सीमा-अंजू और पुरुष प्रधान मीडिया

आज देश की सारी समस्यायें गरीबी, बेकारी, महंगाई खत्म हो गयी हैं। खेतों में दिन-रात मेहनत करते-घाटे की खेती करते गरीब किसान की बदहाली गायब हो गयी है। अब देश की इकलौती सर्वप्रमुख समस्या यह रह गई है कि पाकिस्तान से अपना परिवार छोड़ भारत आने वाली सीमा और भारत से परिवार छोड़ पाक जाने वाली अंजू ने सही किया या गलत। कि क्या सीमा पाक जासूस तो नहीं कि अंजू कहीं पाक के षड्यंत्रकारी एजेण्डे का शिकार तो नहीं। खबरिया टी वी चैनलों को आज खोल कर देखा जाये तो अंजू-सीमा प्रकरण की चीड़-फाड़ में एंकर-एंकरायें-रिपोर्टर सब व्यस्त हैं। 
    
भारत के खबरिया टी वी चैनलों के लिए मानो फिल्मी हीरो-हीरोईनों की जिन्दगी के कोनों में झांकने से चैन नहीं आ रहा था, कि उन्होंने सीमा-अंजू को पहले नायिका-खलनायिका के बतौर स्थापित किया और फिर जुट गये उनके जीवन की चीड़-फाड़ करने में। भारत-पाक का उनका होने ने कहानी में और जायका पैदा कर दिया। इस जायकेदार व्यंजन को परोसने में टी वी चैनल व्यस्त हैं। 
    
चूंकि कहानी में मुख्य किरदार महिलायें हैं तो मीडिया भला उनके बहाने देश की महिलाओं को संस्कृति की शिक्षा देने से क्यों पीछे रहता। आखिर मीडिया का पुरुष प्रधान चेहरा कैसे छिप सकता था। एंकर कम उपदेशक परिवार नाम की संस्था का गुणगान करते हुए बताने लगे कि अपने परिवार को छोड़ कर प्रेम कर सीमा-अंजू ने कितना बड़ा गुनाह कर दिया है। कि सीमा-अंजू की कहानी दिखा रही है कि महिलाओं की आजाद ख्याली उन्हें बिगाड़ने की ओर ले जा रही है। पुरुष प्रधान मीडिया को सीमा-अंजू को कोसते वक्त एक बार भी याद नहीं आया कि परिवार नामक संस्था को लात मार बिगाड़ने वाले पुरुष महिलाओं से बहुत ज्यादा हैं। कि पुरुषों ने तो खुद को कभी ‘परिवार’ संस्था के अनुशासन में बांधा ही नहीं। कि कितने बिगड़ैल नामी-गिरामी पुरुष तो आज मीडिया से लेकर राजनीति में हर ओर देखे जा सकते हैं। इन पुरुषों के बिगड़ने को लेकर तो मीडिया ने कभी खबर नहीं चलाई। देश के मुखिया खुद अपनी पत्नी को छोड़ कर बैठे हैं। वे बिगडैल हैं कि नहीं, इस पर तो मीडिया ने कभी अन्यथा प्रलाप नहीं किया। सवाल यह नहीं है कि सीमा-अंजू ने जो किया वह सही है या गलत सवाल यह है कि सीमा-अंजू के बहाने महिलाओं को निशाने पर क्यों लिया जा रहा है। 
    
सीमा-अंजू के नाम पर भारत-पाक का प्रश्न उठा मीडिया कहानी में ‘राष्ट्रवादी’ छौंका लगाने से भी बाज नहीं आया। सीमा पाक की जगह किसी और देश से आती और अंजू पाक की जगह कहीं और जाती तो यह कहानी दो दिन भी नहीं चलती। कहानी के जरिये भारत और पाक दो दुश्मन देश हैं इसे स्वयं सिद्ध सच्चाई की तरह बारम्बार स्थापित किया जा रहा है और बहस इस दुश्मनी पर नहीं दुश्मनों से प्रेम पर हो रही है। कि क्या दुश्मन देश के वासी से प्रेम करना जायज है? एक बार फिर अंधराष्ट्रवाद का गुबार खड़ा कर प्रवचन झाड़ा जा रहा है कि दुश्मन कौम से प्रेम देश से गद्दारी है। इसी बहाने पाक को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ा जा रहा है। 
    
पाक को दिन-रात कोसने वाले मीडिया को नजर नहीं आता कि पाक सत्ता अपने यहां आई महिला के साथ कहीं बेहतर व्यवहार कर रही है। कि वहां का मीडिया भी भारत की तरह उनके जीवन की चीड़ फाड़ नहीं कर रहा है। 
    
इस चीड़ फाड़ के बीच ही मणिपुर सुलगता रहता है। वहां इण्टरनेट बंद रहता है देश का मुखिया मणिपुर पर चुप्पी साधे रहता है अतः मीडिया भी मणिपुर को ‘पराया’ मान चुप्पी साधे रखता है। अंततः मणिपुर से वायरल वीडियो के असर में जब जनता पूरे देश में सड़कों पर उतरती है तो मीडिया कुछ जागता दिखता है पर अपनी चहेती सत्ता को इस मुद्दे पर सोता देख इस मुद्दे पर खानापूरी कर सो जाता है और सीमा-अंजू को आगे कर देता है। 
    
सीमा-अंजू के बहाने वास्तविक मुद्दों से भटकाने की मीडिया दिन-रात जुगत भिड़ाता है। कहानी में हर रोज नया एंगल पैदा करता है। उसे चार सच्चे-झूठे मसाले से लपेट नया बनाकर परोसता है। उसमें नया-नया तड़का डालता है। यह सब वह तब तक करता रह सकता है जब तक उसे कोई नई खबर नहीं मिल जाती जिससे पाक को कोसा जा सके, हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य बढ़ाया जा सके या फिर सरकार के कसीदे गढ़े जा सकें।
    
आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि देश के कारपोरेट घरानों के टुकड़ों पर चलने वाला पूंजीवादी मीडिया सीमा-अंजू प्रकरण पर इतन पैसा पत्रकारिता के नाम पर बहा देता है। आखिर ऐसी खबरों पर बहाने के लिए पैसा कहां से आता है? यह पैसा मजदूरों-मेहनतकशों के श्रम की लूट कर कमाया जाता है। मजदूरों-मेहनतकशों से लूटे पैसे से देश की जनता को सीमा-अंजू की कहानी सुना अपने वास्तविक मुद्दों- बेकारी, महंगाई, गरीबी से दूर किया जाता है।     -एक पाठक 

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