अंधराष्ट्रवाद और मीडिया

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कभी ब्रिटिश विद्वान सैमुअल जानसन ने कहा था कि, ‘‘राष्ट्रवाद बदमाशों की अंतिम शरणस्थली है’’। आज की दुनिया के ज्यादातर देशों के साथ भारत के हाल देखकर यह बात सच लगती है। दुनिया में उत्पीड़ित देशों की सबसे ज्यादा सम्प्रभुता को रौंदने वाले अमेरिकी साम्राज्यवादी आज ट्रम्प के नेतृत्व में राष्ट्रवाद का चोला ओढ़ अमेरिका को फिर से महान बनाने की बातें कर रहे हैं तो भारत में कभी ब्रिटिश शासकों के आगे नतमस्तक रहने वाले सत्ता पर पहुंच कर खुद को सबसे बड़ा देशभक्त-सबसे बड़ा राष्ट्रवादी करार दे रहे हैं।
    
2014 में नरेन्द्र मोदी के सत्ता में बैठने के बाद समय-समय पर यह प्रचार सुनाई देता है कि दुनिया में भारत का ‘‘डंका’’ बज रहा है। भारत को विश्वगुरू बनाना है। अब तो पूंजीपति वर्ग की भाषा में 2047 तक भारत को ‘‘विकसित’’ बनाने के दावे किये जा रहे हैं। यह इतना अधिक है कि कोई सरकार समर्थक यदि देश की समस्याओं पर जवाब न दे पाये तब भी वह कहते मिल जायेगा कि ‘‘दुनिया में तो भारत की पहचान मोदी जी के आने से ही बढ़ी है’’। एकदम फासीवादी नजरिये वाला कोई कहता मिल जायेगा कि ‘‘मुसलमानों को तो सबक सिखा ही दिया है’’। इस पर यदि सवाल किया जाये कि देश के अल्पसंख्यक मुसलमानों को सबक सिखाना कैसे देश का विकास है? दुनिया में देश का डंका कैसे बज रहा है?..., आदि इसी तरह के प्रश्नों पर किसी को देशद्रोही, पाकिस्तानी, अर्बन नक्सल कहकर चुप करा दिया जायेगा। यानी एक नागरिक के तौर पर आपकी अभिव्यक्ति को कुचल दिया जायेगा। सरकार नागरिकों के प्रति कोई जवाबदेही न माने यह फासीवादी तानाशाही की अभिव्यक्ति है; जिसमें जनता को एक विशेष ढंग से सोचने, व्यवहार करने की ओर जबरन धकेला जाता है। युद्ध के समय यह अपने चरम पर दिखाई देता है।
    
हाल ही में मई 25 में 4 दिवसीय भारत-पाक युद्ध के दौरान यह अंधराष्ट्रवाद सर चढ़ कर बोल रहा था। इस अंधराष्ट्रवादी माहौल में सरकार की हर करतूत आलोचना से परे बना दी गयी। जिन्होंने भी आपरेशन सिंदूर, पाकिस्तान का पानी रोकने, पहलगाम हमले के वक्त सुरक्षा इंतजाम न होने या फिर युद्ध रोकने में ट्रम्प की भूमिका पर प्रश्न उठाये, वे सभी राष्ट्रद्रोही के बतौर नवाजे जाने लगे। कुछ तो गम्भीर धाराओं में मुकदमों का शिकार हो गये और कुछ जेल पहुंच गये। 
    
संसद में आपरेशन सिंदूर पर बहस के वक्त भी अंधराष्ट्रवाद सत्ता पक्ष ही नहीं विपक्षी पार्टियों के भी सिर चढ़कर बोल रहा था। हर कोई सेना के महिमामण्डन से लेकर पाकिस्तान-चीन को कोसने में जुटा था। सरकार की आलोचना हो भी रही थी तो इसलिए कि उसने इंदिरा की तरह पाकिस्तान के टुकड़ें क्यों नहीं करा दिये, कि क्यों वह ट्रम्प के कहने पर रुक गयी। एक तरह से लग रहा था कि पाकिस्तान को कोसना ही देशभक्ति का पर्याय बन गया है। जो जितना पाक को कोस ले वो उतना बड़ा देशभक्त है। युद्ध की बातें ऐसे की जा रही थीं जैसे बम नहीं फुलझड़ियां छोड़नी हों। मारे जाने वाले लोगों और युद्ध से जनता के जीवन में पैदा होने वाली दुश्वारियों की कहीं कोई चर्चा ही नहीं थी। 
    
