसे बड़ा सच है। ऐसे में समाज में मौजूद हर तंत्र व संस्था का चरित्र चर्ग सापेक्ष होगा। तथाकथित निष्पक्ष व निष्कपट कहलाने वाला मीडिया भी इससे जुदा नहीं हो सकता। वर्ग विभाजित समाज में प्रभुत्वशाली विचार व संस्थायें शासक वर्ग के हितों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं। यही बात मीडिया के लिए भी सच है। भारतीय समाज एक पूंजीवादी समाज है। भारत में शासक वर्ग के बतौर पूंजीपति वर्ग सत्ता पर काबिज है। ऐसे में प्रभुत्वशाली प्रचार माध्यम पूंजीवादी वर्ग की ही सेवा करते हैं। इस तरह जिसे आमतौर पर मीडिया कहा जाता है वह पूंजीवादी प्रचार माध्यम ही है जो शासक वर्ग के विचारों, मूल्यों व धारणाओं को ही प्रचारित प्रसारित करते हैं। जाहिर है कि पूंजीवादी प्रचार माध्यम या तथाकथित मीडिया मजदूर वर्ग के जीवन व उसके संघर्षो के प्रति न केवल उपेक्षा का रुख रखता है बल्कि उसके प्रति एक नकारात्मक सोच को लगातार समाज में प्रचारित करता रहता है। यह अकारण नहीं है कि मजदूर वर्ग के शोषण तथा तमाम अनैतिक व कानूनी-गैरकानूनी लूट के द्वारा अकूत संपत्ति संचय करने वाले लोग प्रचार माध्यमों में माननीय व देवतुल्य बन जाते हैं, सर से पांव तक भ्रष्टाचार में डूबे पूंजीवादी नेता गणमान्य हो जाते हैं, अश्लीलता व भौंडेपन की हद से गुजरकर अपना तन, मन, आत्मा बेचने वाले लोग नायक व महानायक बन जाते हैं। विदेशी मालों का प्रचार करने वाले साम्राज्यवादी कंपनियों के भांड भारत रत्न कहलाते हैं तथा इनके चमकते दमकते स्वर्ग को ही इंडिया कहा जाता है वहीं मजदूर वर्ग की रिहायश को अतिक्रमण व उसके संघर्षों को अराजकता व गुंडागर्दी का दर्जा दिया जाता है। पूंजीवादी प्रचार माध्यमों की नजर में मजदूर वर्ग को अनुशासित रखना बेहद जरूरी है और इसके लिए बल प्रयोग से लेकर हर तरीके की हिंसा जायज व जरूरी है। ऐसा न होने, पर समाज में अराजकता व्याप्त हो जाएगी। प्रचार माध्यमों में इसलिए जहां मारूति मजदूरों से लेकर, ग्रेजियानों, एलायड निप्पान व नोएडा के वर्षों से बिना जमानत व सुनवाई के जेलों में बंद सैंकड़ों मजदूरों की खबर सिरे से गायब रहती हैं वहीं शासक वर्गों की धींगा मुश्ती व झूठ फरेब से लेकर सर्दी जुकाम की खबरें सुखियां बनी रहती हैं। ऐसा नहीं है कि न्याय, हक व सच्चाई की आवाज उठाने वाले समाचार पत्र व पत्रिकायें नहीं हैं लेकिन वे ‘मुख्यधारा’ के प्रचार माध्यम नहीं हैं बल्कि उन्हें प्रतिरोध के माध्यम कहना ज्यादा मुनासिब होगा। यह प्रतिरोधी पत्र-पत्रिकायें तथाकथित मीडिया का हिस्सा नहीं बनते। मीडिया से आमतौर पर जिसे पहचाना जाता है वे पूंजीवादी प्रचार माध्यम ही हैं। पूंजीवादी समाज में हर वस्तु माल में तब्दील हो जाती है। खबरें भी पूंजीवादी समाज में माल बन जाती हैं जिनका उपयोग मूल्य व विनिमय मूल्य होता है और वह बाजार से ही तय होता है। इसीलिए हर माल उत्पादक की तरह खबरों के भी माल उत्पादक हैं और यहां भी एकाधिकार का बोलबाला है। जहां आज ज्यादातर राष्ट्रीय या क्षेत्रीय अखबार बड़े कारपोरेट घरानों के हैं, टीवी चैनलों के साथ तो यह बात और स्पष्ट दिखाई देती है, वहीं ज्यादातर मीडिया घराने उद्योग व विभिन्न व्यवसायों को भी चलाते हैं। ऐसे में ये कितना भी निष्पक्ष, निर्भीक व सच को उजागर करने का दावा करें, पूंजीवादी शोषण व लूट, पूंजीसंचय की प्रक्रिया तथा मुनाफे के अर्थशास्त्र से अपने को अलग कैसे कर सकते हैं। आज पूंजीवादी प्रचार माध्यम-समाचार पत्र पत्रिकायें व न्यूज चैनलों के लिए खबरें महज विज्ञापन बटोरने का जरिया हैं चाहे वे विज्ञापन कितने भ्रामक, झूठे व अनैतिक क्यों न हों। असल में ये विज्ञापनों के व्यवसायी हैं जिन्होंने पत्रकारिता का बाना पहन लिया है। निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर में पूंजीवाद की नंगी व निर्मम लूट के साथ और अधिक पतन के गर्त में गिरने के साथ पंूजीवादी प्रचार माध्यम भी पतन के गर्त में गिरते गए हैं। इसका नतीजा है कि ‘पेड न्यूज’ जैसी परिघटना सामने आती है। पैसे लेकर खबर छापना एक आम प्रवृत्ति बनती गयी है। इसके साथ ही पूंजीवादी मीडिया ने सत्ता के दलाल की हैसियत भी अख्तियार की है। बड़े-बड़े पूंजीवादी अखबारों के संपादक/पत्रकार सरकार व विभिन्न पूंजीपतियों के बीच बिचैलिए की भूमिका में उतर आये हैं जिन्हें ‘पाॅवर ब्रोकर’ का खिताब दिया जा रहा है। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में हिंदुस्तान के प्रबंध संपादक वीर सिंघवी, इंडिया टुडे/आज तक गु्रप के प्रभु चावला व एन.डी.टी.वी. की संपादक ‘बरखा दत्त’ जैसे लोग स्पेक्ट्रम के ठेकों में दलाल व बिचैलिए की भूमिका निभाते पाए जाते हैं तो जी.टी.वी. के मासिक संपादक द्वय जिंदल गु्रप के साथ करोड़ों का अनैतिक धंधा या ब्लैकमेलिंग में चर्चा में आते हैं। तहलका जैसी पत्रिका के संपादक का पतन व अवैध कारोबार व जालसाजी तथा ब्लैकमेलिंग जैसी बातें आज के दौर में पूंजीवादी प्रचार माध्यमों की पतनशीलता को ही उजागर करते हैंे। वर्तमान में पूंजीवादी प्रचार माध्यमों की व्यावसायिकता व पतनशीलता को देखकर बहुत से महानुभाव कहते हैं कि मीडिया अथवा पूंजीवादी प्रचार माध्यमों ने अपने श्रेष्ठ पत्रकारिता के मूल्यों को भुला दिया है, कि वे बाजार के आगे समर्पण करते जा रहे हैं, कि अतीत में समाचार माध्यमों का जो निष्पक्ष चरित्र था, वह क्रमशः क्षरित होता जा रहा है और वे पत्रकारिता के श्रेष्ठ मूल्यों को बचाने इसकी जनपक्षधरता को बचाने के लिए नैतिक अपील व अंतःकरण की जागृति की अपील मीडिया संस्थानों से करते रहे हैं। ये महानुभाव इस बात को भूल जाते हैं कि प्रचलित मीडिया या पूंजीवादी प्रचारतंत्र पूरी तरह मुनाफा केन्द्रित व्यवसाय बाजार व मुनाफे के समीकरणों से ही चलता है। खबरें या मनोरंजन उनके लिए महज माल हैं। ऐसे में मीडिया समूहों से किसी नैतिकता, सामाजिक सरोकार की बात करना वास्तविक यथार्थ से आंखें मंूदना है। वास्तव में मीडिया का मौजूदा चरित्र भारतीय पूंजीवाद व विश्व पूंजीवाद के मौजूदा चरित्र के अनुरूप ही है। चूंकि भारतीय पंूजीवादी मीडिया का विकास भारतीय पूंजीवाद के विकास के साथ-साथ हुआ है अतः हर दौर में पूंजीवाद के दौर विशेष की चरित्रगत विशेषताओं के अनुरूप मीडिया का भी चरित्र रहा है। इसलिए भारतीय पूंजीवादी मीडिया की विकास यात्रा को समझना प्रासंगिक होगा जो कि भारतीय पूंजीवाद के विकास के साथ जुड़ा है। यूरोप के पूंजीपति वर्ग के बरक्स, जिसके पास एक रैडिकल जनवादी परंपरा थी, भारतीय पूंजीपति वर्ग की उत्पत्ति ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के एजेन्ट के रूप में हुई। कालांतर में इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में एक पार्टी भी मिल गयी। खुद राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश शासन में नौकरशाह रहे मध्यवर्ग के हिस्सों ने की थी। भारतीय पंूजीपति वर्ग के उदय व विकास के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में इस वर्ग का नेतृत्व स्थापित हो गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लक्ष्य जहां पहले भारतीय मध्यवर्ग व व्यापारियों के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद से विकास के अवसर, रियायतें व सहूलियतें हासिल करना रहा वहीं बाद में इसने भारतीय पूंजीपति वर्ग के हितों के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मोलतोल की नीति को आगे बढ़ाया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ इसका रिश्ता समझौते-संघर्ष-समझौते का रहा। इसी के अनुरूप विभिन्न पत्र पत्रिकायें, जो उस समय हिंदुस्तानी व्यवसाई घरानों द्वारा निकाली जाती थीं, पूंजीपति वर्ग की इसी भावना को स्वर देती थीं। आजादी इन पत्र पत्रिकाओं का अभीष्ट नहीं था, न ही इनका कोई व्यापक सामाजिक सरोकार व प्रतिबद्धता ही थी। कुछेक एक अपवाद जरूर थे जिनमें कानपुर से प्रकाशित गणेश शंकर विद्यार्थी का पत्र ‘प्रताप’ व इलाहाबाद से निकलने वाला ‘स्वराज्य’ या पंजाब से प्रकाशित ‘किरती’ पत्र। इन पत्र पत्रिकाओं को निकालने वालों के लिए पत्रकारिता कोई व्यवसाय न होकर स्वतंत्रता व साम्राज्यवाद विरोध के अपने मिशन व क्रांतिकारी विचारों के प्रयास का हेतु थी। स्वराज्य अखबार के लिए संपादक हेेतु एक विज्ञापन के मजमून से इसे समझा जा सकता है। 1907 में इलाहाबाद से छपने वाले उर्दू अखबार ‘स्वराज्य’ के संपादक के लिए विज्ञापन निकला-‘‘एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी यह सरहे तनख्वाह है, इसके दो एडीटर बगावत आमेश मजामीन (विद्रोहात्मक लेखों) की मुहब्बत में गिरफ्तार हो चुके हैं।’’ गौरतलब है कि स्वराज्य के एक-दो नहीं छः संपादकों को कालापानी की सजा ब्रिटिश हुकूमत से मिली। इसी तरह ‘प्रताप’ अखबार के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी कांग्रेसी होते हुए भी स्वतंत्रता के मिशन व प्रगतिशील जनवादी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध थे। प्रताप का दफ्तर क्रांतिकारियों का अड्डा हुआ करता था। खुद भगत सिंह बलवंत सिंह के नाम से प्रताप में लेख लिखा करते थे। प्रताप का प्रसार बड़ी मात्रा में गरीब बस्तियों में होता था। अपनी इस प्रतिबद्धता की कीमत गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर दंगों के दौरान अपनी जान देकर चुकाई। यह प्रतिबद्धता उस समय के तथाकथित मुख्यधारा के अखबारों में कहीं नहीं थी तब भी पूंजीपति वर्ग और उसकी प्रतिनिधि पार्टी कांगे्रस के सुरों के अनुरूप तथा आजादी के आन्दोलन के दौर में जनता की साम्राज्यवाद विरोधी चेतना से थोड़ा बहुत अनुकूलन करते हुए काफी हद तक नग्न बाजारू स्तर तक नहीं गिरे थे। आजादी के बाद पूंजीपति वर्ग भारत की राज्यसत्ता पर काबिज हुआ। तमाम सामंती तत्वों के साथ उसका सत्ता में गठजोड़ था। शनैः शनै पूंजीपति वर्ग ने अपनी शक्ति का तेजी से विस्तार कर भारतीय समाज के पूंजीवादीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी। मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले पूंजीवादी माॅडल जिसे नेहरूवादी समाजवाद के माॅडल के नाम से जाना जाता है, के अंतर्गत पूंजीवाद के सुगम विकास का रास्ता तैयार किया गया। समाज में पंूजी की बढ़ती गिरफ्त व मुनाफे के अर्थशास्त्र से तथाकथित मीडिया अप्रभावित नहीं रहा। ज्यादातर बड़े औद्योगिक व पंूजीवादी घरानों के हाथों में प्रचार माध्यम सिमटते चले गए। जिस गति से समाज में पूंजी संचय की प्रक्रिया तेज हो रही थी उसी के अनुरूप प्रचार माध्यमों पर एकाधिकारी पूंजीवादी घरानों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा था। इसकी झलक 1964 में महालनोबिस कमेटी की रिपोर्ट में भी दिखायी देती है। भारत सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निर्देश पर योजना आयोग के पी.सी. महाल नोबिस ने 25 फरवरी 1964 को देश के लोगों के जीवन स्तर और आमदनी वितरण की स्थिति का अध्ययन करने वाली कमेटी की तरफ से एक रिपोर्ट पेश की थी, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू योजना आयोग के अध्यक्ष भी थे। इस कमेटी को सरकार ने यह अध्ययन करने को कहा था कि पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान राष्ट्रीय आय में बयालीस प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी और प्रति व्यक्ति आय 20 प्रतिशत बढ़ी। (यहां यह गौरतलब है कि प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि का मतलब मजदूर मेहनतकश आबादी की आय में वृद्धि नहीं होता)। फिर भी राष्ट्रीय आय व प्रति व्यक्ति आय में यह अंतर काफी चैंकाने वाला था। सवाल था कि आखिर ये कमाई किसके हाथों में पहंुच रही है। कमेटी ने इस विषय पर चार वर्षों तक गहन अध्ययन करने के बाद बताया कि कैसे देश की आय कुछ लोगों के हाथांे में सिमटती जा रही है। लेकिन इस कमेटी की रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बात ये सामने आयी कि जिन लोगों के हाथों में पूंजी सिमटती जा रही है वे मीडिया पर किस तरह अपना नियंत्रण बनाये हुए हैं। यानी मीडिया पर नियंत्रण और पूंजी का कुछ हाथों में सिमटना एक साथ हुआ है। प्रसार के संदर्भ में समाचार पत्रों के स्वामित्व के एक अध्ययन के अनुसार 1960 में कई संस्थायें चलाने वाली किसी एक व्यक्ति, समूह और बहुस्तरीय इकाइयों के रूप में समाचार पत्रों का प्रसार संचालित करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी थी। भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक की सालाना रिपोर्ट के अनुसार 1960 में भारत में दैनिक अखबारों के कुल प्रसार का 67.5 प्रतिशत चैन, समूहों व बहुस्तरीय इकाइयों के स्वामित्व के तहत संचालित था। इसी क्षेत्र के मुताबिक दस मालिक पांच उद्यमों (एक्सप्रेस न्यूज पेपर्स, टाइम्स आॅफ इंडिया पब्लिकेशंस, अमृत बाजार पत्रिका, जुगांतर व आनन्द बाजार पत्रिका), तीन समूह (मलयाला मनोरमा, फ्री प्रेस जनरल व हिंदू), दो बहुस्तरीय इकाइयों (थांती व स्टेट्स मैन) का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जो कि 13.11 लाख के प्रसार के साथ 37 दैनिक प्रकाशित कर रहे थे। इस तरह कुल प्रसार के 39.3 प्रतिशत पर उनका नियंत्रण था। महाल नोविस रिपोर्ट के इस अंश से यह बात स्पष्ट है कि कैसे प्रचार माध्यमों पर चंद घरानों का नियंत्रण बढ़ता चला गया है। जिस तरह से समाजवाद(नेहरू माॅडल समाजवाद) का डंका पीटा जाता रहा उसके मूल में पूरे समाज में एकाधिकारी पूंजी का वर्चस्व तथा मीडिया पर पूंजीवादी घरानों का वर्चस्व एक-दूसरे के पूरक के रूप में सामने आये। भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ने भी उसे भरपूर संरक्षण दिया। महाल नोविस रिपोर्ट संसद की लाइब्रेरी में उपेक्षित पड़ी रही। किसी को उसकी कोई महत्ता नजर नहीं आयी। आजादी के बाद कांग्रेस के कार्यकाल में जो प्रथम प्रेस आयोग बना उसने देश में पत्रकारिता की पूंजीवादी दिशा निर्धारित कर दी। आजादी के बाद प्रचार माध्यमों में इजारेदारी या एकाधिकार की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी। इसी के अनुरूप प्रचार माध्यम पूंजीवादी घरानों व शासक वर्ग के एक उपकरण में तब्दील होते गए। ऐसे में इनकी निर्भीकता, निष्पक्षता व जनपक्षधरता की बात बेमानी हो जाती है। इनकी जनपक्षधरता की सीमा हद से हद मध्यवर्ग के स्तर तक थी। यानी मजदूर व किसान कारपोरेट मीडिया के लिए ‘जन’ नहीं थे। इसलिए ‘जनपक्षधरता’ की इनकी परिभाषा संपत्तिशाली व अभिजात्य वर्ग के साथ मध्य वर्ग को ही समेटती थी। यह जनपक्षधरता कभी भारतीय शासक वर्ग के हितों के निमित्त बने विधानों व नीतियों का अतिक्रमण नहीं करती थी। बल्कि एक तरीके से ये शासक वर्ग की नीतियों के पक्ष में जनमत बनाने का ही काम करते थे। यह किस हद तक होता रहा है इसे केवल इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि खुद को लोकतंत्र के प्रहरी या चौथे खंबे के रूप में खुद महिमामंडित करने वाला पूंजीवादी मीडिया इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर पूरी तरह 1975 में इंदिरा गांधी के आपातकाल के फैसले व लोकतंात्रिक मूलभूत अधिकारों के अपहरण के साथ खड़ा था। कारपोरेट जगत व पूंजीवादी मीडिया दोनों आपातकाल के समर्थक के रूप में सामने आये। ठीक इसी दौर में मजदूरों, कर्मचारियों, छात्रों-नौजवानों की हड़ताल व आंदोलन के प्रति पूंजीवादी मीडिया सरकार के दमनात्मक कदमों के साथ था। मजदूरों की बस्तियों को सौंदर्यीकरण के नाम पर उजाड़ने की जो शुरूआत संजय गांधी ने की उसे पंूजीवादी प्रचार माध्यमों ने बहुत सकारात्मक बताया था। ‘60-70’ के दशक में देश में अनेक स्थानों पर जो क्रांतिकारी किसान आंदोलन व मजदूरों के संघर्ष हुए उनको पंूजीपति वर्ग ने अपने वर्गीय शासन के लिए खतरा माना उसी के अनुरूप पूंजीवादी मीडिया किसानों-मजदूरों के संघर्ष को लोकतंत्र के लिए खतरा, आतंक व अराजक कार्यवाहियां बताता रहा है तथा शासक वर्ग के हर दमनात्मक कदम के साथ खड़ा रहा। 80 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट के साथ समाज में सांप्रदायिक व फासीवादी शक्तियों का प्रभाव पड़ा। पूंजीपति वर्ग मजदूरों मेहनतकशों के अधिकारों पर व्यापक और कठोर हमला करने की ओर बढ़ा। यह दौर भारतीय पूंजीवादी राजनीति में दक्षिणपंथ के उभार का था। मीडिया ने धार्मिक फासीवादी रुझान के उभार में काफी बढ़-चढ़कर योगदान किया। 1991 में देश में उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां नई आर्थिक नीति के नाम से लागू हुई। ये नीतियां मजदूर मेहनतकश विरोधी थीं। पूंजी को मजदूर वर्ग का अधिकतम व नग्न शोषण की छूट देना नई आर्थिक नीति के मूल में था। इसके तहत जहां मजदूरों के श्रम अधिकारों पर हमला शुरू हुआ, मजदूरों की सामूहिक सौदेबाजी की ताकत को कमजोर किया गया वहीं पूंजी के उन्मुक्त व स्वच्छंद विचरण के रास्ते की समस्त बाधाओं को खत्म किया गया। नेहरूवादी कथित समाजवाद के माॅडल को त्यागकर शासक वर्ग द्वारा खुले व नंगे पूंजीवाद के माॅडल को अपनाया गया। नई आर्थिक नीतियां आजादी के बाद से मजदूर वर्ग पर सबसे बड़ा हमला था। पूंजीवादी मीडिया नई आर्थिक नीति व निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के सबसे उत्साही समर्थकों के रूप में सामने आया। नई आर्थिक नीति द्वारा बेरोजगार, तबाह-बर्बाद, अधिकार विहीन तथा आत्महत्या तक को मजबूर होते मजदूर-किसानों, उनके नरक बनती जीवन पर पर्दा डालकर पूंजीपति वर्ग व मध्यमवर्ग की चमकती दमकती जिंदगी को देश की प्रगति, समृद्धि का सूचक बनाकर पंूजीवादी मीडिया ने बखूबी प्रचारित किया। दरिद्रता व कंगाली में डूबे व अथाह कष्ट के महासमुद्र के बीच समृद्धि के कुछ टापुओं को ही भारत का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करने का काम पंूजीवादी प्रचार माध्यमों द्वारा किया गया। मजदूर वर्ग की हड़तालें व संघर्ष तो पहले से ही पूंजीवादी प्रचार माध्यमों में उपेक्षित थे लेकिन अब इनके बारे में नकारात्मक प्रचार का काम भी पूूंजीवादी प्रचार माध्यमों ने शुरू कर दिया। यह नकारात्मक प्रचार अथवा दुष्प्रचार किस हद तक है इसका अंदाज केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि मारूति मजदूरों के विगत दो साल में कई चरणों में चली हड़ताल को पहले तो पूंजीवादी मीडिया ने नजरअंदाज या उपेक्षित किया। लेकिन बाद में जब इसे उपेक्षित करना संभव नहीं रहा तो अलग-अलग समय में राष्ट्रीय स्तर के अंग्रेजी अखबारों में इसके बारे में नकरात्मक प्रचार शुरू हो गया जिसमें इस आंदोलन से होने वाले करोड़ों के नुकसान, इस आंदोलन में माओवादी-नक्सली तत्वों की सक्रियता, औद्योगिक अशांति पर कारपोरेट घरानों के मुखियाओं से लेकर प्रधानमंत्री की चिंता अभिव्यक्त हुई। मारूति आंदोलन के तीसरे चरण के बाद जब आन्दोलन के नेता सोनू गुर्जर समेत 30 नेतृत्वकारी साथियों को कंपनी ने लेने से मना कर दिया और उन्होंने कंपनी से हिसाब ले लिया तो पूंजीवादी अखबारों में प्रमुखता से यह खबर इस रूप में छपी- ‘तीस लाख में बिकी सोनू गुर्जर की नेतागिरी’’। जाहिर है इस खबर का मंतव्य मारूति आन्दोलन के प्रति मजदूर वर्ग समेत आम जनता में एक नकारात्मक संदेश देना ही था। मारूति फैक्टरी में 18 जुलाई 2012 की घटना के बाद तो पूंजीवादी अखबारों ने मारूति मजदूरों के खिलाफ खुला युद्ध छेड़ दिया। इसी तरह 2009 में गुड़गांव के रिको व सनबीम कंपनियों में हजारों मजदूरों के आंदोलन, बाउंसरों द्वारा एक मजदूर की हत्या तथा गुड़गांव, धारूहेड़ा, रिवाड़ी, बावल की सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों में एक दिन की हड़ताल तथा गुड़गांव में लगभग एक लाख मजदूरों के प्रदर्शन को पंूजीवादी मीडिया ने बिल्कुल ही नजरअंदाज किया। कुछ सौ लोग गांधी-टोपी पहनकर भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष के नाम पर जंतर-मंतर पर इकट्ठा होेते हैं या कुछ दर्जन मध्यमवर्गीय लोग राजधानी में किसी मुद्दे पर कैंडिल मार्च निकालते हैं तो सभी न्यूज चैनलों के लिए यह ब्रेकिंग न्यूज होती है। चैबीसों घंटे ऐसी खबरों का प्रसारण होता है। अन्ना आन्दोलन के समय तो हफ्ते भर तक ऐसा लगा कि इस देश में कोई और घटनायें घट ही नहीं रही हैं। सभी चैनलों पर अन्ना और उनका आन्दोलन छाया रहा। वहीं देश के कोने-कोने से लाखों की तादात में मजदूर जब श्रम कानूनों के उल्लंघन, ठेका प्रथा खत्म करने, न्यूनतम वेतन बढ़ाने जैसी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करते हैं तो अखबारों से लेकर न्यूज चैनलों तक में इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। देशव्यापी मजदूरों की हड़ताल के साथ भी यही रुख होता है। 2012 में आम हड़ताल के दौरान नोएडा में मजदूरों के द्वारा अराजकता की कथित कार्यवाहियां पूंजीवादी समाचार माध्यमों में छायी रहीं जबकि मालिकों की उत्पीड़नात्मक व उकसाने वाली बातों पर चुप्पी साध ली गयी। इस आम हड़ताल के बाद मजदूरों के बर्बर दमन व बिना जमानत एक साल से अधिक अवधि से मजदूरों को जेल में बंद रखने जैसी खबरें इन पूंजीवादी प्रचार माध्यमों में जगह नहीं पाती हैं। यही बातें ग्रेजियानो, एलाइड निप्पोन व गुड़गांव के ओरिएंट क्राफ्ट व लुधियाना में मजदूरों के स्वतः स्फूर्त आन्दोलन के दमन के बारे में लागू होती है। जाहिर है कि उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के दौर में तथाकथित मीडिया या पूंजीवादी प्रचार माध्यम पूरी तरह पूंजी के हितों, बाजार व मुनाफे के समीकरणों से संचालित होते हैं। पूंजीवादी मीडिया न केवल विज्ञापन बटोरने व मुनाफा कमाने का उपकरण है बल्कि यह वित्तपूंजी बाजार के हित में जनमत बनाने का काम कर रहा है। साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के दौर में आज तथाकथित मीडिया इतना सशक्त हो गया है कि वह समाज व राजनीति में बहुत बड़ी हस्तक्षेपकारी भूमिका निभा रहा है। वह देश के राजनीतिक एजेन्डे तय कर रहा है। समाज के चिंतन का विषय तय कर रहा है। सरकारों के फैसलों तक को प्रभावित कर रहा है और राजनीति के समीकरण तय कर रहा है। लेकिन यह सब कुछ वित्तीय महाप्रभुओं, पूंजीपति वर्ग और विश्व बैंक व साम्राज्यवादियों के हितों के अनुरूप तय कर रहा है। अन्ना आंदोलन एक प्रतीक उदाहरण है जिसमें सरकार की भूमिका को केवल ‘अच्छी सरकार’ (गुड गवर्नेन्स) उपलब्ध कराने तक सीमित करने, नीति निर्माण में गैरलौकतांत्रिक तरीके से अभिजनों (सिविल सोसायटी) की भूमिका बढ़ाने तथा प्रचार माध्यमों के दम पर लोकरंजक मुद्दों (भ्रष्टाचार) पर आन्दोलन खड़ा कर देश का राजनीतिक एजेन्डा व विमर्श तय करने के साथ एक पार्टी तक को खड़ा करने का काम पूंजीवादी प्रचार माध्यमों ने कर दिखाया है। नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर एक महानायक के रूप में स्थापित करने का काम पूंजीवादी प्रचार माध्यमों ने बखूबी किया है। चाहे अन्ना आंदोलन रहा हो या आम आदमी पार्टी का बनना या फिर नरेन्द्र मोदी का करिश्माई नायकत्व यह सब देश के पूंजीपति वर्ग व विश्व बैंक सरीखी साम्राज्यवादी संस्थाओं की इच्छा अनुरूप ही घटित हो रहा है जिसमें पूंजीवादी प्रचार माध्यमों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इन तीनों ही घटनाओं के मूल में देश में विदेशी पूंजी की घुसपैठ बढ़ाना, आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाना तथा सरकार की भूमिका सीमित कर पूंजी के स्वच्छंद विचरण का दायरा विस्तृत करना है। यह अकारण नहीं है कि ‘जनलोकपाल’ के तथाकथित बिल के दायरे में कारपोरेट व एन.जी.ओ. नहीं हैं। अन्ना आन्दोलन के समय प्रचालित ‘सिविल सोसायटी’ व मोदी का ‘गुड गवर्नेंस’ जैसे शब्द विश्व बैंक की भाषा से उधार लिए गए हैं। इस तरह हम देखते हैं कि साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के दौर में पूंजीवादी प्रचार माध्यम देशी-विदेशी पूंजी का हितसाधक उपकरण में पूरी तरह तब्दील हो चुके हैं। इसके साथ ही घोर प्रतिक्रियावादी विचारों के वाहक बनकर समाज में फासीवादी तत्वों के उभार का काम भी पूंजीवादी मीडिया बखूबी कर रहा है। हाल ही में मुजफ्फरनगर दंगों में पूंजीवादी प्रचार माध्यमों ने सांप्रदायिक जहर के प्रचार-प्रसार में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की। दरअसल देश का पंूजीपति वर्ग एक हद तक आज फासीवादी तत्वों को आगे बढ़ाकर पंूजी की निरंकुश सत्ता कायम करना चाहता है उसी के अनुरूप पूंजीवादी प्रचार माध्यम सांप्रदायिक फासीवादी प्रचार को हवा दे रहे हैं। जाहिर है कि ऐसे में आज मुख्य धारा के मीडिया या पूंजीवादी प्रचार माध्यमों से कोई सकारात्मक उम्मीद रखना किसी भी तरह के सच को सामने लाने की अपेक्षा करना अपने आपको धोखा देना है तो फिर मजदूर वर्ग के मुक्ति संघर्ष को आगे बढ़ाने, जनवादी मूल्यों व विचारों की रक्षा करने व पूंजी की निरंकुशता के खिलाफ प्रतिरोध को आगे बढ़ाने के लिए क्या किया जाय? क्या इसके लिए निष्पक्ष मीडिया की तलाश की जाय या एक निष्पक्ष जनवादी मीडिया खड़ा किया जाय। हमारा मानना है कि हम जिस वर्ग विभाजित समाज में रहते हैं वहां निष्पक्षता की बात करना बेमानी है। सभी निष्पक्ष प्रचार अंततः प्रभुत्वशाली वर्गों की सेवा करते हैं। निश्चित तौर पर पूंजी की निरंकुश लूट के इस दौर में मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी विचारधारा व संघर्षों से अनुप्राणित हुए बगैर कोई सार्थक प्रतिरोध खड़ा नहीं किया जा सकता है। समाजवाद के विकल्प को मजबूती से समाज में स्थापित किए बगैर पूंजीवादी लूट व भ्रष्टाचार से मुक्ति की बात बेमानी ही कहलायेगी। निश्चित तौर पर पूंजी का हमला आज जितना व्यापक है, बहुस्तरीय व सघन है, पूंजीवादी प्रचार माध्यम व तथाकथित मीडिया जिस तरह निर्लज्ज तरीके से पूंजी की चाकरी कर रहा है ऐसे में सशक्त प्रतिरोधी व जनपक्षधर प्रचारतंत्र या प्रतिरोधी मीडिया आज के दौर की जरूरत है। इसके लिए सभी जनपक्षधर, न्यायप्रिय व साम्राज्यवाद पूंजीवाद विरोधी शक्तियों को साथ आना होगा। ‘नागरिक’ अखबार पूंजी की निरंकुशता व लूट के खिलाफ प्रतिरोध का स्वर पिछले 16 साल से बुलंद किए है। शासक वर्ग के दमन व धमकियों के बावजूद इसके प्रतिरोध के स्वर में कभी कोई कमी नहीं आयी है बल्कि मजदूर मेहनतकश जनता के न्यायपूर्ण संघर्ष व पंूजीवाद के खात्मे व समाजवादी व्यवस्था के स्थापना के मिशन के प्रति इसकी प्रतिबद्धता और मजबूत होती गयी है। हम सभी मजदूर मेहनतकश जनता की पक्षधर, न्याय की पक्षधर शक्तियों से एकजुटता व्यक्त करते हुए प्रतिरोध की आवाज को बुलंद रखने का आह्वान करते हैं।
साम्प्रदायिकता और मीडिया्ग - सेमिनार पत्र -सितम्बर 2013, मऊ (यू.पी.) दोस्तो, आज हम शहीदे आज़म भगतसिंह और साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष करते हुए सम्भवतः प्रथम शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के शहीद दिवस के अवसर पर इस संगोष्ठी का आयोजन कर रहे हैं। यह हम जानते हैं कि शहीदे आज़म भगतसिंह फांसी के फंदे को चूमने से पहले तक भारत में क्रांति सम्पन्न होने की समस्याओं से जूझ रहे थे। वे उस समय तक के क्रांतिकारी आंदोलन की कमियों-खामियों पर लगातार चिंतन मनन कर रहे थे। यह भी जानी हुई बात है कि भगतसिंह जब कानपुर गये थे तो उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार ‘प्रताप’ में बलवंत के नाम से कई लेख लिखे थे। 1931 में ही 23 मार्च को भगतसिंह को फांसी दे दी गयी और उसके ठीक दो दिन बाद गणेश शंकर विद्यार्थी ने साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के दौरान अपने प्राणों की आहुति दी। यह पढ़कर आश्चर्य होता है कि भारत में क्रांति की समस्याओं पर विचार करते समय उसके एक अंग के बतौर शहीदे आज़म भगतसिंह ने साम्प्रदायिकता की समस्या पर भी विचार किया था। आज वह साम्प्रदायिकता की समस्या विकराल रूप में और नयी आक्रामकता के साथ आ खड़ी हुई है। यह भारत के मजदूरों-मेहनतकशों को बांटती है, उन्हें एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करती है और पूंजीपति वर्ग और उसके राज्य को मजदूरों-मेहनतकशों को अपनी लूट को घनीभूत करने में मदद करती है। मीडिया भी साम्प्रदायिकता की समस्या को बढ़ाने के लिए प्रचारित-प्रसारित करने में भूमिका निभाता है। इस प्रश्न को बहुत पहले शहीदे आज़म ने समझ लिया था। प्रस्तुत आलेख की शुरूआत शहीदे आज़म भगतसिंह और गणेश शंकर विद्यार्थी के एक लेखांश से कर रहे हैं। ऐसा इसलिए कर रहे हैं कि उनके द्वारा छेड़े गये संघर्ष को आगे ले जाने का संकल्प उनके वारिशों को ही उठाना है। यह हमारा दायित्व बनता है कि उनकी मशाल को और ज्यादा ऊपर उठाकर उनके छोड़े गये कार्यों को हम आगे बढ़ायें। हम आज के समय में उनके विचारों को प्रस्थान बिंदु मानकर उनके अधूरे संघर्ष को पूरा करने में योगदान देकर ही सही अर्थों में उनको श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। भगतसिंह के ‘‘साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’’ लेख का अंशः ‘‘जहां तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो समान ‘राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज-स्वराज’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आंदोलन में जा मिले हैं, वैसे तो जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत कम हैं, और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है। ‘‘दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, वे अखबार वाले हैं।’’ ‘‘पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था, आज बहुत ही गंदा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनायें भड़काते हैं और परस्पर सिर-फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक, जिनका दिल और दिमाग ऐसे दिनों में भी शांत रहा हो, बहुत कम हैं।’’ ‘‘अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनायें हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारत की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि भारत का बनेगा क्या?’’ इसके आगे वे साम्प्रदायिक दंगों का इलाज बताते हुए कहते हैः ‘‘लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है। गरीब मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों में तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरे कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी’’। (साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज, भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, पृ. 