एक मजदूर दसवीं पास करके काम सीखने के चक्कर में एक वर्कशाॅप में जाकर लग जाता है। उसके घर के लोगों की इच्छा थी कि कोई टेक्नीकल काम सीख ले। इसीलिए वह टर्नर का काम सीखने के लिए बिनानी इण्डस्ट्रीज नाम की वर्कशाॅप में लग जाता है। <br />
बिनानी इण्डस्ट्रीज प्रोडक्शन का काम करती थी। उसमें लगने के साथ ही वह बड़ी मेहनत से काम करने लग जाता है। दो-तीन साल काम करने के बाद वह टर्नर का काम थोड़ा सीख जाता है। काम सीखने के बाद मालिक उसका वेतन दो सौ रुपये बढ़ा देता है। इससे वह मजदूर खुश होकर और मेहनत और लगन से काम करने लग जाता है। काम करते-करते चार-पांच साल में उस वर्कशाॅप के सारे काम करने के नियम जान जाता है <br />
इसी बीच वर्कशाॅप का फोरमैन एक महीने के लिए गांव चला जाता है। इस तरह से इस मजदूर को काम करवाने का मौका मिल जाता है। उसने और ज्यादा मेहनत करके और मजदूरों से मेहनत करवाकर उस महीने मालिक का और ज्यादा मुनाफा बढ़वाया। इससे मालिक को बहुत खुशी हुई। अब मालिक सोचने लगा कि अगर फोरमैन मेेरे कम्पनी में नहीं रहा तो मेरा काम चल जायेगा। क्योंकि फोरमेन उसकी नजर में ज्यादा सेलरी लेता था। अतः मौका देखकर दो चार महीने बाद मालिक ने फोरमैन को निकाल दिया। उसके बाद उस मजदूर को कम्पनी चलाने को मालिक ने कहा। मजदूर ने खुश होकर फोरमैन की जगह ले ली। और मजदूरों से काम करवाने लगा। मालिक बार-बार उस मजदूर की पीठ पर हाथ फेरकर कहता था बेटा ईमानदारी से काम कर और मजदूरों से अच्छी तरह काम करवा तुझे मैं एक दिन अच्छा आदमी बना दूंगा। बेचारा मजदूर मालिक की बातों में आकर एकदम ईमानदारी से काम करने और करवाने लगा। पहले फोरमैन के समय में 12 घंटे में जो माल 150 पीस निकलता था वहीं वह मजदूर 12 घंटे में 200 पीस निकालने लगा और सभी मजदूरों से निकलवाने लगा। <br />
इस तरह मालिक की नजर में वह मजदूर अच्छा हो गया। और मालिक उस मजदूर को बेटा कह कहकर काम करवाने लगा। मालिक उस मजदूर को साल में सभी मजदूरों से 50 रुपये ज्यादा इन्क्रीमेंट देता था और मजदूर से कहता था बेटा तेरा 50 रुपया ज्यादा बढ़ाया है। और मेहनत करेगा तो और बढ़ेगा। इस तरह वह मजदूर और उत्पादन बढ़ाने लगा। और उसका प्रोडक्शन देखकर मालिक खुश हो जाता था। वह मजदूर साथ ही बाकी मजदूरों पर भी दबाव डालने लगता था। <br />
एक दिन एक मजदूर को एडवांस रुपयों की जरूरत पड़ी तो उसने उस मजदूर से कहा कि मुझे दो हजार रुपया दिलवा दो। बेचारे मजदूर ने मालिक के पास जाकर कहा कि एक मजदूर दो हजार रुपये एडवांस मांग रहा है उसे दे दो। इस पर मालिक ने कहा कि एडवांस दिलवाने के लिए तो फरमाईश लेकर आ जाता है परन्तु मैं कहता हूं कि दस पीस मजदूरों से ज्यादा निकलवा तो नहीं निकलवाता है। इस बात पर उस मजदूर को बड़ा झटका लगता है। <br />
उस दिन के बाद से मजदूर ने फैसला लिया कि अब इसके यहां काम करके अच्छा आदमी नहीं बन सकता। <br />
जब मजदूर ने हिसाब मांगा तो मालिक बोला कि दो-चार महीने रुक जा। मेरी लड़की की शादी होने वाली है। शादी के बाद फ्री हो जाऊंगा तब तू चले जाना। तब मैं तुझे हिसाब भी ज्यादा दे दूंगा। इस बात पर मजदूर राजी हो गया और दो-चार महीने रुकने के लिए तैयार हो गया। <br />
