तंजानिया : चुनाव और हिंसा

/tanzaniya-chunav-aur-hinsa

तंजानिया अफ्रीकी महाद्वीप का एक देश है। 29 अक्टूबर 2025 को यहां राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ। चुनाव पूर्व ही सत्ताधारी पार्टी ने विपक्षी दलों के नेताओं को जेल में डालने के साथ तमाम नेताओं को चुनाव लड़ने से रोक दिया था। विपक्षी नेताओं ने चुनाव के दौरान सत्ताधारी दल द्वारा व राज्य द्वारा की गयी हिंसा में हजारों लोगों को मार डालने या गायब कर देने का आरोप लगाया है। इन परिस्थितियों में एक बार फिर सत्ताधारी दल चामा चा मापिन्दुजी (सी सी एम : क्रांतिकारी पार्टी) लगभग 98 प्रतिशत मतों के साथ विजयी हुई और राष्ट्रपति सामिया सुलुहू हसन फिर से राष्ट्रपति बनने में सफल रही।
    
चुनाव प्रक्रिया के दौरान न केवल इण्टरनेट बंद कर कर्फ्यू लगाया गया बल्कि दमन के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचला गया। मुख्य विपक्षी दल चाडेमा और एसीटी बाजालेंडो दोनों को चुनाव में भाग लेने से रोक दिया गया। कुछ विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर राजद्रोह का मुकदमा उन पर थोप दिया गया। इन परिस्थितियों में सत्ताधारी सीसीएम ने विपक्ष को लगभग अनुपस्थित बना खुद का चुनाव जीतना तय कर लिया था। 
    
चुनाव में सत्ताधारी तानाशाह पार्टी सीसीएम की धांधली के विरोध में एमनेस्टी इंटरनेशनल व कुछ अन्य साम्राज्यवादी संस्थाओं ने रिपोर्ट जारी की है। चुनाव की निगरानी हेतु बेल्जियम, स्वीडन, जर्मनी, आयरलैंड सरीखे देशों के निगरानी मिशनों को देश में आने की अनुमति नहीं दी गयी। चर्च व अन्य सत्ता विरोधी संगठनों का दमन किया गया। 
    
तंजानिया 1961 में ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी से स्वतंत्र हुआ था। जूलियस न्येरेरे के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष से तंजानिया को आजादी हासिल हुई। 1963 में पड़ोसी देश जांजीबार में सुल्तान को सत्ता से हटाने के बाद 1964 में तंजानिया व जांजीबार का एकीकरण हो गया और तंजानिया का संयुक्त गणराज्य कायम हुआ। जूलियस न्येरेरे ने 1967 में अकशा घोषणापत्र जारी कर अफ्रीकी किस्म के समाजवाद (उजामा) की घोषणा की। यह समाजवाद-अफ्रीकी राष्ट्रवाद-आत्मनिर्भरता के मिश्रण वाला कल्याणकारी पूंजीवाद वाला रास्ता था जो साम्राज्यवाद विरोध से प्रेरित था। 1977 में न्येरेरे की पार्टी व जांजीबार की पार्टी के विलय से चामा चा मापिन्दुजी (सीसीएम या क्रांति की पार्टी) का गठन हुआ। 
    
न्येरेरे 1961 से 1985 तक देश के प्रमुख बने रहे। तंजानिया ने समाजवाद के नारे के तहत एक पार्टी शासन अपनाया था। न्येरेरे के काल में तंजानिया में जनता के जीवन में एक हद तक सुधार हुआ। पर 90 के दशक से उदारीकरण की ओर बढ़ने के साथ 1992 में बहुदलीय प्रणाली अपना ली गयी। पर सत्ता पर लगातार सीसीएम पार्टी का वर्चस्व बना रहा। शुरूआत में जहां इस पार्टी के शासन को जन समर्थन प्राप्त था वहीं बाद में उदारीकरण के दौर में जनता की बदहाली बढ़ने के साथ प्रमुख पार्टी का विरोध बढ़ता गया। ऐसे में आने वाले राष्ट्रपति क्रमशः धांधली व तानाशाही से ही चुनाव जीतने में सफल होते रहे। 
    
विपक्षी पार्टियां भी आज सत्ताधारी पार्टी की तरह पूंजीवादी पार्टियां हैं जिन्हें बाहरी साम्राज्यवादी ताकतों का समर्थन मिलता रहा है। इसी के चलते सत्ताधारी पार्टी विदेशी हस्तक्षेप के नाम पर इनका दमन करती रही हैं। बीते 60 वर्षों में सोने व अन्य खनिज की बिक्री से पैदा हुआ पूंजीपति वर्ग सत्ताधारी पार्टी का समर्थन करता है। जहां तंजानिया में भारी आबादी बेहद गरीबी में जी रही है वही शासक वर्ग अमीर होता जा रहा है। 
    
ऐसे में ‘क्रांति की पार्टी’ आज पूंजीपतियों की पार्टी बन चुकी है और उसकी नेता एक तानाशाह बन चुकी है। तंजानिया की जनता को सही क्रांतिकारी जमीन पर खड़े हो इस पूंजीवाद को लात लगा असली समाजवाद कायम करने की जरूरत है। 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।