218-220) गणेश शंकर विद्यार्थी के लेख ‘जिहाद की जरूरत’ का अंश ‘‘आज हमें जिहाद की जरूरत है- इस धर्म के ढोंग के खिलाफ, इस धार्मिक तुनकमिजाजी के खिलाफ। जातिगत झगड़े बढ़ रहे हैं। खून की प्यास लग रही है। एक-दूसरे को फूटी आँखों भी हम देखना नहीं चाहते। अविश्वास, भयातुरता और धर्माडम्बर के कीचड़ में फंसे हुए हम नारकीय जीव, यह समझ रहे हैं कि हमारी सिर फुटौव्वल से धर्म की रक्षा हो रही है। हमें आज शंख उठाना है इस धर्म के विरुद्ध जो तर्क, बुद्धि और अनुभव की कसौटी पर ठीक नहीं उतर सकता।....... ‘‘भारतवासियो, एक बात सदा ध्यान में रखो! धार्मिक कट्टरता का युग चला गया। आज से 500 वर्ष पूर्व यूरोप जिस अंधविश्वास, दंभ और धार्मिक बर्बरता के युग में था, उस युग में भारतवर्ष को घसीटकर मत ले जाओ। जो मूर्खतायें अब तक हमारे व्यक्तिगत जीवन का नाश कर रही थीं, वे अब राष्ट्रीय प्रांगण में फैलकर हमारे बचे-खुचे मानव-भावों का लोप कर रही हैं। जिनके कारण हमारा व्यक्त्तित्व पतित होता गया, अब उन्हीं के कारण हमारा देश तबाह हो रहा है। हिन्दू-मुसलमानों के झगड़ों और हमारी कमजोरियों को दूर करने का केवल एक यही तरीका है कि समाज के कुछ सत्यनिष्ठ और सीधे दृढ़-विश्वासी पुरुष धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध जिहाद कर दें। जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी तब तक देश का कल्याण न होगा। समझौते कर लेने, नौकरियों का बंटवारा कर लेने और अस्थायी सुलहनामों को लिखकर हाथ काले करने से देश को स्वतंत्रता न मिलेगी। हाथ में खड्ग लेकर तर्क और ज्ञान की प्रखर करताल लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है।..... पाप के गड्ढे राष्ट्र के राजमार्ग पर न खोदना चाहिए, क्योंकि भारत की राष्ट्रीयता का रथ उस पर होकर गुजर रहा है। हम चाहते हैं कि कुछ आदमी ऐसे निकल आयें- जिनमें हिन्दू भी हों और मुसलमान भी- जोकि इन सब मूर्खताओं की, जिनके हिन्दू और मुसलमान दोनों शिकार हो रहे हैं- तीव्र निन्दा करें। यह निश्चय है कि पहले-पहल इनकी कोई न सुनेगा। इन पर पत्थर फेंके जायेंगे। ये प्रताडि़़त और निन्दा-भाजन होंगे। पर अपने सिर पर सारी निंदा और सारी कटुता को लेकर जो आगे आना चाहते हैं, उन्हीं को राष्ट्र यह निमंत्रण दे रहा है। सीस उतारे भुईं धरै, ता पर राखे पांव, ऐसे जो हों, वे ही आवें। (‘जिहाद की जरूरत’ गणेश शंकर विद्यार्थी प्रताप, 30 मई, 1926) हम प्रस्तुत आलेख में साम्प्रदायिकता का विश्लेषण और उसके इतिहास में नहीं जायेंगे। इसका कारण यह है कि इस विषय पर समय-समय पर लोग अपनी बातें कहते रहे हैं। हम यहां पर प्रमुख रूप से मीडिया की भूमिका पर चर्चा करेंगे। हम मीडिया द्वारा साम्प्रदायिकता को फैलाने ओर विभिन्न समुदायों के बीच खाई को और चैड़ा करने में उसकी भूमिका की चर्चा करेंगे। इसी प्रकार, इस आलेख में राज्य के विभिन्न अंगों और दंगों के दौरान पुलिस व सशस्त्र बलों की पक्षपातपूर्ण भूमिका की चर्चा नहीं की गयी है। दंगों के दौरान पुलिस व सशस्त्र बल ज्यादातर इसी मुस्लिम विरोधी सोच से ग्रस्त रहते हैं जिसका प्रचार-प्रसार हिन्दुत्ववादी ताकतें करती रहती हैं। मीडिया भी आमतौर पर पुलिस व सशस्त्र बलों की इस भूमिका पर चुप्पी साधे रहता है। इस सम्बन्ध में विभूति नारायण राय द्वारा लिखित पुस्तक ‘साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस’  में कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य उजागर किये गये हैं। इस पुस्तक में एक जगह वे अपने अनुभव का जिक्र करते हुए लिखते हैंः ‘‘...मसलन, उत्तर प्रदेश पुलिस में रहते हुए मुझे विभिन्न स्तरों पर रखे जाने वाले साम्प्रदायिक तत्वों से सम्बन्धित रिकार्डों में एक दिलचस्प चीज देखने को मिली। अधिकांश स्तरों पर साम्प्रदायिक गुंड़ों या साम्प्रदायिकता फैलाने वाले तत्वों की सूची का मतलब मुस्लिम साम्प्रदायिकता में लिप्त लोगों से है। उन दिनों भी जब राम जन्मभूमि आंदोलन के माध्यम से बड़े पैमाने पर हिन्दू साम्प्रदायिक शक्त्तियां सक्रिय थीं, असामाजिक तत्वों की फेहरिश्तों में हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों का नाम बताना मुश्किल होता था। सम्भवतः इसके पीछे भी वही भावना है, जिसके तहत यह माना जाता है कि साम्प्रदायिक होना मुसलमानों का विशेषाधिकार है और हिन्दू तो आमतौर से असाम्प्रदायिक होता है।’’ यह पुलिस व सशस्त्र बलों व राज्य के विभिन्न अंगों की मुस्लिम विरोधी पक्षपातपूर्ण रवैया को दर्शाता है। मीडिया में साम्प्रदायिकता इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में हमें साम्प्रदायिकता की समस्या से और ज्यादा विकराल रूप में सामना करना पड़ रहा है। हिन्दुत्व की फासीवादी ताकतें लगातार यह प्रचार कर रही है कि भारत को हिन्दू-राष्ट्र बनने से कोई रोक नहीं सकता। गुजरात नर-संहार को अंजाम देने वाले नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया जा रहा है। साम्राज्यवादी ताकतें हिन्दुत्व के इस नये चेहरे को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी हैं। गुजरात के विकास माॅडल की प्रशंसा मीडिया में हो रही है। यूरोपीय सांसद जो गुजरात नरसंहार का विरोध करते थे, अब नरेन्द्र मोदी का आतिथ्य स्वीकार कर रहे हैं। संयुक्त्त राज्य अमरीका में हिन्दुत्व की ताकतों द्वारा नरेन्द्र मोदी के भाषण का आयोजन किया जा रहा है। यहां का पूंजीपति वर्ग नरेन्द्र मोदी को स्वीकार करने की प्रक्रिया में अपने को लगा चुका है। आर.एस.एस., भा.ज.पा. के हिन्दुत्व का प्रचार-प्रसार और दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदाय विशेषतौर पर मुसलमानों को आतंकवाद का समर्थक, देशद्रोही होने की तस्वीर मीडिया में लगातार आ रही है। यहां पिछले दिनों आतंकवाद के गढ़ के रूप में आजमगढ़ को मीडिया में पेश किया जा रहा था। आजमगढ़ को ‘आतंकगढ़’ के बतौर समाचार पत्रों और टी.वी. चैनलों में लगातार प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा था। मानो समूचे आजमगढ़ की मुसलमान आबादी ही आतंकवादी हो गयी हो! मीडिया की आज के सूचना प्रोद्योगिकी के युग में छवि निर्मित करने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका हो गयी है। मीडिया में जो भी छपता या दिखाया जाता है, उसे लोग आमतौर पर सच्चाई के बतौर स्वीकार कर लेते हैं। मीडिया समाज में राय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। चूंकि इसकी भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है, इसलिए इसे अपनी भूमिका पर गहराई से विचार करने की जरूरत है। लेकिन आमतौर पर ऐसा नहीं होता। कर्नाटक के एक ‘कालम 9’ नाम के सक्रिय ग्रुप की 2009 की ‘‘आतंकवाद पर मीडिया’’ ;डमकपं वद ज्मततवतद्ध की एक रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने 2008 के कई महीनों तक कन्नड और अंग्रेजी अखबारों के बंगलुरू संस्करणों के आतंकवाद पर की गयी रिपोर्टिंग का विश्लेषण करने के साथ-साथ होन्नाली, देवनगिरि, हुबली, कालछातगी और बंगलुरू के पत्रकारों और पुलिस अधिकारियों से साक्षात्कार लिया। यह वह समय था जब मीडिया मुस्लिम ‘आतंकवादियों की कहानियों से भरा रहता था। ऐसा लगता था कि वे समूचे कर्नाटक राज्य पर कब्जा करने की साजिश रच रहे थे। इस रिपोर्ट में यह पाया गया कि कन्नड और अंग्रेजी, कर्नाटक के दोनों मीडिया गिरफ्तार लोगों पर खतरनाक ढंग से फैसला सुना रहे थे। वे कानून की प्रक्रिया का भी इंतजार नहीं कर रहे थे। रिपोर्ट कहती है कि अधिकांश खबरों की रिपोर्टिंग का कोई भौतिक आधार नहीं था। कथित आतंकवादियों को, जिनमें अधिकांश बेकसूर मुस्लिम नौजवान थे, पुलिस द्वारा मनमाने ढंग से उठा लिया जाता था और बिना प्रमाण के महज पुलिस दावों पर आधारित उनके बारे में मीडिया द्वारा फैसला सुना दिया जाता था। हुबली के कन्नड प्रभा के एक रिपोटर्र ने टीम के साथ साक्षात्कार में यह खुले तौर पर स्वीकार किया कि उसने जो रिपोर्ट भेजी उनमें से 60 प्रतिशत गलत और असत्य थीं। हुबली के टाइम्स आॅफ इण्डिया के एक रिपोर्टर ने स्वीकार किया कि उसने अपनी रिपोर्ट के साथ एक ऐसी दरगाह की फोटो भेजी, जिसका उस रिपोर्ट से कोई सम्बन्ध नहीं था, और उसमें कथित रूप से मुस्लिम आतंकवादी शिविर चलना बताया गया। इतना ही नहीं, दरगाह के निकट लगे झण्डे को पाकिस्तान का झण्डा बताया गया। इसी प्रकार, समुद्र तटीय कर्नाटक की एक घटना में हिन्दू युवा सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा दो मुसलमान व्यक्तियों को गायों को ले जाते समय सार्वजनिक तौर पर नंगा करके घुमाने के बाद उडुपी में विरोध स्वरूप मुसलमानों ने एक रैली निकाली। कन्नड अखबारों ने यह गलत आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी पाकिस्तानी झण्डे फहरा रहे थे और पाकिस्तान समर्थक नारे लगा रहे थे और बिना किसी प्रमाण के उन्हें अल-कायदा और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा होने का आरोप लगा दिया। पुलिस द्वारा इन दावों का खण्डन करने के बावजूद अखबार अपने आरोप पर डटे रहे। इस तरह की अनेक मीडिया की मुस्लिम विरोधी खबरों का उदाहरण इस रिपोर्ट में दिया गया है। रिपोर्ट यह सूचित करती है कि कर्नाटक के पत्रकार आतंकवाद को मुस्लिमों की ही विशिष्ट परिघटना के बतौर देखते हैं, और कि हिन्दू ‘‘आतंकवादियों’’ की सम्भावना पर भी विचार करने को तैयार नहीं हैं। रिपोर्ट यह भी इंगित करती है कि बी.जे.पी. के उभार के बाद विशेषतौर पर मुस्लिमों के विरुद्ध आतंक की ढेर घटनायें हुई हैं जिन्हें हिन्दू ग्रुपों ने अंजाम दिया था। लेकिन मीडिया इन्हें हिन्दू ‘आतंकवाद’ की घटनाओं के बतौर नहीं बताता। रिपोर्ट इसे कर्नाटक के मीडियाकर्मियों द्वारा ‘‘हिन्दू राष्ट्रवाद का आत्मसातीकरण’’ कहती है और इसे खतरनाक बताती है। मीडिया हिन्दुत्व लाॅबी को हिन्दुओं के ‘एकमात्र प्रतिनिधि’ के बतौर पेश करती है। जो बात कर्नाटक के मीडिया पर लागू होती है लगभग वही बात समूचे देश के पैमाने पर लागू होती है। साम्प्रदायिक ताकतों की मीडिया में पैठ इतनी व्यापक है कि वे सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय मुस्लिमों को इस तरह चित्रित करता है कि मानो पाकिस्तान बनने के लिए सारे मुसलमान जिम्मेदार रहे हों, या यदि पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलते समय, यदि पाकिस्तान की टीम की जीत से कुछ मुसलमान जश्न मनाते हों, तो उसे समूचे मुसलमानों को जिम्मेदार बताया जाता है। मीडिया भारत और पाकिस्तान की दो क्रिकेट टीमों के मैच को दो देशों के बीच पवित्र युद्ध के बतौर चित्रित करता है। मुसलमानों की एक छवि मीडिया जो लगातार पेश करता है कि वे ‘धर्मोन्मादी’ और ‘मूलवादी’ होते हैं। किसी एक व्यक्ति या समूह मात्र की कार्रवाइयों को समूचे मुस्लिम समुदाय की कार्रवाई घोषित कर दिया जाता है। शाहबानो मुकदमे के बारे में मीडिया ऐसे प्रचारित कर रहा था मानो मुसलमानों के भीतर ही महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता हो। मीडिया भी आर.एस.एस. और भा.ज.पा. की सुर में सुर मिलाते हुए इसे मुस्लिम नेताओं के तुष्टीकरण को समूचे मुस्लिम समुदाय के तुष्टीकरण की नीति के बतौर गलत ढंग से चित्रित करता है। मीडिया की भूमिका-इतिहास के आइने में हमारे देश में अखबारों की शुरूवात उपनिवेशवाद के दौर में हुई थी। वस्तुतः मीडिया उपनिवेशवाद की ही सेवा कर रहा था। उन्नीसवीं सदी की शुरूवात में अखबार समुदाय केन्द्रित तकलीफों एवं सरोकारों को व्यक्त करते थे। वे ज्यादातर धार्मिक सुधारों की मांग करते थे। लेकिन मांगें कभी-कभी एक-दूसरे समुदाय के विरोध में भी व्यक्त होती थी। यह ऐसा भी समय था जब धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर भारतीय होने की धारणा भी पैदा होने लगी थी। 1857 में एक ऐसा समय आया जब भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में दिल्ली के उर्दू प्रेस ने भारतीयों को भारतीयों के बतौर उद्बोधित किया। ’सैय्यद उल-अखबार’ और ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ सहित कई अखबारों ने हिन्दुओं और मुसलमानों को अपने मतभेद भुलाकर अपने मुश्तरका दुश्मन के विरुद्ध लड़ने का आह्वान किया था। अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः कब्जा कर लेने के बाद दिल्ली उर्दू अखबार के सम्पादक मौलवी मुहम्मद बकर को गोली से उड़ा दिया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में षायद वे पहले सम्पादक थे जिन्होंने अवाम की एकता आधारित भारत बनाने के सपने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। 1880 के दशक के बाद से कांग्रेस और मुस्लिम राजनीति के आने के साथ और बाद में बीसवीं शताब्दी की शुरुवात में उत्तरी भारत के अखबारों ने पूरी तरह से साम्प्रदायिक पक्षधरता में उसी तरह लिप्त होने लगे, जिस प्रकार राजनीतिक धरातल पर विभिन्न धारायें लिप्त थीं। यह प्रक्रिया भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता के दोनों के साथ-साथ बढ़ती रही। राष्ट्रीय आंदोलन की प्रमुख पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने शुरु से ही भारतीय समाज के सम्बन्ध में धार्मिक व सम्प्रदायगत नजरिया अपनाया था। महात्मा गांधी अपने को सनातनी हिन्दू कहते थे। 1921 के मोपला विद्रोह के बारे में गांधी जी ने धार्मिक नजरिए से आलोचना की थी। वे एक हिन्दू नेता के बतौर अपने को  पेश कर रहे थे। उनका यह वाक्य ध्यान देने योग्य हैः ‘‘मोपला के पागलपन की मुसलमानों द्वारा की गयी मौखिक निन्दा मुसलमान मैत्री की कोई परीक्षा नहीं है।’’ इसलिए यह कहना कि ‘‘राष्ट्रवाद’’ साम्प्रदायिकता के विरोध में खड़ा था, सही नहीं है। ‘‘राष्ट्रवाद’’ अपने साथ अन्य कूडा़-कबाड़ के साथ साम्प्रदायिकता का कूड़ा-कबाड़ लिए हुआ था। उपनिवेशवाद और स्वतंत्रता प्राप्ति के शुरुवाती वर्षों में भारतीय पूंजीपति वर्ग के ऊपरी हिस्से द्वारा साम्प्रदायिक ताकतों का समर्थन नहीं मिला था। वह मूलतः कांग्रेस पार्टी का समर्थन कर रहा था। साम्प्रदायिक ताकतें विशेष तौर पर हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतें निम्न पूंजीवादी तबके के बीच अपना आधार रखती थीं। इसी के अनुरूप आजादी के बाद हमारे यहां के अखबार राजनीतिक पार्टियों की तरह ही अपनी साम्प्रदायिक पक्षधरता व्यक्त करते थे। सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और अन्य शासक वर्गीय पार्टियां समुदायों के तथाकथित नेताओं पर निर्भर करती थीं। ये ही समुदायों के नेता के बतौर स्थापित किये जाते थे। चाहे राष्ट्रीय पैमाने पर हो या स्थानीय पैमाने पर हो। उनको ही समुदाय विशेष के नेता के बतौर राजनीतिक आगोश में समेटा जाता था। समुदाय विशेष के ये नेता अपने समुदाय या देश की सामाजिक आर्थिक समस्याओं से कोई मतलब या सरोकार नहीं रखते थे। समय के साथ राष्ट्रीय नेतृत्व का भी अपनी सोच व व्यवहार में ऐसा ही चरित्र उजागर होता गया। उस समय के पूंजीवादी समाचार पत्र, खुले तौर पर साम्प्रदायिक विचारधारा या दृष्टिकोण को प्रचारित-प्रसारित नहीं करते थे। बल्कि इसके बजाय वे नरम साम्प्रदायिकता का रुख अपनाते थे। उस समय मुसलमानों का नेतृत्व दोनों-राजनीतिक व धार्मिक-कांग्रेस पार्टी कर रही थी। जमात-ए-उलेमा-ए हिंद जैसे कुछ धार्मिक संगठन कांग्रेस के संगठन के बतौर वस्तुतः काम कर रहे थे। मुसलमानों के नेता के बतौर मौलवी लोग वस्तुतः पिछड़ी मानसिकता रखते थे और उनके पिछड़े विचारों को ही मीडिया समूचे मुसलमानों के दृष्टिकोण के बतौर पेश करता था। यह एक वास्तविकता है कि मीडिया की इस नरम साम्प्रदायिकता ने उस समय ज्यादा उग्र रूप ले लिया जब शासक कांग्रेस पार्टी ने खुले तौर पर साम्प्रदायिक रुख अपना लिया। 