यह समय : राक्षसी बूढ़ों का समय

Published
Wed, 04/01/2026 - 15:50
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बूढ़े लोग पूरे घाघपने, धूर्तता के साथ दुनिया पर शासन कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प (79), शी जिनपिंग (73), पुतिन (73), लूला (80), मोदी (75) जैसे बूढ़े दुनिया के अधिकांश देशों में शासक बने हुए हैं। कुछेक ही देश हैं, जहां देश का नेतृत्व जवान (हालांकि ये अपनी सोच-समझ, दर्शन-नजरिये में बूढ़ों जैसे ही हैं) कर रहे हैं। स.रा.अमेरिका तो जैसे बूढ़ों के ही हवाले है। ट्रम्प से पहले जो राष्ट्रपति थे वह अक्सर लड़खड़ा कर गिर पड़ते थे। 
    
बूढ़े लोग क्यों दुनिया में शासन कर रहे हैं? क्या ये लोग ऐसी व्यवस्था और शासन प्रणाली को नहीं चला रहे हैं जो स्वयं बुढ़ा गयी है। रोगग्रस्त हो गयी है। और ऐसे में अगर बूढ़े लोग दुनिया में शासन कर हैं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। ये बूढ़े सड़ते-गलते पूंजीवाद की पैदाइश और उसके नुमाइंदे हैं। 
    
बुढ़ापा मानव जीवन में किस बात का प्रतीक है। और इसके उलट युवावस्था किस बात का प्रतीक है। बुढ़ापा सकारात्मक अर्थों में सही, सार्थक और क्रियाशील जीवन जीने के साथ हासिल किये गये खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ आयी परिपक्वता और इन सबको उदारतापूर्वक नये पीढ़ी को सौंपते हुए उनके लिए स्थान छोड़ने का प्रतीक है। नकारात्मक अर्थों में किसी भी सूरत में अपने स्थान में जमे रहने और इसके लिए किसी भी हद तक चले जाने का प्रतीक है। कुछ भी हो बुढ़ापे में लोग वह योगदान मानव जीवन में नहीं दे पाते हैं जो वे युवावस्था में दे सकते थे। यह सच्चाई है कि सारे महान वैज्ञानिक सिद्धान्त देने वाले उस वक्त युवा ही थे जब उन्होंने अपने युगान्तरकारी सिद्धान्त दिये। इसमें अल्बर्ट आइंसटीन का नाम सबसे पहले लिया जा सकता है। और यही बात महान क्रांतिकारियों कार्ल मार्क्स, लेनिन आदि के बारे में कही जा सकती है। 
    
महाभारत में एक श्लोक है जो इस बात को बहुत अच्छे ढंग से व्यक्त करता है कि बूढ़ों से क्या उम्मीद की जानी चाहिए। यह श्लोक कहता है, ‘‘ न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा, वृद्धा न ते ये न वर्दान्त धर्मम्। धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति, सत्यं न तच्छलमभ्युपैति (अभ्युदेति)।।’’ (महाभारत, उद्योग पर्व) इसका मतलब है कि वह सभा, सभा नहीं है जहां बुजुर्ग लोग न हों, वे बुजुर्ग, बुजुर्ग नहीं हैं जो धर्म की बात न करें। वह धर्म, धर्म नहीं जिसमें सत्य न हो और वह सत्य, सत्य नहीं है जो छल-कपट से युक्त हो। 
    
इस कसौटी में यदि आज के बूढ़े शासकों को कसें तो क्या पायेंगे। ये सभी बूढ़े ऊपर से नीचे तक छल कपट से भरे हैं। और इनमें सबसे बड़ा छली-कपटी डोनाल्ड ट्रम्प है। और यह छली-कपटी दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक-सैनिक-राजनैतिक-ताकत का सर्वेसर्वा है। जो चाहता है कि दुनिया में स.रा.अमेरिका का प्रभुत्व बना रहे। और वह अपने प्रभुत्व को बनाये रखने के लिए कुछ भी कर सकता है। एक देश के राष्ट्रपति का अपहरण कर सकता है तो एक देश के ऊपर ठीक वार्ता के बीच विनाशकारी हमला बोल सकता है। जो बात ट्रम्प पर लागू होती है वह दूसरे रूप में पुतिन पर तो तीसरे रूप में नेतन्याहू पर तो किसी अन्य रूप में मोदी पर भी लागू हो जाती है। 
    
