साधो, ठगवा नगरिया लूटल हो!

Published
Thu, 07/16/2026 - 15:50
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भक्तजन अक्सर कहते रहते हैं- राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। संघ परिवार ने इन भक्तजनों की बात सुनी और राम नाम को लूट लिया। लूट कर उन्होंने ‘जय सियाराम’ को ‘जय श्री राम’ बना दिया। लेकिन उनका मन इतने से नहीं भरा। राम का नाम लूटने के बाद उन्होंने राम के मंदिर को ही लूट लिया। वैसे संघी कह सकते हैं कि वह मंदिर राम का नहीं है। उसे तो संघियों ने ही बनवाया है। अब वे अपने बनवाये मंदिर को लूटें या न लूटें, यह उनका अपना मसला है। दूसरे इस लूट में अपनी टांग क्यों अड़ा रहे हैं? संघी यह कह नहीं सकते बल्कि कह रहे हैं। वे कह रहे हैं कि राम मंदिर उनका है, मंदिर का चढ़ावा उनका है, हिन्दू उनके हैं। ऐसे में वे चढ़ावे को लूट क्यों नहीं सकते?
    
इतिहास में एक से एक ठग-लुटेरे हुए हैं। इनसे कहांनियां भरी पड़ी हैं। कई फिल्में भी बनी हैं। ‘पाइरेट्स आव कैरेबियन’ को कौन भूल सकता है? भारत में बाहरी-भीतरी ठगों-लुटेरों की एक लम्बी सूची है। महमूद गजनवी, तैमूर लंग तथा नादिरशाह का नाम तो संघी ही लगातार जपते रहते हैं। सबसे बड़े ठग-लुटेरे तो अंग्रेज साबित हुए। वे आये थे भारत में व्यापार करने पर अंत में सारे देश के मालिक बन बैठे। उन्होंने यहां जो लूट मचाई उसके सामने तो पहले वाले सारे लुटेरे मासूम लगने लगे। 
    
अब विश्व गुरू की चाहत रखने वाले संघियों ने इन सारे ठगों-लुटेरों का रिकार्ड तोड़ दिया है। कम से कम इस मामले में वे विश्व गुरू बन गये हैं। वेटिकन वाले यह दावा नहीं कर सकते कि उन्होंने राम मंदिर से ज्यादा लूटपाट की है। इसी तरह काबा वाले भी दावा नहीं कर सकते। रही स्वर्ण मंदिर वालों की बात तो वे तो महज देशी हैं। वे क्या खाकर संघ परिवार का मुकाबला करेंगे? 
    
संघी ठगों-लुटेरों की खासियत है कि उन्होंने अपनी ठगी और लूट को कभी छिपाया नहीं। उन्होंने जो किया वह डंके की चोट पर किया। सीना ठोंक कर किया। यदि लोगों ने उसे नेकी या भलाई का काम समझा तो यह उनकी समस्या है। 
    
राम मंदिर को ही लें। संघियों ने कभी यह छिपाया नहीं कि अयोध्या में राम मंदिर का मामला धर्म का नहीं बल्कि राजनीति का मामला है। आडवाणी, इत्यादि ने कई बार इसे खम ठोंककर कहा। अब यदि आम हिन्दू इसे धर्म का मामला समझता है तो यह उसकी समस्या है। यह संघियों की समस्या नहीं है। उनकी अंतरात्मा साफ है। वैसे भी संघियों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सारे उपाय जायज हैं। ऐसे लोगांे की अंतरात्मा हमेशा साफ और शांत रहती है। वे शांत मन से झूठ बोल सकते हैं, अफवाहें फैला सकते हैं, दंगे करवा सकते हैं, हत्या करवा सकते हैं। और उसके बाद वे उतने ही शांत मन से चरित्र निर्माण पर प्रवचन दे सकते हैं। 
    
ऐसे ही शुद्ध अंतरात्मा वाले संघियों ने 1949 में रात में चोरी से बाबरी मस्जिद में रामलला की मूर्ति रख दी और प्रचारित कर दिया कि वहां रामलला प्रकट हो गये हैं। इन्हीं शुद्ध अंतरात्मा वाले संघियों ने 1992 में देश के सर्वोच्च न्यायालय को आश्वासन देकर बाबरी मस्जिद तोड़ डाली। और फिर उन्होंने ‘न्यायपालिका का सम्मान’ करते हुए सर्वोच्च न्यायालय से वहां मंदिर बनवाने का फैसला लिखवा लिया। इन्हीं की तरह के शुद्ध अंतरात्मा वाले न्यायाधीशों ने वह फैसला लिख भी दिया। उन्होंने लिख दिया कि हालांकि मस्जिद को गिराना भीषण अपराध था तो भी वह जगह हिन्दुओं को यानी संघियों को मंदिर निर्माण के लिए दे दी जाये।
    