युद्ध के इस अंधराष्ट्रवादी माहौल में मारे गये नागरिकों, सीमा से सटे कश्मीर और पंजाब के इलाकों में आम नागरिकों को हुए जान-माल के नुकसान को कोई तवज्जो नहीं दी गयी। उन्हें किसी प्रकार की राजकीय सहायता की गयी हो इसकी कहीं सुध तक नहीं ली गयी। यहां तक कि सेना को हुए राफेल विमानों के नुकसान की भी सही जानकारी अभी तक नहीं दी गयी।
    
कहने की बात नहीं कि इस पूरे माहौल में भारत का पूंजीवादी मीडिया सरकार के बयानों से भी दो कदम आगे चल रहा था। युद्ध से पहले ही ‘यह सरकार कुछ बड़ा करने वाली है’, का प्रचार कर रहा था। युद्ध के दौरान यह कराची-इस्लामाबाद पर हमले की मनगढ़न्त खबरें फैला रहा था। सरकार पर व इस युद्ध के औचित्य पर सवाल उठाने वालों पर लानत-मलामत कर रहा था। कुल मिलाकर यह निर्लज्जता से सरकार के सुर में सुर मिला रहा था। आपरेशन सिंदूर का श्रेय भी मोदी को देने में इसने चाटुकारिता की हदें पार कर दीं। एक भी देश अगर भारत के समर्थन में दो शब्द बोल देता तो चैनल इसे बढ़ा चढ़ाकर मोदी की कूटनीतिक सफलता घोषित कर देते। उन्होंने पूरी चालाकी से यह सच छुपाया कि इस युद्ध में भारत को इजरायल व तालिबान को छोड़ किसी भी देश का साथ नहीं मिला। ट्रम्प के युद्ध रुकवाने के दावों पर सरकार से सवाल पूछना तो दूर यह सरकार के पक्ष का ही महिमामण्डन करने में जुटा रहा। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भारत के राफेल गिरने की खबरों पर भी इनकी सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत नहीं हुई। 
    
पूंजीवादी मीडिया का यह रुख आज भारत में पत्रकारिता की चिंताजनक स्थिति को दिखा देता है। 
    
2025 के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारतीय मीडिया को 180 देशों में 151 वां स्थान मिला। मुख्य धारा के न्यूज चैनल और अखबार भारतीय शासक वर्ग और सरकार का भोंपू बनते गये हैं। इस मामले में हिन्दी या अंग्रेजी के न्यूज चैनलों और अखबारों के बीच का अंतर क्रमशः कम होता गया है। खबरें, उनके शीर्षक अक्सर ही सरकार के एजेंडे को ही आगे बढ़ाने वाले होते हैं। एकाधिकारी पूंजी और संघ के गठजोड़ से सत्ता पर काबिज मोदी सरकार के ये पूर्ण समर्थक बनते गये हैं। मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर एकाधिकारी पूंजी के नियंत्रण के चलते इनका सरकार का भोंपू बन जाना संभव हो सका है। इसीलिए जब अडानी ग्रुप की वित्तीय गड़बड़ियों पर हिंडेनबर्ग की रिपोर्ट सामने आती है तो अडानी इसे ‘‘भारतीय राष्ट्र’’ पर हमला कहने लगता है और मीडिया यह दोहराने लगता है।
    
राष्ट्रवाद आधुनिक पूंजीवादी धारणा है। यूरोप में राष्ट्रवाद सामंतवाद और सामंती सत्ता के खिलाफ संघर्ष के दौरान पैदा हुआ। भारत में राष्ट्रवाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद और इनके देशी आधार सामंती राजे-रजवाड़ों के खिलाफ संघर्ष में पैदा हुआ। 1857 में सामंती रजवाड़ों के अंतिम विद्रोह और भारतीय जनता के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद राष्ट्रवादी भावना क्रमशः आजादी तक बढ़ती ही रही। सामंती शासन और साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में इस राष्ट्रवादी धारा ने जनता का नेतृत्व किया। देश आजाद हुआ और सत्ता पर भारतीय पूंजीपति वर्ग बड़े भूस्वामी वर्ग के साथ सत्ता पर काबिज हो गया। यहां राष्ट्रमुक्ति के साथ राष्ट्रवाद की सकारात्मक भूमिका समाप्त हो गयी। अब यह देश में उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के दमन का अस्त्र बन गया। जहां देश की ‘‘एकता’’, ‘‘अखण्डता’’ के नाम पर राष्ट्रीयताओं के आन्दोलनों को कुचलना ‘‘राष्ट्रवाद’’ यानी अंधराष्ट्रवाद हो गया। आजाद भारत में मेहनतकश जनता के बीच ‘फूट डालने और राज करने’ में शासक वर्ग ने इसका उपयोग किया। आज केवल साम्राज्यवादी कब्जे के शिकार देशों और उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के संघर्ष में ही राष्ट्रवाद की कुछ सकारात्मक भूमिका बची हुई है। शेष दुनिया के अधिकांश देशों में पूंजीवादी शासकों के राष्ट्रवाद की भूमिका सकारात्मक नहीं रह गयी है। वहां शासक वर्ग के हाथ में यह ‘‘अंधराष्ट्रवाद’’ हो गयी है। भारत में भी शासकों का राष्ट्रवाद ‘‘अंधराष्ट्रवाद’’ के रूप में ही मौजूद है।
    
