इण्डोनेशिया में आर्थिक तंगी के चलते जनता में उबाल
इण्डोनेशिया में मौजूदा विरोध प्रदर्शनों ने 14-15 वर्ष पूर्व अरब बसंत के ट्यूनेशिया की यादें ताजा कर दीं। ट्यूनेशिया में तब एक पुलिस कांस्टेबल के फल विक्रेता को थप्पड़ व बा
इण्डोनेशिया में मौजूदा विरोध प्रदर्शनों ने 14-15 वर्ष पूर्व अरब बसंत के ट्यूनेशिया की यादें ताजा कर दीं। ट्यूनेशिया में तब एक पुलिस कांस्टेबल के फल विक्रेता को थप्पड़ व बा
दुनिया में जगह-जगह बढ़ रहे सैन्य टकरावों की कड़ी में बीते दिनों कम्बोडिया व थाइलैण्ड के शासक भी युद्ध में उलझ पड़े। अमेरिका के बड़बोले राष्ट्रपति को एक और युद्ध विराम कराने क
म्यांमार की जनता विनाशकारी प्राकृतिक आपदा की शिकार बनी है। विनाश की छाया थाइलैण्ड तक पहुंची है। 28 मार्च को दो शक्तिशाली भूकंप के विनाश से म्यांमार अभी उभर भी नहीं पाया थ
बांग्लादेश शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद से ही लगातार अशांत है। वहां नयी गठित अंतरिम सरकार में मौजूद भांति-भांति के तत्व देश को शांति की ओर नहीं बढ़ने दे रहे हैं। इस
बांग्लादेश में जन उभार द्वारा शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के बाद से यह चर्चा होने लगी है कि भारत के पड़ोसी देशों में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही है। श्रीलंका और बांग्लाद
बांग्लादेश की सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक स्थिति इस बात को बार-बार रेखांकित कर रही है कि आम जनों, मजदूरों-मेहनतकशों, छात्र-युवाओं की बुनियादी समस्याओं का समाधान न तो शेख हसीना, न मोहम्मद यूनुस, न बेगम जिया के पास है। इसका समाधान उन्हें स्वयं करना होगा। पूंजीवादी निजाम का खात्मा और समाजवाद ही अंततः समाधान का रास्ता खोल सकता है।
इस चुहिया का नाम मोहम्मद यूनुस है। यह सज्जन बांग्लादेश की नई अंतरिम सरकार के मुखिया बने हैं। वे नई अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि मुख्य सलाहकार हैं। नई सरकार के
भारत के पड़ोस में स्थित म्यांमार बीते कुछ समय से गृहयुद्ध का शिकार है। फरवरी 2021 में म्यांमार में सेना ने चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर यहां सैन्य शासन कायम कर लिया था। इ
चीन की मध्यस्थता में हुए साऊदी अरब और ईरान के बीच समझौते से अशांत पश्चिम एशिया में शांति की दिशा में प्रयास शुरू हो गये हैं। इन शांति प्रयासों से इस क्षेत्र में इजरायल काफी हद तक पश्चिम एशिया के शा
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।
जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है
हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।