काॅकरोच जनता पार्टी - हिंदू फासीवादी व सही राह

Published
Mon, 06/01/2026 - 15:50
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काॅकरोच जनता पार्टी के इंटरनेट पर धमाल ने और कुछ किया हो या न किया हो मगर इतना तो जरूर किया है कि हिंदू फासीवादियों को अलग से अपना मगर देशभक्त काॅकरोच घोषित करना पड़ा है। 
    
हिंदू फासीवादियों की पत्रिका पांचजन्य और आर्गनाइजर ने काॅकरोच और काॅकरोच जनता पार्टी को गलियाने में, इसे षड्यंत्र साबित करने में खूब पसीना बहाया है। इसलिए कहना ही होगा कि काॅकरोच ने संघ परिवार को थोड़ा बीमार कर दिया है और ये कुछ-कुछ अस्थमा से ग्रसित हो गए हैं। 
    
पांचजन्य में काॅकरोच पर जो लेख संघ ने लिखा है उसका शीर्षक है ‘काॅकरोच काॅकटेल: लोकतंत्र, मीम और माचिस की तीली’। इस लेख में काॅकरोच जनता पार्टी को एक साजिश, एक टूल किट, एक पुराना वार रूम साबित करने का काम किया गया है।
    
इसके बाद एक दूसरे लेख में पांचजन्य ने इस पार्टी को विपक्ष व डीप स्टेट का जेनरेशर्न का ब्रेनवाश करने का टूलकिट बताया है। इसमें राहुल गांधी व आम आदमी पार्टी पर निशाना साधते हुए मोदी काल में भारत के विकास का ढिंढोरा पीटा गया है। तीसरा लेख तो अभिजीत दिपके के पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई एस आई से सम्बन्ध की मनगढ़न्त कहानी कहते हुए काॅकरोच जनता पार्टी के 77 प्रतिशत फालोअर पाकिस्तान, बांग्लादेश, अमेरिका आदि से होने की बात करता हुआ इसे भारत के खिलाफ विदेशी साजिश करार देता है। 
    
लेख में वास्तविक तथ्यों को गायब करके, झूठे तथ्यों या आधे-अधूरे तथ्यों का हवाला देकर इसे एक साजिश बताने का काम किया गया है। लेख गलत तर्क पद्धति, भावनात्मक बातों और भ्रांतिपूर्ण तर्कों का इस्तेमाल करता है। 
    
सी जे आई सूर्यकांत की मुख्य टिप्पणी का यह लेख जिक्र तक नहीं करता। बाद में जो स्पष्टीकरण सूर्यकांत द्वारा इस रूप में दिया गया कि उनकी टिप्पणी बेरोजगार युवाओं पर नहीं, बल्कि कथित फर्जी-जाली डिग्री लेकर पेशों में घुसने वालों पर थी। लेख इस टिप्पणी को आधार बनाकर और अभिजीत दिपके के अतीत को आधार बनाकर काॅकरोच को कुचलने की कोशिश करता है जो कि बेहद असफल और भौंडा है। 
    
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था ‘कुछ बेरोजगार युवा काॅकरोच की तरह होते हैं, जिन्हें न तो रोजगार मिलता है और न ही पेशे में कोई जगह। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं कुछ एक्टिविस्ट बन जाते हैं और हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं’। सी जे आई ने आगे कहा कि ये ‘परजीवी’ समाज का हिस्सा हैं जो सिस्टम पर हमला करते हैं। समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी लोग हैं। 
    
इस तरह साफ है महफिल में जिस बात पर सारा हंगामा था उसी को गायब कर दिया गया और फिर जिसकी चर्चा तक न थी उस पर हंगामा बरपा गया है। यही हिंदू फासीवादियों की सही को गलत और गलत को सही साबित करने की तर्क पद्धति है। यानी असल संदर्भ गायब करके या गलत संदर्भ का हवाला देकर फिर आलोचना पेश करो ताकि पाठक को लगे कि आलोचना में दम है।
    
आखिरकार भारत के युवा जिसमें अधिकांश एक अदद नौकरी की तलाश में हैरान-परेशान और उत्पीड़ित हैं। जो सरकारी नौकरी में भर्ती के लिए सड़कों पर लाठियां खा रहे हैं। 23 लाख युवा जो नीट पेपर लीक हो जाने से त्रस्त हैं। इंटर के लाखों युवा जो एक्जाम की काॅपियों की डिजिटल चेकिंग की भयंकर गड़बड़ियों से त्रस्त हैं, करोड़ों बेरोजगार नौकरी की तलाश में दर-दर की ठोकर खा रहे हैं और जिनके असंतोष और आक्रोश पर हर जगह पहरे हैं साथ ही नौकरी न होने से समाज के ताने हैं। वो क्या करे। 
    