पर फिर भी कहना होगा कि नेहरू के जमाने से मोदी के जमाने तक शासकों के अंधराष्ट्रवाद में काफी फर्क आ चुका है। आजादी के बाद जनता के संघर्षों का दबाव शासक वर्ग पर मौजूद था। इसीलिए शासकों का अंधराष्ट्रवाद भारत-पाक युद्ध या भारत-चीन युद्ध के वक्त तो नजर आता था या यह इस स्तर पर नहीं पहुंचा था कि शासकों पर सवाल खड़े करना, उनके खिलाफ बात करना राष्ट्रद्रोह मान लिया जाता। 
    
जनता अपने संघर्षों के दम पर जब तब सरकार से असहमति जताती रही। संघर्षों का दमन भी होता रहा पर कई मुद्दों पर सरकार झुकने को भी मजबूर होती रही। भाषावार राज्य गठन, त्रिभाषा फार्मूले का विरोध ऐसे ही मुद्दे थे जिन पर सरकार झुकने को मजबूर हुई। इंदिरा के सत्तासीन होने के बाद अंधराष्ट्रवादी कदम बढ़ते गये। 70 के दशक में जनसंघर्ष, उनका दमन और फिर आपातकाल में सरकार के इस रुख को गहराते हुए देखा गया। संविधान की प्रस्तावना में अखण्डता के शामिल होने को भी शासकों की इस सोच में देखा जा सकता है कि वे अब उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के संघर्षों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है और उन्हें अब किसी भी कीमत पर कुचलेंगे। गौरतलब है कि अब तक भारत में कश्मीर का विलय एक मुकाम तक पहुंच गया था। 
    
80 के दशक के मध्य से भारतीय शासकों ने अपनी पुरानी संरक्षणवादी नीतियों में बदलाव करना शुरू किया और 90 के दशक में उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के साथ सरकार नई दिशा में बढ़ चली। इन नीतियों का अंतर्य था पूंजी द्वारा श्रम पर हमला। अब नाम मात्र के कल्याणकारी राज्य को तिलांजलि से छुट्टे पूंजीवादी की ओर देश बढ़ चला। इन स्थितियों में एक ओर जनवादी अधिकारों पर हमला बोला गया; राज्य का दमनकारी चरित्र बढ़ता गया तो दूसरी ओर जनता को साम्प्रदायिक वैमनस्य के जरिए आपस में बांटने की ओर ले जाया गया। यह यूं ही नहीं था कि नई आर्थिक नीतियां लागू होने व बाबरी विध्वंस का काल लगभग एक ही था। संघ-भाजपा, जिनको अब तक पूंजीपति वर्ग पालता-पोषता रहा था, अब अधिकाधिक पूंजीपति वर्ग का समर्थन ग्रहण करते गये। 2014 में यह संघ व एकाधिकारी पूंजी के गठजोड़ कायम होने व मोदी के सत्तासीन होने तक जा पहुंचा। वैसे तो 90 के दशक से ही शासकों के अंधराष्ट्रवाद में नये-नये आयाम जुड़ते गये पर मोदी काल में यह सब नयी ऊंचाईयों तक जा पहुंचा। इस सबका एक अंतर्राष्ट्रीय आयाम भी था। 
    
