हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा को पांच राज्यों में से तीन में सफलता मिली। उसने यह सफलता कैसे हासिल की? यह न तो कोई रहस्य की बात है और न ही कोई चमत्कार है।
असम, पं.बंगाल, पुडुचेरी में भाजपा या उसके गठबंधन (एनडीए) को चुनावी सफलता मिली। तमिलनाडु में दो वर्ष पूर्व बनी पार्टी तमिलिगा वेट्री कषगम (टीवीके) को सबसे ज्यादा सीटें (108 सीटें व 35 फीसदी वोट) मिलीं। केरल में दस वर्ष बाद कांग्रेस पार्टी ने अपने गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यू डी एफ) के साथ वापसी की। असम और पुडुचेरी को छोड़कर कहीं भी सत्तारूढ़ पार्टी का गठबंधन सत्ता में वापसी नहीं कर सका। इस तरह इन विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी लहर को व्यापक रूप से देखा जा सकता है। असम में सत्ता अपने हाथ में बनाये रखने के लिए भाजपा ने वह सब कुछ किया जो वह कर सकती थी। उसने हर तरह की चाल चली। परिसीमन के जरिये षड्यंत्र रचे और सबसे बढ़कर उग्र ढंग से अल्पसंख्यक विरोधी हिन्दू साम्प्रदायिक प्रचार किया। और इस तरह से असम में भाजपा ने सत्ता विरोधी लहर को चुनौती दी। और अपनी पकड़ सत्ता पर बनाये रखी।
सत्ता विरोधी लहर प्रमुख रूप से विधानसभा चुनाव में पं.बंगाल, तमिलनाडु व केरल मंे दिखायी दी। पं.बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में एम के स्टालिन व केरल में पिनारई विजयन को सत्ता गंवानी पड़ी। जहां तक तमिलनाडु व केरल का सवाल है वहां भाजपा के पास दांव लगाने को ज्यादा कुछ नहीं था। वहां तो बस वह किसी तरह से पांव जमाना चाहती थी। इन चुनावों में उसका मुख्य निशाना पं.बंगाल था। और पं.बंगाल में चुनाव जीतने के लिए उसने हर वह हथकंडा अपनाया जो अपना सकती थी। इसमें सत्ता विरोधी लहर ने उसके धूर्त हथकण्डों को एक सुनहरा आवरण प्रदान कर दिया। पं.बंगाल में भाजपा-संघ ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। मोदी सरकार ने ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एस आई आर) से एक ऐसा जाल बुना कि ममता बनर्जी बीसियों सीटें सिर्फ इसलिए हार गयी कि वहां इतने ज्यादा मतदाताओं के नाम काट दिये गये थे कि अगर वह मत डालते तो भाजपा का वहां जीतना मुश्किल था।
पं.बंगाल में ममता बनर्जी की हार में यद्यपि सत्ता विरोधी लहर का अहम रोल था परन्तु एस आई आर का भी कम रोल नहीं था। इसके अलावा संघ-भाजपा ने हिन्दुओं को एकजुट करने के लिए मुसलमानों के खिलाफ घृणित साम्प्रदायिक दुष्प्रचार किया हुआ था। इसमें उसने प्रमुख रूप से घुसपैठियों का एक नकली आख्यान गढ़ा हुआ था। घृणित साम्प्रदायिक दुष्प्रचार के अलावा मोदी एण्ड कम्पनी ने केन्द्रीय सुरक्षा एजेन्सियों को पूरे राज्य में तैनात किया हुआ था। यह तैनाती अभूतपूर्व थी। और इन सबके साथ मोदी सरकार का रबर स्टाम्प बना हुआ चुनाव आयोग तो था ही। यदि ममता बनर्जी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर न होती तो, या तो ममता बनर्जी पुनः चुनाव जीत जाती या फिर उनकी हार बेहद मामूली होती। ममता बनर्जी वर्ष 2011 से सत्ता में थी।
तमिलनाडु में एम.के.स्टालिन की सरकार के खिलाफ चली सत्ता विरोधी लहर इतनी ज्यादा थी कि स्वयं अपनी सीट भी गंवा बैठे। तमिल फिल्मों के एक सुपरस्टार विजय की पार्टी टी वी के को सबसे ज्यादा सीटें व मत प्राप्त हुए। तमिलनाडु में सभी स्थापित पार्टियों की हालत इतनी खराब हो गयी कि वे न ‘किंग’ बनने की स्थिति मंे थीं और न ही ‘किंग मेकर’ बनने की स्थिति मंे थीं। भाजपा अपनी बुरी हालत के बाद भी ऐसी तिकड़में अपने राज्यपाल के द्वारा भिड़ाने की कोशिश कर रही थी ताकि विजय की पार्टी या तो एन डी ए का हिस्सा बन जाये या फिर उसके बिना गठबंधन में शामिल हुए सहयोगी बन जाये। सुपरस्टार विजय की राजनीति मूलतः वही है जो एम के स्टालिन की पार्टी की है अतः उसका भाजपा के साथ जाना आसान नहीं था। फिलवक्त विजय कांग्रेस सहित कई छोटी पार्टियों के समर्थन से मुख्यमंत्री बन चुके हैं।