1980 के दशक के दौरान मुरादाबाद, मेरठ, हाशिमपुरा, मालियाना और भागलपुर में साम्प्रदायिक हत्यायें संगठित की गयीं। इसी दौर में 1984 में सिखों के विरुद्ध नरसंहार आयोजित किये गये। इन सभी को कांग्रेस पार्टी ने अपने अलग-अलग राजनीतिक उद्देश्यों के लिए आयोजित किया था। इन साम्प्रदायिक दंगों के दौरान मीडिया द्वारा, विशेष तौर पर देशी भाषाओं के समाचार पत्रों द्वारा खुली पक्षधरता देखी जा सकती है। उदाहरण के लिए एक अल्पसंख्यक समुदाय के बतौर सिखों को 1980 के दशक के पंजाब आंदोलन के दौरान भारतीय मीडिया में बुरे रूप में, देशद्रोही के रूप में पेश दिया जाता था। सिखों का अतिवाद और आतंकवाद के साथ जोड़कर वर्णित किया जाता था। विशेष तौर पर आॅपरेशन ब्लू स्टार के बाद और दो सिख अंगरक्षकों द्वारा इंदिरा गांधी की हत्या करने के बाद दिल्ली नरसंहार के दौरान और बाद में समाचार पत्रों की भूमिका अत्यंत शर्मनाक रही है। उस समय मीडिया सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के राजनीतिक लक्ष्यों के साथ अपनी पक्षधरता प्रतिबिम्बित कर रहा था। कांगे्रस सिखों और पंजाब के प्रति जो भी नीति अपना रही थी मीडिया उसको प्रतिविम्बित करता था और इसमें साझीदार था। पूंजीवादी मीडिया जिसे मुख्यधारा मीडिया कहा जाता है इसमें राष्ट्रीय कहे जाने वाले और क्षेत्रीय समाचार पत्र दोनों आते हैं, वही व्यक्त करता हैं जिसे शासक वर्ग की बड़ी पार्टियां समाचार का प्रमुख एजेण्डा घोषित करती है। वर्तमान समय में, दोनों शासक वर्गीय पार्टियों के पास, कांगे्रस और भाजपा के पास सुगठित ढांचा है जो रोजाना मीडिया को अपनी बातें पहुंचाता है। पत्रकार वार्ता, प्रेस सम्मेलन आदि के उनके माध्यम है। भाजपा इसमें माहिर है। इसका संगठन और प्रचार ब्रिगेड सुसंगठित और सब जगह है। यह गांव और छोटे कस्बों तक फैली हुई है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवक सनसनीखेज प्रचार करने में प्रशिक्षित है और वे ही मीडिया के जारिए अपना एजेण्डा तय करके देते है और भाजपा उसका प्रचार करती है। 1980 के दशक में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण की बात कहकर मीडिया में स्थापित करने की कोशिश की गयी। इसी प्रकार बाबरी मस्जिद, राम जन्म भूमि विवाद को मीडिया में लगातार राम जन्म भूमि के बतौर स्थापित किया गया। इसी प्रकार, बंगलादेशी (मुसलमानों से मतलब है) घुसपैठियों को मीडिया में लगातार प्रचारित किया गया। बंगलादेशी हिन्दू को ये शरणार्थी कहेंगे और मुसलमान को घुसपैठिया। ये सारी शब्दावली 1980 के दशक से ही निर्मित हुई है। इसी प्रकार मदरसों को आतंकवाद के प्रशिक्षण स्थली का प्रचार निरंतर संघी लोग कर रहे है। मीडिया इसको खूब रंग-रोगन के साथ पेश करता है। मीडिया की पक्षपात भरी रिपोर्टिंग दंगों के दौरान ज्यादा स्पष्टता के साथ दिखाई पड़ती है। मीडिया ऐसे समय में सम्प्रदायों के बीच दूरी बढ़ाने में अपने पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग के जरिए भारी नुकसान पहुंचाता है। मीडिया गिरफ्तार व्यक्ति का नाम लेकर, उसकी ड्रेस या दाढ़ी बताकर दो सम्प्रदायों के बीच तनाव पैदा करने का काम कर देता है। चाहे कोई विवाद निजी ही क्यों न रहा हो, उसे साम्प्रदायिक रूप देने में मीडिया भूमिका अदा कर देता है। इस तथ्य के बावजूद कि अधिकांश दंगों में मुसलमान ही मारे जाते हैं, फिर भी अखबार लगातार मुसलमानों के हमलावर होने की चर्चा करता रहता है। मीडिया, मीडियाकर्मी का वर्ग-चरित्र जिसे हम मीडिया कहते हैं उसका दायरा बहुत व्यापक है। इसमें समाचार पत्र, टी. वी. चैनल. फिल्में, संगीत इत्यादि सभी आ जाते हैं। लेकिन हम यहां पर अपने को समाचार पत्रों और टी. वी. चैनलों तक ही सीमित रखेंगे। मीडिया और मीडियाकर्मी के बीच सम्बन्ध उसी प्रकार का है जिस प्रकार का किसी भी उद्योग में पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग के बीच होता है। उद्योगों में मजदूर वर्ग वस्तुओं का उत्पादन करता है और यहां मीडिया में यह विचारों व सूचनाओं का उत्पादन व वितरण करता है। दोनों ही जगह पर पूंजीपतियों का काम मुनाफा अधिकाधिक करना होता है। यहां वह मीडियाकर्मियों के शोषण को घनीभूत करके ही इसे अंजाम दे सकता है। लेकिन मीडियाकर्मी राय बनाने वाला होता है। वह समाज को विचारों से प्रभावित करता है। वह समाज को सही या गलत पक्ष में खड़ा करने के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है। यह उतना मीडियाकर्मी पर नहीं जितना मीडिया के मालिक पर निर्भर करता है कि वह किस समाचार को किस दृष्टि से दे या न दे। मीडिया के मालिक को अपने मुनाफे को बढ़ाने के साथ-साथ यह कोशिश होती है कि मीडिया उसके व उसके वर्ग हितों की सेवा करने वाला दृष्टिकोण अपनाये। इस या उस मामले में कभी-कभी मीडियाकर्मी अपना नजरिया पेश कर सकता है, बशर्ते कि वह मीडिया मालिक के हितों पर चोट न करता हो। इसलिए मीडिया पर चर्चा करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष में क्या पूंजीवादी मीडिया एक हद से आगे तक जा सकता है? क्या इस पूंजीवादी मीडिया का हित इसमें है कि इस देश से साम्प्रदायिकता समाप्त हो जाय? जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले ही राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान राष्ट्रवाद में साम्प्रदायिकता के तत्व मौजूद थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पूंजीवादी राष्ट्रवाद की एक सकारात्मक साम्राज्यवाद-विरोधी भूमिका थी। लेकिन सत्ता पाने के बाद से भारतीय पूंजीवाद एक लम्बे डग भरता हुआ विश्व-पंूजीवाद के साथ अभिन्न रूप से जुड़ चुका है। अब इसकी कोई साम्राज्यवाद-विरोधी भूमिका नहीं है। भारतीय पूंजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा व्यापक मेहनतकश जन समुदाय के हितों के साथ नहीं है। अब इसकी विचारधारा राष्ट्रवाद के पास भारतीय मेहनतकश जन समुदाय को देने के लिए कोई भी सकारात्मक मूल्य नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तो यह साम्प्रदायिकता या अन्य प्रतिगामी मूल्यों का कूड़ा-कबाड़ साथ में लिए रहता था। लेकिन अब इसके पास मेहनतकश जनता को देने के लिए सिर्फ कूड़ा-कबाड़ ही है। उसके लिए कोई सकारात्मक चीज देने के लिए नहीं है। साम्राज्यवाद के मौजूदा दौर में जब विश्व पूंजीवाद गहरे आर्थिक संकट में डूबा हुआ है, उस समय भारतीय पूंजीवाद तो और भी ज्यादा प्रतिगामी मूल्यों को प्रश्रय दे रहा है। ऐसी स्थिति में वह अपने लिए तरह-तरह के विकल्पों की तलाश में है। इसमें एक विकल्प फासीवाद का है। फासीवाद की सबसे तीक्ष्ण प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व हिन्दुत्व की ताकतें- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भाजपा और इनके सहायक संगठन करते है। इनकी विचारधारा और इनका सांगठनिक ढांचा सभी फासिस्ट व नाजीवादी तर्क पर टिका हुआ है। ऐसी स्थिति में मीडिया भी साम्प्रदायिकता को हवा देने में भूमिका निभायेगा। इसकी जोर-शोर से कवायद संघ की शक्तियां कर रही हैं। वे बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद से लम्बा सफर तय कर चुकी हैं। वे मुम्बई और देशव्यापी दंगों के प्रयोग के बाद गुजरात में नरसंहार की एक नयी प्रयोगशाला में प्रयोग के बाद गुजरात में नरसंहार के शिकार और उनको न्याय दिलाने के पक्ष में खड़े लोगों को आतंकित करने, उन्हें बदनाम करने की साजिशों में लगे हुए है। इसके अलावा वे हिटलर के स्टाॅर्मट्रूपर की तर्ज पर तरह-तरह के आतंकी संगठन बना रहे हैं जो मक्का मस्जिद, मालेगांव और अन्य स्थानों पर आतंकी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। स्वाभाविक है कि मीडिया सहित पूंजीपति वर्ग का समर्थन इन हिन्दुत्ववादी ताकतों को मिल रहा है। इनका कथित हिन्दू राष्ट्रवाद, साम्राज्यवादी ताकतों के साथ साठगांठ का राष्ट्रवाद है। इसलिए पूंजीवादी मीडिया पहले की तुलना में अब ज्यादा पश्चगामी व साम्प्रदायिक है। यह दंगों के समय अपने असली दानवी मानव द्रोही फासिस्ट चेहरे के साथ उपस्थित होगा, जैसा कि पहले हो चुका है। जहां तक पूंजीवादी मीडिया में कार्यरत मीडियाकर्मियों की बात है वे निम्न पूंजीपति वर्ग के हिस्से बनते है। यह इस वर्ग की विशेषता होती है कि यह अपने रहन-सहन व बर्ताव आचरण में पूंजीवादी होता है और मजदूर वर्ग व मेहनतकश जन समुदाय को नीची निगाह से देखता है। लेकिन दूसरी तरफ पूंजीवाद इसे हमेशा नीचे की ओर धकेलता रहता है। इसके बड़े हिस्से की जीवन स्थितियां हमेशा खराब से खराबतर होती जाती हैं। ऐसी स्थिति में बेरोजगारी, मंहगाई आदि की मार से यह लगातार गिरती आर्थिक स्थिति में अपने को पाता है। इसमें से ही निराश नौजवान फासीवाद की विचारधारा के आसानी से वाहक बन जाते है। इसके अतिरिक्त मजदूर वर्ग के आवारा हिस्सों में भी फासीवादी विचारधारा के वाहक आसानी से मिल जाते हैं। मीडियाकर्मी यदि संगठित होकर पंूजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में मजदूर वर्ग और व्यापक मेहनतकश आबादी के साथ नहीं खड़ा होगा तो उसका एक हिस्सा फासीवाद की ओर जायेगा। लेकिन मीडियाकर्मियों में यह भ्रम आमतौर पर व्याप्त है कि वे विशिष्ट हैं। ऐसे में उनका मजदूर वर्ग और अन्य मेहनतकश जनसमुदाय के साथ एकता बनाना जरुरी लेकिन कष्टसाध्य कार्य है। साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष का परिप्रेक्ष्य साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल भारतीय पूंजीपति वर्ग अपने हित के लिए कर रहा है। वह जब चाहता है तो धर्म निरपेक्षता के लबादे को पहनकर साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल करता है तो अन्य अवसर पर वह खुलकर साम्प्रदायिकता अपना कर उसे हिन्दू राष्ट्रवाद को लबादा पहनाकर भी वह कर सकता है। इसलिए साम्प्रदायिकता के विरुद्ध धर्म निरेपक्षता के आधार पर यह संघर्ष ज्यादा आगे तक नहीं ले जाया सकेगा। विभिन्न पूंजीवादी पार्टियां जो अपने को धर्म निरपेक्ष घोषित करती है, वे मौका मिलते ही साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ हाथ मिला लेती हैं। इसका मतलब बहुत स्पष्ट है कि घोषित तौर पर धर्म निरपेक्ष पार्टी कभी भी साम्प्रदायिक व अन्य पिछड़े मूल्यों के साथ समझौता कर सकती हैं। सभी पूंजीवादी पार्टियों के पिछले व्यवहार से यह देखा जा सकता है। दूसरी तरफ जब और जहां मजदूर वर्ग के संघर्ष तीव्र होते रहे हैं और अन्य मेहनतकश जनसमुदाय अपने वर्ग-संघर्ष को तीव्र से तीव्रतर करते रहे हैं, तब और वहां साम्प्रदायिक शक्तियां कमजोर रही हैं। और जैसे ही मजदूर वर्ग और अन्य मेहनतकश जनसमुदाय के वर्ग-संघर्ष कमजोर हुए हैं या पीछे हटे हैं तो साम्प्रदायिक शक्तियां मजबूत हुई हैं। साम्प्रदायिक शक्तियों का विकास या हा्रस मजदूर वर्ग के वर्ग-संघर्ष के विलोमानुपात में होता रहा है। इसलिए साम्प्रदायिक शक्तियों से संघर्ष महज राष्ट्रवाद या धर्म निरपेक्षता के आधार पर नहीं हो सकता। यदि साम्प्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष को भारतीय पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष के अंग के बतौर नहीं किया जाता और यदि इस संघर्ष में मजदूर वर्ग और अन्य मेहनतकश जनसमुदाय बढ़चढ़कर शिरकत नहीं करते तो यह संघर्ष विभिन्न पूंजीवादी शक्तियों के बीच नूराकुश्ती होगी जिसके शिकार मजदूर मेहनतकश जनसमुदाय होंगे। वे विभिन्न धर्मों और अन्य पहचानों में बंटे होने के बावजूद उनकी मूल पहचान वर्गीय ही रहेगी। यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि जब हम साम्प्रदायिकता की बात कर रहे हैं तो हम अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता को भी खतरा मानते है। वस्तुतः अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता और बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता एक-दूसरे की पूरक है और एक-दूसरे की मदद करती है। हम मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के भीतर मौजूद साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष को व्यापक साम्प्रदायिकता विरोधी संघर्ष का एक अभिन्न अंग समझते हैं। बहुसंख्यक की साम्प्रदायिकता का जिक्र इसलिए आना स्वाभाविक है कि यह राष्ट्रवाद का उग्र व आक्रामक नारा लाकर अपने को पेश करती है और जिसमें फासीवाद में पनपने का पूरा आधार मौजूद है। अन्त में, भगत सिंह ने साम्प्रदायिक दंगे और उनके इलाज नामक लेख में अखबार वालों के लिए जो आदर्श प्रस्तुत किये थे, उसी के आधार पर यदि मीडियाकर्मी अपने को मजदूर व मेहनतकश अवाम के वर्ग-संघर्ष में उसका हिस्सा बन सकें तो साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष को आगे बढ़ाया जा सकता है तथा पूंजीवाद को उसकी कब्र में पहुंचाया जा सकता है। यदि हम इस काम को आगे बढ़ाने में योगदान करने में समर्थ हुए और इसमें योगदान दे सके तो यही भगतसिंह और गणेश शंकर विद्यार्थी को सही अर्थों में श्रद्धांजलि होगी।
