योगी यानी बुलडोजर बाबा को खास तरह की यूनियन से चिढ़ है, सख्त नफरत है और उनका बस चले तो वो यूनियनों को खत्म करवा दें। यूनियन यानी एक रूप में संगठन या संगठित समूह से नफरत कोई अद्भुत या विचित्र बात नहीं है। यही नहीं उन्हें संविधान में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द से चिढ़ है जो कि हर संघी को है। योगी इन शब्दों को भी हटाना चाहते हैं। आखिरकार बौने तानाशाह का भी यह अधिकार है कि वह ऐसा सोच सके। मगर उन्हें हर तरह की यूनियन से नफरत नहीं है।
हिंदू युवा वाहिनी जैसा संगठन तो योगी ने ही बनाया था फिर इससे क्यों नफरत हो। हिंदू राष्ट्र को समर्पित आर एस एस और इसकी राजनीतिक पार्टी या इसके अन्य लंपट संगठनों से योगी को नफरत क्यों हो भला! समाज को धर्म के नाम पर विभाजित करने वाले और समाज में दहशत फैलाने वालों से नफरत क्यों हो भला। यही काम तो भगवाधारी योगी कर रहे हैं। इसी तरह बड़े व्यापारियों, पूंजीपतियों की एसोसिएशन से नफरत होने का तो सवाल ही नहीं है।
हिंदू राष्ट्र के झंडे को थामे योगी ने मजदूर वर्ग के प्रति और उनकी यूनियनों और संघर्ष के प्रति अपनी नफरत का इजहार बड़ी मोहब्बत से किया है। जब गुड़गांव, मानेसर के बाद नोएडा में मजदूर आंदोलन शुरू हो गया और हजारों की तादाद में मजदूर सड़क पर उमड़ पड़े। न्यूनतम वेतन और ओवरटाइम का दुगुना भुगतान- यही मांग थी इन मजदूरों की। इन मजदूरों की तो यूनियन भी नहीं थी। सब तो ठेके के मजदूर हैं। मगर फिर भी महान योगी ने पूरे आंदोलन को ‘राज्य की वृद्धि और विकास को पटरी से उतारने की एक साजिश’ करार दे दिया।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन को बाहरी तत्वों की साजिश बताकर, उन्होंने श्रमिकों के संघर्ष के मूल कारणों- जिंदा रहने लायक जरूरी वेतन से भी कम वेतन, बढ़ती महंगाई और नारकीय जीवन स्थिति- को नकार दिया। उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि ‘किसी भी बाहरी तत्व को कारखानों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने देना चाहिए’।
फिर योगी आदित्यनाथ ने ट्रेड यूनियनों की भूमिका और वैधता पर सीधे प्रहार किया। इसे औद्योगिक शांति के लिए खतरा बताया। इसे श्रमिक अधिकारों के लिए एक गंभीर खतरा बताया। आखिरकार बौने तानाशाहों का बौनापन इसी तरह उजागर होता है। इसी तरह वे जनता के सामने नंगे होते जाते हैं। यही हाल यू पी के मौजूदा मुख्यमंत्री का है।
दो साल पहले शिक्षक दिवस के अवसर पर, एक कार्यक्रम में योगी ने कहा था कि ‘एक शिक्षक को कभी भी ट्रेड यूनियन का हिस्सा नहीं बनना चाहिए क्योंकि ऐसा करना उनके पेशे की गरिमा के खिलाफ है।’ आखिर किसी भी पेशे की अपनी यूनियन बनाना और अपनी विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए काम करना कैसे गरिमा के खिलाफ हो सकता है। एक जैसे काम करने वालों का एक समूह बनाकर आवाज उठाना बेहद स्वाभाविक है मगर योगी ने उसे सिर के बल खड़ा कर दिया।
अभी हाल ही में एक अखबार के कार्यक्रम में, योगी ने ट्रेड यूनियनों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उद्योगों के बंद होने और श्रमिकों के भुखमरी के कगार पर पहुंचने के लिए ट्रेड यूनियनें जिम्मेदार हैं। तानाशाह अहंकार और श्रेष्ठता बोध की बीमारी से ग्रसित होते हैं, इसलिए हकीकत को वो नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि मजदूर वर्ग का जो हिस्सा स्वतः स्फूर्त ढंग से और स्वतः स्फूर्त गति में सड़कों पर आया था उनकी तो कोई ट्रेड यूनियन भी नहीं थी। सभी ठेका प्रथा के तहत ठेकेदारों के हवाले हैं और जिनकी यूनियन बन पाना आज के दौर में बेहद मुश्किल है।