केरल में पिनाराई विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चे (एल डी एफ) की सरकार को मुंह की खानी पड़ी है। सत्ता विरोधी लहर पर सवार होकर दस साल बाद कांग्रेस नीत गठबंधन की सत्ता में वापसी हुयी है। केरल में वामपंथी सरकार के पतन का कई दक्षिणपंथी इस रूप में जश्न मना रहे हैं कि अब भारत में कहीं भी वामपंथ की सरकार नहीं है। और कुछ इसे मध्य-पूर्व भारत में माओवाद के कथित खात्मे के साथ जोड़कर और खुश हो रहे हैं। कि अब भारत में हर रूप का वामपंथ खत्म हो गया है। सीपीआई, सीपीएम या सीपीआई (लिबरेशन) आदि बहुत पहले ही क्रांति का रास्ता छोड़ चुके हैं। अतः कथित वामपंथ की चुनावी हार एक पूंजीवादी पार्टी की हार और जीत से ज्यादा कुछ मायने नहीं रखती है। दुनिया मंे क्रांतियों की अपनी ही गति व गतिकी रही है।
इन विधानसभा चुनावों में भारी संख्या में मतदान हुआ। असम में करीब 85 फीसदी, केरल में करीब 80, तमिलनाडु में करीब 84, पुडुचेरी में करीब 90 फीसदी तो पं.बंगाल में करीब 92 फीसदी मतदान हुआ। इतना उच्च मतदान जहां एक ओर कुछ राज्यों में सत्ता विरोधी लहर का बायस बना वहीं दूसरी ओर यह विशेष गहन पुनरीक्षण (एस आई आर) के कारण उपजे भय को खासकर पं.बंगाल में दिखलाता है। इतना उच्च मतदान इस बात को भी दिखलाता है कि भारत की जनता खासकर मजदूर-मेहनतकश जनता का वर्तमान पूंजीवादी जनवादी चुनाव प्रणाली व व्यवस्था में भरोसा कायम है। वे अपने मत देने के अधिकार को गम्भीरता से लेते हैं और इस बात से भी घबराते हैं कि मत न देने से कहीं उनकी नागरिकता ही खत्म न हो जाये। इस रूप में भारत में काबिज हिन्दू फासीवादी सरकार नागरिकों को तनाव मंे डालने व आतंकित करने में एक हद तक कामयाब भी हुयी है।
इन विधानसभा चुनावों ने हिन्दू फासीवाद के बढ़ते खतरे को अलग-अलग तरीके से फिर-फिर स्थापित किया। असम, पं.बंगाल में संघ-भाजपा ने उग्र हिन्दुत्व व हिन्दू राष्ट्रवाद का विषैला घोल धार्मिक बहुसंख्यक व धार्मिक अल्पसंख्यक दोनों के ही गले उतरा। पहले वालों को उन्माद की अवस्था मंे पहुंचाने के लिए तो दूसरे वालों को आतंकित करने के लिए। धार्मिक विभाजन अपने चरम पर तब पहुंच गया जब हिन्दू फासीवादियों के लोकप्रिय नेता मोदी, शाह, योगी, हिमंत बिस्वा सरमा आदि अपनी चुनावी सभाओं को संबोधित करते थे। भाजपा की जीत में धार्मिक कुत्सा प्रचार, अंधराष्ट्रवाद, लोकप्रिय योजनाओं की घोषणाओं की मुख्य भूमिका थी। भाजपा के पास प्रचार के लिए और विरोधियों को खरीदने के लिए बेहिसाब पैसा था। चुनाव आयोग, ईडी, इन्कम टैक्स विभाग, सीबीआई आदि केन्द्रीय एजेन्सियां उनके इशारों पर काम कर रही थीं। तमिलनाडु व केरल में उसे अगर मनवांछित सफलता नहीं मिली तो महज इसलिए कि उसका एक तो जनाधार नहीं है और दूसरे उसकी विचारधारा के प्रति गहरा विरोध हमेशा से रहा है।
इन सभी राज्यों में मजदूर-मेहनतकश जनता के सामने कोई ऐसी पार्टी नहीं थी जो सच्चे अर्थों में उसके हितों, आकांक्षाओं व भविष्य का प्रतिनिधित्व करती थी। विकल्पहीनता उसे एक धूर्त पूंजीवादी नेता या पार्टी के स्थान पर दूसरे धूर्त नेता या पार्टी की ओर ही धकेलती है। हिन्दू फासीवाद के बढ़ते खतरे का सामना इनमें से कोई भी पार्टी करने में सक्षम नहीं है। हिन्दू फासीवाद को वर्तमान समय में भारत के सबसे बड़े पूंजीपतियों अम्बानी, अडाणी, टाटा, मित्तल आदि का ही नहीं बल्कि विदेशी पूंजीपतियों का भी समर्थन हासिल है। इसलिए इनकी ताकत अतुलनीय रूप से बहुत बढ़ जाती है। ‘इण्डिया गठबंधन’ के नेता यदि बहुत एकजुट भी हो जायें तब भी इनकी हार सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं। इनका मुकाबला करने के लिए मजदूर-मेहनतकशों को स्वयं ही आगे आना होगा।