सम्पादकीय

गहराता सामाजिक आर्थिक संकट और ‘काकरोच जनता पार्टी’

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जैसा कि तय ही था कि जैसे ही पांच राज्यों में चुनाव निपटेंगे वैसे ही गैस, पेट्रोल-डीजल के दामों में आग लगेगी और महंगाई आसमान छूने लगेगी। मई माह के दूसरे पखवाड़े में पेट्रोल-डीजल सौ रुपये प्रति लीटर या उससे भी ज्यादा तक जा पहुंचे। बढ़ती महंगाई के बीच देश का आर्थिक संकट गहराता गया है और उसके साथ सामाजिक संकट भी गहरा रहा है। और इस गहराते सामाजिक संकट ने समाज के हर वर्ग और तबके को मजबूर कर दिया है कि वह अपनी प्रतिक्रिया दे।

हालिया विधानसभा चुनाव: कुछ निष्कर्ष

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इन सभी राज्यों में मजदूर-मेहनतकश जनता के सामने कोई ऐसी पार्टी नहीं थी जो सच्चे अर्थों में उसके हितों, आकांक्षाओं व भविष्य का प्रतिनिधित्व करती थी। विकल्पहीनता उसे एक धूर्त पूंजीवादी नेता या पार्टी के स्थान पर दूसरे धूर्त नेता या पार्टी की ओर ही धकेलती है। हिन्दू फासीवाद के बढ़ते खतरे का सामना इनमें से कोई भी पार्टी करने में सक्षम नहीं है।

ये तो होना ही था

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अप्रैल माह में भारत के मजदूरों खासकर औद्योगिक मजदूरों के सब्र का बांध टूट गया। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन सी आर) के मजदूर हजारों-हजार की संख्या में सड़कों पर उतर आये। श

अमेरिकी साम्राज्यवाद के हमले व आतंक के साये में ‘मई दिवस’

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यह एक सच्चाई है कि जितने लोग दूसरे विश्वयुद्ध में मारे गये थे उससे कहीं अधिक लोग दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों के हमले, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष युद्ध में मारे जो चुके हैं। और यह भी सच है कि जब तक साम्राज्यवाद, पूंजीवाद जिन्दा रहेगा तब तक मानव जाति का यूं ही कत्लेआम होता रहेगा। 

यह समय : राक्षसी बूढ़ों का समय

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बूढ़े लोग पूरे घाघपने, धूर्तता के साथ दुनिया पर शासन कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प (79), शी जिनपिंग (73), पुतिन (73), लूला (80), मोदी (75) जैसे बूढ़े दुनिया के अधिकांश देशों म

अमेरिकी साम्राज्यवादियों का बढ़ता पागलपन व बहशीपन

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बदमाश ट्रम्प व धूर्त नेतन्याहू का न केवल जनता के बीच बल्कि स्वयं शासक वर्ग की कतारों के बीच भी विरोध तेजी से बढ़ा है। इस कारण इन दोनों के तेवर पहले दिनों के मुकाबले बाद में ढीले पड़ने  शुरू हुए हैं। दोनों ही देशों में ट्रम्प व नेतन्याहू को आगामी महीनों में चुनाव का सामना करना है। युद्ध का लम्बा खिंचना इन दोनों ही धूर्तों के राजनैतिक भविष्य पर संकट खड़ा करने लगेगा। और ठीक यही ईरान चाहता है।

आठ मार्च का दिन इंकलाब व मुक्ति के नाम

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आठ मार्च का दिन मजदूर-मेहनतकश महिलाओं का ऐसा दिन है जब वे तसल्ली से इस बात पर विचार करती हैं कि सही क्या और गलत क्या है। मुक्ति क्या और गुलामी क्या है। उनका अतीत क्या व भविष्य क्या है। कौन उनका साथी है और कौन उनकी मुक्ति की राह में रोड़ा है। 

भारत को लज्जित करते भारत के शासक

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हकीकत में क्या हुआ है? भारत के स्वयंभू राष्ट्रवादियों ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। और एक तरीके से अपने इतिहास को फिर से दुहरा दिया है। आजादी की लड़ाई के समय ये ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के ‘आज्ञाकारी सेवक’ थे और आज ये अमेरिकी साम्राज्यवादियों के आज्ञाकारी अनुचर बने हुए हैं। 

मुक्त व्यापार समझौते : भारत को घेरते साम्राज्यवादी

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इन मुक्त व्यापार समझौतों को मोदी सरकार अपनी बहुत बड़ी सफलता व उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रही है। सब्जबाग दिखाये जा रहे हैं। और एक से बढ़कर एक काल्पनिक आंकड़े पेश किये जा रहे हैं।

एक राष्ट्र का सरेआम बलात्कार

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वेनेजुएला की स्वतंत्रता व सम्प्रभुता पर अमरीकी साम्राज्यवादी आक्रमण की हर ओर से निंदा हुयी है। कुछ ही ऐसे शासक हैं जो मोदी की तरह मौन या तटस्थ हैं। और बहुत-बहुत थोड़े से हैं जो इजरायल के नेतन्याहू की तरह हैं जो निर्लज्जतापूर्वक ट्रम्प के साथ खड़े हैं। क्यांकि वे भी ट्रम्प की ही तरह नमूने हैं। खास बात यह है कि ट्रम्प का सबसे ज्यादा विरोध स्वयं स.रा.अमरीका में हुआ है। बड़े-बड़े विशाल जुलूस निकले हैं जिनमें वेनेजुएला पर अमरीकी हमले की निंदा की गयी है।

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

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शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

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जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

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हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।