क्या ये सत्तालोलुप बूढ़े, दुनिया या अपने देश को सुरक्षित वर्तमान और भविष्य दे सकते हैं। कोई भी विवेकवान व्यक्ति कह उठेगा इनसे यह उम्मीद पालना मूर्खता है। ट्रम्प जैसे जितने दिन शासन में रहेंगे वही करते आयेंगे जिसके जरिये उन्होंने सत्ता हासिल की। और फिर सत्ता हासिल करने के बाद उसका इस्तेमाल सत्ता में बने रहने के लिए किया। ये बूढ़े छल-कपट से भरे, सत्य और धर्म (यहां रिलीजन से मतलब नहीं बल्कि सत्य, न्याय आदि का प्रतीक है) की राह से विमुख है। ये मनुष्यता के नहीं राक्षसी प्रवृत्तियों के वाहक हैं। 
    
आज दुनिया जिस जगह पर खड़ी है उसके लिए अन्तोन ग्राम्शी की एक बात को बार-बार, कई जगह उद्धृत किया गया। ग्राम्शी ने अपने देश इटली में जब फासीवाद आ गया था और जब पूरी दुनिया दूसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी थी तब कहा था, ‘‘पुराना जमाना खत्म हो रहा है, और नया जमाना आने के लिए जूझ रहा है। अब राक्षसों का समय है’’। आजकल यह बहुत लोकप्रिय कथन है। 
    
ग्राम्शी के जमाने के राक्षस कौन थे। ये राक्षस मुसोलिनी, हिटलर, तोजो जैसे थे। और इन राक्षसों को पालने वाले और बड़े मायावी राक्षस थे। इन राक्षसों के नाम थिसेन, क्रुप, ह्यूजेन बर्ग, केप्लर, वेचस्टीन, हेनरी फोर्ड आदि थे। और आज के राक्षसों को तो आसानी से पहचाना जा सकता है परन्तु इन राक्षसों को पालने वाले मायावी राक्षसों के ही इशारों पर चलते और बढ़ते हैं। और ये मायावी राक्षस आमजनों की निगाहों से ओझल रहते हैं। 
    
राक्षसी ट्रम्प को पालने वाले या तो तेल उद्योग या फिर हथियार से जुड़े हुए मायावी राक्षस हैं। हर युद्ध इन हथियार कंपनियों को नया बाजार उपलब्ध कराता है। 28 फरवरी को जब से ईरान पर अमेरिका-इजरायल ने हमला किया तब से अमेरिका की हथियार कंपनियों की पौ बारह हो गयी है। उन्होंने ट्रम्प पर पूरा दांव लगाया था। ट्रम्प में दांव लगाने वालो में दुनिया का सबसे अमीर आदमी एलन मस्क भी था। बिल गेट्स भी था। और इन सब राक्षसों का असली चेहरा ‘एपस्टीन फाइल’ के जरिये अब पूरी दुनिया के सामने है। अमेरिका में नाजुक उम्र की बच्चियों का यौन उत्पीड़न करने वाले और ईरान में बालिकाओं के स्कूल में ‘टामहाक’ मिसाइल फेंक कर उनका कत्ल करने वाले एक ही हैं। 
    