जनांदोलन और मीडिया की भूमिका - सेमिनार पत्र -अप्रैल 2012, बरेली (यू.पी.) 13 अपै्रल का हमारे देश में पारंपरिक व राजनीतिक दोनों लिहाज से महत्व है। आज के दिन बैसाखी, पोंगल, ओणम इत्यादि विभिन्न नामों से देश भर में त्यौहार मनाया जाता है। कृषि परिवेश से निकली इस परंपरा का आधार फसल के पक जाने से चहुं ओर फैली खुशी में है। देहातों में रबी की फसल काटकर घर लाने का यह मौसम होता है। मेहनत के फल बटोरने की खुशी को परंपरा ने त्योैहार का रूप दे डाला। लेकिन यह अवसर हर किसी को बराबर खुशी नहीं देता। वर्ग विभाजन हमारे समाज की ऐतिहासिक सच्चाई है। एक तरफ मेहनतकश वर्ग है, दूसरी ओर मिल्की वर्ग है, जो पहले वर्ग की मेहनत की लूट पर पलता है। ठीक जिस समय मेहनतकशों की मेहनत के फल पकते हैं, उसी समय वह लूट लिये जाते हैं। खुशी गम में और त्योैहार मातम में बदल जाता है। संयोग ही सही लेकिन 13 अप्रैल की तारीख 1919 के जलियांवाला बाग कांड और 1978 के पंतनगर गोलीकांड के लिए भी जानी जाती है। पहली घटना में, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों ने रौलेट एक्ट के विरोध में शांतिपूर्ण सभा कर रहे सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया। कई महीनों तक पूरे पंजाब में मार्शल लाॅ लगा रहा। तब देश गुलाम था। आजादी के लिए पूरे देश में व्यापक जनांदोलन चल रहे थे। तब कहा जा सकता था कि इस हत्याकाण्ड का जिम्मेदार पश्चिम का कोई गोरी चमड़ी वाला डायर नाम का आततायी है और कि, 13 अप्रैल, 1919 से मुुक्ति स्वतंत्रता के बाद ही मिल सकेगी। 15 अगस्त,1947 को आजादी मिल गयी। सवाल है कि 1978 को 13 अपै्रल फिर क्यों दोहराया गया? यह घटना न केवल आजाद भारत में दोहरायी गई बल्कि इंदिरा गांधी के तानाशाहीपूर्ण आपातकाल के बाद आई जनता पार्टी की सरकार में हुई। आजादी और उसके बाद की ‘दूसरी आजादी’ से भी मेहनतकशों के दमन में कोई कमी नहीं आई। पश्चिम-पूरब और गोरे-काले की सारी बात बेमानी निकली। उपरोक्त दोनों घटनाक्रम महज प्रसंगवश हैं। ऐसे सैकड़ों घटनाक्रम आजादी से पहले व बाद में रचे जा चुके हैं। आज 13 अप्रैल को इस सेमिनार में मेहनतकश वर्गों के प्रतिनिधि, छात्र-नौजवान, महिलायें, जनांदोलन से जुड़े लोग, टेªड यूनियनकर्मी, मीडियाकर्मी, शिक्षक, साहित्यकार आदि मौजूद हैं। हम सभी के सामने कई ज्वलंत सवाल पेश हैं। क्या आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम कह सकते हैं कि मेहनतकश वर्गों-तबकों के जीवन में कोई मूलभूत बदलाव आ सका? क्या मेहनतकश जनता की लूट-खसोट मौजूदा समय में किसी और मौके की तुलना में कहीं ज्यादा नहीं है? क्या दमनकारी कानून व पुलिस-फौज के द्वारा जारी कत्लेआम पहले की ही तरह बदस्तूर जारी नहीं है? क्या इस शोषण-उत्पीड़न-दमन से मुक्ति के लिए क्रांतिकारी जनांदोलन एक फौरी जरूरत नहीं बन गयी है। मौजूदा मीडिया का जनांदोलनों के प्रति नकारात्मक रुख क्यों है? क्या मीडिया का चरित्र वर्गोपरी है? क्या समाज में मीडिया कोई स्वतंत्र हस्तक्षेपकारी भूमिका निभाता है? मौजूदा समय के मीडिया में नैतिक मूल्यों व स्वतंत्र लेखन की दुहाई कितनी कारगर है? क्या यह कोई ऐसा उपकरण है जिसका स्वतंत्र ढंग से जनांदोलनों में इस्तेमाल संभव है? क्या क्रांतिकारी जनांदोलनों के उभार में इस मीडिया से कोई उम्मीद बनती है? क्रांतिकारी जनांदोलनों की सेवा करने वाला वैकल्पिक मीडिया कैसा होना चाहिए? इस मीडिया को सशक्त बनाने के लिए आज हमें क्या कुछ करने की जरूरत है? जनांदोलन से तात्पर्य- जनता और जनांदोलन को दौर के सापेक्ष ही परिभाषित किया जा सकता है। हर दौर में शासकों के अतिरिक्त जन समुदाय जनता कहलाता है। सामंतवाद में राजाओं, सामंतों व उनके धार्मिक अवलंबों के इतर काश्तकार-दस्तकार लोग जनता थे। औपनिवेशिक काल में औपनिवेशिक शासकों, उनके देशी आधार (उनके मालों की बिक्री से जुड़े बडे़ पूंजीपतियों व राजा-रजवाड़ों) के अलावा समस्त आबादी जनता थी। इनमंे देशी पूंजीपति व धनी किसान भी शामिल थे। मौजूदा समय में साम्राज्यवादी पूंजीपति, देशी पूंजीपति, फार्मर, धनी किसान आदि सभी शासक वर्ग हैं। इसलिए इनसे इतर मजदूर, गरीब किसान व देहातों-शहरों में रहने वाले मध्यमवर्गीय लोग ही जनता बनते हैं। इसी तरह उत्पीडि़त समुदायों के सदस्यों को एक खास संदर्भ में इसमें रखा जा सकता है। आदिवासी, दलित, स्त्रियां, उत्पीडि़त राष्ट्रीयता भारत के शोषित वर्ग मजदूर के नेतृत्व में ही अपने अपमान, उत्पीड़न, दमन से मुक्ति की ओर बढ़ सकते हैं। आज के दौर में जनांदोलनों से हमारा आशय कमोबेश इनके आंदोलन से है। गौरतलब है कि जनांदोलन प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी दोनों किस्म के हो सकते हैं। ऐसे जनांदोलन जो दीर्घकालिक तौर पर मेहनतकश वर्गों के हितों में हों, प्रगतिशील हैं। लेकिन ऐसे जनांदोलन जो मेहनतकश वर्गों की एकता को खंडित करते हों, उनकी पहलकदमी रोकने व आगे बढ़ने में बाधक हों, अंततः शासक वर्गों की सेवा करते होें, प्रतिक्रियावादी हैं। फासीवादी आंदोलन जनांदोलन होने के बावजूद इसी श्रेणी में आते हैं। 90 के दशक का रामजन्मभूमि आंदोलन इसी तरह का था। हाल का अन्ना आंदोलन फासीवादी मंसूबों के साथ शासक वर्ग की सेवा करने के कारण प्रतिक्रियावादी है। जनांदोलनों के संबंध में प्रगतिशील व प्रतिक्रियावादी का यह भेद करना अतिआवश्यक है। इसी आधार पर हम विभिन्न जनांदोलन के संबंध में राष्ट्रीय मीडिया की अलग-अलग भूमिकाओं को भी समझ सकेंगे। मीडिया का वर्ग चरित्र- जनांदोलनों के संबंध में मीडिया की भूमिका को समझने के लिए जरूरी है कि हम उसके वर्ग चरित्र को समझंे। मीडिया के बारे में अक्सर ही कुछ गलत धारणाएं बना ली जाती हैं। उसकी भूमिका व चरित्र को लेकर मिथक गड़े जाते हैं। उसे स्वतंत्र, निष्पक्ष, ईमानदार, नैतिक वर्गों से ऊपर मान लिया जाता है। क्या वास्तव में स्थिति ऐसी है? हम ऐसा नहीं मानते। ठोस तथ्य भी इस बात की गवाही नहीं देते। जिस तरह स्वतंत्रता, ईमानदारी व नैतिकता स्वयं वर्ग सापेक्ष है, उसी प्रकार मीडिया भी वर्ग सापेक्ष है। मीडिया में निष्पक्षता व वर्गोपरि वजूद का कोई वास्तविक अर्थ नहीं है। यह महज भ्रम फैलाने की कवायद है। यह भ्रम शोषित-उत्पीडि़त वर्गों के बीच शोषकों के मीडिया को स्वीकार्यता दिलाने के लिए फैलाया जाता है। जिस प्रकार शासक वर्ग अपनी पुलिस, फौज, कानून के माध्यम से अपनी व्यवस्था को टिकाये रखते हंै। उसी प्रकार अपनी संस्कृति, शिक्षा, विचार आदि से भी वे यह काम करते हैं। शासक वर्गीय मीडिया भी इस हेतु उनका एक उपकरण है। शासक वर्गीय मीडिया आम जन की बुद्धि के व्यवस्थापक का काम करता है। वह उसका प्रचार यंत्र है। वह शासकों की व्यवस्था के हित में मेहनतकश जनता के विचारों को ढालने का काम करता है, इसके द्वारा प्रतिरोध किये जाने की संभावनाओं को न्यूनतम करने का प्रयास करता है। साथ ही प्रतिरोध खडे़ हो जाने की स्थिति में उसके खिलाफ दुष्प्रचार कर व्यवस्था की रक्षा करता है। क्या हम रोजमर्रा के जीवन में ढेरों उदाहरणों के माध्यम से इस बात को नहीं देखते हैं? हाल ही में कुडानकुलम परमाणु संयंत्र परियोजना के खिलाफ चल रहे जनांदोलन को अमरीकी आर्थिक सहायता के नाम पर बदनाम किया गया। लेकिन ठीक इसी समय इस संयंत्र के विदेशी सहायता (रूस) से लगाये जाने की बात नहीं उठायी गयी। अमरीका के साथ भारत सरकार द्वारा किये गये परमाणु करार के तहत अमरीका को हासिल भारत के परमाणु कार्यक्रमों की निगरानी के अधिकार को बहस का मुद्दा नहीं बनाया गया। जरा सोचिए इस प्रकार तथाकथित निष्पक्ष मीडिया किसका हित साध रहा हैं? संभवतः आपको जवाब स्वतः ही मिल जायेगा। क्या मीडिया ऐसा उपकरण है जिसका हर कोई हर समय अपने हित में इस्तेमाल कर सकता है? आंदोलन के दौरान हमारे बीच के कई साथी अक्सर ही कहते हैं कि मीडिया को अपने साथ लेना जरूरी है अथवा बिना मीडिया को साथ लिये आंदोलन खड़ा नहीं किया जा सकता। अक्सर ही यह मांग बिना मीडिया के वर्ग चरित्र को जाने समझे की जाती है। एकाध बार मीडिया में मेहनतकशों के आंदोलनों को कवरेज मिल जाना और मीडिया को आंदोलन के पक्ष में खड़ा कर लेना, दोनों नितांत भिन्न बातें हैं। यह आंदोलन और मीडिया दोनों के वर्ग हितों पर निर्भर करता हैं जहां दोनों के वर्ग हितों का मेल होगा, वहां ऐसा स्वतः संभव हो जायेगा। लेकिन इसकी विपरीत स्थिति में उल्टा नतीजा निकलेगा। प्रगतिशील जनांदोलनों के विकास में मीडिया की भूमिका को बनाने के लिए हमें सर्वप्रथम उपरोक्त भ्रमों से मुक्ति पाना जरूरी है। जनांदोलनों व मीडिया के पारस्परिक संबंध की गहराई में उतरने के लिए अपने देश के इतिहास की एक झलक ले लेना हमारे लिए इस मौके पर लाभप्रद रहेगा। औपनिवेशिक काल में मीडिया- भारत में पत्र-पत्रिकाओं की शुरूआत औपनिवेशिक काल में ही हो गयी थी। जिस प्रकार ब्रिटिश शासकों ने कुछ सम्पन्न भारतीयों को अंग्रेजियत के रंग में रंगने के लिए औपनिवेशिक शिक्षा की नींव डाली। उसी प्रकार 18 वीं शताब्दी के अंत में बंगाल प्रांत में अंग्रेजों द्वारा कुछ पत्र-पत्रिकायें निकालना शुरू किया गया। यह सामान्य मनोरंजन व कुछ जानकारियां देने भर के लिए थीं। इनमें से कुछ ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित की जाती थी। यह सभी अंग्रेजी में थी और इनका प्रसार सीमित था। 19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में राजा राममोहन राय व दूसरे समाज सुधारकों द्वारा बंगाली व हिन्दी में कुछ पत्र-पत्रिकायें शुरू की गयीं। अंग्रेज शासकों को इन पत्र-पत्रिकाओं का समाज सुधारक वाला स्वर भी गवारा नहीं था वे इन्हें भी नापसंद करते थे। इस संम्बध में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेन्सी के गवर्नर टाॅमस मुनरो का कथन काबिलेगौर है- ‘प्रेस को आजादी देना हमारे लिए खतरनाक है। विदेशी शासन और समाचार पत्रों की स्वतंत्रता दोनों एक साथ नहीं चल सकते। स्वतंत्र प्रेस का पहला कर्तव्य क्या होगा? यही न कि देश को विदेशी चंगुल से स्वतंत्र कराया जाए?’ (मुनरो ने अपने औपनिवेशिक वर्गीय हितों के अनुरूप कितनी स्पष्टता से और कितने मार्के की बात कही है। यदि उसकी बात को आज की परिस्थितियों व आज के पूंजीपति-मजदूर वर्ग के संबंधों के हिसाब से अनूदित किया जाए तो क्या आज भी ‘मीडिया की स्वतंत्रता’ पर यह बात सच नहीं बैठेगी)। 1857 के गदर से पहले कुछ एक अल्पजीवी राष्ट्रवादी पत्र-पत्रिकायें ही अस्तित्व में आई। इसकी मुख्य वजह संचार साधनों व आवश्यक पूंजी का अभाव था। गदर के बाद हिंदी, उर्दू व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में पत्रकारिता में थोड़ी तेजी आई। किन्तु लंबे समय तक इनकी प्रसार संख्या सीमित ही रही। लेकिन इनमें राष्ट्रवादी रुझान अधिकाधिक मुखर होता गया। फलस्वरूप ब्रिटिश शासक अनेकानेक तरीकों से इन्हें रोकने का प्रयास करते रहे। राष्ट्रमुक्ति आंदोलन के उत्तरोत्तर विकास के अनुरूप राष्ट्रवादी रुझान वाले वैकल्पिक मीडिया की मांग भी तेज होती गयी। 19 वीं सदी के आखिर में हिन्दी दैनिक ‘हिन्दोस्थान’ व ‘भारतोदय’ निकलने शुरू हुए। अंग्रेजी में मद्रास से ‘हिन्दू’ व मराठी में ‘केसरी’ जैसे अखबार निकलने शुरू हो चुके थे। बाद के काल मे ऐसे और भी बहुत से अखबार निकलने शुरू हुए। राष्ट्रीय आंदोलन के मजबूत व व्यापक होने के साथ-साथ इन अखबारों का प्रकाशन भी कई स्थानों से होने लगा और इनकी प्रसार संख्या भी काफी बढ़ गयी। कांगे्रस पार्टी ने भी ‘यंग इंडिया’, ‘नव जीवन’, ‘हरिजन’, ‘नेशनल हेराल्ड’ आदि अखबार निकाले। राष्ट्रीय आंदोलन के अंदर कांग्रेस के बरक्स क्रांतिकारी धारा के पैदा होने के साथ ही क्रांतिकारी पत्र-पत्रिकाओं ने भी जन्म लिया। इनमें बंगाल से ‘युगांतर’ व कानपुर से ‘प्रताप’ प्रमुख हैं। विदेशों में गदर पार्टी ने ‘गदर’ व श्यामजी कृष्ण वर्मा ने ‘इंडियन सोशियोलाजिस्ट’ नाम से चर्चित राष्ट्रवादी क्रांतिकारी पत्र प्रकाशित किये। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के बाद क्रांतिकारी कम्युनिस्टों ने भी बहुत सी भाषाओं में अपनी पत्र-पत्रिकायें निकालीं। औपनिवेशिक काल में पनपा यह राष्ट्रवादी व क्रांतिकारी मीडिया जनांदोलन की देन था। अपनी बारी में इसने राष्ट्र मुक्ति आंदोलन व क्रांतिकारी आंदोलन को बढ़ाने, संगठित करने व वैचारिक आधार प्रदान करने का कार्य किया। इस प्रकार औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ भारतीय जनता ने अपने वर्ग हितों के लिए चलने वाले जनांदोलन के अनुरूप वैकल्पिक मीडिया खड़ा किया। आजादी के बाद मीडिया- 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासकों द्वारा सत्ता हस्तांतरण के उपरांत राष्ट्रीय सत्ता पर भारतीय पूंजीपति वर्ग का कब्जा हो गया। इस सत्ता का इस्तेमाल पूंजीपति वर्ग ने राष्ट्रीय जीवन के हर पहलू को अपने वर्गीय हितों के अनुरूप पुर्नसंगठित करने के लिए किया। आजादी के तुरंत बाद ही शासक पंूजीपति वर्ग ने तेलंगाना सरीखे जनांदोलनों को कुचलना शुरू कर दिया। साथ ही आजादी के पहले से चले आ रहे कश्मीर व पूर्वोत्तर के राष्ट्र मुक्ति आंदोलनों को भी अन्यायपूर्ण तरीके से दमन करते हुए इन इलाकों को अपने राज्य में समेटने की नीति पर चला। ब्रिटिश शासकों के विरुद्ध स्वतंत्र पत्रकारिता की दुहाई देने वाला पूंजीपति वर्ग का राष्ट्रवादी मीडिया अब शासक वर्गीय मीडिया बन गया। उपरोक्त कार्यवाहियों में उसने पूंजीवादी सरकार का पक्ष पोषण किया। आजादी के बाद आॅल इंडिया रेडियो के रूप में पूंजीवादी सरकार के हाथ में मीडिया का एक और सशक्त उपकरण आ चुका था। इन सबने मिलकर सरकार की नीतियों के प्रचार तंत्र की भूमिका अख्तियार कर ली। अब यह सरकार व पूंजीपति वर्ग के विरुद्ध खड़े होने वाले जनांदोलन को दबाने का उपकरण बन गया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रगतिशील राष्ट्रवाद आजादी के बाद अपनी प्रगतिशीलता को तजते हुए अंधराष्ट्रवाद में तब्दील होता गया। यही हस्र पूंजीपति वर्ग के नियंत्रण वाले मीडिया का भी हुआ। 1959 में शुरू हुए सरकारी नियंत्रण वाले दूरदर्शन के आ जाने के साथ पूंजीवादी सरकार का यह प्रचार तंत्र और मजबूत हो गया। आजादी के बाद के कुछ वर्षों में चले जनांदोलनों व टेªड यूनियनों के आंदोलनों को कम्युनिस्टों ने नेतृत्व दिया। इस अनुरूप पंूजीवादी सरकार की नीतियांे की खुली मुखालफत भी कम्युनिस्टों द्वारा संचालित पत्र-पत्रिकायें ही कर रही थीं। किंतु कालांतर में इनके संशोधनवाद के गड्ढे़ में जा गिरने व क्रांतिकारी कम्युनिस्टों की टूट-बिखराव ने जनसंघर्षों व पंूजीवाद विरोधी मीडिया को खासी कमजोर स्थिति में पहुंचा दिया। इस दौरान चले नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन का एक तरफ सरकारी मशीनरी ने जबर्दस्त दमन किया तो दूसरी तरफ पंूजीपरस्त मीडिया ने इसे अराजकतावादी व हिंसक कहकर बदनाम करने का काम किया। 70 के दशक में जे.पी. आंदोलन के रूप में इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ व्यापक जनांदोलन छिड़ा। इस आंदोलन की अस्पष्ट दिशा, पूंजीवादी सीमाओं व पंचमेल खिचड़ी नेतृत्व के कारण यह जनता पार्टी की नेतृत्व वाली सरकार व उसके हस्र के रूप में अपनी परिणति को पहुंच गया। नक्सलबाड़ी आंदोलन व जे.