होरमुज नाकाबंदी के बीच ट्रंप की चीन यात्रा का अर्थ

Published
Sat, 05/16/2026 - 15:50
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अमरीका द्वारा पेश शांति प्रस्ताव को ईरान ने यह कहकर रद्द कर दिया कि यह आत्मसमर्पण करने की मांग है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया कि ईरान धमकियों के आगे नहीं झुकेगा और वह अपनी सम्प्रभुता व सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। अमरीकी प्रस्ताव के जवाब में ईरान ने अपना प्रस्ताव मध्यस्थ पाकिस्तान के जरिये पेश किया। इस शांति प्रस्ताव में अमरीका-इजरायल द्वारा ईरान पर थोपे गये गैर उकसावे भरे युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई (हरजाने) की मांग की गयी थी। अमरीका व उसके समर्थक देशों द्वारा अवरुद्ध ईरानी रकम और सम्पदा को वापस करने की मांग तथा ईरान पर लगे आर्थिक व अन्य प्रतिबंधों को समाप्त करने की बात की गयी। ईरानी शांति प्रस्ताव में यह मांग रखी गयी कि होरमुज जलडमरूमध्य से अमरीकी नौसेना द्वारा नाकाबंदी पूर्णतया समाप्त की जाये। होरमुज जलडमरूमध्य से जहाजों के पारगमन के प्रबंधन और संचालन की जिम्मेदारी ईरान की हो। इसके साथ ही इस शांति के दायरे में लेबनान और गाजापट्टी के इलाके भी निश्चित रूप में शामिल हों। इसके बाद, ईरान के परमाणु कार्यक्रम के संवर्धन पर बातचीत हो। इसमें भी ईरान ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसका परमाणु कार्यक्रम नागरिक उद्देश्यों के लिए है और उसका अधिकार है। ईरान ने यह साफ तौर पर खारिज कर दिया कि वह अपना यूरेनियम अमरीका को सौंपेगा। ईरान के इस जवाबी प्रस्ताव को अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प से पूर्णतया ‘‘अस्वीकार्य’’  कहकर खारिज कर दिया। इस तरह, शांति की यह प्रक्रिया बाधित हो गयी और अमरीका-इजरायल द्वारा ईरान पर फिर से युद्ध छेड़ने की संभावना बढ़ गयी। 
    
इसी युद्ध की संभावना के बीच अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप 14-15 मई को चीन में राष्ट्रपति शी जिन पिंग से शीर्ष बैठक करने वाले हैं। दोनों साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच विश्वव्यापी प्रतिस्पर्धा के इस समय बहुत और महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। लेकिन इनमें इस शीर्ष वार्ता में होरमुज जलडमरूमध्य का मुद्दा सबसे प्रमुख रहने की संभावना है। ट्रंप की लाख धमकियों के बावजूद ईरान झुकने का नाम नहीं ले रहा है। ईरान लगातार दावा कर रहा है कि वह लम्बे युद्ध के लिए तैयार है। अब ट्रंप ईरान से समझौता कराने के लिए चीन की मदद चाहेगा। ट्रंप की संभावित यात्रा से पहले ईरान के विदेश मंत्री अरागची चीन की यात्रा कर चुके हैं। अरागची ने चीनी विदेशमंत्री से मिलकर ईरान की अवस्थिति स्पष्ट कर दी। चीन ईरान के तेल का 90 प्रतिशत सस्ते दामों पर खरीदता है। इसके अतिरिक्त, वह खाड़ी देशों से भी तेल खरीदता है। होरमुज जलडमरूमध्य की अमरीका द्वारा नाकाबंदी करने से चीन का तात्कालिक नुकसान हो रहा है। लेकिन चीन इसके लिए पहले से तैयार था। उसने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों -सौर ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा इत्यादि- के साथ-साथ रूस से तेल खरीदने का विकल्प तैयार कर रखा है। इसके बावजूद, वह ईरान की सत्ता को गिरते नहीं देखना चाहता। ईरान के साथ उसके 25 वर्षीय आर्थिक व अन्य समझौते हैं। चीनी और रूसी साम्राज्यवादियों के लिए ईरान की सम्प्रभुता का समर्थन और अमरीकी-इजरायली हमले का विरोध महज नैतिकता या न्यायसंगतता का मामला नहीं है, बल्कि यह उनकी वैश्विक रणनीति के हिस्से के बतौर है। चीन ने पश्चिम एशिया में बेल्ट और रोड इनीशियेटिव के तहत काफी निवेश कर रखा है। इस इलाके में शांति उसके निवेश के लिए जरूरी है। इसी के मद्देनजर उसने पश्चिम एशिया के दो बड़े प्रतिद्वन्द्वियों- साउदी अरब और ईरान- के बीच कूटनीतिक सम्बन्धों की बहाली करायी थी। 
    