सोवियत संघ के विघटन के साथ समाजवाद से निपटने के बाद साम्राज्यवादियों को अपने वैश्विक हस्तक्षेप-युद्धों के लिए नया दुश्मन चाहिए था। सभ्यताओं के संघर्ष व आतंकवाद के शिगूफे से यह दुश्मन हासिल किया गया। इसके तहत आतंकवाद के खात्मे के बहाने देशों पर हमले बोले गये तो दूसरी ओर अपने देशों के भीतर अप्रवासियों-मुसलमानों पर हमला बढ़ाया गया। वैश्विक पैमाने पर पूंजीवादी राजनीति अधिकाधिक दक्षिणपंथ की ओर ढुलकती गयी। फासीवादी-दक्षिणपंथी प्रवृत्तियां क्या अमेरिका क्या भारत सब जगह जोर पकड़ती गयीं। 
    
मोदी काल में अब धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया गया। अब हिन्दू धर्म, उसकी कूपमंडूकताओं का विरोध करना राष्ट्र विरोघ बना दिया गया। हिंदू धर्म-त्यौहारों को संघी नेकर पहना आक्रामकता प्रदान कर मुसलमानों पर हमलावर बना दिया गया और इस आक्रामकता को राष्ट्रवाद-देशभक्ति के बतौर पेश किया जाने लगा। यही सब गौरक्षा-लव जिहाद आदि के नाम पर मुसलमानों पर हमला बोलने के मामले में भी किया गया। अब सरकार का विरोध ही राष्ट्र विरोध बन गया। सेना पर सवाल खड़े करना, शासकों की साम्राज्यवादपरस्ती का विरोध करना, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के उत्पीड़न की बात उठाना, कुल मिलाकर किसी भी तरह सत्ता के विरोघ में कुछ कहना राष्ट्र विरोध का ठप्पा दिये जाने को अभिशप्त हो गया। 
    
भारत के शासकों ने पाकिस्तान, आतंकवाद, मुसलमान में अंधराष्ट्रवाद के बाहरी और आंतरिक ‘‘शत्रु’’ तय कर लिये। कश्मीरी राष्ट्रीयता का दमन, धार्मिक विभाजन, सांस्कृतिक विविधता का दमन, आदि सब देश की ‘‘एकता, अखण्डता’’ के नाम पर होता है। यहां तक कि खेल, गीत-संगीत, खान-पान की चीजों में भी यही किया जाता है। भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मैच किसी ‘‘युद्ध’’ की तरह पेश किये जाते हैं। मैच जीतने पर ‘‘धूल चटाई’’, ‘‘रौंद डाला’’ जैसे शीर्षकों से खबरें प्रचारित की जाती हैं। हाल में हुए एशिया कप में खिलाड़ियों के हाथ न मिलाने से लेकर जीतने पर ट्राफी न लेने तक खेल नहीं ‘‘देशभक्ति’’ थी। हिन्दू फासीवादी मोदी सरकार के काल में यह सब नये चरम पर है। अपने फासीवादी प्रचार तंत्र द्वारा जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाकर स्वायत्ता खत्म करने का देश भर में जश्न मनवाया गया। जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीदने और लड़कियों से शादी करना संभव होने की बातें की गयीं। इनके पीछे सांस्कृतिक एकता की भावना नहीं बल्कि कब्जा करने का दंभपूर्ण प्रदर्शन था। यह अंधराष्ट्रवाद ही है जिसमें एक राज्य की लाखों-लाख जनता से कुछ अधिकार छिन जाने पर शेष जगह जनता को दुर्भावनापूर्ण जश्न में लगा दिया। 
    
शासकों द्वारा थोपे गये युद्धों-छद्म युद्धों में मारे गये सैनिकों की अंत्येष्टी को जोशो-खरोस के साथ मनाया जाने लगा। इसमें इलाके की स्थानीय जनता को भी अधिकाधिक शामिल कराने की कोशिशें रहती हैं। कारगिल युद्ध के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने इसकी शुरूआत की। इसमें परिवार के प्रति शोक संवेदना व्यक्त नहीं की जाती हैं बल्कि उनको गौरवान्वित महसूस करवाया जाता है कि आपका परिजन देश के लिए ‘‘शहीद’’ हुआ है। मोदी सरकार ने सैनिकों की मौत को भी राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया। पुलवामा के कथित आतंकी हमले के बाद बालाकोट स्ट्राइक पर ‘‘घुस कर मारने’’ का प्रचार किया गया। हालांकि चीन के साथ हुई झड़प में सैनिकों के मारे जाने पर ‘‘चीनी ऐप्स पर प्रतिबन्ध’’ लगाने को ही अंधराष्ट्रवाद की नैया बना दिया गया।
    