ट्रम्प, पुतिन, शी जिनपिंग, नेतन्याहू जैसे राक्षस रातों-रात तैयार नहीं होते। इन राक्षसों की सालों-साल ट्रेनिंग होती है। कई राक्षसों में से सबसे तेजतर्रार, सबसे घाघ, सबसे मक्कार राक्षस का चयन होता है। पहले इनके आका ‘मायावी राक्षस’ इनका चुनाव करते हैं। और फिर इनका चुनाव प्रमुख पार्टियों के कई उम्मीदवारों के बीच होता है। और फिर शुरू होता है इन राक्षसों की लोकप्रिय छवि बनाने का खेल। पूंजीवादी लोकतंत्र का ‘महाउत्सव’ चुनाव इन राक्षसों को वैधता दिलाते हैं और फिर ये सत्ता के शीर्ष स्थल पर पहुंच जाते हैं। हर राक्षस चुनाव जीतने के लिए अपने को सबसे बड़ा ‘राष्ट्रवादी’ ‘लोकप्रिय’ बताता है। चुनाव जीतने के लिए छल-प्रपंच, तीन-तिकड़म, षड्यंत्र-प्रति षड्यंत्र करता है। 
    
सत्ता के शीर्ष पर पहुंचना इतना आसान नहीं है। इसलिए एक उम्र लग जाती है। और यह अवसर तब मिलता है जब सत्ता के नियंता पूरी तरह से इस बात से मुतमईन हो जाते हैं कि फलां हमारे लिए सबसे बेहतर है। इस तरह से दुनिया में कुछेक अपवादों को छोड़कर ढंग से परखे, आजमाये हुए राजनेता सत्ता के शीर्ष पर पहुंचते हैं। वे जितने बूढ़े होते जाते हैं उतने ही घाघ, उतने ही मक्कार, उतने ही खतरनाक, उतने ही निर्मम होते जाते हैं। सत्ता एक तो आसानी से मिलती नहीं और इसलिए आसानी से छोड़ी भी नहीं जाती है। ट्रम्प के जीवन से बड़ा उदाहरण इन बातों का और क्या हो सकता है। और हम भारतीय मोदी की कथा से अच्छे ढंग से जानने लगे हैं कि मोदी ने क्या-क्या करतब करके सत्ता हासिल की है। 
    
सत्ता में बूढ़ों का कब्जा उस बात की अभिव्यक्ति है जो पूंजीवाद खासकर साम्राज्यवाद का आम चरित्र है। यहां अतीत, वर्तमान पर शासन करता है। यहां मृत श्रम (मशीनें और कथित भविष्य का नियंता ए आई मृत श्रम के सिवा और क्या है), जीवित श्रम (मजदूर) पर शासन करता है। यहां पशुता मानवता पर हावी है। 
    
ऐसे समाज में जहां अतीत वर्तमान पर मृत श्रम जीवित श्रम पर, पशुता मानवता पर हावी हो वहां भविष्य क्या हो सकता है। वहां भविष्य तब ही निर्मित हो सकता है जब उपरोक्त का उलटा हो। यानी वर्तमान की सेवा में अतीत, जीवित श्रम की सेवा में मृत श्रम लगे और मानवता पशुता पर काबू पाये। वर्तमान का काम अतीत से चिपके रहना नहीं भविष्य का निर्माण करना है। 
    
हाल के समय में कई देशों में में युवाओं ने बूढ़ों की सत्ता को चुनौती दी। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल हमारे पड़ोस में इसके उदाहरण बन के सामने आये। ‘जेन जी’ ने बूढ़ों को सत्ता से भले ही बेदखल कर दिया हो पर ये ‘जेन जी’ पुरानी व्यवस्था, पुरानी सोच के दायरे को न लांघ पाने के कारण वहीं देर-सबेर पहुंच जायेंगे जहां उनके बूढ़े पहुंचे हुए थे। बस समय की बात है। उन्होंने विद्रोह तो किया पर पूंजीवादी व्यवस्था की सीमा को न लांघ सके। इसलिए इन देशों में जवान सत्ता पर पहुंचने के बावजूद अतीत के, मृत श्रम के, पशुता के गुलाम हैं। 
    
ऐसी अवस्था में रास्ता क्या है। रास्ता स्पष्ट है पूंजीवाद का पूर्ण खात्मा और समाजवाद (जीवित श्रम की व्यवस्था) कायम किया जाये। राक्षसों के समय को खत्म किया जाये। मानवता के भविष्य को सुरक्षित किया जाये। 

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