संघी ठगों-लुटेरों ने बाबरी मस्जिद की जगह लूट ली और वहां राम मंदिर बना दिया। अब यदि कोई आस्थावान हिन्दू इतने अपवित्र तरीके से बने हुए मंदिर को पवित्र समझता है तो यह उसकी समस्या है। संघियों ने तो यह लूटपाट की ही थी अपनी राजनीति के लिए। इसके जरिये वे देश की राजनीति में हावी हो गये। वे आज केन्द्र में और ज्यादातर प्रदेशों में सत्ता में हैं। रामनाम की लूट उनके लिए काफी फायदेमंद साबित हुयी थी। वे उसे आगे भी लूटना चाहते थे। इसके लिए इससे अच्छा तरीका क्या हो सकता था कि देश भर में हिन्दुओं को राम मंदिर के दर्शन के लिए प्रेरित किया जाता और फिर उनके चढ़ावे को लूट लिया जाता। अब इस पर इतनी हाय-तौबा क्यों? कौन अपनी मेहनत का फल नहीं चखना चाहता?
    
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये? उन्हें चढ़ावे से ललचा कौन रहा है? आज नहीं तो कल संघी ठग-लुटेरे अपने ऊपर लग रहे लांछन के जवाब में परंपरा का हवाला जरूर देंगे। यदि श्री हर्ष कश्मीर के मंदिरों को लूट सकता था तो संघी ठग-लुटेरे क्यों नहीं? उनका तो ‘हिन्दू राष्ट्र’ का और भी बड़ा लक्ष्य है। 
    
बल्कि इन ठगों की सबसे बड़ी ठगी ही ‘हिन्दू राष्ट्र’ का सपना है। इन ठगों ने देश के हिन्दू जन मानस के एक ठीक-ठाक हिस्से को ‘हिन्दू राष्ट्र’ का सपना दिया है या ज्यादा सही कहें तो ठगों की तरह लोगों को इस सपने से सम्मोहित कर दिया है। उन्होंने कहे-अनकहे लोगों के दिमाग में यह भरा है कि जब ‘हिन्दू राष्ट्र’ बन जायेगा तो सब कुछ ठीक हो जायेगा। हर किसी को रोजगार मिल जायेगा, गरीबी-भुखमरी दूर हो जायेगी, भ्रष्टाचार-अपराध खत्म हो जायेगा, हर कोई सच्चरित्र हो जायेगा और भारत एक बार फिर विश्व गुरू बन जायेगा। यह सब कैसे होगा, ये ठग यह नहीं बताते। बस इतना जरूर बताते हैं कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा अल्पसंख्यक हैं, खासकर मुसलमान। यदि उन्हें ठिकाने लगा दिया जाये तो ‘हिन्दू राष्ट्र’ का रास्ता साफ हो जायेगा। इसके लिए जरूरी है संघियों को सत्ता में पहुंचाना। और ये ठग आज ‘हिन्दू राष्ट्र’ का सपना दिखाकर सत्ता में पहुंच भी गये हैं। 
    
जो आम हिन्दू आज संघी ठगों-लुटेरों द्वारा राम मंदिर के चढ़ावा चोरी से आहत हैं वे जरा भी सचेत नहीं हैं कि इन ठगों-लुटेरों ने इससे कहीं बड़ी लूट तो पहले ही कर ली। इसी लूट से ये आज देश भर में सत्तानशीन हैं। ‘हिन्दू राष्ट्र’ का सपना दिखाकर वे स्वयं विभिन्न स्तरों पर सत्ता पर काबिज हैं। सपनों की लूट से बड़ी कोई लूट नहीं होती। और इन ठगों ने तो लोगों के अच्छे जीवन के सपने को ही लूट लिया। ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ जिंगल को सुनते समय लोगों ने नहीं सोचा था कि ठगों-लुटेरों के अच्छे दिन आने वाले हैं। 
    
कहते हैं कि शैतान को भी उसका श्रेय मिलना चाहिए। इसी तर्ज पर संघी ठगों की तारीफ में यह कहना पड़ेगा कि उन्होंने राजनीति में ठगी को कला के ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया है। यहां बात सांसदों-विधायकों की खरीद-फरोख्त, ‘वाशिंग मशीन’ या ‘वोट चोरी’, इत्यादि की नहीं हो रही है। यहां बात दूसरी हो रही है। 
    
समाज का मध्यम वर्ग पढ़ा-लिखा है और खुद को बहुत समझदार समझता है। कम से कम वह आम मजदूर-मेहनतकश जनता के मुकाबले खुद को बहुत समझदार समझता है क्योंकि उसे वह जाहिल समझता है। इस ‘समझदार’ पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग के एक बड़े हिस्से को संघी ठगों ने अपना मुरीद बना लिया। इतना कि वह ‘भक्त’ बन गया। यह बहुत मजेदार नजारा है कि अपनी डिग्रियों पर इतराने वाले लोग एक ऐसे व्यक्ति के ‘भक्त’ बन गये जिसकी डिग्री का अता-पता नहीं। अपनी सामाजिक हैसियत को लेकर अतिशय संवेदनशील लोग एक ऐसे व्यक्ति के ‘भक्त’ बन गये जो गाता फिरता है कि वह ‘चायवाला’ है। अपने ज्ञान पर इतराने वाले लोग एक ऐसे व्यक्ति के ‘भक्त’ बन गये जो मुंह खोलते ही बेवकूफी की बातें करता है। 
    