इसके अतिरिक्त, पश्चिम एशिया में अभी तक अमरीकी साम्राज्यवादियों का वर्चस्व कायम रहा है। ईरान की 1979 में इस्लामी सत्ता आने के बाद अमरीकी साम्राज्यवादी लगातार उसे हटाने की ‘हुकूमत परिवर्तन’ करने की साजिश रचते रहे हैं। उन्होंने ईरान की हुकूमत को समूचे पश्चिम एशिया में अलग-थलग कर रखा था। ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे। यहूदी नस्लवादी इजरायली सत्ता अमरीकी साम्राज्यवादियों की इस क्षेत्र में चैकीदार और लठैत थी। इसके बाद भी, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने इस इलाके के कई देशों में अपने फौजी अड्डे बनाकर रखे थे। ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमलों और ईरान द्वारा किये गये जवाबी हमलों से इस इलाके में अमरीकी प्रभुत्व को चुनौती मिल गयी। ईरान का भारी नुकसान होने के बावजूद ईरान ने अमरीकी और इजरायली फौजी ठिकानों और अवरचना के विभिन्न क्षेत्रों को भारी नुकसान पहुंचाया। ईरान की रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों ने मदद की। अमरीकी-इजरायली योजना, ईरान की ध्वस्त करने की योजना, असफल हो गयी। 
    
उधर अमरीका में ट्रंप के विरुद्ध न सिर्फ मजदूर-मेहनतकश आबादी खड़ी होती गयी है, न सिर्फ विरोधी पूंजीवादी पार्टी डेमोक्रेटिक पार्टी ट्रंप के खिलाफ खड़ी हो गयी है, बल्कि खुद उसके मागा समर्थक, उसकी रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य भी खिलाफ होते जा रहे हैं। देश के भीतर तेल और गैस की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ अन्य सामानों के महंगे होते जाने की मार से व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी परेशान है। समूचे अमरीका में ईरान पर युद्ध छेड़ने के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी तेल और गैस की आपूर्ति में बाधा होने से ट्रंप के ऊपर होरमुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी के विरुद्ध आवाजें तेज हो रही हैं। यूरोप के देश अपनी तेल की जरूरतों को पूरा करने के लिए ईरान के साथ अलग समझौता कर रहे हैं। अमरीकी नाकेबंदी के विरोध में यूरोप के देश मुखर होकर सामने आ गये हैं। पूर्व एशिया के देशों जापान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण पूर्व एशिया व दक्षिण एशिया में तेल आपूर्ति में बाधा आ जाने से ये नाकेबंदी के विरोध में आते जा रहे हैं। 
    