पी. आंदोलन अपनी अलग-अलग कमजोरियों के चलते कोई व्यापक वैकल्पिक मीडिया नहीं खड़ा कर सके। इस कमी का इस आंदोलन के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में मेहनतकश वर्गांें के जनांदोलन तुलनात्मक तौर पर ढलान पर रहे। इसी का एक नतीजा प्रकारांतर से समाज में नकारात्मक प्रवृत्तियों के मजबूती ग्रहण करने के रूप में सामने आया। पंजाब में खालिस्तानी फासिस्टों का उभार आया। महाराष्ट्र में साम्प्रदायिक फासिस्ट शिव सेना ने तो हिन्दी क्षेत्र में संघ मंडली ने अपने पैर पसारे। इन प्रतिक्रियावादी ताकतों को पंूजीवादी मीडिया ने पूरा प्रश्रय दिया। रामजन्मभूमि आंदोलन व आडवाणी की रथ यात्रायें बिना मीडिया के सहयोग के व्यापक समर्थन नहीं जुटा सकती थीं। इस फासीवादी जनांदोलन को मीडिया का सहयोग मिलना लाजिमी था। दीर्घकालिक तौर पर यह प्रतिक्रियावादी जनांदोलन पूंजीवाद की सेवा करता है। इसने साम्प्रदायिक आघार पर मेहनतकश वर्गों की एकता को खंडित किया। मेहनतकश वर्गों को उनके बुनियादी हितों के संघर्षों से दिग्भ्रमित किया। इस प्रकार नई आर्थिक नीतियों के रूप में हो रहे पूंजीवादी हमले से मेहनतकश वर्गों के ध्यान को भटकाया। आजादी के बाद के दशकों में दमन व प्रलोभन दोनों तरह से भारतीय पूंजीपति वर्ग ने राष्ट्र मुक्ति आंदोलनों के पुराने नेतृत्व को अपने अंदर समायोजित करने में कामयाबी हासिल की। इसके बावजूद कश्मीर व पूर्वोत्तर के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्र मुक्ति आंदोलन जारी रहे। इन आंदोलनों की राष्ट्रीय मीडिया में हमेशा नकारात्मक तस्वीर उभारी गयी। अलगाववाद -आंतकवाद के नाम पर राष्ट्रीय मीडिया ने शेष भारत में इन आंदोलनों को अलगाव में डालने का काम किया। इस हेतू उसने जमकर अंधराष्ट्रवादी विचारों का प्रचार किया। पूंजीवादी सरकार व उसके मीडिया तंत्र ने इन उत्पीडि़त समुदायों की हकीकत सामने आने में हमेशा बाधा खड़ी की। कुल मिलकार उपरोक्त पृष्ठभूमि में हमने 21 वीं सदी में प्रवेश किया है। अब नई परिस्थितियों में जनांदोलनों व उसके अनुरूप मीडिया को खड़ा करने की चुनौतियां हमारे सामने हैं। मौजूदा दौर- आजादी के बाद से अब तक गुजरे दौर में बहुत कुछ बदल चुका है। मजदूर वर्ग के आंदोलन के लिहाज से इस दौरान काफी नुकसान उठाना पड़ा है। उस समय का समाजवादी देशों का ब्लाक कई दशक पूर्व समाप्त हो चुका है। साम्राज्यवाद एक बार पुनः आक्रमक मुद्रा में है। खासकर अमरीकी साम्राज्यवाद सोवियत साम्राज्यवादियों की पराजय के बाद से नई रणनीतिक किलेबंदियां कर रहा है। वह अपने नेतृत्व में साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की परियोजना में मशगूल है। इसके तहत वह अपनी एकाधिकारी निगमों के हितों में विभिन्न देशों के पूंजीवादी शासकों के साथ रणनीतिक साझेदारियों के साथ-साथ सीधे सैनिक हमलों तक से गुरेज नहीं कर रहा हेै। हालांकि उसकी राह इतनी सुगम नहीं है लेकिन अपनी बेचैनी में वह मानवता को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। अपने देश में भी उसने मेहनतकशों का जीना अधिकाधिक दूभर किया है। भारत के पूंजीवादी शासकों ने भी अपनी गुट निरपेक्ष नीति को त्यागकर साम्राज्यवादियों से रणनीतिक साझेदारियां कायम की हैं। खासकर अमरीकी साम्राज्यवादियों से इसकी नजदीकियां भारतीय जनता के लिए घातक परिणाम ला रही है। अपने हितों में भारतीय पूंजीपति वर्ग विदेशी निवेश के नाम पर भारत के संसाधनों व मेहनतकशों की लूट में साम्राज्यवादी निगमों को खुलेआम शाामिल कर रहा है। उड़ीसा में पोस्को, जैतापुर में अरेवा, कोडानकुलम में रूसी निवेशकों व गुडगांव में जापानी होंडा के हितों में पिछले दिनों उसने भारतीय मेहनतकशों का खून बहाने में कोई गुरेज नहीं किया। स्वयं भारत के पूंजीपति अपने मुनाफे की बढ़ती के लिए निजीकरण-उदारीकरण के रथ पर सवार हैं। शिक्षा-चिकित्सा जैसी बुनियादी जरूरतों के मामलों में सरकर ने अपना पल्ला झाड़कर आम जनता को मुनाफाखोरों की हवस के हवाले कर दिया है। राष्ट्रमुक्ति आंदोलन व उसके बाद के आंदोलन की तपिश में जो कुछ मेहनतकशों को हासिल हुआ था, वह सब एक-एक कर छीना जा रहा है। सेज के नाम पर बड़ी-बड़ी श्रमिक जेलें बनाई जा रही हैं। उद्योगों व सेवा क्षेत्र में श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जनता को आये दिन कानून का पाठ पढ़ाने वाली सरकार पूंजीपतियांे से कानूनों का पालन करवाने के प्रति पूरी तरह लापरवाह बनी हुई है। आखिर पूंजीवादी सरकार से इससे इतर उम्मीद भी क्या की जाए। उदारीकरण की इस मौज में पूंजीपति वर्ग द्वारा किया जा रहा भ्रष्टाचार भी अपने चरम पर है। मंत्रियों-अधिकारियों द्वारा किया जा रहा भ्रष्टाचार इसका हिस्सा है। मेहनत की लूट के साथ ही पूंजीपति छोटी संपत्ति का हरण भी तेजी से कर रहा है। छोटे-मध्यम किसानों की जमीनों को औने-पौने दामों में खरीदने से लेकर सीधे पुलिसिया दमन के जरिए हड़पा जा रहा है। आदिवासियों को उनके मूल स्थानों से बेरहमी से खदेड़ा जा रहा है। खुदरा व्यापार में लगी छोटी पूंजी को भी बड़ी-बड़ी रिटेल श्रृंखलाओं के माध्यम से बेदखल करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अब इस क्षेत्र में साम्राज्यवादी निगमांे के लिए भी लाल गलीचे बिछाये जा रहे हैं। पूंजीपति वर्ग के इन हमलों का प्रतिकार भी जनता जमकर कर रही है। देश के विभिन्न हिस्सों में पिछले वर्षों में कई बड़े-बडे़ आंदोलन फूटे हैं। पूंजीवादी शासकों के तमाम दमन के बावजूद यह जनसंघर्ष जारी है। पिछले वर्षों में कश्मीर व मणिपुर में एक के बाद एक जनांदोलनों की लहरें उठती रही हैं। इनका भी सरकार ने बर्बरता से दमन करने का प्रयास किया है। कुल मिलाकर मौजूदा समय में साम्राज्यवादी व देशी पूंजीवादी शासक काफी आक्रामक हुए हैं। उनकी इस आक्रमकता के पीछे उनकी आक्रामक आर्थिक मंशाएं हैं। मेहनतकश अवाम भी दुनिया भर में व हमारे देश में नये सिरे से संगठित हो रही है। हालांकि अपनी संगठनबद्धता की प्रक्रिया में उसे कई मंजिलों से गुजरना है। मौजूदा दौर का मीडिया- आज दुनिया पहले के किसी भी समय की तुलना में बहुत करीब आ चुकी है। संचार माध्यमों का बहुत विकास हो चुका है। सूचनाओं का आदान-प्रदान बहुत तेजी से होना संभव हो सका है। आज हम पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो से आगे बढ़कर लाइव कवरेज व इंटरनेट के युग में पहुंच गये हैं। लेकिन इस सब का मतलब यह नहीं कि सूचनाएं पाना आम आदमी के लिए बहुत सहज हो गया है। कुछ संसाधनों की बढ़ोत्तरी के बावजूद पूंजीवादी शासकों ने मीडिया के सभी संसाधनों पर अपनी जकड़बंदी बहुत सूक्ष्मता से कायम की हुई है। उदारीकरण के मौजूदा दौर में मीडिया का जबर्दस्त कारपोरेटीकरण हुआ है। इसने पूर्व की तथाकथित संपादकीय स्वतंत्रता के लिए अब नाम भर के लिए भी जगह नहीं छोड़ी है। संपादकों के स्थान पर सीधे मालिकान काबिज हो गये हैं। जहां प्रत्यक्ष तौर पर ऐसा नहीं है, वहां भी संपादक मंडल पर प्रबंधक तंत्र हावी है। खबरों का स्थान विज्ञापनों ने ले लिया है। पेड न्यूज मीडिया के लिए सामान्य नैतिकता बन गयी है। आक्रामक बाजार नीति समस्त मीडिया समूहों का मूलमंत्र है जो ज्यादा मुनाफा कमाये वही सफल मीडिया है। बाजार व मुनाफे का प्रसार करने वाले संपादक ही सफल संपादक हैं। प्रिंट व इलेक्ट्राॅनिक हर प्रकार के मीडिया के लिए उसका प्रसार नहीं बल्कि विज्ञापन मुख्य लक्ष्य है। वितरण प्रसार या टीआरपी वृद्धि तो केवल विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने का जरियाभर है। स्वाभाविक है कि मीडिया मालिकों को यह विज्ञापन अन्य पूंजीपतियों से ही मिलेंगे। ऐसे में पूंजीपतियों के खिलाफ किसी जनांदोलन को ऐसे मीडिया में जगह मिलने का सवाल ही नहीं उठता। उल्टा पूंजीपतियों के बचाव में यह मीडिया पूरी तरह से मुस्तैद है। उदाहरणस्वरूप 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में नीरा राडिया के टेप दो महीने तक मीडिया में अंदरखाने चर्चा का विषय रहे। लेकिन किसी ने उन्हें जनता के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया। जब मामला ज्यादा गरमाने लगा, तभी वह सामने आये उसमें भी रतन टाटा या अम्बानी को किसी ने कठघरे में खड़ा नहीं किया। सरकारी मीडिया तो लगभग खामोश ही रहा। आखिर कहां गया वह ‘निष्पक्ष’ व ‘ईमानदार’ मीडिया? मीडिया के इतने प्रकार के बीच खबरांे का चयन व अंतर्वस्तु पूंजीवादी हितों के अनुरूप बहुत बारीकी से निर्धारित की जाती है। लगभग सभी मीडिया साधनों ने ‘नकारात्मक’ सामग्री को प्रमुखता न देने की नीति बना रखी है। नकारात्मक से उनका अभिप्राय ऐसी खबरों से है, जो बाजार व पंूजीपति वर्ग के अनुकूल न हो। इसी का नतीजा है कि वैश्विक आर्थिक मंदी के भारतीय बाजार पर गंभीर प्रभावों के बावजूद न्यूज चैनल या दैनिक अखबार से रूबरू होने पर शायद ही आपको इसकी झलक मिल पाये। मीडिया ने एक खुशफहमी बना रखी है कि भारतीय बाजार पर मंदी का कोई विशेष प्रभाव नहीं है। पूंजीपतियों के विरुद्ध चलने वाले बड़े-बड़े आंदोलनों तक को कोई कवरेज नहीं मिलता। नंदीग्राम, सिंगूर, जैतापुर, कुडानकुलम, मारुती में कई-कई महीनों तक आंदोलन चले लेकिन इन्हें नाममात्र की कवरेज मिली। वह भी या तो व्यापक राजकीय दमन के बाद या आंदोलन को बदनाम करने के लिहाज से। इसके बरक्स अन्ना के आंदोलन के लिए मीडिया ने प्रचार व संगठनकर्ता की भूमिका पूरी तत्परता से निभाई। एक अन्ना भूख हड़ताल पर बैठता है तो मीडिया आसमान सिर पर उठा लेता है, लेकिन उसी समय कुडानकुलम में सैकड़ों लोग कई दिन तक भूख हडताल पर बैठे रहते हैं, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसकी वजह जनांदोलन के वर्गीय चरित्र व उसकी मांगों में है। एक पूंजीवाद के दीर्घकालिक हितों को साधता है, दूसरा उसकी मंशाओं को नुकसान पहुंचाता है। आज राष्ट्रीय मीडिया के सामने औपनिवेशिक मुक्ति जैसा कोई लक्ष्य नहीं है। इसीलिए उसने अपने-अपने पहले के घोषित आदर्शों व नैतिकता को पूरी तरह से तिलांजली दे दी है। यहां तक कि उसने अपना बौद्धिक चोगा उतारकर बहुरंगी लबादा ओढ़ लिया है। न्यूज चैनलों पर खबरों से कहीं ज्यादा स्थान धार्मिक प्रवचनों, फूहड़ कार्यक्रमों, सिनेमा, क्रिकेट आदि को दिया जाता है। कई महत्वपूर्ण खबरें इस दौरान ज्यादा से ज्यादा स्क्रीन के नीचे से होकर निकल जाती हंै। अधिकांश तो वहां भी जगह नहीं पातीं। आम आदमी को खबरों से काटकर रखने का सबसे मुफीद तरीका खबरांे का स्थानीयकरण करके किया गया है। वैश्विक खबरें हर जगह गायब हैं। जो मिलती हैं, वह भी ‘20 मिनट में सौ खबरें’, ‘अराउंड दि वल्र्ड’ का छोटा सा कोना अधनंगी तस्वीरों के साथ अथवा हिंदी दैनिकों में आखिरी पन्ने पर बेतुके शोध अध्ययनों व विज्ञापनों के साथ कहीं अनमने ढंग से प्रस्तुत की जाती हैं। तथाकथित राष्ट्रीय अखबार मुख्य पृष्ठ समेत भीतरी पृष्ठों में एक-दो खबरों को छोड़कर दो-तीन राज्यों तक सीमित रहते है। क्षेत्रीय अखबार तो दो-तीन जिलों तक सिमट गये हैं। ऐसी स्थिति में इस मीडिया से जाहिर तौर पर संकीर्ण दृष्टिकोण ही बन सकता है। व्यापक जनांदोलनों के विकास में यह संकीर्ण दृष्टिकोण भारी बाधा है। इंटरनेट के बारे में लोगों को भारी मुगालता है कि वह एक स्वतंत्र मंच है। इंटरनेट का पूरा साधन भारी कारपोरेट निगमों व सरकारों के नियंत्रण में है। वे उसमें मौजूद अंर्तवस्तु की लगातार फिल्टरिंग करते रहते हैं। अगर आज इसमें थोड़ी बहुत गुंजाइश है तो उसे भी ये मालिकान कभी-भी छीन सकते हैं। भारी विरोध के बावजूद अमरीकी, यूरोप व भारत में इंटरनेट की अंर्तवस्तु को और सार्थक नियंत्रित करने के लिए कई कानून लाये जा रहे हैं। भारत में सरकारी मीडिया लंबे समय से भारतीय पूंजीपतियों व साम्राज्यवादी सहयोगियों की सेवा करता रहा है। आज भी वह इसे बखूबी अंजाम दे रहा है। पिछले दो दशकों में साम्राज्यवादियों ने सीधे भी अपने मीडिया प्रचार तंत्र की घुसपैठ देश में बनाई है। जाहिर है भारतीय शासकों की ही मदद से। इसी दौरान भारतीय एकाधिकारी समूह ने पिं्रंट मीडिया के साथ ही इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में भी जबर्दस्त पैठ बना ली है। वह उसे और बड़े पैमाने पर हासिल करने को प्रयासरत है। मुकेश अंबानी द्वारा नेटवर्क-18 में 2100 करोड़ का निवेश इसकी एक बानगी है। यह सौदा अभी प्रक्रिया में है और सीएनएन-आईबीएन में नीता अंबानी का एक घंटे का प्रचार कार्यक्रम प्रसारित भी हो चुका है। सवाल यह है कि क्या इतने ज्यादा सरकारी नियंत्रण व कारपोरेटीकृत मीडिया की मेहनतकशों के जनांदोलनों के विकास में किसी संभावना को तलाशा जा सकता है? हमारा जवाब नहीं में है। ऐसी कोई भूमिका वैकल्पिक मीडिया ही निभा सकता है। वैकल्पिक मीडिया हेतु एकजुट हों- हमने अपने इतिहास से इस बात को जाना है कि हर जनांदोलन अपने वर्ग हितों के अनुरूप अपना स्वयं का मीडिया निर्मित करता है। शासक वर्गों का पक्ष पोक्षण करने वाला मीडिया इस जनांदोलन के हमेशा खिलाफ रहेगा। मेहनतकशों के आगामी आंदोलन भी इस बात के अपवाद नहीं हो सकते। रूस व चीन की समाजवादी क्रांतियों के दौरान भी क्रांतिकारियों ने भीषण संघर्ष व कुर्बानियांे से ऐसे मीडिया को खड़ा किया। क्रांतिकारी मीडिया क्रांतिकारी जनांदोलन का प्रचारक, उद्वेलनकर्ता व संगठनकर्ता होगा। एक सही वैचारिक दिशा देकर ही वह इस भूमिका का निर्वाह कर सकता है। ‘नागरिक’ का मानना है कि पूंजीपति व मजदूर वर्ग के बीच के इस संघर्ष में मजदूर वर्ग की वैचारिक दिशा समाजवाद ही हो सकती है। सभी क्रांतिकारी वर्गांे-तबकों के संघर्षों को समाजवादी संघर्ष से जोड़े बिना जनांदोलनों का न तो अग्रिम विकास संभव है और न ही वे अपने अभीष्ट को मुकम्मिल ढंग से हासिल कर सकते हैं। यहां तक कि मेहनतकशों को छोटे-बडे़ सुधारों को भी हासिल करने के लिए क्रांतिकारी संघर्ष को तेज करने की जरूरत है। ऐसे संघर्ष का अनुषंगी कोई क्रांतिकारी मीडिया ही बन सकता है। हमारे देश में आज तमाम समूह व व्यक्ति छोटे-छोटे रूपों में ऐसे वैकल्पिक मीडिया को खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं।‘नागरिक’ भी इसका हिस्सा है। लेकिन इस बिखराव की अवस्था में हमारी ताकत का बहुत अपव्यय हो रहा है, जबकि हासिल तुलनात्मक तौर पर कम है। इस सभी बिखरी हुई ताकतों की एकजुटता क्रांतिकारी जनांदोलन की फौरी जरूरत है। निश्चित ही यह दुरूह कार्य है। लेकिन यह जरूरी है। संयुक्त होकर ही हम साम्राज्यवादी-पूंजीवादी प्रचार तंत्र का मुकाबला करने के लिए मजबूती से आगे बढ़ सकते हैं। हमें उसके द्वारा फैलाये जा रहे भ्रमों, पूंजीवाद की अजेयता के दावों, मेहनतकशों के आंदोलनों के दुष्प्रचार, साम्प्रदायिक-जातिवादी-नारी विरोधी सोच, साम्राज्यवादी मंसूबेबाजियों की काट करते हुए आगे बढ़ना होगा। निश्चित ही शासक वर्गों के साथ यह संघर्ष न केवल वैचारिक होगा बल्कि शासक ऐसे प्रयासों का क्रूरतापूर्वक दमन भी करेगा। आज भी कई जनपक्षधर पत्रकारों व अखबारों को यह दमन झेलना पड़ रहा है। अखबारों व उनके पाठकों की खुफिया विभाग द्वारा निगरानी, अखबारों पत्रिकाओं को प्रतिबंधित करना, पत्रकारों-संपादकों की गिरफ्तारी से लेकर हत्याओं तक को अंजाम दिया जा रहा है। वर्ग संघर्ष ऐसा ही घृणास्पद होता है। अब तक भी क्रांतिकारी जनांदोलन व इसका अनुषंगी मीडिया इसी के बीच से होकर विकसित हुआ है। मौजूदा सेमिनार की सफलता इसी में है कि हम इस चुनौती को समझते हुए स्वीकार करें और आगे बढ़े। सेमिनार में लिये गये प्रस्ताव पत्रकारों के दमन के विरुद्ध प्रस्ताव पिछले दो दशकों में पूरे विश्व में साम्राज्यवादी हमलों, लूट-खसोट, कत्लेआम तथा पूंजीवादी सत्ताओं के शोषण-दमन-उत्पीड़न के विरुद्ध मेहनतकश आमजनों के आन्दोलन मुखर हुए हैं। साथ ही जनता के संघर्षोंं को स्वर देने वाले जांबाज पत्रकार-सम्पादक/मीडियाकर्मी इस दमन-उत्पीड़न को आवाम के सामने लाते रहे हैं, और शोषण तंत्र के खिलाफ खतरा बनते रहे हैं। इससे डर कर साम्राज्यवादी पूंजीवादी सत्ताओं एवं प्रतिक्रियावादी माफिया तत्वों ने ऐसे जनपक्षधर पत्रकारों-सम्पादकों/मीडियाकर्मियों की हत्या, गिरफ्तारियों, अपहरण से लेकर उन्हें डराने-धमकाने के प्रपंच रचे हैं। हमारे देश में भी मजदूरों-किसानों तथा आम जनता के संघर्षों, साम्प्रदायिकता, फासीवाद, कश्मीर व पूर्वोत्तर के आन्दोलनों को स्वर देने वाले पत्रकारों-सम्पादकों/मीडियाकर्मियों के विरुद्ध भारत की केन्द्र सरकार तथा उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़, आन्ध्रप्रदेश, गुजरात इत्यादि राज्य सरकारों द्वारा तथा गुण्डा माफिया तत्वों द्वारा फर्जी एन्काउण्टर, गिरफ्तारियां, अपहरण, डराने-धमकाने तथा उनके परिवारों को उत्पीडि़त करने की कार्यवाहियां की गयी हैं। यह सेमिनार जनता के संघर्षों को स्वर देने वाले सम्पादकों-पत्रकारों तथा मीडियाकर्मियों के दमन-उत्पीड़न का घोर विरोध करता है तथा शहीद पत्रकारों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है तथा जेलों में बंद सीमा आजाद समेत सभी पत्रकारों की बिना शर्त रिहाई की मांग करता हैं। मीडिया पर प्रतिबंधों के खिलाफ प्रस्ताव भारत के संविधान में देश के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दर्ज है। देश के संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत जहां जनता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, वहीं संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत देश के शासक वर्ग को देश की सम्प्रभुता, अखण्डता, राज्य की सुरक्षा, न्यायालय की अवमानना, सार्वजनिक व्यवस्था व विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण सम्बंधों के नाम पर इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीनने का अधिकार प्राप्त है। इसी अधिकार का इस्तेमाल कर सरकारें मीडिया पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगा रही हैं। इसी क्रम में पूर्व के आई.