भारतीय खनिज सम्पदा अमेरिका को लुटाने की तैयारी

Published
Mon, 06/01/2026 - 15:50

भारत-अमेरिका महत्वपूर्ण खनिज समझौता

भारत सरकार की अमेरिकापरस्ती हर बीते दिन के साथ बढ़ती जा रही है। अमेरिकी सरगना ट्रम्प द्वारा बारम्बार अपमानित किये जाने के बावजूद भारत के संघी शासक अमेरिकापरस्ती से पीछे नहीं हट रहे हैं। हाल ही में दोनों देशों ने महत्वपूर्ण खनिजों व दुर्लभ मृदा तत्वों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक ढांचागत समझौते पर हस्ताक्षर किये। समझौते में इन तत्वों के खनन व प्रसंस्करण दोनों पर सहयोग करने की बात तय हुई। इस समझौते को अंतिम रूप अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की चार दिवसीय भारत यात्रा के दौरान दिया गया। इसके साथ ही क्वाड देशों (अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया, भारत) के विदेश मंत्रियों की बैठक में क्वाड देशों के बीच एक महत्वपूर्ण खनिज ढांचा बनाने की भी घोषणा की गयी। 
    
महत्वपूर्ण खनिजों के तहत निकिल, कोबाल्ट, लिथियम, एल्युमिनियम, जस्ता आदि धातुओं के साथ 17 दुर्लभ मृदा तत्व आते हैं। ये वे गैर ईंधन खनिज हैं जिनका उपयोग बैटरी, घड़ियों, वायरिंग, सैन्य उपकरण, सेमीकण्डक्टर और अन्य आधुनिक तकनीकी उत्पादों में किया जाता है। अमेरिकी साम्राज्यवादी चीनी-रूसी साम्राज्यवादियों से बढ़ते टकराव के मद्देनजर इन खनिजों की व्यवधान की शिकार आपूर्ति श्रंखला के बीच, चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए कई देशों से समझौते कर वैकल्पिक आपूर्ति तलाश रहे हैं। 
    
दरअसल अमेरिका 12 महत्वपूर्ण खनिजों के लिए पूरी तरह व 29 खनिजों के आधे से अधिक के लिए आयात पर निर्भर है। दुर्लभ मृदा तत्वों के लिए (जिनका उपयोग चुंबकीय गुणों के चलते औद्योगिक स्वचालन, इलेक्ट्रिक मोटर, ऊर्जा जनरेटर, इलेक्ट्रोनिक्स, चिकित्सा उपकरणों, द्रोण, युद्ध सामग्रियों आदि में होता है) यह चीन पर बुरी तरह से निर्भर है। चीन में इन दुर्लभ मृदा तत्वों का 60 प्रतिशत भण्डार है व यह दुनिया के 90 प्रतिशत दुर्लभ मृदा तत्वों का प्रसंस्करण करता है। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादी चीन पर अपनी इस निर्भरता को घटाने को हाथ पैर मार रहे हैं। इसके लिए वे दुर्लभ मृदा तत्वों के महत्वपूर्ण भण्डार वाले देशों से समझौते कर रहे हैं। चूंकि इन तत्वों के प्रसंस्करण में भारी मात्रा में प्रदूषण व जहरीला कचरा बनता है इसलिए अमेरिकी साम्राज्यवादी इनके प्रसंस्करण का काम भी अमेरिका में न करके इन पिछड़े देशों में ही करना चाहते हैं। 
    
भारत अभी बड़ी मात्रा में केवल 4 महत्वपूर्ण खनिजों तांबा, ग्रेफाइट, फास्फोरस व टाइटेनियम का उत्पादन करता है पर यहां 30 से अधिक महत्वपूर्ण खनिजों का भण्डार है। साथ ही यहां 7.23 मिलियन टन दुर्लभ मृदा तत्व आॅक्साइड भण्डार मौजूद है। पर अन्वेषण व प्रसंस्करण तकनीक के अभाव के चलते इनका ज्यादा उत्पादन नहीं किया जाता है। 
    
पिछले बजट में सरकार ने उड़ीसा, केरल, आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु में दुर्लभ मृदा गलियारे बनाने की नीति पेश की थी। इन गलियारों में दुर्लभ मृदा तत्वों का खनन, प्रसंस्करण व इनसे चुंबक निर्माण तक की सारी गतिविधि होनी थी। अब अमेरिका से वर्तमान समझौते व क्वाड देशों के परस्पर सहयोग की घोषणा से स्पष्ट है कि ये गलियारे अमेरिकी पूंजी व तकनीक से आगे बढ़ेंगे। जहां तैयार चुम्बक अमेरिका को निर्यात होंगे व भारतवासी पीछे छूट गये जहरीले कचरे के दुष्परिणाम भुगतेंगे। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादी बीते कुछ वर्षों में अर्जेण्टीना, कुक द्वीप समूह, इक्वाडोर, गिनी, मोरक्को, पैराग्वे, पेरू, फिलीपींस, संयुक्त अरब अमीरात, यूके व उज्बेकिस्तान के साथ महत्वपूर्ण खनिज समझौते कर चुके हैं। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के रेकोडिक में अमेरिका ने महत्वपूर्ण खनिज खनन में 1.25 अरब डालर निवेश की घोषणा की है। द.अफ्रीका के फालबोखा रेयर अर्थस प्रोजेक्ट में  5 करोड़ डालर निवेश अमेरिका कर रहा है। 
    
स्पष्ट है कि गरीब देशों के महत्वपूर्ण खनिजों पर कब्जे की वैश्विक ताकतों के बीच प्रतिद्वन्द्विता बढ़ती जा रही है। यह भविष्य में इनके उपयोग के मद्देनजर कब्जे का झगड़ा है। पिछली सदी में जो महत्व तेल संसाधनों का था नयी सदी में वही महत्व महत्वपूर्ण खनिज हासिल कर रहे हैं। ऐसे में अमेरिकी साम्राज्यवादी इनके भण्डार वाले हर देश से समझौता कर पहले ही आगे निकल चुके चीन को टक्कर देना चाहते हैं। इसी प्रक्रिया में गरीब मुल्कों में इनका प्रसंस्करण कर वहां की मिट्टी-पानी जहरीला बनाने की ताक में है। यानी सारा लाभ साम्राज्यवादियों का और सारी पीड़ा-कष्ट गरीब मुल्कों के हिस्से। 
    
मोदी सरकार इस समझौते से भारत के संसाधन अमेरिका को लुटाने व जहरीला कचरा भारत में फैलाने का इंतजाम कर रही है। 

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