ऐसी हालत में, जब ट्रंप को घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलगाव का सामना करना पड़ रहा है और वह सैनिक तरीके से ईरान को झुकाने में, घुटने टेकने के लिए मजबूर करने में असफल होता गया है, वह चीन की शीर्ष वार्ता करने के लिए जा रहा है। इस मामले में ट्रंप अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में है और वह जल्द से जल्द ईरान युद्ध से बाहर निकलना चाहता है, साथ ही वह यह दिखाना चाहता है कि वह विजयी होकर बाहर निकला है। आये दिन ट्रंप यह घोषणा करता रहता है कि उसने ईरान को तबाह कर दिया है, कि ईरान की वायुसेना और जलसेना को नष्ट कर दिया है कि वह पहले ही विजयी हो चुका है। लेकिन जैसे ही वह घोषणा करता है, उसी के आस-पास ही ईरानी मिसाइलें और ड्रोनों के हमले उस पर या इजरायल पर हो जाते हैं। इससे ट्रंप की निराशाभरी बौखलाहट बढ़ जाती है। अब वह परमाणु हमले की भी धमकी दे रहा है। यह ट्रंप की निराशाभरी बौखलाहट का ही परिणाम है। अब जब वह 14-15 मई को चीन शी जिन पिंग से वार्ता करने के लिए जाने वाला है तो वह शी जिनपिंग को इस बात के लिए मनाने की कोशिश करेगा कि वह ईरान को यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम रोकने के लिए तैयार करे। वह होरमुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने के लिए ईरान को तैयार करे। चीनी साम्राज्यवादी ईरान-अमरीका के बीच किसी भी किस्म का समझौता कराने की कीमत ट्रंप से वसूल करेंगे। शी जिन पिंग ताइवान और दक्षिणी चीन सागर के मसले पर अमरीकी साम्राज्यवादियों को अपनी अवस्थिति को छोड़ने या पीछे हटने के लिए कहेंगे। यहां पर ट्रंप कमजोर स्थिति में है और चीनी राष्ट्रपति ज्यादा मजबूत स्थिति में हैं। ट्रंप को समझौते की जल्दी है। चीन को ऐसी कोई जल्दी नहीं है। ट्रंप को नवम्बर, 26 के मध्यावधि चुनाव का भी सामना करना है। इसलिए वह किसी न किसी रूप में ऐसा समझौता चाहता है जिसमें वह विजयी होता हुआ दिखे। अमरीकी साम्राज्यवादियों की प्रभुत्वकारी स्थिति पहले से ही कमजोर हो रही थी, अब ईरान युद्ध ने उसे काफी कमजोर कर दिया है। 
    
ट्रंप की चीन यात्रा का मकसद इस सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे के अतिरिक्त, दुर्लभ मृदा (रेयर अर्थ) और स्थायी चुम्बक के मामले में चीन से वार्ता भी है। चीन दुनिया के 70 प्रतिशत दुर्लभ मृदा पर अपना नियंत्रण रखता है और स्थायी चुम्बक के 90 प्रतिशत का वह उत्पादन करता है। चीन ने अभी हाल में ही दुर्लभ मृदा तत्वों के निर्यात पर कई शर्तें लगा दी हैं। चीन का कुल 17 दुर्लभ मृदा तत्वों में 12 पर एकाधिकार है। इनकी जरूरत जेट विमानों में, मिसाइलों में, कारों में, मोबाइल फोनों और तरह-तरह के फौजी व नागरिक सामानों के लिए होती है। यदि अमरीकी उद्योगों को ये दुर्लभ मृदा तत्व नहीं मिलते हैं तो उनके उत्पादन पर असर पड़ता है। चीनी साम्राज्यवादी अपने इस एकाधिकार का प्रयोग करके अमरीकी आधुनिक उद्योगों का नुकसान पहुंचा रहे हैं। ट्रंप इस सम्बन्ध में चीन के शी जिन पिंग से सौदा करने जा रहे हैं। बदले में चीन ट्रंप से टैरिफ को कम करने की मांग करेगा। चीन के मालों पर ट्रंप ने 100 प्रतिशत तक का टैरिफ लगा रखा है। 
    