ऐसे में सिस्टम के मुख्य अंग के शीर्ष पद पर बैठे आदमी ने खुद के जरिए समूचे शासक वर्ग विशेषकर हिंदू फासीवादियों की जनता के प्रति घटिया सोच को सामने ला दिया। 
    
इन शासकों के लिए काॅकरोच एक बिंब है जिसे घर में कहीं भी दिखने पर कुचल दिया जाता है या कीटनाशक छिड़क कर मार दिया जाता है। हिंदू फासीवादियों और सत्ता के अलग-अलग अंग जनता को इसी तरह से अलग-अलग जगह पर कुचलते हैं। इसी को अधिकांश महसूस करते हैं जिसे सामान्य तरीके से कहा भी जाता है कि जनता को जानवर या कीड़ा-मकोड़ा समझा जाता है। इस तरह एक आक्रोश, असंतोष विशेषकर युवाओं में इकट्ठा होता गया है।
    
जाहिर था ऐसे में इंटरनेट पर इसकी प्रतिक्रिया में काॅकरोच पर एक व्यंग्य से जैसे ही शुरूवात हुई उसने इस आक्रोशित युवाओं और लोगों के दिल को छू लिया। देखते ही देखते इसके फालोअर एक करोड़ से ज्यादा हो गए। इसके साथ ही वेबसाइट बनी और घोषणा पत्र भी आ गया। इसी को हिंदू फासीवादी सुव्यवस्थित, नियोजित बताकर षड्यंत्र साबित करने में लगे हैं। यानी जो भी चीज व्यवस्थित और योजनाबद्ध होगी वह जरूर साजिश होगी, यह संघ का तर्क है। क्योंकि इनकी नजर में यह स्वतः स्फूर्त नहीं है। मगर जहां-जहां स्वतः स्फूर्त आंदोलन मजदूर वर्ग के हुए उस पर क्या! वहां-वहां इनकी सरकार ने इसका बर्बर दमन किया।
    
संघी लेखक अब क्या करे! करोड़ों फालोअर को गाली देना तो उचित नहीं। इसलिए बेरोजगारी, परीक्षा प्रणाली, भर्ती विलंब, पेपर लीक और अवसर असमानता जैसे मुद्दे को तो इसे स्वीकार करना ही पड़ा है। लेख कहता है इस पीड़ा को राजनीतिक पटाखा बनाकर न्यायपालिका की खिड़की पर फोड़ा गया है। इसके बाद ही लेख बेहद चालाकी से कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और सरकारी वामपंथियों का माखौल उड़ाकर इसके जरिए काॅकरोच जनता पार्टी का मखौल उड़ाता है। तर्क पद्धति ऐसी है कि मानो सीजेपी बराबर कांग्रेस हो, आम आदमी पार्टी हो, सरकारी वामपंथी हो। लेख लगे हाथ फिर चीन में नवजनवादी क्रांति के बाद 1956-62 के महान अग्रवर्ती छलांग के दौर में कृषि संकट की चर्चा करने लगा जिसकी मूल वजह कई वर्षों का सूखा बाढ़ और पूंजीवादी पुर्नस्थापना हो चुके सोवियत संघ द्वारा तकनीकी सहयोग और विशेषज्ञों को वापस बुला लेना था। वहां पक्षियों से फसल को होने वाले नुकसान में गौरैया उन्मूलन अभियान चलाया गया हालांकि इसे बाद में पारिस्थितिकीय प्रभाव स्पष्ट होने पर रोक दिया गया।
    
इस तथ्य को बिल्कुल फर्जी और मनमाने ढंग से प्रस्तुत करते हुए लेख कहता है ‘‘नई शोध चर्चाओं में गौरैया उन्मूलन के कामरेडी करतब को भारी फसल हानि और असंख्य मौतों से भी जोड़कर देखा गया है। यानी जो विचार स्वयं को वैज्ञानिक कहता था, उसने प्रकृति को आदेश देकर सुधरने को कहा और प्रकृति ने अकाल के रूप में उसका उत्तर दिया’’।
    