हद तो यह है कि कार्यपालिका (प्रशासन, पुलिस, अफसर) अधिकाधिक सरकार के आगे दण्डवत थी ही अब न्यायालय भी झुकता गया है। यदि मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ सेवानिवृत्त होकर बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद पर फैसला देने में ईश्वर की भूमिका बताते हैं तो यह समझना किसी के लिए मुश्किल नहीं है कि कौन ‘‘ईश्वर’’ है जिसके आगे न्यायाधीश झुकने को मजबूर हैं। सारा तथाकथित लोकतंत्र (न्यायालय, कार्यपालिका) सरकार के नियंत्रण में रखने का मतलब ही है कि जनवाद को कम से कमतर करते जाना। मजदूर-मेहनतकश जनता के लिए नाममात्र के अधिकार भी पूंजीवादी लोकतंत्र में कांट-छांट दिये गये हैं।
    
आज देशभर में अतिक्रमण के नाम पर मजदूर बस्तियां उजाड़ी जा रही हैं। जहां नहीं उजाड़ी जा रही हैं वहां ‘घुसपैठिया’ के नाम पर बस्तियों को संदिग्ध बनाने की कोशिश की जा रही है। बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमान के नाम पर तमाम बांग्ला भाषी भारतीयों को ही परेशान किया गया। यहां पुलिस उत्पीड़न या बुल्डोजर कार्यवाहियों को जायज ठहराने के लिए ‘अल्पसंख्यक’, ‘आतंकवाद’, ‘घुसपैठिया’, ‘देश विरोधी गतिविधियां’, आदि के झूठ को फैलाकर जनता के बड़े हिस्से को खुद नागरिक अधिकारों के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है, संदिग्ध बना दिया जा रहा है। 
    
यह अंधराष्ट्रवाद पड़ोसी मुल्कों को धमकाने, देश में सबसे गरीब रोहिंग्या-बांग्लादेशी लोगों को खतरे के रूप में देख घुसपैठिया बताने, मुसलमानों पर हमला बोलने, बुलडोजर एक्शन, जंगलों से आदिवासियों को बम बरसा कर खदेड़ने, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के संघर्षों को बेरहमी से कुचलने, मोदी काल में देश के विकास की मनगढ़न्त गाथायें गढ़ने, क्रांतिकारी जनवादी ताकतों को बेरहमी से कुचलने आदि भांति-भांति रूप में खुद को आज अभिव्यक्त कर रहा है। कहने की बात नहीं कि संघ-भाजपा की फासीवादी हिन्दू राष्ट्र की परियोजना के लिए ये जरूरी है और एकाधिकारी पूंजी का इस सबको समर्थन मिल चुका है।     
    
ऐसे में मीडिया की स्थिति पर नजर डालें तो आज मुख्यधारा का मीडिया लगभग पूरी तरह से मोदी सरकार के महिमामण्डन व उसके अंधराष्ट्रवाद के प्रचारक की भूमिका में उतरा हुआ है। इसने जनता के बुनियादी मुद्दों पर पर्दा डालकर अंधराष्ट्रवादी उन्माद, हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य, पाकिस्तान-आतंकवाद प्रसारित करने पर मुख्यतः जोर दिया है साथ ही इसने मोदी-भाजपा को असंदिग्ध देशभक्त के बतौर पेश किया है तो विपक्ष को देशद्रोहियों की जमात बताने में जुटा रहा है। टीवी चैनलों में मुसलमानों, पाकिस्तान व आतंकवाद को कोसना, इनके बारे में मनगढ़ंत बातें करना आज प्रिय शगल बन चुका है। 
    
मीडिया को शासक वर्ग ‘लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ’ करार दे जनता की आंखों में धूल झोंकने का काम करता है। दरअसल पूंजीपति वर्ग की शासन व्यवस्था में उसकी पूंजी से चलने वाला मीडिया उसके हितों को प्रसारित करने वाले औजार से अधिक कुछ नहीं है। पूंजीपति वर्ग के हितों के अनुरूप जनमत का निर्माण करना ही इसका मुख्य काम है। इसीलिए लोकतंत्र का यह तथाकथित स्तम्भ खुद लोकतंत्र की कब्र खोदने में अग्रणी बना हुआ है। 
    