ट्रंप को जो सबसे बड़ा खतरा सामने दिखाई दे रहा है वह यह है कि डालर की वैश्विक मुद्रा के बतौर हैसियत में गिरावट आ रही है। अभी भी डालर एक वैश्विक मुद्रा के बतौर काम कर रहा है। उसकी यह स्थिति पेट्रो डालर के होने से और ज्यादा मजबूत हुई थी। 1973 के बाद साउदी अरब के साथ अमरीकी साम्राज्यवादियों ने यह समझौता किया था कि तेल की बिक्री डालर की मुद्रा में होगी। यह स्थिति अभी तक बनी हुयी है। दुनिया के तेल के खरीदार देश डालर में तेल खरीदते हैं। इसके लिए उन्हें अपने देश में डालर का भण्डार रखना पड़़ता है। बेचने वाले देशों के पास जो डालर आता है, वह फिर वापस अमरीका में निवेश के बतौर या बैंकों में जमा होता है। इस तरह, हर देश को डालर की मुद्रा रखने की मजबूरी होती है। लेन-देन की बैंकिंग प्रणाली, स्विफ्ट प्रणाली भी डालर द्वारा संचालित होती है। इससे अमरीकी साम्राज्यवादी डालर की कागजी मुद्रा को छापकर अपने घाटे की भरपाई करते हैं और इसकी कीमत दुनिया भर के गरीब देश चुकाते हैं। यह प्रणाली अभी तक सर्वमान्य रही है। लेकिन जब अमरीकी साम्राज्यवादी डालर का हथियारीकरण करने लगे, देशों पर प्रतिबंध लगाने लगे, उनको डालर प्रणाली से बाहर करने लगे, तब प्रतिबंधित देश वैकल्पिक प्रणाली के बतौर कुछ तरीके सोचने के लिए मजबूर हुए। पहले रूस ने दूसरे देशों के साथ व्यापार में आपसी मुद्रा में लेन-देन करना शुरू किया। चीन ने भी युवान के साथ अलग-अलग देशों की मुद्राओं के साथ व्यापार करना शुरू कर दिया। ब्रिक्स देशों ने भी आपस में अपनी-अपनी मुद्राओं में व्यापार करना शुरू किया। अब ईरान ने होरमुज जलडमरूमध्य में जहाजों के पारगमन पर टोल टैक्स चीनी मुद्रा युवान में लेना शुरू कर दिया। इससे डालर का प्रतिस्थापन तो नहीं हुआ। यह इस तरह हो भी नहीं सकता। क्योंकि डालर की वैश्विक मुद्रा की साख, बैंकिंग प्रणाली और वित्तीय बाजार में गहराई से जड़ें हैं। लेकिन इसमें वैकल्पिक रास्ता खुला है। यह अभी कमजोर स्थिति में है। यह प्रक्रिया लम्बी चलेगी, डालर के साथ-साथ चलेगी। लम्बी प्रक्रिया के दौरान जब डालर की साख और कमजोर होगी और कोई एक मुद्रा ताकतवर होकर आयेगी, तभी वह इसका स्थान ले सकेगी। 
    
लेकिन ट्रंप डालर के इस गिरते प्रभाव पर चिंतित है और वह धमकी दे रहे हैं कि यदि कोई देश विडालरीकरण की ओर जायेगा तो वे उसे तबाह कर देंगे। ब्रिक्स के कुछ देश डालर के साथ-साथ आपसी मुद्रा में भी विनिमय कर रहे हैं। 
    
इस तरह, हम देखते हैं कि अमरीकी साम्राज्यवादी सबसे बड़ी राजनीतिक, सैनिक और आर्थिक शक्ति होने के बावजूद हर मोर्चे पर पहले की तुलना में कम प्रभावशाली होते जा रहे हैं। अब वे अपने वर्चस्व को बचाने के लिए अधिकाधिक सैन्य तरीकों को सहारा ले रहे हैं। 
    
लेकिन यह पहली बार हुआ है कि अमरीकी सैन्य हमलों और इतने बड़े पैमाने पर सैनिक घेरेबंदी का मुंहतोड़ जवाब ईरान की मिसाइलों, ड्रोनों और छोटी नौकाओं ने दिया है। वियतनाम और अफगानिस्तान में लंबी लड़ाइयों के बाद अमरीकी साम्राज्यवादियों की शिकस्त हुई थी, लेकिन ईरान में युद्ध के 40 दिनों में ही अमरीकी साम्राज्यवादी समझौता और युद्धविराम की बातें करने लगे। 
    
ये सारे मुद्दे पृष्ठभूमि में रहेंगे, जब दो साम्राज्यवादी शक्तियां- एक सबसे ताकतवर लेकिन कमजोर होती जा रही और दूसरी अपेक्षाकृत कम ताकतवर लेकिन क्रमशः मजबूत होती जा रही शक्ति, यानी अमरीका और चीन के बीच शीर्ष वार्ता होने जा रही है। 

इस वार्ता के चाहे जो भी परिणाम हों, लेकिन एक बात निश्चित है कि अमरीकी साम्राज्यवाद का कमजोर होते जाना तय है और इसके प्रतिद्वंद्वी के बतौर चीनी साम्राज्यवाद का उभरना और रूसी व चीनी साम्राज्यवादियों का गठबंधन मजबूत होते जाना साफ दिखाई पड़ रहा है। 

यहां यह भी साफ दिखाई दे रहा है कि पश्चिम एशिया में अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली यहूदी नस्लवादियों की तमाम धमकियों के बावजूद ईरान एक बड़ी इलाकाई शक्ति के बतौर उभरेगा।

हो सकता है कि देर-सबेर इस इलाके से अमरीकी फौजी अड्डों को बोरिया-बिस्तर समेटना पड़े।  

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