ईरान अमेरिका युद्ध समझौता: महाशक्ति का ‘अनइंस्टाल’ बटन

Published
Wed, 07/01/2026 - 15:50
/iran-amerika-yuddh-samajhauta-mahasakti-ka-uninstall-button

ईरान पर युद्ध थोपने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बड़ी अकड़ में थे। टीवी पर, सोशल मीडिया पर, रैलियों में- हर जगह वही अंदाज। अकड़ ऐसी कि कई बार मुंह और शरीर तक टेढ़ा हो जाता था।
    
उस समय ऐसा लग रहा था जैसे कोई टेक कंपनी नया फोन लांच कर रही हो- ‘‘इस बार का आपरेशन इतना स्मार्ट है कि दुश्मन को पता भी नहीं चलेगा और खेल खत्म हो जाएगा।’’
    
युद्ध शुरू हुआ। मिसाइलें चलीं, ड्रोन उड़े, धमकियां दी गईं, बयान आए।
    
दुनिया को बताया गया कि यह कुछ दिनों का मामला है। अमेरिका और उसके सहयोगियों की तकनीक, खुफिया तंत्र और सैन्य ताकत के सामने ईरान टिक नहीं पाएगा। बार-बार दोहराए जाने वाला यह आलाप कि ‘‘हम युद्ध जीत रहे हैं’’ ‘‘कि हमने ईरान को तबाह कर दिया है’’ या यह कि ‘‘हम युद्ध जीत चुके हैं’’। 
    
लेकिन कुछ दिन बाद वही महाशक्ति युद्धविराम की अपील करने लगी।
    
यानी जो आदमी मैच शुरू होने से पहले कह रहा था- ‘‘मैं दस गोल मारूंगा’’, वही हाफ टाइम में रेफरी से कहने लगा- ‘‘देखिए, खेल भावना भी कोई चीज होती है।’’
    
अचानक उसे शांति याद आ गई।
    
जो नेता कल तक कह रहे थे- ‘‘हम पीछे नहीं हटेंगे’’, वही आज कह रहे हैं- ‘‘हमारा उद्देश्य तो हमेशा से स्थिरता और शांति था।’’
    
साम्राज्यवाद का यही चरित्र है- वह हर युद्ध की शुरुआत भी शांति के नाम पर करता है और हर युद्ध विराम का श्रेय भी खुद ले लेता है। एक बार फिर वर्साय का महल इसके लिए चुना गया।
    
साम्राज्यवाद यही करता है। पहले डर पैदा करो। फिर हथियार बेचो। फिर हमला करो। फिर बातचीत की अपील करो।
    
और अंत में घोषणा कर दो- ‘‘देखिए, हमने दुनिया को बचा लिया।’’
    
यह वैसा ही है जैसे कोई साइबर सिक्योरिटी कंपनी पहले आपके सिस्टम में वायरस डाल दे और फिर प्रेस कान्फ्रेंस करके कहे- ‘‘हमारी वजह से आपका डेटा सुरक्षित है।’’
    
सबसे मजेदार बात यह है कि युद्ध के दौरान अमेरिकी मीडिया का एक हिस्सा बता रहा था कि ईरान अलग-थलग पड़ चुका है, उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर है, उसके संसाधन सीमित हैं और वह ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगा।
    
लेकिन अमेरिका और ट्रंप ने युद्धविराम की मेज पर ईरान को मौजूद पाया।
    
कमजोर कहा जाने वाला देश झुका नहीं।
    
प्रतिबंधों, दबावों और सैन्य धमकियों के बावजूद उसने अपनी शर्तों को नहीं छोड़ा। और अमेरिका को झुका दिया।
    
तब समझ में आया कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते। कुछ युद्धों में बच जाना ही जीत होता है। कुछ लड़ाइयों में हार न मानना ही जीत होता है। और कुछ मौकों पर दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति को यह एहसास करा देना कि हर देश इराक, लीबिया या अफगानिस्तान नहीं है- यही जीत होती है।
    
इस युद्ध ने कम से कम इतना तो साबित कर दिया कि अरबों डालर के रक्षा बजट, विमानवाहक पोतों और मंचों से की गई डींगों के बावजूद हर लड़ाई मनमाफिक नहीं जीती जा सकती।
    
महाशक्तियां अक्सर अपनी ताकत का विज्ञापन ज्यादा करती हैं और अपनी सीमाओं को फुटनोट में छिपा देती हैं।
    
युद्धविराम की घोषणा दरअसल केवल मिसाइलों की खामोशी नहीं थी। वह उस हेकड़ी की आवाज भी थी, जो धीरे-धीरे उतर रही थी। वही हेकड़ी जो कहती थी- ‘‘हम नियम बनाते हैं।’’
    
लेकिन दुनिया बदल रही है। अब छोटे और कमजोर समझे जाने वाले देश कभी-कभी इतना भर कर देते हैं कि महाशक्तियों को भी बातचीत की मेज याद आ जाती है।
    
जिस अमेरिका ने दुनिया को यह विश्वास दिलाया था कि उसकी शक्ति अजेय है, उसे अंततः उसी देश के साथ समझौते की मेज पर बैठना पड़ा जिसे वह युद्ध शुरू होने से पहले लगभग पराजित घोषित कर चुका था। यही नहीं उसे कमोबेश वही बातें माननी पड़ीं जो ईरान शुरू से कह रहा था। 
    
लेकिन इसके बाद भी साम्राज्यवादी बाज नहीं आएंगे। वे अगला मौका मिलते ही फिर किसी युद्ध में उतर जाएंगे। और ऐसा वे तब तक करते रहेंगे जब तक दुनिया की मजदूर और मेहनतकश जनता साम्राज्यवाद का अंत नहीं कर देती।
 

आलेख

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।