धीरे-धीरे मजदूर को छः महीने से ज्यादा काम करते हो गया। परन्तु अभी तक मालिक की लड़की की शादी नहीं हुई। फिर एक दिन मजदूर मालिक से बोला साहब मुझे मेरा हिसाब दे दो। मैं छः महीने से आपसे गांव जाने के लिए कह रहा हूं। तब मालिक फिर बोला अभी मेरी लड़की की शादी तय नहीं हुई हैै। हो जाने दे तब चले जाना। इस तरह मजदूर उसकी लड़की की शादी तक रुक गया। फरवरी का महीना आया और लड़की की शादी हो गयी। शादी के दस-पन्द्रह दिन बाद मजदूर बोला साहब मैंने 16 मार्च का टिकट करवा लिया है गांव के लिए। मैं हिसाब के लिए आपसे साल भर से मांग रहा हूं। इस पर मालिक बोला मेरे पास पैसे नहीं हैं। जो पैसा था वह सब लड़की की शादी में खर्च हो गया। अब पैसा होगा तो हिसाब दूूंगा। तूने मेरे से पूछकर टिकट बनवाया था क्या। इस पर मजदूर बोला कि ठीक है कोई बात नहीं जब मैंने टिकट करवाया है तो जाऊंगा ही आप पैसे दो या न दो। जैसे ही मजदूर के गांव जाने का समय आया तो मालिक ने उसे आॅफिस बुलाकर नौकरी छोड़ने का लेटर लिखवाकर ले लिया। उसे 13 साल काम करने का मात्र 25000 रुपया दे रहा था। इस पर मजदूर बोला कि मैंने 13 साल इतनी ज्यादा मेहनत की और ईमानदारी से काम करवाया तो मुझे 25000 रुपये दे रहे हो। और इससे पहले का फोरमेन था तो उसे 9 साल का तीस हजार रुपया दिया था। मुझे 13 साल का पच्चीस हजार और पिछले फोरमैन को 9 साल का 30,000 यह इतना अंतर करके क्यों दे रहे हो। जबकि मैंने उस फोरमैन से ज्यादा प्रोडक्शन बढ़वाया। इस पर मालिक ने रोते-गाते उस मजदूर को भी 30 हजार रुपया दिया और बोला इससे ज्यादा मैं और नहीं दे सकता और इस महीने की सेलरी पूरे महीने काम करने पर दे दूंगा। 16 मार्च का टिकट कैंसिल करवाकर मजदूर 31 मार्च तक काम करने को मजबूर हुआ। जैसे ही टिकट कैंसिल करवाकर मजदूर काम करने लगा तो दो दिन बाद ही मजदूर का पैर इतना ज्यादा कट गया कि 12 टांके लगवाने पड़े। पैर के किनारे वाली अंगुली आधे से ज्यादा कट गयी। मालिक ने दवाई करवाई और करवा कर मजदूर के कमरे पर छोड़ दिया। अभी घाव आधा भी ठीक नहीं हुआ कि मालिक सोचने लगा कि उसको रूम पर रहने से क्या फायदा हो रहा है। कम्पनी में आयेगा तो बैठे-बैठे कम से कम मजदूरों का ध्यान तो रखेगा। मालिक ने दूसरे दिन से एक मजदूर को उस मजदूर के कमरे पर भेजने लगा। मजदूर रोज मजदूर को साईकिल से सुबह आठ बजे कम्पनी ले जाता और शाम को सात बजे उसके कमरे पर छोड़ता। बेचारा मजदूर कम्पनी में रोज दस घंटे बैठकर मजदूरों का माल चेक करता। मालिक की आदत से मजदूर बिलकुल परेशान हो गया था। अभी मजदूर का पैर बिल्कुल ठीक भी नहीं हुआ था। एक महीने से भी ज्यादा काम करने के बाद मजदूर के गांव का कोई आदमी गांव जा रहा था। उसके साथ मजदूर गांव जाने के लिए तैयार हो गया। स्टेशन तक उसका दोस्त उसे गाड़ी पर छोड़कर आया। <br />
मजदूर लंगडाते हुए गांव गया। गांव पर जब अपनों के बीच उसको सुकून मिला। पन्द्रह दिन बाद जब मजदूर वापस लौटकर आया तो दूसरी कम्पनी में काम पर लगा। इस बीच उसकी मुलाकात इंकलाबी मजदूर केन्द्र के लोगों के साथ हुई। जब संगठन के लोगों ने मजदूर को समझाया कि मालिक जिस भी कम्पनी का हो वह मजदूर का शोषण करने और ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के सिवा कुछ और नहीं करेगा। अगर मजदूरों को अच्छा आदमी बनना है तो उसके लिए मजदूरों को समाजवाद लाना पड़ेगा। समाजवाद में ही मजदूरों की मुक्ति हो सकती है। <strong>एक मजदूर फरीदाबाद</strong>