मजदूर संघर्षों की लहर का नया केन्द्र- कानपुर
उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन का सिलसिला एक के बाद एक फैक्टरी में जारी है। इसी क्रम में 16 मई को सचेंडी स्थित आटो पार्ट्स कम्पनी स्पन माइक्रो
उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन का सिलसिला एक के बाद एक फैक्टरी में जारी है। इसी क्रम में 16 मई को सचेंडी स्थित आटो पार्ट्स कम्पनी स्पन माइक्रो
देश के बड़े हिस्से में मजदूर संघर्षों की लहर जारी है। उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के दौर में ज्यादा तेजी बढ़ती हुई पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग की खाई की पृष्ठभूमि में मजदूरी
भारत का मजदूर वर्ग उदारीकरण- निजीकरण की नीतियों के भारत में लागू होने के बाद की सबसे तीव्र लहरों में से एक (और संभवतः सबसे व्यापक) से गुजर रहा है। यद्यपि यह लहर अप्रैल मा
उत्तर भारत में दो माह पूर्व पैदा हुई मजदूर संघर्षों की लहर लगातार जारी है। मजदूरों के संघर्ष की इस लहर ने पहले हरियाणा-उ.प्र.
मौजूदा मजदूर आंदोलन के उभार को पूरे देश ने देखा। कैसे मजदूर अपनी बदहाल होती स्थिति को लेकर सड़कों पर उतर आए और एक के बाद एक कई फैक्टरियों में मजदूरों ने काम बंद कर हड़ताल क
अप्रैल माह की शुरूआत से मानेसर-नोएडा-फरीदाबाद-भिवानी में एक के बाद एक फैक्टरी में मजदूरों का आक्रोश दावानल बनकर फूट पड़ा। सालों से अपने मालिकों-प्रबंधन के शोषण-उत्पीड़न को
24 फरवरी 2026ः हरियाणा में पानीपत स्थित इंडियन आयल कारपोरेशन लिमिटेड (IOCL) की रिफाइनरी में कार्यरत हजारों मजदूर हड़ताल पर हैं। 23 फरवरी को सुबह 11 बजे से
मजदूर विरोधी 4 नये लेबर कोड्स के विरोध में केंद्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों द्वारा 12 फरवरी को आहूत देशव्यापी आम हड़ताल में मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) से जुड़े घटक सं
12 फरवरी की आम हड़ताल पिछले कुछ वर्षों की हड़तालों से कहीं अधिक सफल रही। स्कीम वर्कर्स, गिग मजदूरों-सरकारी कर्मियों के साथ कई जगह निजी क्षेत्र की यूनियनों ने भी हड़ताल की। द
गिग एंड प्लेटफार्म सर्विस वर्कर्स यूनियन (जीआईपीएसडब्ल्यूयू) के आह्वान पर, भोजन और अन्य ऐप-आधारित ‘‘डिलीवरी पार्टनर’’ ने ‘‘सुरक्षा, संरक्षा और सम्मान’’ के अधिकार की मांग
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।
जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है
हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।