टी. कानून में पिछले वर्ष सप्लीमेंट्री (प्ज् रूल्स 2011) जोड़ कर इंटरनेट, बेबसाइटों व ब्लाॅग पर प्रतिबंध लागने की तैयारी कर ली गयी है। इसके तहत सरकार के आदेश पर किसी भी साइट से मैटर को 36 घंटे के भीतर हटाना पड़ेगा। ‘कार्टून अगेंस्ट करप्शन’ नामक बेबसाइट को पिछले वर्ष दिसम्बर में अचानक बंद कर दिया गया। वेबस्पेस उपलब्ध कराने वाली कम्पनी बिग राक ने बंद की गयी साइट को बगैर पुलिस की अनुमति के प्रारम्भ करने से इंकार कर दिया। पिछले वर्ष कश्मीर सरकार ने वहां के 5 समाचारपत्रों को विज्ञापन देने पर यह कहकर रोक लगा दी कि उनकी सम्पादकीय लाइन देश को कमजोर करने वाली है। पश्चिम बंगाल व बिहार सरकार ने खर्चों में कटौती के नाम पर सरकार की नीतियों का विरोध करने वाली पत्र-पत्रिकाओं पर रोक लगा दी है। जब भी जनता के संघर्ष तेज होते हैं, सरकारें व पुलिस आंदोलनरत् क्षेत्र की नाकेबंदी कर मीडिया के वहां घुसने पर रोक लगाने में नहीं हिचकती। 21 मार्च 2011 को परमाणु संयत्रों का विरोध कर रही कुंडानकुलुम क्षेत्र की जनता के बीच पुलिस ने मीडिया के घुसने पर रोक लगा दी। उ.प्र. के भट्टा पारसौल में आंदोलनरत् किसानों के बर्बर दमन के बाद वहां पर भी मीडिया को नहीं घुसने दिया गया। कश्मीर व पूर्वोत्तर के आंदोलनों की खबरों को भी सरकारें लगातार संेंसर करने का काम करती रही हैं। भारत में क्षरित हो रही प्रेस की आधी-अधूरी स्वतंत्रता चिंता का विषय है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता इंडेक्स में भारत का स्थान 171 राष्ट्रों की सूची में वर्ष 2002 के 80वें से लुढ़ककर 131 वां हो चुका है। ‘नागरिक’ सेमिनार भारत में गिरती प्रेस स्वतंत्रता के खिलाफ निन्दा प्रस्ताव पारित करता है। लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित, जनपक्षधर, मजदूर, किसान, मेहनतकश वर्ग के हित में कार्य करने वाले अखबार, पत्र-पत्रिकाओं टी.वी. चैनल, इंटरनेट, वेबसाइटों व इनके पत्रकारों की सुरक्षा एवं इन्हें जारी रखे जाने के लिए संघर्ष करने का संकल्प लेता है। भारतीय लोकतंत्र का चरित्र और जनता - सेमिनार पत्र -जून 2011, देहरादून (उत्तराखंड) आजादी के लगभग ढाई दशक बीतने के बाद भारतीय लोकतंत्र का एक वीभत्स रूप 26 जून, 1975 को तब समूचे देश के सामने आया जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आन्तरिक सुरक्षा के नाम पर पूरे देश में ‘आपातकाल’ की घोषणा करके ‘सिविल तानाशाही’ लागू कर दी थी। 26 जून से शुरू हुआ ‘आपातकाल’ का यह सफर पूरे 19 माह तक जारी रहा। इस दौरान चैतरफा ‘पुलिस राज’ कायम हो गया। पुलिसिया आतंक ने खौफ और दहशत का जो माहौल पैदा किया, वह आज भी लोगों में सिहरन पैदा कर देता है। नागरिकों के सभी मूल अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। आपातकाल के इस दौर को ही आमतौर पर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ‘काला अध्याय’ के नाम से नवाजा जाता है। प्रचार माध्यमों में ‘आपातकाल’ को छोड़कर शेष सभी दौर की खुशनुमा तस्वीर प्रस्तुत की जाती है। हमारे हुक्मरान दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत को प्रचारित करते हैं। जबकि वास्तविकता यही है कि भारतीय लोकतंत्र अपनी उत्पत्ति के समय से एक तरफ उत्तर पूर्व की जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार को तो दूसरी तरफ तेलंगाना आंदोलन को अपने फौजी बूटों तले रौंदकर आगे बढ़ा है। यहां दमन, हत्याओं व बलात्कार की जो मिसाल भारतीय शासकों ने पेश की, उसकी बानगी औपनिवेशिक काल में ही देखी जा सकती है। उत्तर पूर्व के क्षेत्रों की जनता ‘आपातकाल’ जैसी स्थिति में आजादी के बाद से ही रह रही है। वे अपनी आजादी के लिए भारत के शासकों से दशकोें से संघर्षरत है। मणिपुर, नागालैंड, सिक्किम आदि पूर्वोत्तर राज्यों को वहां की जनता के भारी विरोध के बावजूद फौज के दम पर जबरदस्ती भारत में विलय कर लिया गया। ‘सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून’ के तहत यहां जनता तब से अब तक फौज की संगीनों के साये में जी रही है। अपनी राष्ट्रीयता के लिए संघर्षरत लोगों को भारतीय राज्य ने उग्रवादी, अलगाववादी या आतंकवादी करार दे दिया है। यहां सेना किसी को भी मात्र शक के आधार पर गिरफ्तार कर सकती है, गोली मार सकती है, किसी भी घर में उग्रवादी के होने की आशंका के आधार पर बम दाग सकती है, हमला करके सबको मार सकती है। किसी भी घर में घुस सकती है, जब चाहे तब तलाशी ले सकती है। भारतीय लोकतंत्र का जब जन्म हो रहा था तब मद्रास सपे्रशन आॅफ डिस्टर्ब एक्ट, 1948 लागू करके नेहरू सरकार ने तेलंगाना के किसनों के संघर्ष को अपनी फौज के दम पर कुचल दिया। भारतीय लोकतंत्र अपनी पैदाइश के वक्त से ही दमनात्मक रहा है। फर्जी मुठभेड़, हत्या, बलात्कार जैसे घष्णित हथकंड़ों के जरिये जनआंदोलनों का दमन का इसका इतिहास रहा है। सन् 1947 से 1950 तक आते-आते 1962 बार जनप्रदर्शनों पर गोलियां चलवायी गयीं, अपने ही देश के 3784 नागरिकों की हत्या कर दी गयी और लगभग 10,000 लोगों को घायल कर दिया गया। 50 के दशक में ही भाषावार प्रांतों के गठन की मांग को लेकर जुझारू संघर्ष जनता के द्वारा किये गये, इसका भी निर्मम दमन किया गया। संघर्ष के दबाव में ही अंततः राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन सरकार को करना पड़ा। 70 के दशक मंे किसानों का जमीन वितरण के लिए ‘जमीन जोतने वाले की’ के नारे से नक्सलबाड़ी से अन्य प्रांतों तक फैल गये सशक्त आंदोलन का दमन भी बेहद क्रूर व बर्बर तरीके से भारतीय शासक वर्ग द्वारा किया गया। कई हजार किसान व इसके समर्थन में आगे आये विद्यार्थियों की निर्मम हत्या कर दी गयी। स्वाभाविक है कि इन बातों की रोशनी में ही हमें भारत के लोकतंत्र के चरित्र पर चर्चा करनी है। हमें इसकी पड़ताल एक मजदूर, एक किसान, एक शोषित-उत्पीडि़त जन की दृष्टि से करनी है। हमें यह जानना है कि यह लोकतंत्र भारत के मेहनतकशों, शोषित-उत्पीडि़त जनों को इतने दशकों में क्या देता रहा है और कदाचित यह भी कि उनसे क्या छीनता रहा है। आइये! पहले आपातकाल के काले दिनों को याद करें। आपातकाल का दौर समाज में आमतौर पर यह मिथक प्रचलित व स्थापित है कि आपातकाल इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वकांक्षा व सनक का नतीजा था। यह मिथक या प्रचार वास्तविकता से परे है।वास्तविकता यह है कि समाज वर्गों में बंटा है, बहुलांश शोषित उत्पीडि़त व शासित जनता व शोषक शासकों में बंटा है तथा यहां कोई भी इस वर्ग से संबंध से परे नहीं है। न ही कोई व्यवहार व कार्यवाही इस सम्बन्ध से मुक्त है। 1975 का आपातकाल इस ओर गहराई से अहसास कराता है। इस दौर में भारतीय समाज संकट से गुजर रहा था। जो आर्थिक व राजनीतिक संकट इस दौर में पैदा हो चुका था, उससे निपटने को भारतीय पूंजीपति वर्ग की राजसत्ता के लिए खुली तानाशाही वाला रुख अपनाना जरूरी हो गया था। इसी काम को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पूंजीपतियों की पार्टी कांग्रेस ने किया जो कि पूंजीवादी राजसत्ता के एक अंग पर उस वक्त सत्ताशीन थी। आइये! देखे कैसे? पूंजीपति वर्ग ने सत्ताशीन होते ही पूंजीवादी विकास का जो रास्ता चुना था, वह लगभग एक दशक बाद ही संकट में फंसने लगा था। 1965-67 तक आते-आते अर्थव्यवस्था का यह संकट काफी तीक्ष्ण हो गया था। इससे उबरने के लिए विश्व बैंक से कई वर्षों तक सशर्त कर्ज लेने का रास्ता अपनाया गया व रुपये का अवमूल्यन किया गया। 1965-67 के संकट से उबरने के बाद 1973 तक आते-आते अर्थव्यवस्था पुनः संकट में फंसने लगी। वैश्विक स्तर पर भी ऐसा दौर इस वक्त रहा जब वैश्विक अर्थव्यवस्था ठहराव का शिकार थी। देश के भीतर एक ओर खाद्यान्न संकट पैदा हो गया तो दूसरी तरफ कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। मुद्रास्फीति 30 प्रतिशत तक पहुंच गयी। खाद्य वस्तुओं के दामों में उछाल के चलते कई स्थानों पर दंगे होने लगे। बेरोजगारी व महंगाई काफी तेजी से बढ़ी। भारत ने 1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध में भले ही इंदिरा गांधी की लोकप्रियता को आसमान तक पहुंचा दिया। बांग्लादेश के रूप में नये राष्ट्र का उदय बांग्लोदश की जनता की अकूत कुर्बानियों का नतीजा था परंतु भारत के शासकों ने जीत का सेहरा अपने सिर पर बांधा था। अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें देवी की संज्ञा से नवाज रहे थे परंतु युद्ध ने अपनी कीमत वसूली थी। इस युद्ध ने देश की अर्थव्यवस्था को जो पहले से ही खराब थी और खस्ताहाल कर दिया था। कुल मिलाकर, भारतीय पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का यह तीखा संकटकालीन दौर था। यह आर्थिक संकट अब तेजी से राजनीतिक संकट में बदलने लगा। एक ओर पी.ए.सी. की कुछ यूनिटों ने विद्रोह कर दिया जिसका क्रूर दमन फौज के द्वारा करवाया गया, तो इसके कुछ समय बाद ही रेलवे की 21 दिनों की ऐतिहासिक हड़ताल हुई, इसका भी बर्बर दमन कर दिया गया। लेकिन संकट बढ़ता गया। एक ओर बेरोजगारी, महंगाई व वेतन न मिल पाने से त्रस्त जनता के सभी तबके डाक्टर से लेकर मजदूर व विद्यार्थी तक सभी सड़कों पर प्रदर्शनों, हड़तालों में संघर्षरत थे तो दूसरी तरफ संपूर्ण क्रांति का नारा देने वाले जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में घोर सांप्रदायिक संगठनों, पार्टियों व कुछ अन्य राजनीतिक दलों से बनी लोक संघर्ष समिति ने केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए प्रघानमंत्री इंदिरा गांधी को 4 दिन के भीतर इस्तीफा देने की अंतिम चेतावनी दे दी। इंदिरा गांधी के पद पर बने रहने को अनैतिक करार दे दिया गया क्योंकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के चुनावों को अवैध करार दे दिया था। कुल मिलाकर स्थिति अत्यंत विस्फोटक हो गयी थी। अर्थव्यवस्था का संकट अब राजनैतिक संकट का रूप धारण कर चुका था। इसके अब सरकार के नियंत्रण से बाहर जाने की पूरी संभावना थी। पूंजीपति वर्ग की जरूरत थी कि स्थिति को अब तत्काल नियंत्रण में लाया जाय। 26 जून से देश में ‘आपातकाल’ की घोषणा के साथ सिविल तानाशाही देश में कायम हो गयी। आपातकाल लागू होतेेे ही ‘मीसा’ व ‘डीआइआर’ कानून लागू हो गया। बोलने, लिखने, विरोध प्रदर्शन इत्यादि जैसे सभी मौलिक अधिकारों को छीन लिया गया। मौलिक अधिकारों के हनन को न्यायालय में चुनौती दे सकने वाले अधिकारों को भी निलंबित कर दिया गया। इंदिरा गांधी व उसकी केबिनेट के अधिकार असीमित हो गये। सारी शक्तियां यहां संघनित हो गयीं। आर्थिक संकट से निपटने के लिए कई पंूजीवादी नुस्खे अमल में लाये गये। आपातकाल के इस दौर में विरोध प्रदर्शनों, आन्दोलनों व हड़तालों की अगुवाई करने वाले हर शख्स को उठाकर जेल में ठूंस दिया गया। लगभग 1 लाख 10 हजार व्यक्तियों को जेल में डाल दिया गया। विरोध की हर आवाज को कुचल दिया गया। इंदिरा गांधी के नेतृत्व में इस दौर में एक फासीवादी राज्य कायम हो गया। जहां जनसंख्या वृद्धि को समस्याओं की जड़ के रूप में प्रस्तुत करके बलात नसबन्दी अभियान चलाया गया। इसके शिकार भी मजदूर व गरीब आबादी के लोग हुए। वे ही निशाने पर थे। 1976-77 में लगभग 83 लाख नसबन्दी का आंकड़ा पार कर लिया गया। आपातकाल हटते ही यह आंकड़ा लगभग 10 लाख रह गया। बलात नसबन्दियों का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि लगभग 1800 लोगों की इस अभियान में मौतंे हुईं तथा हजारों लोग संक्रमण व मनोवैज्ञानिक बीमारियों का शिकार हुए। शहर के सौंदर्यीकरण के लिए गरीब बस्तियों को बदनुमा दाग बताकर दिल्ली में ही लगभग 1 लाख 21 हजार झुग्गी-बस्तियों को ध्वस्त कर दिया गया। लगभग 7 लाख गरीब मजदूर मेहनतकश लोगों को यहां से खदेड़कर शहर से बाहर गन्दगी एवं बुनियादी सुविधाओं से वंचित पुनर्वास कालोनियों में छोड़ दिया गया। दिल्ली मंे यमुना पार एक गाली, एक ग्लानि का प्रतीक बन गया। इन्दिरा गांधी ने एक फासीवादी नेता की तरह आचरण किया। ‘समाजवाद’, ‘धर्मनिरपेक्षता’ व ‘20 सूत्रीय कार्यक्रम’ के नारे के साथ मजदूर वर्ग समेत अन्य मेहनतकश समुदाय को अपने पीछे लामबन्द करने की कोशिश करके अपनी निरकंुश सत्ता को इन नारों की आड़ में वैध ठहराकर वह यही फासिस्ट व्यवहार कर रही थी। लगभग 19 माह बाद जब आर्थिक संकट से एक हद तक पार पा लिया गया तथा अर्थव्यवस्था भी काफी हद तक पटरी मंे आने लगी, जनता व्यापक तौर पर आपातकाल के विरोध में गोलबन्द होने लगी तो आपातकाल को खत्म करने व चुनाव कराने की घोषणा कर दी गयी। इस प्रकार ‘आपातकाल’ उस दौर की हकीकत है जब भारतीय पूंजीवादी अर्थव्यवस्था व राजनीति संकटग्रस्त थी। तब संकटग्रस्तता से पार पाने के लिए भारतीय शासक वर्ग ने लोकतंत्र का आवरण हटा दिया अब इसके ओट में छुपी हुयी तानाशाही नग्न होकर सामने आ गयी। इस तानाशाही का पूरा प्रबन्ध संविधान में पहले से ही मौजूद था। यह संविधान सम्मत तानाशाही थी। आपात काल के बारे में इस संक्षिप्त चर्चा के बाद कुछ बुनियादी बातों की चर्चा करें। भारतीय राज्य का बढ़ता फासीवादीकरण भारतीय राज्य शुरू से ही दमनात्मक व प्रतिक्रियावादी रहा है। 50 के दशक मंे इसने राष्ट्रीयताओं के आंदोलन को इस अंधराष्ट्रवादी तर्क के आधार पर निर्मम दमन करके जबरन भारतीय राज्य में मिला दिया कि इनका स्वतंत्र वजूद भारतीय संघ के लिए खतरा है। विलय के बाद इन क्षेत्रों में आत्मनिर्णय के अधिकार के तहत अलग राष्ट्र के गठन के लिए जो संघर्ष चलाया गया उसे उग्रवाद का नाम देकर वहां सशक्त फौज की तैनाती व इसे असीमित अधिकार देकर आंदोलन को कुचल डाला। ‘उग्रवाद’ व बाद में ‘आतंकवाद’ के खात्मे के नाम पर भारतीय राज्य अपने दमन तंत्र को और ज्यादा पुख्ता करता चला गया है। औपनिवेशिक दौर के काले कानूनों में कुछ फेरबदल करते हुए यह फिर नये एक से एक खतरनाक काले कानून इस नाम पर बनाते चला गया है। मद्रास सप्रेसन आॅफ डिसटर्बेस एक्ट 1948, निवारक नजरबन्दी कानून 1950, सशस्त्र सुरक्षा बल विशेषाधिकार अघिनियम 1958, गैर कानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम 1967, डिस्टर्ब एरिया एक्ट, बाहृय अनुरक्षण कानून(डम्ै।) 71, आन्तरिक सुरक्षा अनुरक्षण कानून (डप्ै।) 