‘नागरिक’ का प्रकाशन क्यों ?
‘‘नागरिक’’ का परिचय अंक आपके हाथ में है। इसे पाने पर इसकी योजना से असम्बद्ध लोगों की पहली प्रतिक्रिया यह होगी कि आखिर एक नया अखबार क्यों? सामान्य तौर पर इसके कई जबाव हो सकते हैं- यह कुछ बुद्धिजीवी किस्म के लोगों के दिमाग की खुराफात है। यह कुछ लोगों द्वारा अपने को स्थापित करने का प्रयास है या ‘नाम कमाने’ की कोशिश है। यह सत्ता प्रतिष्ठानों तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश है यह विज्ञापनों के माध्यम से पैसा कमाने का तरीका है। यह ब्लैकमेल का एक बहुत अच्छा साधन है, यह चुनावी राजनीति के लिए आधार बनाने का तरीका है और अंततः यह ‘स्वान्तः सुखाय’ है। हमारा जबाव अलग है। निश्चय ही, आज लगभग सभी अखबारों के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनके प्रकाशन के उद्देश्य ऊपर गिनाये गये उद्देश्यों में से एक या एक से अधिक होते हैं लेकिन ठीक इसी कारण हमारा जबाव अलग है। मूूलतः पैसे द्वारा संचालित आज की दुनिया में प्रचारतंत्र पैसे द्वारा, पैसे के लिए खेल बन कर रह गये हंै। उनका पहला व्यक्तिगत उद्देश्य होता है पैसा कमाना। किसी भी अखबार या अन्य प्रचार माध्यम (टी.वी. चैनल, पत्रिका इत्यादि) के शुरू करने के पीछे उसके मालिकों का फौरी व दूरगामी उद्देश्य होता है- पैसा लगाकर मुनाफा कमाना। इस मामले में यह मालिकों की निगाह में किसी भी अन्य व्यवसाय की तरह ही होता है जिसमें पैसा लगाया ही इसलिए जाता है कि मुनाफा कमाया जाये। निश्चय ही मुनाफा जितना ज्यादा हो, उतना ही अच्छा। उसके लिए जो भी रणनीति अपनाई जाए या जो भी हथकंडे प्रयोग में लाये जाएं, सब ठीक हैं। प्यार, युद्ध और व्यवसाय में सब कुछ जायज है। लेकिन अपने कार्य में प्रचार-माध्यम, प्रचार और ‘‘विचार निर्माण’’ का कार्य करता है। इस माल का उपयोग मूल्य ही यही है। चूंकि अखबार का मूल काम समाचार और विचार देना है इसीलिए इसकी दूसरी और ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका शुरू हो जाती है। यह भूमिका है पैसा आधारित व्यवस्था के पक्ष में लगातार प्रचार करने की। चूंकि अखबार मालिक खुद पैसे वाले लोग होते हैं तथा पैसा कमाने की आकांक्षा रखते हैं। अतः पैसे की इस वर्तमान व्यवस्था को वे हजार तरीकों से सही और विकल्पहीन ठहराने का प्रयास करते हैं। इन अखबारों में वे ही लोग संपादक, संवाददाता या लेखक की हैसियत से स्थान पा सकते हैं, जो इस व्यवस्था के समर्थक हों। यदि वे आलोचक भी हों तो अंततः इसके समर्थक हों, ये लोग ही मेधा, कुशलता व श्रम का इस्तेमाल कर, लगातार यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि जो कुछ वर्तमान है, वही सर्वश्रेष्ठ है। इसका कोई विकल्प सम्भव नहीं है। समाचारों/लेखों का चुनाव, उनकी प्रस्तुति, उनकी भाषा शैली, मुद्दों का चुनाव व प्रस्तुतीकरण इत्यादि सभी इसी लक्ष्य के इर्द-गिर्द घूमते हैं। लेकिन यह सब अत्यन्त सूक्ष्मता से होता है। खासकर संभ्रान्त अंग्रेजी पत्रकारिता में। वे अपने अत्यन्त सभ्य व्यवहार के अनुरूप इसमें भी अत्यन्त माहिर हैं। क्षेत्रीय भाषाओं के लोग इस मामले में गंवार हैं तथा मुंहफट शैली के आदी हैं। अंग्रेजी वाले जो काम अत्यन्त सूक्ष्मता से करते हैं, वे उसे भौंड़े अन्दाज में पेश कर देते हैं। अंग्रेजी वाले ऊंचे आदर्शों की आड़ में यह खेल खेलते हैं तो क्षेत्रीय भाषा वाले सीघे-सीघे अपने हितों का ऐलान कर देते हैं। कभी किसी समूह का, कभी किसी पार्टी का या कभी किसी विचारधारा का। इन सबका परिणाम यह निकलता है कि इन अखबारों में आम जनता की जिन्दगी, उसकी रोजमर्रा की तात्कालिक व दीर्घकालिक समस्याएं, इन समस्याओं के खिलाफ संघर्ष तथा उसकी कुर्बानियां बाकायदा सुनियोजित ढंग से अखबारों से गायब होती हैं। इनका अकसर कोई तो जिक्र ही नहीं होता लेकिन किसी बड़ी घटना के कारण यदि नजरअंदाज करना असंभव हो जाए तो इन्हें कुछ इस रूप में पेश किया जाता है कि यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन अश्वत्थामा मारा गया-आदमी या हाथी। अक्सर तो इस रूप में समाचार का प्रस्तुतीकरण होता है कि बिना शंखध्वनि की बाधा को ही यह लगने लगता है कि मरने वाला आदमी ही था। सेन्सर, अर्द्धसत्यों और विचारों का हमला इतना मारक होता है कि देर-सबेर लोग भी इनके शिकार हो जाते हैं, गाफिल लोगों का तो कहना ही क्या। इसके परिणामस्वरूप आम आदमी इस व्यवस्था में असहाय जीते रहने को अपनी नियति मान लेता है। ‘कुछ नहीं हो सकता’ का व्यवस्था समर्थक मंत्र उसका मूल मंत्र बन जाता है और व्यवस्था पोषक माध्यम तथा उसके मालिकों की जीत मुकम्मिल हो जाती है। जीते रहने के लिए जीवन मंे विश्वास, जिजीविषा, निहायत आवश्यक है। उसी तरह एक नये समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है उसकी अच्छाई, जरूरत और संभाव्यता में विश्वास। पैसा आधारित और पैसा समर्थक प्रचारतंत्र इसी विश्वास को नष्ट करना चाहता है। इसी के लिए प्रयासरत है और ठीक इसी कारण आज जरूरत है एक ऐसे अखबार की जो इस विश्वास को न केवल पुनर्जीवित करे बल्कि समाज में उसे स्थापित करे। उसे समाज के बहुलांश की सांसों का अंग बना दे। ‘आखिर एक नया अखबार क्यों..?’ का ‘‘नागरिक’’ का जबाव यही है कि वह आम आदमी की आशाओं, आकांक्षाओं, उम्मीदों, हसरतों, जज्बातों, संघर्षों, बलिदानों को स्वर देने वाला और मुखरित करने वाला अखबार बनना चाहता है। चूंकि आज कोई ऐसा अखबार नहीं है, इसीलिए वह इस महान और पवित्र कार्य का जिम्मा अपने निहायत कमजोर कन्घों पर उठाना चाहता है। ये कन्धे मजबूत बनें और इतने मजबूत बनें कि इस कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा सके, इसके लिए यह आवश्यक है कि आप भी दिलोजान से इसमें अपना कंधा भिड़ायें और तब एक दिन ऐसा आयेगा जब हम कह सकेंगेः- मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया। '

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