2023 के उत्तरार्ध में, उत्तर प्रदेश विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले प्रदेश भर के विद्युतकर्मियों और संविदा श्रमिकों ने अपनी लंबित मांगों, विशेष रूप से नियमितीकरण, वेतन विसंगतियों और पुरानी पेंशन बहाली के लिए आंदोलन प्रारम्भ किया। इस पर योगी सरकार ने बातचीत का रास्ता छोड़, सीधे दमन का रास्ता अपनाया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘सरकार ब्लैकमेलिंग की राजनीति बर्दाश्त नहीं करेगी।’ यह बयान अपने आप में ही श्रमिकों की वैध मांगों को ‘ब्लैकमेलिंग’ करार देकर उनके संवैधानिक अधिकारों को नकारता है।
इसके बाद योगी सरकार ने आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम (एस्मा) लागू कर हड़ताल को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। पुलिस ने सैकड़ों कर्मचारियों और संविदा श्रमिकों को गिरफ्तार किया, उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई और उन्हें हड़ताल समाप्त करने के लिए बाध्य किया गया। आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेताओं और संविदा श्रमिक संगठनों के पदाधिकारियों को सामूहिक रूप से बर्खास्त कर दिया गया या उनके अनुबंध समाप्त कर दिए गए। यही नीति शिक्षक आंदोलन के साथ अपनाई गई थी जब एक साल से सरकारी नौकरी कर रहे शिक्षकों की सरकारी नौकरी खत्म करके उन्हें फिर से शिक्षामित्र बना दिया गया। इस आंदोलन के दौरान लगभग सात सौ शिक्षकों की मौत आत्महत्या, हार्ट अटैक आदि वजह से हुई। मगर एक दौर में समाजवादी पार्टी की सरकार में पुलिस गिरफ्तारी के डर से संसद में आंसू बहाते हुए संवैधानिक अधिकारों की दुहाई देने वाला खुद मजदूरों-मेहनतकशों के दमन में सारे कानूनों की धज्जियां उड़ा रहा है।
आज गौर से देखा जाये तो ऐसे बौने फासीवादी तानाशाहों की कमी नहीं विशेषकर संघ परिवार में। मगर इससे विशेष फर्क नहीं पड़ता कि कोई संघ से है या नहीं। शासक वर्ग के एक ठीक-ठाक हिस्से की आज की मनःस्थिति यही है। इसीलिए आसानी से एक पार्टी से दूसरी पार्टी में विशेषकर भाजपा में जाते ही सुर बदल जाते हैं। असम का कांग्रेसी हिमंता जिसने भगवा चोला धारण कर लिया था आज वह भी हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए एक आइकन बना हुआ है। जिनकी संघी पृष्ठभूमि है उनके तो कहने ही क्या। इसलिए मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, राजस्थान से लेकर उत्तराखंड तक बौने फासीवादी तानाशाहों की कमी नहीं है।
हालांकि इनमें योगी तो विशेष है। अन्य भाजपाई मुख्यमंत्री जहां मोदी-शाह के मातहत हैं और इससे खुश हैं। तो वहीं योगी भविष्य में प्रधानमंत्री होने का ख्वाब भी देखते हैं। खुद को अलग अंदाज में पेश करना और मोदी-शाह से इतर पेश करना इसी बात का इशारा है।
ट्रेड यूनियन आंदोलन से इतनी गहरी नफरत और जनवादी-संवैधानिक अधिकारों के प्रति इतनी घृणा से योगी किसे और क्या साबित करना चाहते हैं? योगी देश के शीर्ष पूंजीपतियों के सामने साबित करना चाहते हैं कि अब सबसे बेहतरीन रेस का घोड़ा उनके लिए योगी ही है। यू पी में बड़े पूंजीपतियों के निवेश सम्मेलन आयोजित करवाकर इसमें हर तरह की छूट निवेशकों को देकर और फिर हर तरह के आंदोलन का बर्बर दमन करके योगी संदेश दे रहे हैं कि उनके सबसे बेहतरीन सेवक योगी ही हो सकते हैं।