दिमागी नक्सल और सिविल डिफेन्स
इस बार भी 15 अगस्त के दिन भारत देश की आम जनता को उसके राजा ने बताया कि किस तरह उसके 12 सालों के राज में भारत ने तरक्की की ऊंचाईयों को छुआ है। हर क्षेत्र में भारत विकास कर
इस बार भी 15 अगस्त के दिन भारत देश की आम जनता को उसके राजा ने बताया कि किस तरह उसके 12 सालों के राज में भारत ने तरक्की की ऊंचाईयों को छुआ है। हर क्षेत्र में भारत विकास कर
द हिन्दू अखबार में छपी एक खबर के अनुसार जनगणना-2027 में सरकार जनता से कई ऐसे सवाल पूछ रही है जिसका सम्बन्ध जनगणना से कम लोगों की व्यक्तिगत जानकारियां जुटाने से अधिक है। द
गुड़गांव-नोएडा में ठेका मजदूरों के स्वतः स्फूर्त संघर्ष की लहर को हरियाणा व उ.प्र.
आजकल ई-20 पेट्रोल का मामला काफी चर्चा में है। मोदी सरकार ने ई-20 एथेनाल मिश्रित पेट्रोल को ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘किसान कल्याण’ और ‘ऊर्जा सुरक्षा’ जैसे दावों के साथ बिना बहस
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों ही जगह 2017 से भाजपा की सरकारें हैं। उत्तर भारत में हर साल जुलाई-अगस्त (सावन) के महीने में कांवड यात्रा शुरू होती है। इस यात्रा में कांवड़ि
संसद ने ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक, 2026 को पारित कर दिया। विधेयक लोकसभा में बिना किसी चर्चा के महज 12 मिनट में और राज्यसभा में विपक्ष के वाकआउट के बीच लगभग एक घंटे की सीमित
अभी ज्यादा कुछ दिन नहीं हुए थे कि भाजपा ने पांच में से तीन राज्यों खासकर प.बंगाल में बम्पर जीत हासिल की थी। अब इस बात को छोड़ दिया जाए कि भाजपा ने जीत कैसे हासिल की। भाजप
जंतर-मंतर पर छात्र-युवा आंदोलन के आगे घुटने टेकते हुए मोदी सरकार ने सोचा था कि एक बार घुटने टेक कर वह छात्रों-युवाओं के उभार की लहर को थाम लेगी और अपनी सरकार को और नुकसान
‘वंदे मातरम’ एक बार फिर से चर्चा में है। मोदी सरकार और संघ के लिए राष्ट्र गीत और नारा भी उसी तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का हथियार है जैसे राम। राम के नाम पर लूट-खसोट मचाने
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है।
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?