इस तरह हिंदू फासीवादी लेखक इतिहास के कालक्रम में घटी घटना के तथ्य को गलत और मनमाने ढंग से प्रस्तुत करता है और इसे दूसरी जगह की किसी दूसरी घटनाओं पर मनमाने ढंग से लागू करता है। 
    
फिर इस माओ काल को आधार बनाकर काॅकरोच जनता पार्टी को गलियाता है। कहता है कुपढ़ वामपंथी रोग भारत में भी बार-बार लौटता है। इसके हिसाब से यही अब सीजेपी के रूप में हो रहा है।
    
जो सीजेपी इंटरनेट पर अपना घोषणा पत्र जारी करके खुद को धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक बताता है साथ ही न्यायिक जवाबदेही, चुनावी अखंडता, 50 प्रतिशत महिला आरक्षण: स्वतंत्र मीडिया (उद्योगपतियों के स्वामित्व वाले मीडिया संस्थानों के लाइसेंस रद्द करने), दल-बदल विरोधी कानून (दल बदलने वाले पर 20 साल तक चुनाव लड़ने पर बैन) की मांग कर रहा है और साथ ही पेपर लीक के मसले पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांग रहा है। उसकी इस मांग और घोषणा पर बातचीत करने के बजाय इसे सिरे से गायब करके इसको भी आपराधिक षड्यंत्र साबित करने की कोशिश हिंदू फासीवादी कर रहे हैं। 
    
इसे आपराधिक षड्यंत्र साबित करते हुए असल तथ्यों को गायब करके और अपने फर्जी तथ्य गढ़कर यह हिंदू फासीवादी लेखक सीजेपी को आरोपित करते हुए कहता है पहले नाम बदलो, फिर गुस्सा बढ़ाओ, फिर जत्थे बनाओ, फिर संवैधानिक संस्थाओं को खलनायक बताओ फिर भीड़ को सबसे बड़ा न्याय करने का लाइसेंस सड़क पर दे दो। मुख्य न्यायाधीश के काॅकरोच संबधी बयान पर इंटरनेट पर जवाब को हिंदू फासीवादी संवैधानिक संस्थाओं को उखाड़ फेंकने की अपील की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं।
    
एक तरफ आपराधिक षड्यंत्र बताने का खेल है तो दूसरी तरफ संघियों ने इन युवाओं के बीच ही विभाजन कर डाला है। अपना अलग काॅकरोच भी गढ़ लिया है। लेख कहता है काॅकरोच भी दो तरह के हैं। पहला वह है जो सोशल मीडिया पर देशभक्ति की बात करता है। ऐसा काॅकरोच रात में पढ़ता है, दिन में काम ढूंढता है, नौकरी न मिले तो स्टार्टअप बनाता है, और मीम देखकर हंस भी लेता है। दूसरा वह है जो क्रांति की तिकड़म में आकाओं के इशारे पर किटकिट करता है, जिसके दिमाग में है स्टालिन शैली का छोटा तानाशाह।
    
पांचजन्य के दूसरे व तीसरे लेख दिखाते हैं कि संघी चिंतक किस कदर आम युवाओं के दुख दर्द को हवा में उड़ाकर उनके आक्रोश को विपक्ष व विदेशी साजिश करार देने में जुटे हैं। वे कुछेक स्टार्ट अप की चर्चा कर करोड़ों युवाओं को विकास करते भारत की फर्जी तस्वीर पेश करते हैं और जेन जेड का आह्वान करते हैं कि भड़काने वाले षड्यंत्रों से सावधान रहें और मोदी के नेतृत्व में आगे बढ़़ते भारत का साथ दें। 
    
ये तीनों लेख जेन जेड से भयभीत संघी शासकों के भय को दिखाते हैं। भयभीत होने की जायज वजहें हैं। आखिर नेपाल-बांग्लादेश-श्रीलंका में भ्रष्ट शासकों को जेन जी ने सत्ता से उखाड़ फेंकने में बड़ी भूमिका निभायी। काॅकरोच द्वारा कमल कुतरने का मीम संघियों को डरा रहा है। वैसे जनता-युवाओं की दुर्दशा, पूंजीपतियों की खातिर सारे कानून ताक पर रखकर संसाधन लुटाने, जनसंघर्षों को लाठी-गोली से कुचलने में संघी शासक पड़ोसी देशों के शासकों से भी चार हाथ आगे हैं। ऐसे में इनका भयभीत होना और हर अनर्गल आरोप मढ़ना समझा जा सकता है। 
    