75, बाद के काल में टाडा, पोटा व फिर इन्हें निरस्त करके यूएपीए 2004 जैसे खतरनाक काले कानून केन्द्र सरकार ने अलग-अलग दौर में बनाये इसके अलावा हर राज्य (प्रान्त) ने भी इसी प्रकार के काले कानूनों से अपने को लैस कर लिया है। टाडा व पोटा जैसे काले कानून में न्याय के बुनियादी सिद्धान्त को ही ठुकरा दिया गया। न्याय का बुनियादी सिद्धान्त है कि आरोप सिद्ध होने पर ही किसी को दोषी ठहराया जा सकता है। इन कानूनों के तहत कहा गया कि व्यक्ति आरोप लगने के बाद तब तक दोषी माना जायेगा जब तक वह खुद को निर्दोष साबित न कर दे। इन काले कानूनों के तहत जहां फौज, अर्द्धसैनिक बल एवं पुलिस को असीमित अधिकार दे दिये गये वहीं इनके द्वारा की जाने वाली फर्जी मुठभेड़, हत्याओं व बलात्कारों को जबावदेही से परे कर दिया गया। अनावश्यक दबाव में इनके काम न कर पाने का तर्क दिया गया ताकि निरंकुशता व निर्ममता से दमन किया जा सके। इन काले कानूनों के लागू होने से आम जनता के बेहद सीमित जनवादी अधिकारों में भी कटौती हो गयी, कहीं-कहीं यह पूरी तरह खत्म हो गये। इन काले कानूनों के अलावा भारतीय राज्य ने आन्तरिक व बाहरी सुरक्षा के नाम पर भारी रक्षा बजट बढ़ाया है। आजादी के डेढ़ दशक बाद ही इसने आई.टी.बी.पी. व एस.एस.बी. जैसे अर्द्ध सैनिक बल गठित कर दिये और बाद के दशकों में बीएसएफ, सीआईएसएफ व एनएसजी का गठन किया। कुछ अर्सा पहले कोबरा बल, एसटीएफ एवं एटीएस का गठन कर दिया है। भारतीय शासक वर्ग की यह मुहिम जोर-शोर से आगे बढ़ रही है। अमेरिका व इजरायल के साथ संयुक्त सैन्य युद्धाभ्यास भी किये जा रहे हंै। पड़ौसी मुल्कों का खौफ दिखाकर देश के भीतर युद्धोन्माद फैलाकर अंधराष्ट्रवादी गर्दाेगुबार खड़ा कर अपनी मुहिम को जारी रखने, सैन्यीकरण, हथियारों की अंधाधुंध खरीद को भारतीय राज्य जायज ठहराने में सफल हो जा रहा है। इस प्रकार अपने दमनात्मक उपकरण को वह लगातार मजबूत करता चला जा रहा है। ‘आतंकवाद’ के नाम पर ही भारतीय राज्य अपने निगरानी तंत्र को और मजबूत कर रहा है। ‘अपने आस-पड़ौस के हर व्यक्ति पर नजर रखो’, ‘आतंकवादी आपके पड़ौसी या मित्र के रूप में हो सकता है’ ऐसा अंधाधुंध प्रचार करके भारतीय राज्य ने समाज में अविश्वास अलगाव की फिजा तैयार करके हर नागरिक को अपने पक्ष में करने व उसे खुफिया एजेण्ट मंे बदल देने की निकृष्ट कोशिश की है। इस मकसद से अब हर नागरिक पर नजर रखने के लिए विशेष पहचान पत्र (यूआईडी) बनाने की योजना नन्दन निलकणी के नेतृत्व में पिछले कुछ वर्षों से चल रही है। इस प्रकार ‘भारतीय राजसत्ता’ का आतंकवाद दिन व दिन बढ़ता जा रहा है। ‘राजकीय आतंकवाद’ की इस आहट को मणिपुर से लेकर कश्मीर तक चल रहे राष्ट्रीयता के संघर्षों, बेरोजगारी व महंगाई व अन्य जनवादी मांगांे को लेकर हर प्रान्त में चल रहे संघर्षों, मजदूर वर्ग के संघर्षों तथा सिंगूर, नन्दीग्राम व भट्टा पारसौल मंे किसानों के संघर्षों पर चली लाठी-गोलियों से महसूस किया जा सकता है। शासक वर्ग के पास हर समस्या का एक समाधान है ‘लाॅ एण्ड आर्डर’। केवल कानूनी व तकनीकी नुस्खों के जरिये समाधान का प्रस्तुतीकरण इनकी वर्गीय सीमा को दिखाता है। ‘सख्त से सख्त कानून’ और इसको लागू करने वाली ‘निरकंुश संस्था’ ये इनका मूल मंत्र हंै। वह भी केवल अपने वर्गीय हितों के संदर्भ में। यही वजह भी है कि भ्रष्टाचार के संदर्भ में भी इन्हीं के वर्ग के लोग ‘सशक्त व निरंकुश लोकपाल संस्था’ की वकालत करते हैं तथा मध्यम वर्ग के लोगों को अपने पीछे लामबन्द करने में सफल हो जाते हैं। यह फासिज्म की आहट है। यह राज्य को अधिक से अधिक शक्तिशाली बनाने की मांग है। अनायास नहीं है कि इस तरह के सारे नामों को संघ का समर्थन मिलता रहा है। भारतीय राज्यसत्ता को मध्ययुगीन मूल्य मान्यताआंे को भी पालने-पोसने व इस्तेमाल करने से कोई गुरेज नहीं है। शोषित उत्पीडि़त वर्गांे व तबकों विशेषकर महिलाओं व दलितों के लिए यह स्थिति अत्यन्त घातक है। साम्प्रदायिक ताकतंे इन मूल्य-मान्यताओं के साथ समाज के लिए बेहद घातक हैं। यह स्थिति भारतीय शासकवर्ग के लिए फासीवादीकरण में सहायक है। कट्टर हिन्दू साम्प्रदायिक संगठनों को पाल-पोसकर भारतीय पूंजीपति वर्ग हिटलर के भारतीय संस्करण के अभ्युदय को संभव बनाता है। ये साम्प्रदायिक संगठन एक ओर आतंकवाद को मुस्लिम का पर्याय बताकर व मुसलमानों को अन्य सामाजिक समस्याओं की वजह के रूप मंे प्रस्तुत करके कुछ हद तक जनता को गुमराह करने व इसके एक न्यून हिस्से को अपने पीछे लामबंद करने में सफल हुए हैं। गुजरात प्रायोजित दंगा व उड़ीसा मंे ईसाईयों पर हमला इसकी एक बानगी है। भारतीय राज्य द्वारा किये जा रहे इस प्रकार के फासीवादीकरण से मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकश तबकों समेत समस्त भारतीय समाज के लिए गम्भीर खतरा मौजूद है। अब पिछले कुछ वर्षों से ‘विकास’ का हवाला देकर इस प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा है। इस पूंजीवादी विकास से विस्थापन एवं तबाही का दंश झेल रही मेहनतकश अवाम का विरोध स्वाभाविक है। इस विकास का विरोध करने वाले लोगों व इसे नेतृत्व दे रहे लोगों को विकास विरोधी ठहराकर इनका निर्मम दमन किया जाता है। मध्य भारत मंे इसी तर्क के आधार पर आॅपरेशन ग्रीन हंट चलाकर अपने ही नागरिकों पर हमला कर दिया गया। सिंगूर, नन्दीग्राम, कलिंग, दादरी व भट्टा पारसौल आदि सब जगहों पर फासिज्म की ही गूंज सुनायी दी है। भारतीय लोकतंत्र का चरित्रः भारतीय लोकतंत्र अपने चरित्र में पंूंजीवादी लोकतंत्र है। यह अपने अंतर्वस्तु मंे ही दमनकारी व प्रतिक्रियावादी है। भारतीय संविधान इस पूंजीवादी जनतंत्र की ही लिखित अभिव्यक्ति है। संविधान मंे बेहद सीमित जनवादी अधिकार शोषित-उत्पीडि़त नागरिकों को मौलिक अधिकारों के रूप में देने के बाद ही इनको निलंबित कर देने के पूरे प्रावधान इसमें मौजूद हैं। जनवाद और तानाशाही अंतरसम्बन्धित व एक दूसरे के पूरक है। जनवाद होने का अर्थ है तानाशाही मौजूद होना। पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीवादी जनवाद होने का अर्थ है पूंजीपति वर्ग के लिए वास्तविक जनवाद तथा पूंजीपति वर्ग की मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकश तबकों पर यानी बहुलांश आबादी पर तानाशाही। दूसरे शब्दों में उन्हें जो जनवाद पूंजीवाद में हासिल होता है, वह मात्र औपचारिक या कागजी होता है। इस प्रकार यह पूंजीवादी जनवाद, पूंजीपति वर्ग की सेवा करता है और पूंजीवादी जनवाद, पूंजीवादी तानाशाही के अलावा और कुछ नहीं होती। पंूजीवादी जनतंत्र के अलग-अलग रूप हो सकते हैं अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस या फिर श्रीलंका की तरह। रूप में भिन्नता के बावजूद ये सब अपने अंर्तवस्तु मंे पूंजीपति वर्ग की तानाशाही के सिवाय और कुछ नहीं है। पंूजीपति वर्ग की यही खासियत है। इसके दर्शन, विचारधारा, राजनीति, नैतिकता व कानून, मुनाफे व बाजार से तय होता है। यही वजह है कि ‘स्वतंत्रता’, ‘समानता’ और ‘बंधुत्व’ के नारे को गुंजायमान करने वाली फ्रांसीसी क्रांति में मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकश तबकों को अपने पीछे लामबन्द करके सामंती विशेषाधिकारों, सामंती मूल्य मान्यताओं को ध्वस्त कर देने के बावजूद सत्ताशीन होते ही फ्रांसीसी पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में जो गणतन्त्र बना, वह मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकश तबकों के विरोध में चला गया। उसके नारे व्यापार और लूट की स्वतंत्रता एवं पूंजीवादी समानता तक सीमित रह गये। जनता को सामंती बंधनों, मूल्य मान्यताओं से चर्च व सामंतों के घोर उत्पीड़न एवं शोषण से मुक्ति मिली लेकिन अब वह पूंजीपति वर्ग के शोषण उत्पीड़न के चक्रव्यूह मंे फंस गयी। समग्रता मंे यह आगे बढ़ा कदम था। वहां जनता को ज्यादा जनवादी अधिकार इसीलिए हासिल हैं। जबकि भारतीय लोकतंत्र वैश्विक परिस्थितियों एवं देश के भीतर चल रहे उग्र जन संघर्षों के दबाव मंे सुलह-समझौते से अस्तित्व मंे आया इसलिए एक ओर इसने सार्विक मताधिकार के तहत महिलाओं को भी मताधिकार देकर उस दौर की प्रगतिशीलता को दिखाया तो वहीं दूसरी ओर सामंती मूल्य मान्यताओं को बरकरार रखा। दमन, शोषण व उत्पीड़न की ब्रिटिशकालीन मशीनरी, पंूजीवादी लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी थी। भारतीय लोकतंत्र ने इसे बनाये रखा। साम्राज्यवाद से सीमित अलगाव का सम्बन्ध बनाया। इसलिए पूंजीवादी लोकतंत्र के भीतर भी जो जनवादी अधिकार मिल सकते थे वह भी इस कारण भारतीय लोकतंत्र में मेहनतकश आवाम को नहीं मिल सके। दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था के लिए पंूजीवादी संसदीय जनवाद से बेहतर कुछ नहीं होता। शांतिपूर्ण दौर में जब आर्थिक-राजनीतिक संकट न हो तो पूंजीवादी तानाशाही लोकतंत्र की शक्ल अख्तियार किये होती है। शोषण-उत्पीड़न के इस शांतिपूर्ण दौर में पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां, चुनाव के द्वारा पंूजीवादी राजसत्ता के अंग विधायिका में पहुंचती हंै। पूंजीपति वर्ग के प्रबन्धक के बतौर काम करते हुए नीतियां व कानून बनाती हंै। चुनाव के द्वारा सरकार बनाने की इस प्रक्रिया से पूंजीपति वर्ग अपने शासन को वैधता प्रदान करा देता है। जनता औपचारिक जनवादी अधिकारों का उपयोग करती है। मेहनतकश आवाम का भरोसा व्यवस्था पर बनता है। यह भ्रम जनता के बीच बनता है कि जैसे सरकार वर्गों से परे हो कि सरकार चाहे तो समस्याओं को हल कर सकती है। इस प्रकार अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों की सरकार भी अलग-अलग समय पर बनती है। लेकिन समस्याएं बरकरार रहती हैं। उस दौर में जब आर्थिक व राजनीतिक संकट मौजूद हो, पूंजीपति वर्ग की यह लोकतांत्रिक तानाशाही नग्न होकर सामने आ जाती है। पूंजीपति वर्ग के सदस्य जनवाद का पूरा लुत्फ उठाते हैं। लेकिन मजदूर-मेहनतकश नागरिकों को सीमित औपचारिक जनवादी अधिकारों से भी महरूम कर दिया जाता है। तब यह हिटलर का नाजीवाद, मुसोलिनी का फासीवाद, सैनिक तानाशाही या फिर इन्दिरा गांधी की सिविल तानाशाही का रुख अख्तियार करके निरंकुश आतंकी शक्ति में बदल गया जाता है। दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था अर्थव्यवस्था के क्षेत्र मंे उत्पादन को लगातार संगठित करते हुए इसका समाजीकरण करती चली जाती है। उत्पादन व उत्पाद की प्रकृति सामाजिक होती जाती है जबकि इसके विपरीत उत्पादन के साधनों व सामाजिक उत्पाद पर समाज का स्वामित्व नहीं होता, इस पर पूंजीपति वर्ग का स्वामित्व बना रहता है। इस प्रकार सामाजिक उत्पादन एवं पंूजीवादी निजी स्वामित्व के बीच तीखा अन्तरविरोध बना रहता है। चूंकि अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में इस प्रकार समाजीकरण लगातार बढ़ रहा होता है लेकिन राजनीति के क्षेत्र में इस प्रकार की गतिशीलता राजसत्ता पर पूंजीपति वर्ग के कब्जे के चलते असम्भव हो जाती है। पंूजीपति वर्ग सामाजिक उत्पादन एवं निजी पूंजीवादी स्वामित्व के अन्तरविरोध से पैदा होने वाले तीखे आर्थिक राजनैतिक संकटों को हल करने के लिए राज्य को लगातार दमनकारी काले कानूनों से लैस करता जाता है। प्रतिक्रियावादी होता चला जाता है। इस प्रक्रिया में राज्य का फासीवादीकरण भी हो रहा होता है। भारतीय लोकतंत्र इससे जुदा नहीं है, यही इसका चरित्र है। मौजूद परिस्थितियों में हमारे कार्यभार व भूमिकाः- परिस्थितियां जटिल है, निःसन्देह शासक वर्ग हमलावर है। राज्य और दमनात्मक होता जा रहा है तो इसके बरक्स जनता इसका जबाव अपने संघर्षों से दे रही है। उसने सिंगूर, नन्दीग्राम, गोवा मंे शासकों को झुकने पर मजबूूर कर दिया। मणिपुर से कश्मीर तक जनता आर्मी व काले कानून को खत्म करने की मांग को लेकर दशकों से संघर्षरत है। देश के हर हिस्से, हर कोने में जनता अपने-अपने संघर्ष को दमन के बावजूद जारी रखे हुए है। वैश्विक स्तर पर भी विशेषकर अरब मुल्कों में भयानक दमन व उत्पीड़न के बावजूद दशकों से सत्तासीन कई तानाशाह शासकों को जनता ने धूल चटा दी है। इन संघर्षों से ऊर्जा ग्रहण करते हुए और सबक लेते हुए देश के भीतर शासक वर्ग द्वारा लागू किये गये सभी दमनकारी काले कानूनांे को खत्म करने के लिए व जनांदोलनों के दमन के खिलाफ संघर्ष करने की जरूरत है। इन दमनकारी कानूनों का जनता पर होने वाले प्रभाव व क्रूर दमन को व्यापक जनता तक प्रचारित करने की जरूरत है। मध्ययुगीन सामंती मूल्य मान्यताएं जिसके चलते समाज में अंधविश्वास कूपमण्डूक अवैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है। मेहनतकश महिलाएं व दलित इस वजह से भी सामाजिक गैर बराबरी के शिकार हैं। इन मध्ययुगीन मूल्य मान्यताओं को प्रश्रय देने वाली सत्ता व लोगों के खिलाफ संघर्ष करने की जरूरत है। बराबरी, स्वतंत्रता व वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने वाली प्रचारात्मक कार्यवाहियां करनी होंगी। अंततः मुकम्मल समाधान तभी सम्भव है। जब पूंजीवादी व्यवस्था के बुनियादी अंतरविरोध, सामाजिक उत्पादन व पूंजीवादी निजी स्वामित्व को सामाजिक स्वामित्व के पक्ष में हल कर दिया जाए। मजदूर वर्ग के अधिनायकत्व में समाजवाद लाया जाय। समाजवादी व्यवस्था ही जनवाद का सर्वोच्च रूप होगी जहां व्यापक मजदूर-मेहनतकश अवाम के लिए वास्तविक तौर पर जनवाद होगा। व्यापक मजदूर-मेहनतकश नागरिकों के इस समाजवादी राज्य में पंूजीपति वर्ग पर तानाशाही होगी। समाजवादी विचारों को समाज में प्रचारित करने व इस लक्ष्य के लिए मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकश तबकों को गोलबन्द करने की चुनौती हमारे सामने है। मौजूदा परिस्थितियों में जनपक्षधर नागरिकों व मीडियाकर्मियांे की भूमिकाः- मौजूदा पंूजीवादी लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ कहलाने वाला इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया का पूंजीपरस्त चेहरा लगातार बेनकाब होता जा रहा है। यह शासक वर्ग के द्वारा राज्य के फासीवादीकरण करने की मुहिम में अंधाधुंध प्रचार करके जनता को शासकों के पक्ष में खड़ा करने का काम जारी रखे हुए है। यह पूंजीपति वर्ग के पक्ष में फिजा तैयार करने की मुहिम में जुटा हुआ है। इसकी खबरों के केन्द्र से अब मजदूर-मेहनतकश जनता के जनवादी संघर्ष अब लगभग नदारद हैं। इनका स्थान फूहड़ता, कूपमण्डूकता, अंधविश्वास अश्लीलता भरे रियल्टी शो ने ले लिया है, अपराध, सेलिबे्रटीज भ्रष्टाचार के सनसनीखेज खबरों ने ले लिया है। लेकिन इसके बावजूद कई मीडियाकर्मियों ने अलग-अलग समय पर अपनी जिन्दगी को जोखिम में डालते हुए जनपक्षधर लेखन किया। पूंजीवादी षड्यंत्रों का खुलासा किया। बेशक इन्हें अपनी इस पक्षधरता की कीमत अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ी। देश में छोटे स्तर का जनपक्षधर मीडिया अपने सीमित संसाधनों व दमन-उत्पीड़न के बावजूद लगातार मजदूर वर्ग-मेहनतकश तबकों के पक्ष में खड़ा है। इस जनपक्षधर मीडिया को पूरे देश में विस्तार करने की जरूरत है।

अंत में आइये! हम सभी जनपक्षधर नागरिकों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों व मीडियाकर्मियों का आह्वान करते हैं कि पूंजीवादी लोकतंत्र की सीमाओं व इसकी हकीकत को उजागर करने की ओर बढ़े। बढ़ते दमन व काले कानूनों के विरोध में एकजुट होने और अन्ततः मानवता की मुक्ति के लिए समाजवाद की स्थापना का संकल्प लेते हुए इस दिशा में आगे बढ़े।


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