बिहार चुनाव : एन डी ए की भारी जीत के मायने

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बिहार चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। एन डी ए गठबंधन पिछले चुनाव से भी भारी जीत हासिल कर सत्ता संभालने की तैयारी में है। इण्डिया गठबंधन को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। टक्कर का प्रतीत हो रहा चुनाव परिणामों में एकतरफा नजर आया। 
    
मोदी-शाह मण्डली चुनावी जोड़-तोड़, मतदाताओं को रिझाने-लुभाने में इस कदर सिद्धहस्त होती जा रही है कि वह असंतोष के बड़े-बड़े मुद्दों मसलन बेरोजगारी, पलायन को पटखनी देती नजर आ रही है। चुनाव आयोग, प्रशासन का मोदी-नीतिश के साथ खड़े होना, महिलाओं को दस हजार रुपया बांटना इनकी जीत को ज्यादा प्रभावशाली बनाने में मददगार रहे। ऊपर से एस आई आर प्रक्रिया में नामों को काटने व ईवीएम गडबड़ियों ने उसे अतिरिक्त लाभ पहुंचाया। 
    
तो फिर क्या बेकारी-पलायन, महिला हिंसा के मुद्दे लोगों ने नकार दिये। नहीं! ऐसा नहीं कहा जा सकता। क्योंकि भले ही भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी हो पर सबसे ज्यादा वोट तेजस्वी की राजद को ही मिले हैं। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि इन मुद्दों को हल करने के जो वायदे तेजस्वी-राहुल ने किये थे, लोगों ने उन पर वैसा भरोसा नहीं किया जैसी उम्मीद जतायी जा रही थी। इसी तरह जातीय जोड़-तोड़ के गणित में नीतिश एक बार फिर तेजस्वी पर भारी पड़े। पैसा व मीडिया के मामले में तो एनडीए का मुकाबला करने की हालत में कोई दल नहीं था। 
    
केन्द्र-राज्य सरकार-चुनाव आयोग- प्रशासनिक मशीनरी-मीडिया की इतनी मिलीभगत के बावजूद विपक्षी गठबंधन 30 प्रतिशत से अधिक मत पाने में सफल रहा है। अगर विजयी गठबंधन 45-47 प्रतिशत से अधिक मत हासिल नहीं कर पाता तो यह दिखाता है कि बहुसंख्यक मतदाता मोदी-नीतिश सरकार के खिलाफ थे। यह चुनावी प्रक्रिया का ही कमाल है कि इतने मतदाताओं की नाराजगी के बावजूद एनडीए भारी संख्या में सीटें जीतने में सफल रहा। 
    
संघ-भाजपा के फासीवादी अभियान को राहुल-तेजस्वी के साथ जुड़ चुनावी गणित में हराने में जुटे सरकारी वामपंथियों को भी गिरावट झेलनी पड़ी। उन्हें समझना होगा कि इस जोड़-तोड़ से वे खुद के और अधिक पतन की राह खोल रहे हैं, क्रांतिकारी संघर्ष का रास्ता तो ये पहले की छोड़ चुके हैं। 
    
संघ-भाजपा के फासीवादी आंदोलन को उतने ही मजबूत जनांदोलन के जरिये ही रोका जा सकता है। यह संघर्ष सड़कों से लेकर संसद हर जगह लड़ा जाना होगा। फासीवाद विरोधी जनांदोलन की नामौजूदगी में महज चुनावी जोड़-तोड़ से हिन्दू फासीवाद को हराने की उम्मीद आज असफल होने को अभिशप्त है। ऐसा क्रांतिकारी संघर्ष देश के सबसे क्रांतिकारी वर्ग मजदूर वर्ग के नेतृत्व में ही खड़ा हो सकता है। इस संघर्ष के निशाने पर हिन्दू फासीवादियों के साथ-साथ उन्हें सत्ता में बैठाने वाली एकाधिकारी पूंजी भी होगी। इसीलिए एकाधिकारी पूंजी की कांग्रेस सरीखी पार्टियां इस संघर्ष का हिस्सा नहीं बन सकतीं। इसीलिए फासीवाद के खिलाफ देशव्यापी क्रांतिकारी मोर्चा कायम करना आज वक्त की जरूरत है।  
    
चुनावों में संघ-भाजपा की जीत से वास्तविक परिवर्तनकारी ताकतों को हतोत्साहित होने की जरूरत नहीं है। उन्हें अपने क्रांतिकारी सिद्धांत पर खड़े हो फासीवाद को वास्तविक चुनौती देने वाले संघर्ष को तीव्र करने में लगे रहना होगा। संघ-भाजपा से जनता की नाराजगी आज हर सड़क-चौराहे पर अभिव्यक्त हो रही है। मोदी की 56 इंच की छाती व देवपुरुष होने की नौटंकी तार-तार हो चुकी है। भले ही ये चुनावी गुणा-भाग में अभी भी जीत रहे हों पर क्रांतिकारी जनसंघर्ष के आगे इनका परास्त होना तय है।   

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