जहां तक प्रश्न काॅकरोच जनता पार्टी का है तो इसकी घोषणायें बताती हैं कि यह पार्टी एक ऐसे साफ-सुथरे पूंजीवादी लोकतंत्र का सपना बेच रही है जिसमें भ्रष्टाचार न हो। मीडिया पूंजीपतियों से स्वतंत्र व निष्पक्ष हो, महिलाओं को राजनीति में पूर्ण भागीदारी व सुरक्षा मिले। न्यायपालिका राजनैतिक हस्तक्षेप से स्वतंत्र हो। साफ-सुथरे पूंजीवादी लोकतंत्र का यह ख्वाब सुनने में जितना अच्छा लगता है व्यवहार में इसे कायम करना असंभव व दिवा स्वप्न सरीखा है। यह पूंजीवाद की वर्गेतर समझ से उपजता है जो कि न केवल गलत होती है बल्कि गलत राह की ओर भी ले जाती है। 
    
किसी भी वर्गीय व्यवस्था की तरह पूंजीवादी व्यवस्था भी शासक वर्ग व शोषित वर्ग के अंतरविरोधों से संचालित होती है। पूंजीवादी व्यवस्था मंे पूंजीपति वर्ग (आज के दौर में एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग) सत्ता पर काबिज होता है और मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकशों का शोषण-उत्पीड़न कर अपना मुनाफा कमाता है। राजसत्ता पूंजीपति वर्ग के शासन का उपकरण मात्र होती है और न्यायपालिका- सेना-विधायिका आदि सभी इसके अनिवार्य अंग होते हैं। ऐसे में पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजी के प्रभाव से स्वतंत्र न्यायपालिका, विधायिका होना असम्भव है ऐसे में ये बातें करना दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था को ही झाड़ पोंछकर पेश करना है। यही बात भ्रष्टाचार के मामले में भी है। पूंजीवाद में भ्रष्टाचार का खात्मा असम्भव है। 
    
दरअसल काॅकरोच जनता पार्टी पूंजीवादी व्यवस्था की असली लूट- मजदूर वर्ग की मेहनत की पूंजीपतियों द्वारा लूट- को उजागर न करके देश के युवाओं के सामने एक ऐसी पूंजीवादी व्यवस्था का ख्वाब परोसती है जो पूंजीवाद से नाभिनालबद्ध बुराईयों से मुक्त हो। इसीलिए वह मजदूरों की दुर्दशा या मांगों-संघर्षों पर चुप्पी साधे रहती है। वह मध्यमवर्गीय दृष्टि से युवाओं को पूंजीवाद में बेहतर रोजगार-पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया आदि का ख्वाब परोसती है। इस मामले में भले ही यह संघ-भाजपा के लिए कितनी भी असहजता पैदा कर रही हो, दूरगामी तौर पर यह पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने की एक कोशिश बन जाती है। 
    
जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है जो बताता है कि मजदूर-मेहनतकश-युवा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को ध्वस्त कर समाजवाद कायम कर ही अपना भविष्य सुधार सकते हैं। सही रास्ता समाजवादी क्रांति का रास्ता है। देर सबेर भारत के युवा इस रास्ते को पहचान लेंगे व मजदूर वर्ग के साथ तेजी से इस रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। 
    
काॅकरोच जनता पार्टी जो केवल इंटरनेट की दुनिया में है और जिसने हिंदू फासीवादी राजनीति का अभी कोई सीधे विरोध इंटरनेट पर नहीं किया है मगर इसके बावजूद यह बड़ी तादात में आभासी दुनिया में युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। जाहिर है इसमें एक बड़ा हिस्सा उनका ही है जो कल तक हिंदू फासीवादी प्रभाव में थे। यही हिंदू फासीवादियों के लिए चिंता का विषय भी है। और यही युवा जल्द ही आभासी दुनिया की सीमाओं को समझ जाएंगे और साथ ही उनकी जिंदगी उन्हें इंकलाब की ओर धकेल देगी। हिंदू फासीवादी अपनी बर्बरता और घोर युवा और जन विरोधी नीतियों से इन्हें बगावत की ओर ही धकेल रहे हैं। तब इनका यह काॅकरोच का बंटवारा भी खत्म हो जाएगा।

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