आज भारत में मीडिया के सभी क्षेत्रों (अखबार, पत्रिकायें, रेडियो, टीवी, इंटरनेट, सिनेमा) में एकाधिकारी पूंजी का वर्चस्व है। अंबानी, अडाणी घराने आज ज्यादातर मीडिया समूहों से प्रसारित सामग्री को नियंत्रित करते हैं। ये घराने चूंकि आज संघ-भाजपा के साथ खड़े हैं इसलिए ज्यादातर मीडिया संघी भोंपू नजर आता है। नेटवर्क 18 समूह के चैनलों का मालिकाना अम्बानी के पास है तो एन डी टी वी के विभिन्न चैनलों का मालिक अडाणी है। जी टी वी, रिपब्लिक टी वी के मालिकों का भाजपा प्रेम जगजाहिर है। 
    
स्वभाविक ही है कि भारतीय शासकों का अंधराष्ट्रवाद दुनिया भर में प्रगतिशील राष्ट्रवाद के संघर्षों का विरोधी है। पूंजीवादी मीडिया भी उसी अनुरूप अवस्थिति लेता गया है। कभी फिलिस्तीन मुक्ति के समर्थक रहे भारत में आज फिलिस्तीनी मुक्ति का समर्थन राष्ट्रद्रोह सरीखा हो चुका है। मीडिया भी इस मसले पर सरकार से सवाल पूछने के बजाय फिलिस्तीनी मुक्ति का समर्थन करने वालों को अपराधी के बतौर पेश करने में पीछे नहीं है। जब फिलिस्तीन के मसले पर यह हाल है तो कश्मीर-पूर्वोत्तर की उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं पर तो बात करना भी गुनाह सरीखा हो चुका है। ढेरों लोग इन मसलों पर बोलने के चलते जेलों में कैद हैं और मीडिया सरकार की भाषा में इन्हें आतंकी सरीखा पेश करने में जुटा है। यही हाल मुसलमानों के उत्पीड़न पर आवाज उठाने वालों का भी है। इससे आगे बढ़कर रोटी-रोजगार-महंगाई, सरकार के विकास के फर्जी आंकड़ों पर सवाल खड़े करने वालों से यह मीडिया राजसत्ता के सुर में सुर मिला अपराघी की तरह व्यवहार कर रहा है। कुल मिलाकर इंसान का मुंह में जुबान रखना भी गुनाह हो चुका है और मीडिया इस हालात पर सत्ता के कसीदे गढ़ रहा है। मजदूर वर्ग के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ बोलना तो पहले भी सत्ता को नापसंद था आज यह अपराध सरीखा बन गया है और मीडिया खामोशी से इस पर सहमति दे रहा है। इस अंधराष्ट्रवाद में सरकार-सेना ही नहीं पुलिस-प्रशासन तक की कारगुजारियों के खिलाफ बोलना राष्ट्र के खिलाफ बोलना सरीखा हो चुका है। पुलिस की लाठी ही राष्ट्रवाद का प्रतीक बन चुकी है। बुलडोजर राष्ट्रवाद का प्रहरी बन चुका है। जाहिर है यह सब भारतीय कानूनों का मखौल बना किया जा रहा है और पूंजीवादी मीडिया इसका बढ़ चढ़कर प्रस्तोता बना हुआ है। यह स्थिति देश को तेजी से फासीवादी निजाम की ओर ले जा रही है।  
    
हालिया भारत-पाक युद्ध के दौरान मीडिया चैनलों ने मानो दुष्प्रचार व अंधराष्ट्रवाद फैलाने की आपस में जंग छेड़ दी थी। जी न्यूज ने दावा किया ‘पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पर कब्जा कर लिया गया है।’ आज तक ने कराची पोर्ट पर सैन्य हमले का कृत्रिम रूपान्तरण बना उसे इस तरह प्रसारित किया जैसे लाइव प्रसारण हो रहा हो। इंडिया टुडे ने भी लाहौर, कराची पर भारतीय हमले का दावा किया। टाइम्स नाउ ने तो अतिरंजित कवरेज की सीमा पार कर दी। सोशल मीडिया पर तो पाक सेना के आत्मसमर्पण, पाक प्रधानमंत्री के बंकर में छिपने की खबरें थीं। गौरतलब है कि इन झूठी व अतिरंजित खबरें देने वाले चैनलों पर सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की जबकि एक्स पर सरकार ने स्वतंत्र मीडिया हाउस वायर, मकतूब मीडिया, फ्री प्रेस कश्मीर, द कश्मीरियत समेत 8000 खाते
बंद करा दिये। 
    
