चुनाव

हिंदू फासीवाद, चुनाव आयोग और विधानसभा चुनाव

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हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

एस आई आर - साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे भाजपा की जीत

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2026 के पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम  ने देश के अंदर फिर से लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग, सामाजिक सौहार्द, क्षेत्रीय दलों के स्थायित्व, विपक्षी दलों के चुनावी

बंगाल जीतने की हिन्दू फासीवादियों की घृणित कवायद

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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का सफाया करने का जाल हिंदू फासीवादियों ने चुनाव आयोग के जरिए नग्न और षड्यंत्रकारी तरीके से बुना है। चुनाव आयोग द्वारा संचालित विशेष गहन प

बांग्लादेश : बी एन पी की चुनावी जीत

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बांग्लादेश में बहुप्रतीक्षित चुनाव 12 फरवरी को सम्पन्न हो गये। इस चुनाव में उम्मीद के मुताबिक बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बी एन पी) को भारी जीत हासिल हुई है। खबर लिखे जा

जनता का चुनाव करते हिंदू फासीवादी

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देश में चुनाव के दौरान अक्सर ही गुस्से में आकर कई लोग कहते सुने जाते हैं कि अब उक्त पार्टी को हम वोट नहीं करेंगे। लंबे समय से यही देखा गया है कि किसी एक पार्टी की सरकार क

जापान : बढ़ते संकट के साथ नये चुनाव

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हाल में ही जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने संसद भंग कर 8 फरवरी को नए चुनावों की घोषणा कर दी। ताकाइची की पार्टी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को उम्मीद है कि इन चुनावों क

ममदानी, राहुल और चुनावी मुद्दे

न्यूयार्क शहर के मेयर के चुनाव में जोहरान ममदानी की जीत ने वाम उदारवादियों को खुशी से पागल कर दिया है। सरकारी वामपंथी भी पर्याप्त खुश हैं। उनकी खुशी किसी हद तक जायज भी है

बिहार चुनाव : एन डी ए की भारी जीत के मायने

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बिहार चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। एन डी ए गठबंधन पिछले चुनाव से भी भारी जीत हासिल कर सत्ता संभालने की तैयारी में है। इण्डिया गठबंधन को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। टक्कर का प

एस.आई.आर. : बिहार के बाद अब 12 राज्यों में फासीवादी परियोजना

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चुनाव आयोग बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण कराने के बाद अब इसे पूरे देश पर थोपने को उतारू है। इस सम्बन्ध में 28 अक्टूबर से 7 फरवरी तक 12 राज्यों में एस आई आर की घोषणा चुनाव

आर्थिक संकट, विश्व व्यापार संगठन और ‘तटकर युद्ध’

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दोनों विश्व युद्धों के बीच के काल में, खासकर 1929 से शुरू हुई महामंदी के काल में साम्राज्यवादी देशों के बीच ‘मुद्रा युद्ध’ और ‘तटकर युद्ध’ बहुत तेज हो गया था। निर्यात में बढ़त हासिल करने के लिए देश अपनी मुद्राओं का अवमूल्यन कर रहे थे और तटकर बढ़ा रहे थे। इसने महामंदी को और घनीभूत किया। इस तरह महामंदी से निकलने के देशों के व्यक्तिगत प्रयास ने वैश्विक तौर पर उसे और घनीभूत किया। अंततः द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही से महामंदी से निजात मिली। 

आलेख

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?