दिमागी नक्सल और सिविल डिफेन्स

Published
Sun, 01/04/2026 - 15:50
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इस बार भी 15 अगस्त के दिन भारत देश की आम जनता को उसके राजा ने बताया कि किस तरह उसके 12 सालों के राज में भारत ने तरक्की की उचाईयों को छुआ है। हर क्षेत्र में भारत विकास कर रहा है। वह दिन अब दूर नहीं जब देश की फटेहाल जनता को पता चले कि उनका देश "विकसित भारत" बन चुका है।

मोदी के अनुसार भारत को विकसित बनाने में उनके सामने कुछ समस्याएं हैं। दरअसल उनका ये विकास का रास्ता कुछ लोगों को समझ या पसंद नहीं आ रहा और ये नादान लोग विकास में रोड़ा अटकाते हैं। मोदी के अनुसार ये नक्सली हैं, अर्बन नक्सल हैं, आंदोलनजीवी हैं और इस बार 15 अगस्त को उन्होंने इन नादान लोगों के लिए एक नया शब्द इस्तेमाल किया है वह है - दिमागी नक्सल। कुछ लोग कह रहे हैं कि कुछ दिन पहले के फ्रेंड्स ही अब दिमागी नक्सल बन गये हैं। जो भी हो लेकिन इतना तो साफ है मोदी का दिमागी नक्सल का विचार एक बहुत ही खतरनाक फासीवादी कार्यवाही का आगाज है। यह मोदी भक्तों और मोदी विरोधियों दोनों के लिए स्पष्ट है।

इस शब्द की उत्पत्ति उनके दिमाग़ में कैसे हुई यह तो मोदी जी ही बता सकते हैं लेकिन उन्होंने दिमागी नक्सल से निपटने के लिए एक कार्य दिशा रख दी है। इसके संकेत उनके भाषण में मिल जाते हैं। वह है सिविल डिफेन्स। वे इन दिमागी नक्सल को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताते हैं और इस आंतरिक खतरे से निपटने के लिए वे सिविल डिफेन्स फोर्स बनाने की बात करते हैं।

ऐसा नहीं है कि यह सिविल डिफेन्स कोई नई चीज़ है। जैसे कि मोदी व उनके संघ में बैठे आका नये नहीं हैं। ये हिटलर के वंशज हिटलर की तरह सिविल डिफेन्स फोर्स बनाने की बात कर रहे हैं। दरअसल हिटलर के शासन में उसके खासमखास दूसरे नंबर के व्यक्ति हरमन गोरिंग ने 1933 में आर वी एल का गठन किया था। इसके सदस्यों का काम था हिटलर और उसके नाज़ीवाद के खिलाफ विचार रखने वालों का पता लगाना और गेस्टापो को उसकी खबर पहुँचाना और फिर गेस्टापो उन लोगों के साथ क्या करती थी यह इतिहास में दर्ज़ है।

मोदी सरकार में दूसरे नंबर का व्यक्ति इस समय कौन है यह किसी से छिपा नहीं है। वैसे तो मोदी जिस सिविल डिफेन्स फोर्स को बनाने की बात कर रहे हैं वह समाज में मौजूद है। बजरंग दल, श्री राम सेना, करनी सेना, विश्व हिन्दू परिषद आदि आदि संघ के अनुषन्गी संगठन हैं और इनके कार्यकर्ता वही काम कर रहे हैं जिसकी मोदी और उनके आका अपेक्षा करते हैं। सी ए ए - एन आर सी का आंदोलन या फिर किसानों का आंदोलन हर जगह उन्होंने अपनी भूमिका का निर्वहन किया है। अभी हाल में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में भी ये पुलिस के साथ मिलकर छात्रों के आंदोलन को कुचलने में अपनी भूमिका निभा रहे थे। गौ रक्षा, लव जिहाद आदि मसलों पर भी ये अपनी भूमिका सक्रिय रूप से निभाते हैं। लेकिन अभी इनकी कार्यवाहियाँ समाज में लम्पटाई के दायरे में आती हैं। मोदी बस इतना करना चाहते हैं कि सिविल डिफेन्स फोर्स के नाम पर इनको क़ानूनी जामा पहनाया जा सके। उसके बाद वे इन लोगों को आधुनिक हथियार और तकनीक से भी लैस कर दिमागी नक्सलों से निपटने के लिए तैयार करना चाहते हैं।

हिटलर की विचारधारा और तौर-तरीकों से सीखकर ये फ़ासीवादी शासक सोचते हैं कि वे इसी तरह पूंजी की सेवा करते रहेंगे और अपने हिस्से की मलाई खाते रहेंगे लेकिन इतिहास अगर हिटलर के उदय का है तो उसके अंत का भी है।

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