नागरिकता और हिंदू फासीवादी

Published
Wed, 07/01/2026 - 15:50
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विशेष गहन पुनर्रीक्षण को थोपने और इसके जरिए मनमानी करने के बाद हिंदू फासीवादी अब नागरिकता के परीक्षण के लिए हालात बना रहे हैं। 
    
फिलहाल पासपोर्ट मामले में नागरिकता को लेकर बहस गरमाई हुई है। यह सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं है, बल्कि हिंदू फासीवाद के रूप में फासीवाद की ओर तेजी से बढ़ने की राजनीतिक वैचारिक दिशा की अभिव्यक्ति है। यह बहस उस समय और तीव्र हो गई जब विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, बल्कि केवल एक यात्रा दस्तावेज है। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि विशेष गहन पुनर्रीक्षण में पासपोर्ट को मतदाता सूची में बने रहने के लिए वैध दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया गया था। 
    
मोदी सरकार ने वर्तमान पासपोर्ट मामले के पीछे पासपोर्ट अधिनियम, 1967 का हवाला दिया। पासपोर्ट मामले में इसके नागरिकता से सीधे जुड़े न होने की बात कानूनी दृष्टि से सही है, लेकिन इसके राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ बहुत गहरे हैं। जो काम सांप्रदायिक नागरिकता कानून बनाकर नागरिकता परीक्षण (एन आर सी) के रूप में नहीं हो पाया वह फिर विशेष गहन पुनर्रीक्षण के जरिए किया जा रहा है और अब इस बहस को हवा देकर इसके पक्ष में माहौल बनाया जा रहा है। 
    
सवाल यह है कि भारत का नागरिक कौन है? क्या मोदी, क्या अमित शाह, क्या ज्ञानेश कुमार और सूर्यकांत और इनके आका अडाणी-अंबानी आदि ही देश के नागरिक हैं और बाकी सब संदिग्ध नागरिक, अवैध प्रवासी? क्या जब भारत में नागरिक होने से संबधित कोई भी दस्तावेज निर्धारित नहीं है तब क्या अपनी मनमर्जी से हिंदू फासीवादी या न्यायालय किसी अमुक दस्तावेज को नागरिकता की शर्त बना सकता है?
    
अभी बहस पासपोर्ट के हवाले से है। पासपोर्ट बनवाने का सिलसिला ज्यादा बड़ी तादाद में पिछले 15-20 सालों से हुआ है। अभी भी अनुमानित तौर पर 7-8 प्रतिशत लोगों के पास ही यह दस्तावेज है। तो क्या माना जाये कि पासपोर्ट जिनके पास है वह 7-8 प्रतिशत लोग ही भारत के नागरिक हैं शेष बहुलांश मजदूर मेनहकतकश आबादी संदिग्ध नागरिक है और फिर इन संदिग्ध नागरिकों की जांच पड़ताल को जायज ठहराया जाय। 
    
वास्तव में पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है जो विदेश यात्रा में जरूरी है। आम तौर पर यह भारत के नागरिकों को और विशेष रूप में भारत में बसने वाले अन्य लोगों को भी दिया जा सकता है। यात्रा के लिए जारी किए जाने का मतलब यह नहीं कि यह नागरिकता प्रमाण पत्र है। इसे बनवाने के लिए आधार कार्ड या वोटर कार्ड या अन्य दस्तावेज जो व्यक्ति की पहचान, स्थान और जन्म से संबंधित हैं, अनिवार्य हैं। 
    
यदि अवधारणा में बात की जाये तो मतदाता पहचान पत्र एक ऐसा दस्तावेज है जो केवल नागरिक को ही दिया जा सकता है। नागरिकता से वंचित किया गया या दिवालिया और मानसिक तौर पर विक्षिप्त को छोड़ दिया जाये तो यह हर नागरिक को दिया जाता है। एक नागरिक को ही चुनाव में मत देने का अधिकार है। वोटर कार्ड (इपिक कार्ड) इस तरह नागरिक होने का सबूत है। 
    
मगर हिंदू फासीवादियों और न्यायपालिका ने इसे खारिज कर दिया। भिन्न रूप में देखा जाय तो कांग्रेस के जमाने से ही यह स्थिति पैदा हो गई। 
    
