पेट्रो डालर व्यवस्था पर बढ़ रहे खतरे
1971 में संयुक्त राज्य अमेरिका दिवालिया होने की कगार पर था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने वैश्विक वित्त व्यवस्था को एक वादे के आधार पर खड़ा किया था। प्रत्येक डॉलर सो
1971 में संयुक्त राज्य अमेरिका दिवालिया होने की कगार पर था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने वैश्विक वित्त व्यवस्था को एक वादे के आधार पर खड़ा किया था। प्रत्येक डॉलर सो
पहले से ही 4 वर्ष से रूस-यूक्रेन युद्ध की मार झेल रही विश्व अर्थव्यवस्था अब ईरान युद्ध के साथ नये खतरों का सामना कर रही है। ईरान युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अ
विश्व की सभी प्रमुख राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के मंच जी-20 ने दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता के समय वैश्विक स्तर पर अमीरों व गरीबों के बीच बढ़ती आर्थिक असमानता के अध्ययन के लि
अभी हाल ही में विश्व असमानता रिपोर्ट, 2026 प्रकाशित हुई है। इस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम, विश्व असमानता लैब और यूरोपीय संघ से सहायता प्राप्त एक अनुदान की
अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प के खिलाफ 18 अक्टूबर को लाखों युवा, श्रमिक, विद्यार्थी व आम जन सड़कों पर उतरे। इसे ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन की दूसरी लहर कहा गया। 2700 से ज्यादा प
अंगोला में 1 जुलाई से ईंधन सब्सिडी में कटौती कर दी गयी है। इस कटौती के खिलाफ मिनीबस टैक्सी एसोसिएशन ने 28 जुलाई को तीन दिवसीय हड़ताल का आह्वान किया। इस ईंधन सब्सिडी में कट
दक्षिणपंथियों और फासीवादियों की फितरत रही है कि वे जहर को भी अमृत के आवरण में लपेट कर पेश करते रहे हैं। कुछ ऐसा ही कारनामा अमेरिकी सरगना ट्रम्प अमेरिका के भीतर कर रहे हैं
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की अपनी वार्षिक रिपोर्ट ‘वर्ल्ड इकानामिक आउटलुक’ के मुताबिक 2025 में वैश्विक अर्थव्यवस्था उथल-पुथल वाली अनिश्चित राह की ओर बढ़ रही है। रिपोर्ट ट्
बीते दिनों अमेरिका में एक दिलचस्प वाकया घटित हुआ। 4 दिसम्बर को यूनाइटेड हेल्थ केयर के सीईओ ब्रायन थाम्पसन की मैनहट्टन में निवेशकों की एक बैठक में जाते समय गोली मारकर हत्य
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।
जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है
हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।