लखनऊ कोचिंग अग्निकांड
लखनऊ के कोचिंग सेंटर में लगी आग में 15 से ज्यादा छात्रों की मौत की खबर केवल एक दुर्घटना की खबर नहीं है। यह उन लाखों युवाओं के सपनों के जलने की खबर है जिन्हें इस पूंजीवादी व्यवस्था ने प्रतियोगिता, बेरोजगारी और असुरक्षा की भट्ठी में झोंक दिया है। यह सिर्फ लापरवाही के कारण एक इमारत में लगी आग नहीं, बल्कि उस सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का परिणाम है जिसने शिक्षा को अधिकार नहीं, बल्कि बाजार का एक माल बना दिया है।
आज भारत का युवा अभूतपूर्व बेरोजगारी का सामना कर रहा है। सरकारी नौकरियों की संख्या लगातार घटाई जा रही है, स्थायी रोजगार की जगह ठेका और अस्थायी काम ले रहे हैं। दूसरी ओर लाखों युवाओं को बताया जा रहा है कि जीवन में आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता प्रतियोगी परीक्षाएं हैं। परिणामस्वरूप कोचिंग उद्योग अरबों रुपये का कारोबार बन चुका है। छात्र गांव-कस्बों से शहरों की ओर भाग रहे हैं, तंग कमरों में रह रहे हैं, दिन-रात पढ़ रहे हैं और अपने परिवारों की उम्मीदों का बोझ ढो रहे हैं।
इस पूंजीवादी व्यवस्था ने शिक्षा को ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि नौकरियों के लिए एक निर्मम दौड़ में बदल दिया है। इस दौड़ में कोचिंग संस्थान ‘सफलता’ बेचते हैं और छात्र ग्राहक बन जाते हैं। जहां मुनाफा सर्वोपरि हो, वहां सुरक्षा, मानक और मानवीय जीवन अक्सर पीछे छूट जाते हैं। अग्निशमन नियमों की अनदेखी, संकरे रास्ते, आपातकालीन निकासों का अभाव और प्रशासनिक लापरवाही कोई संयोग नहीं हैं। ये उस व्यवस्था की स्वाभाविक उपज हैं जिसमें लागत कम करना और मुनाफा बढ़ाना सबसे बड़ा सिद्धांत है।
लेकिन सवाल केवल भवन सुरक्षा का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर लाखों युवाओं को ऐसी कोचिंग फैक्टरियों में जाने के लिए मजबूर कौन कर रहा है? क्यों एक नौकरी के लिए हजारों-लाखों उम्मीदवारों को आपस में भिड़ाया जाता है? क्यों शिक्षा और रोजगार की योजनाबद्ध व्यवस्था बनाने के बजाय युवाओं को ‘प्रतियोगिता’ के नाम पर एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बना दिया जाता है? जहां दूसरे के सिर पर चढ़कर जाना ही एकमात्र विकल्प है।
लखनऊ की यह त्रासदी हमें याद दिलाती है कि बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है, यह पूंजीवादी व्यवस्था का अपरिहार्य परिणाम है। पूंजीवाद में बेरोजगारी मजदूरी को कम से कमतर करने का साधन है। जितने ज्यादा बेरोजगार होंगे उतने कम तनख्वाह पर काम करवाया जा सकता है। ऐसे में जब बेहतर तनख्वाह वाले रोजगार के अवसर सीमित हों और प्रतियोगिता को जीवन-मरण का प्रश्न बना दिया जाए, तब कोचिंग सेंटर केवल शिक्षण संस्थान नहीं रह जाते, वे युवाओं को मजबूरी के कारखाने में झोंकने वाले साधन बन जाते हैं।
इसलिए इन मौतों को केवल हादसा कह देना सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा। इनके लिए जिम्मेदार केवल कोई एक भवन मालिक, कोई एक अधिकारी या कोई एक विभाग नहीं है। जिम्मेदारी उस पूरी पूंजीवादी व्यवस्था की है जिसने युवाओं को रोजगार के संकट में धकेला, शिक्षा का बाजारीकरण किया और मुनाफे को इंसानी जीवन से ऊपर रखा।
लखनऊ के छात्रों की स्मृति में केवल शोक व्यक्त करना ही काफी नहीं, बल्कि यह सवाल उठाना जरूरी है कि आखिर कब तक युवाओं के सपनों और जीवन की कीमत पर यह प्रतियोगिता का साम्राज्य चलता रहेगा? कब तक बेरोजगारी को सामान्य और कोचिंग उद्योग को उसका समाधान बताया जाता रहेगा?
इन जली हुई किताबों और बुझी हुई जिंदगियों की राख से एक सवाल उठ रहा है- क्या शिक्षा और रोजगार इंसानों की जरूरत होंगे, या फिर हमेशा की तरह बाजार के मुनाफे का साधन बने रहेंगे? और इंसान जीने के लिए मर मर कर जीता रहेगा? यह अलग बात है कि किसका नंबर कब आता है।
लखनऊ की आग तो बुझ चुकी है, लेकिन उसके पीछे छिपी पूंजीवादी व्यवस्था की आग अभी भी धधक रही है। यह आग अपने आगोश में और इंसानों को लेने के लिए आतुर है। वही आग बार-बार नए नामों और नई जगहों पर ऐसी त्रासदियों को जन्म देती रहेगी, जब तक कि युवाओं, छात्रों और मेहनतकश जनता की जरूरतों को मुनाफे से ऊपर रखने वाली व्यवस्था का निर्माण नहीं होता। यानी समाजवादी व्यवस्था का निर्माण नहीं हो जाता।