इन ठगों ने इस मध्यम वर्ग की चाहतों, चिन्ताओं, आशंकाओं और समस्याओं को पहचाना। उन्होंने इस वर्ग की उद्विग्नता को और भड़काया। उसे जताया कि कुछ पराये लोग हैं जो उसके वर्तमान और भविष्य के लिए खतरा हैं। कि उसका उद्धार संघियों की छतरी तले आने में ही है। एक बार शैतान के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने के बाद इस उद्धिग्न मध्यम वर्ग की अंतरात्मा वैेसे ही शुद्ध होने लगी जैसे संघियों की। अब जाति-धर्म इत्यादि को लेकर उसके उहापोह शांत होने लगे। वह उदारता और प्रगतिशीलता का मुखौटा उतार कर आराम से जातिवादी हो सकता था। इससे भी ज्यादा आराम से वह साम्प्रदायिक हो सकता था। जो वैमनस्य इस मध्यम वर्ग के सीने में दफन था वह अब छलककर खुली नफरत के रूप में सामने आ गया। ‘वोक’ न होना अब ‘वोक’ हो गया। अब बहुत आराम से अपने पोंगापंथ और जाहिलियत का प्रदर्शन किया जा सकता था क्योंकि संघी ठगों ने तो इसे ‘प्राचीन गौरव’ का जामा पहना दिया था। संघी ठगों ने इस मध्यम वर्ग को अपने रंग में रंग लिया था। 
    
इस रंग में रंगकर न केवल इस मध्यम वर्ग की अंतरात्मा संघी ठगों की तरह शुद्ध हो गयी बल्कि उन्हें अपना हित भी दिखाई देना बंद हो गया। उसे लूटकर संघी ठग अपने पूंजीपति आकाओं की तिजोरियां भरते रहे और यह वर्ग साम्प्रदायिक अफीम में मदहोश रहा। इस पर कर्ज बढ़ता गया, इसकी ई एम आई भारी होती गयी, इसकी कार एथेनाल से खचाड़ा हो गयी पर इसकी भक्ति में कोई कमी नहीं आई। विश्वगुरू के सपने के लिए वह कोई भी कीमत चुकाने को तैयार था। अब वह शिकायत नहीं कर सकता कि संघी ठगों ने राम मंदिर का चढ़ावा लूट लिया। आखिर इसे भी उसी कीमत में क्यों न गिना जाये? वैसे भी अपनी जिन्दगी में लगातार चिन्दी चोरी में लिप्त यह मध्यम वर्ग किस मुंह से शिकायत कर सकता है? 
    
ठगों-लूटेरों के भी दिन पूरे होते हैं। अक्सर यह तब होता है जब उनकी ठगी और लूट चरम पर पहुंच जाती है। लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए वे एकदम आश्वस्त हो जाते हैं कि वे पकड़े नहीं जायेंगे। और तब वे लापरवाह हो जाते हैं और कुछ ऐसा कर गुजरते हैं कि आंखें मूंदे लोगों को भी खटकने लगता है। राम मंदिर के चढ़ावे की लूट संघी ठगों-लुटेरों के लिए वैसा ही क्षण है। अब हर हिन्दू ठिठककर सोचने लगा है कि संघियों पर कितना विश्वास किया जाये। 
    
संघी ठग-लूटेरे भी सचेत हैं। वे लीपापोती में लग गये हैं। वे पूरी कोशिश कर रहे हैं कि यह दाग उनके दामन से छूट जाये। पर उनके दुर्भाग्य से वे जितना रगड़ते हैं दाग उतना फैलता जाता है। 
    
ऐसा नहीं है कि आम हिन्दू अब इन संघी ठग-लुटेरों को डंडा लेकर खदेड़ने लगेंगे। ऐसा नहीं है कि भक्त गणों की भक्ति एक झटके में खत्म हो जायेगी। पर विश्वास कहीं न कहीं दरक चुका है और समय के साथ दरार चैड़ी होती चली जायेगी। पहले ही सरकारी भ्रष्टाचार और वादाखिलाफी से मन कसैला हुआ पड़ा था। पर साम्प्रदायिक नशा इन कसैलेपन को हलका कर दे रहा था। अब कड़वाहट बढ़ जायेगी। 
    
इन स्थितियों ने उन लोगों के लिए सुनहरा अवसर पैदा किया है जो संघी जहर से समाज को मुक्त कराने की मुहिम में लगे हुए हैं। उन्हें ज्यादा जोर-शोर से संघी ठगों-लुटेरों के असली चरित्र का पर्दाफाश करना होगा और बताना होगा कि राम मंदिर का चढ़ावा चोरी तो इन ठगों के कारनामों में सबसे कम महत्व का है। असली ठगी तो उनका ‘हिन्दू राष्ट्र’ का सपना है जो बाकी ठगियों की जड़ में है। 

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