देश के भीतर 1955 में जो कानून बना उसके हिसाब से जो कोई भी भारत में जन्मा वह भारत का नागरिक माना गया। 1955 से 1987 तक यही स्थिति बनी रही। मगर असम में इसके उलट किया गया। यहां कट आफ 1971 की रखी गई। यानी असम में मार्च 1971 के बाद जन्मे व्यक्ति को भारत का नागरिक नहीं माना गया। यह दोहरा आचरण था।
    
हिंदू फासीवादियों ने असम का ही हवाला देकर देश में करोड़ों घुसपैठिए आ जाने का खतरा बताकर एन आर सी को व्यापक करने, और नागरिकता कानून में फेरबदल कर दिया। यह 2003 में अटल बिहारी के जमाने में भी किया गया और 2019 में भी किया गया। इसी प्रभाव में असम में एन आर सी भी हो गई और 19 लाख लोग नागरिकता के दायरे से बाहर भी कर दिए गए। कागज होने के बावजूद भी या मामूली गलतियों में भी लोग नागरिकता से बाहर कर दिए गए।
    
देश भर में एन आर सी की योजना में 2020 में जब मोदी सरकार विफल हो गई तब 2024 के चुनाव में बहुमत से काफी दूर होने के बाद फिर एक साथ दो खेल खेले गए। यह था एस आई आर। इसके जरिए कौन मतदाता होगा और कौन नागरिक यह भी हिंदू फासीवादियों को ही तय करना था। 
    
सुप्रीम कोर्ट ने इसको वैध ठहराते हुए निर्वाचन आयोग को मतदाता सूचियों के पुनर्रीक्षण के दौरान नागरिकता की सीमित जांच करने की अनुमति दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने तमाम आलोचनाओं और तर्कों को खारिज करते हुए आधार कार्ड को पहचान पत्र के रूप में मान्यता दी। बाद में अदालत ने फैसला ही दिया कि ैप्त् के जरिए चुनाव आयोग सीमित रूप में नागरिकता की जांच कर सकता है हालांकि गृह मंत्रालय का फैसला अंतिम फैसला होगा; इसके अलावा बाहर हुए मतदाताओं या अयोग्य करार दिए गए मतदाताओं की सूची गृह मंत्रालय को सौंपे जाने का निर्देश दिया।
    
अब तस्वीर साफ है वर्तमान बहस का व्यावहारिक पहलू हिंदू फासीवादियों के लिए नागरिकता परीक्षण है। इसका साफ मतलब है विरोधियों, आलोचकों को भी इसके निशाने पर लेना। यह अलग-अलग जगह विरोध प्रदर्शनों और आंदोलन के उभार को ध्वस्त करने का एक हथियार भी है। पहले नागरिकता को लेकर व्यक्तियों को व्यक्तिगत तौर पर बिखरे हुए रूप में निशाना बनाने की संभावना ज्यादा है। 
    
हिंदू फासीवादी यह करने की ओर बढ़ेंगे। इसका प्रतिरोध वैचारिक राजनीतिक रूप में किया जाना जरूरी है। 
    
वर्तमान परिदृश्य में तथा मजदूर वर्ग और बहुसंख्यक जनता के नजरिए और हित में है कि जो भी देश के भीतर जन्मा है उसे देश का नागरिक माना जाये और साथ ही जो भी देश में बेहतर जिंदगी के लिए रोजगार के लिए आया है, उसकी मांग पर उसे देश का नागरिक घोषित किया जाय। यह और कुछ नहीं बल्कि काफी हद तक 1955 के नागरिकता कानून की बहाली होगी। यदि विदेशी दौलत वाले और पूंजी के मालिकों को देश के भीतर कानूनी तौर पर कुछ साल रहने पर नागरिकता दी जा सकती है तब मजदूर-मेहनतकश लोगों के मामलों में उलटा रुख क्यों? सिर्फ इसलिए कि उनके पास पैसा नहीं है। 
    
इसके साथ ही हिंदू फासीवादियों का यह पूरा कदम उस कथित जनवादी अवधारणा पर हमला है जिसमें कहा जाता है कि जनप्रतिनिधित्व की संसदीय प्रणाली में संसद जनता की इच्छा-आकांक्षा का मूर्त रूप है। यानी सरकार जनता की तरफ से शासन कर रही है। सरकार की शक्ति जनता में निहित हैं। यहां सब कुछ उलटा है। सरकार ने बिना घोषणा के ही घोषित कर दिया है कि उसके प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आदि ही देश के नागरिक हैं बाकी सब संदिग्ध नागरिक।
 

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