कारगिल युद्ध के बाद से ही मीडिया चैनल ग्राफिक्स के जरिये युद्धों के समय अतिरंजना का काम कर रहे हैं। हर नये मौके पर ये झूठ-आडम्बर के नये कीर्तिमान रच रहे हैं। कुछ वक्त पहले दैनिक जागरण ने एक सर्जिकल स्ट्राइक की खबर को अपनी मुख्य खबर बना पेश किया था तब सेना को ही आगे आकर इसका खण्डन करना पड़ा था। 
    
जाहिर है बड़ी पूंजी-फासीवादी संघ-भाजपा की सरकार की सहमति इन सारे कारनामों में चैनलों के साथ रही है। समाज को एक उन्माद में ढकेल जनता को बुनियादी मुद्दों से दूर करने में ये चैनल मददगार बने हुए हैं।     
    
गैर एकाधिकारी क्षेत्रीय पूंजी के भी अखबार-चैनल हैं जो क्षेत्रीय राजनीतिक दलों से जुड़े हैं। पर आज ये भी अधिकतर मुख्य धारा के चैनलों की ही नकल कर रहे हैं। इनमें से कुछ के केन्द्र के बढ़ते हस्तक्षेप, राज्यों की अवहेलना, एक भाषा-एक संस्कृति आदि के संघी एजेण्डे से मतभेद हैं पर अंधराष्ट्रवाद के मसले पर ये मोटे तौर पर मोदी सरकार के ही सुर में सुर मिला रहे होते हैं। केवल उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के ही कुछेक पत्र-पत्रिकायें-चैनल भिन्न रुख अपना रहे होते हैं।
    
स्थानीय स्तर पर शहरों-कस्बों से छोटी पूंजी से निकलने वाले अखबार-पत्रिकायें जो ज्यादातर सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर होते हैं, उनमेें पेटी बुर्जुआ चरित्र के चलते फासीवादी सोच व उसकी अंधराष्ट्रवादी बातों का पहले ही से प्रभाव होता है। इसीलिए ये पहले से ही अंधराष्ट्रवाद के मसले पर संघी दृष्टिकोण फैलाते रहते हैं। 
    
जहां तक सवाल सोशल मीडिया का है तो इसका बहुलांश संघ-भाजपा के फासीवादी एजेण्डे-अंधराष्ट्रवादी उन्माद को फैलाने का जरिये बना हुआ है। मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलने, गाली-गलौज के लिए इसका संगठित स्तर पर इस्तेमाल हो रहा है। युद्ध के दौरान मनगढ़ंत खबरें फैलाने, अंधराष्ट्रवादी दावे करने में यह अग्रणी है। संघ-भाजपा नियोजित तरीके से यहां अपने पक्ष की खबरें फैलाने व विरोधी खबरों को ट्रोल करने-गरियाने का काम करते हैं। हालांकि फिर भी कहना होगा कि इसका छोटा हिस्सा ही सही संघी करतूतों का विरोध करने व इनकी असलियत उजागर करने का काम करता है। 
    
जहां तक जनता के मुद्दों को स्वर देने वाली पत्र-पत्रिकाओं-वेबसाइटों का सम्बन्ध है तो ये बेहद कम संसाधनों पर समर्पित कार्यकर्ताओं के दम पर चलती हैं। इनका प्रभाव यद्यपि कम है पर यही शासक वर्ग से लोहा लेती हैं व शासकों के हमले दमन का सर्वाधिक शिकार होती हैं। इस श्रेणी में भी राष्ट्रवाद के प्रश्न पर विचारधारात्मक विभ्रम मौजूद होने के चलते तो कई दफा दमन से बचने के उपाय के चलते उचित प्रतिक्रिया नहीं दी जाती। कोई संघी राष्ट्रवाद के बरक्स प्रगतिशील राष्ट्रवाद, अच्छे या सकारात्मक राष्ट्रवाद की बातें करने लगते हैं। और इस तरह से शासक वर्ग के ही हितों को आगे बढ़ाने के बायस बन जाते हैं। मसलन हालिया भारत-पाक युद्ध के वक्त युद्ध का खुलकर विरोध करने के बजाय ढेरों लोग सरकार के कुत्सा प्रचार, झूठे दावों आदि को ही मुख्य रूप से झुठलाने में लगे रहे। इस तरह वे युद्ध को प्रकारांतर से जायज ठहराने लगे। 
    
