अंततः प्रधानमंत्री मोदी को स्वीकारना पड़ा कि भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में है। उन्हें मानना पड़ा कि इस संकट के चलते करोड़ों लोग गरीबी रेखा के नीचे जाने की कगार पर हैं। बस जिस चीज को मानने से प्रधानमंत्री मोदी चालाकी से बच निकले वह यह कि अर्थव्यवस्था की यह हालत उनकी सरकार की बीते 12 वर्षों की गलत नीतियों- उनके कुकर्मों के कारण है। इसके बजाय प्रधानमंत्री मोदी इस संकट का ठीकरा कोरोना, अमेरिका-ईरान युद्ध आदि के जरिये सारी दुनिया पर फोड़ते नजर आये।
दरअसल हालिया ईरान युद्ध ने तो पहले से बीमार भारतीय अर्थव्यवस्था को एक झटके में उसकी असलियत का आईना दिखाने का काम किया है। वरना तो मोदी व उनकी संघी मण्डली बीमार अर्थव्यवस्था को प्रचार माध्यमों के जरिये ‘सबसे तेज गति से विकास करती’, ‘विकसित भारत की ओर बढ़ती’ आदि तरह-तरह के विशेषणों से नवाज अपनी पीठ आप ठोंकने में जुटी थी। ‘मेक इन इण्डिया’ - ‘स्टार्ट अप’ सरीखे अनेकों जुमले प्रचारित कर गर्त में जाती अर्थव्यवस्था को शिखर की ओर बढ़़ती दिखाने में जुटी थी।
मोदी काल के बीते 12 वर्षों में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में जो भी नीतियां अपनायी गयीं, उसने भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अम्बानी-अडाणी सरीखे चंद बड़़े पूंजीपतियों को सारे संसाधन-ठेके लुटाना, नोटबंदी, जीएसटी, कोरोना में तुगलकी लाॅकडाउन आदि सभी निर्णयों ने एक-एक कर अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को गहरे घाव देने का काम किया। आज हालत यह है कि ईरान युद्ध से तेल के भाव बढ़ने से सरकार को विदेशी मुद्रा भण्डार के खाली होने का भय सताने लगा है।
दरअसल विदेशी मुद्रा भण्डार सिकुड़ने के पीछे कई कारक हैं। देश में विदेशी निवेश आने के बजाय उसका तेजी से पलायन, बढ़ते पैट्रोलियम-सोने के भाव, भारतीय पूंजीपतियों का देश की तुलना में विदेशों में निवेश पर जोर, भारतीय मालों का निर्यात गिरना व आयात का बढ़़ते जाना, अप्रवासी भारतीयों द्वारा कम मुद्रा को भारत भेजना आदि सभी इसके लिए जिम्मेदार हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि सरकार की लोगों को सोना कम खरीदने, तेल कम खाने व पैट्रोलियम का कम इस्तेमाल करने की सीख से स्थिति में कुछ खास असर नहीं पड़ने वाला।
मोदी सरकार की चंद बड़े पूंजीपतियों को आगे बढ़ाने की नीति ने भारतीय अर्थव्यवस्था का बंटाधार करने में महती भूमिका निभायी है। जीएसटी-नोटबंदी-लाॅकडाउन की मार से तमाम छोटे-मझोले उद्योग धंधे तबाह हो गये। इनमें लगे करोड़ों लोगों का रोजगार छिन गया। परिणाम एक ओर इनके द्वारा किये जाने वाले निर्यात में कमी तो दूसरी ओर भारतीय बाजार में मांग के सिकुड़ने के रूप में सामने आया। मांग की कमी के चलते आज ज्यादातर औद्योगिक इकाइयां क्षमता से कम उत्पादन कर रही हैं और पूंजीपति नये उद्योगों में निवेश के बजाय अधिकाधिक सट्टाबाजी की ओर बढ़ रहे हैं।
उद्योग व कृषि दोनों ही क्षेत्र संकट का शिकार हैं। छोटी-मझोली किसानी खेती की बढ़ती लागत व फसलों के उचित दाम न मिलने के चलते तबाह हो रही है। 45-46 प्रतिशत आबादी इस तबाह होती खेती पर निर्भर है। इससे भारतीय देहातों की दुर्दशा-किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं को समझा जा सकता है। उद्योगों का हाल भी कुछ जुदा नहीं है। मजदूरों के खून की आखिरी बूंद निचोड़ने की इजाजत देने वाली श्रम संहिताएं भी उद्योगों में नया निवेश नहीं जुटा पा रही हैं। पूंजीपति नये उद्योग खोलने के बजाय मजदूरों को और निचोड़ कर सरकारी राहतों का लाभ उठा अपना मुनाफा बढ़ाने में जुटे हैं।
संकटग्रस्त उद्योग व कृषि के आधार पर खड़ा सेवा क्षेत्र ही कुछ तेजी से विकास कर रहा है। ऐसे में इसका अधिकांश विकास आभासी व बढ़ा-चढ़़ा है। सरकार की नीतियों के चलते एक ओर बेरोजगारी आसमान छू रही है तो दूसरी ओर असमानता पुराने सारे रिकार्ड तोड़ रही है।
अर्थव्यवस्था के इन हालातों में भी साम्प्रदायिक वैमनस्य-अंधराष्ट्रवाद फैलाकर व संवैधानिक संस्थाओं को भ्रष्ट कर मोदी सरकार एक के बाद एक चुनाव जीत रही है और यह भ्रम फैलाने में जुटी है कि जनता सरकार के कामकाज से खुश है।
अभी कुछ ही समय हुआ जब सरकार भारत के दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बनने का ढिंढोरा पीट रही थी और शीघ्र ही तीसरी बड़़ी अर्थव्यवस्था का ख्वाब परोस रही थी। पर भारतीय अर्थव्यवस्था के गहराते संकट व रुपये की गिरती ने उसके इस ख्वाब को पलीता लगा दिया। वर्तमान में भारत फिर से छठे स्थान पर लुढ़क चुका है। जापान, यूके उसे फिर से पछाड़ चुके हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था की इस गिरती पर मोदी सरकार दुनिया को कोस कर अपने कुकर्मों व अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकती।