चुनाव आयुक्तों का अंतर्कलह

Published
Sat, 09/26/2026 - 20:50

विशेष गहन पुनरीक्षण का मामला हिंदू फासीवादियों का पीछा छोड़ने का नाम नहीं ले रहा है। इस बार यह चुनाव आयोग के भीतर चल रही अंतर्कलह के रूप में सामने आया है। इसके जरिए भले ही चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की तानाशाही और मनमर्जी के आरोप हों मगर इसके तार सीधे-सीधे महामानव मोदी और गृहमंत्री शाह से जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि ज्ञानेश कुमार के बचाव में तुरंत ही भाजपाई और संघी मैदान में उतर आए। इनको बचाने का मतलब मोदी-शाह को बचाना ही है।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी जांच रिपोर्ट के जरिए बताया है कि एस आई आर मामले में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में 14 बार औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज कराईं और कई मुद्दों पर सवाल उठाए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण था - फॉर्म-6 में बदलाव। इसमें बदलाव के जरिए, अब आवेदक से यह पूछा जाने लगा कि क्या उनका या उनके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछले SIR की मतदाता सूची में "मौजूद" था। जबकि पहले ऐसा पूछने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं था।

चुनाव आयोग में दूसरे चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई 2023 में ही चेतावनी दी थी कि पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन के बिना इस तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता। जांच रिपोर्ट में कहा गया कि कई आदेश "अनधिकृत" और "अवैध" तरीके से जारी किए गए, जिनकी जानकारी इन दोनों आयुक्तों को नहीं थी या कुछ में मीडिया के जरिए पता चलती थी।

फॉर्म 6, निर्वाचन पंजीकरण नियम- 1960 के तहत निर्धारित है और इसमें आवेदकों को व्यक्तिगत विवरण, फोटोग्राफ, आयु प्रमाण और पते का प्रमाण देने की जरूरत होती है।

रिपोर्ट के अनुसार, तब दोनों आयुक्तों ने तर्क दिया कि चूंकि फॉर्म 6, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत बनाए गए नियमों का हिस्सा है, इसलिए किसी भी बदलाव के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के जरिए औपचारिक संशोधन जरूरी था। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28 के तहत, केंद्र सरकार चुनाव आयोग से परामर्श के बाद निर्वाचन नियम बनाती और संशोधित करती है। ऐसे संशोधनों को अधिसूचित किया जाता है और संसद के समक्ष रखा जाता है।

साफ है कि यह बदलाव जिसे करने का अधिकार केवल संसद के पास था, उसे अपने आकाओं के इशारे पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद कर डाला। और यह बदलाव भी एस आई आर की ही तरह असंवैधानिक था। ये अलग बात है कि इसे सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक ठहरा दिया गया था। उक्त आपत्तियों के अलावा दोनों आयुक्तों ने मतदाता सूची डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण और इसमें केंद्रीय स्तर से ही बदलाव कर सकने पर आपत्ति जताई। राज्य स्तर के चुनाव अधिकारी तथा ई.आर.ओ. की ई.आर.ओ. नेट सिस्टम तक पूरी पहुंच नहीं हो पाने पर भी आपत्ति जताई गई। अन्य आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने, नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील और वोटर डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे।

असंवैधानिक होने के अलावा एस आई आर में शुरू से लेकर अंत तक कोई पारदर्शिता नहीं है। चुनाव आयोग के पास आम नागरिकों, सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं और याचिकाकर्ताओं को अंधकार में रखने के अलावा कोई जवाब नहीं है। सबसे हैरतअंगेज यह है कि एस आई आर देशव्यापी स्तर पर कराने का फैसला कब, कहां और कैसे हुआ, इसका जवाब भी सूचना अधिकार के तहत नहीं 'कोई फाइल नहीं ' होने के रूप में मिला है।

फॉर्म 6 में इस बदलाव का असर सीधे-सीधे उन मतदाताओं पर पड़ना था जिनका नाम 2002-03 की कथित विशेष गहन पुनरीक्षण वाली मतदाता सूची में नहीं था जबकि वे तब 18 साल से ऊपर थे या फिर जिनका जन्म बाद में हुआ था। यह इन्हें अपने माता-पिता या दादा-दादी पर निर्भर बना देता था। इन्हें उनसे अपना लिंक स्थापित करना होता था। इसी तरह 13 करोड़ मतदाता जिनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया उन्हें भी यह प्रभावित करता है। नतीजतन इन्हें और नए मतदाता विशेषकर जेन जी को मतदाता सूची में जोड़ने की स्थिति बेहद बुरी है।

एस आई आर और इसकी प्रक्रिया शुरुवात से संवैधानिक जनवादी प्रक्रियाओं को ताक पर रख कर की गई है। इसका एक मकसद मनमाने मतदाताओं का चयन करके चुनावी निरंकुशता के जरिए शासन चलाना था दूसरी तरफ नागरिकता को सन्दिग्ध बनाकर डर, आशंका और असुरक्षा का माहौल बनाए रखने के साथ ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना था और है। इसके ज़रिए अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं को मताधिकार से वंचित कर दिया गया और 5-6 करोड़ नागरिकों को संदिग्ध बताकर नोटिस भेजे गए हैं। इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित मुस्लिम, दलित, आदिवासी, महिलाएं, प्रवासी मजदूर और स्लम बस्तियों में रहने वाली आबादी है।

एस आई आर के मामले पर कुछ प्रक्रियागत मामलों पर ही कांग्रेस से लेकर तमाम पूंजीवादी पार्टियों का मतभेद है। मगर ये एस आई आर को असंवैधानिक बताकर इसे रद्द करने की मांग नहीं करते। कुछ हैं जो व्यक्तिगत तौर पर ही ऐसा करते हैं। आम तौर कर ये ज्ञानेश कुमार को ही मुख्य दोषी बता रहे हैं। कुछ हद तक ही गृहमंत्री अमित शाह या मोदी और संघ को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। जरूरत है कि प्रधानमंत्री गृहमंत्री समेत हिंदू फासीवादियों को इसके लिए कठघरे में खड़ा किया जाय। इससे आगे जरूरत है हिंदू फासीवाद और एकाधिकारी पूंजी के गठजोड़ को निशाने पर लिया जाय जो पूंजीवादी जनतंत्र को खोखला करने और इसे निगलकर फासीवादी तानाशाही कायम करने के बेहद करीब हैं।

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