यह समझने की जरूरत है कि आज साम्राज्यवादी कब्जे के शिकार देशों व उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के संदर्भ में ही राष्ट्रवाद की प्रगतिशील भूमिका कुछ शेष बची है। अन्यथा यह सारी दुनिया के पैमाने पर ही प्रतिक्रियावादी भूमिका अंधराष्ट्रवाद में तब्दील हो चुका है। इसीलिए इस अंधराष्ट्रवाद का मुकाबला किसी भिन्न राष्ट्रवाद की जमीन पर खड़े होकर नहीं बल्कि मजदूर वर्ग के अंतर्राष्ट्रीयतावाद के ही दृष्टिकोण से किया जा सकता है। राष्ट्रवाद पूंजीपति वर्ग की पैदायश के साथ पैदा हुआ था। इसीलिए आज अंधराष्ट्रवाद का मुकाबला पूंजीवादी व्यवस्था के अंत व समाजवाद की स्थापना के लक्ष्य को सामने रख कर ही किया जा सकता है। जनपक्षधर मीडिया को अपना रुख इसी अनुरूप बनाना होगा। 
    
पूंजीवादी व्यवस्था की क्रूरता के शिकार हर व्यक्ति को वर्ग सचेत कर, वास्तविक स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा हासिल करने के लिए प्रेरित करना आज जनपक्षधर मीडिया का मुख्य कार्यभार बनता है। कभी फ्रांसीसी क्रांति के समय पूंजीपति वर्ग स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा का झण्डा पकड़ता था। सत्ता पर आते ही उसने लूट की स्वतंत्रता, लुटेरों के बीच समानता और लुटेरों के बीच भाईचारा स्थापित किया। अगर मजदूर-मेहनतकश जनता ने कुछ हासिल किया तो अपने संघर्षों और बलिदान की बदौलत। महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति में मजदूर वर्ग ने अपनी अप्रतिम क्षमता का परिचय दिया। मजदूर वर्ग का अंतर्राष्ट्रीयतावाद उसे अंधराष्ट्रवाद के चंगुल में फंसने से रोकता है। वह अपने दर्शन, विचारधारा ही नहीं बल्कि अतीत के अनुभव से भी जानता है कि मजदूर वर्ग की मुक्ति किसी एक देश से मात्र शुरू भर ही होगी। अंधराष्ट्रवाद उसके लिए पराई विचारधारा है। इसी तरह पूंजीपति वर्ग के विपरीत जातीय, धार्मिक, राष्ट्रीय, लैंगिक, आदि सवालों को हल करते हुए मजदूर-मेहनतकश जनता की परस्पर एकता कायम करना समाजवाद का लक्ष्य होता है।
    
देश-दुनिया में जहां शासकों का अंधराष्ट्रवाद जोर पकड़ रहा है वहीं जनता का बढ़ता प्रतिरोध इसे चुनौती भी दे रहा है। कई जगह युवा संघर्षों से सत्तायें बदल चुकी हैं। मजदूर वर्ग भी जगह-जगह बड़े पैमाने पर संघर्ष कर रहा है। भारत में भी किसान आंदोलन व सीएए-एनआरसी विरोधी संघर्ष ने मोदी की सत्ता के अंधराष्ट्रवादी कुत्सा प्रचार का बहादुरी से मुकाबला किया। संघर्षों की ये लहर भविष्य में क्रांतिकारी विचारधारा से लैस हो फासीवादी ताकतों की राह न केवल रोकेगी बल्कि समाजवादी क्रांति की ओर भी कदम बढ़ायेगी। 
    
‘नागरिक’ अखबार अंधराष्ट्रवाद के खिलाफ मजदूर वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका को शिद्दत से महसूस करता है। और यह अपना कर्तव्य समझता है कि मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से अंधराष्ट्रवाद का मुकम्मल प्रतिकार किया जाए। यह स्थापित किया जाये कि मजदूर वर्ग की सक्रियता से ही फासीवाद के बढ़ते खतरे को रोका जा सकता है। व्यापक मेहनतकश जनता को फासीवादी प्रभाव से निकल कर मजदूर वर्ग के साथ समाजवादी क्रांति की राह पर बढ़ना होगा। ‘नागरिक’ अखबार इस काम को अपनी पूरी क्षमता से करने के लिए कृतसंकल्प है। मानवता के उज्जवल भविष्य के लिए सभी इंसाफपसन्द जनता से इसमें सहयोग, समर्थन की अपील करता है।

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