एल जी बी टी क्यू समुदाय के अधिकारों पर कानूनी हमला

Published
Wed, 04/01/2026 - 15:50
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अभी मार्च 2026 में भारत की संसद ने एक नया बिल पास किया- ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक। यह विधेयक ट्रांसजेंडर और एल जी बी क्यू समुदाय के कानूनी अधिकारों पर हमला है। विपक्ष और समुदाय के लोग भी इसे ‘प्रतिगामी’ और ‘हिंदुत्ववादी सोच’ का नतीजा बता रहे हैं। इस कानून ने 2014 के आजादी के कई दशक बाद आए नालसा (राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण) फैसले को लगभग खत्म कर दिया है। साथ ही, इसने 2019 के ट्रांसजेंडर अधिकार कानून में बड़े बदलाव कर दिए हैं।
    
नालसा के तहत ही 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति ‘तीसरा लिंग’ है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि लिंग पहचान व्यक्ति खुद तय करेगा, यानी आत्म-पहचान का अधिकार। इसके लिए किसी डाक्टर की जांच, सर्जरी या जैविक परीक्षण की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने इसे निजता के अधिकार का हिस्सा बताया था। इसके बाद 2018 में नवती सिंह जोहर फैसले ने धारा 377 को बदला। अब सहमति से बने वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंध अपराध नहीं रहे। इन दोनों फैसलों से एल जी बी टी क्यू समुदाय को औपचारिक तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत समानता, गरिमा और निजता का अधिकार हासिल हुआ।
    
2019 में संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम बनाया। यह नालसा फैसले को लागू करने के लिए था। इस कानून में ट्रांसजेंडर की व्यापक परिभाषा थी। इसमें ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, नान-बाइनरी, जेंडर-क्वीयर सब शामिल थे। आत्म-पहचान का अधिकार भी उसमें था। लेकिन 2026 के नए संशोधन विधेयक ने उस कानून को पूरी तरह बदल दिया है।
    
नए कानून में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि आत्म-पहचान का अधिकार खत्म कर दिया गया है। अब कोई व्यक्ति खुद यह नहीं कह सकता कि वह किस लिंग का है। उसकी पहचान अब उसके जन्म के समय मिले जैविक चिह्नों या पारंपरिक सामाजिक समूहों से तय होगी। कानून में लिखा है कि ट्रांसजेंडर वही होगा जो ‘किन्नर’, ‘हिजड़ा’, ‘अरावणी’, ‘जोगता’ जैसी पुरानी पहचानों में आता है या जो अंतरलिंगी (इंटरसेक्स) है। इस परिभाषा से ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, नान-बाइनरी, जेंडर-फ्लुइड सभी बाहर हो गए हैं। विधेयक में साफ लिखा है कि ‘‘विभिन्न यौन अभिविन्यास और स्व-अनुभूत यौन पहचान वाले व्यक्ति इसमें शामिल नहीं होंगे।’’
    
दूसरा बड़ा प्रावधान है मेडिकल बोर्ड की अनिवार्यता। ट्रांसजेंडर का पहचान प्रमाण पत्र पाने के लिए अब व्यक्ति यानी ट्रांसजेंडर को सरकारी मेडिकल बोर्ड के सामने ‘चिकित्सकीय परीक्षण से गुजरना होगा। इस बोर्ड की अध्यक्षता मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) करेंगे। बोर्ड की सिफारिश के बाद जिला मजिस्ट्रेट संबंधित व्यक्ति को (ट्रांसजेंडर) प्रमाण पत्र जारी करेंगे। यह नालसा फैसले के बिल्कुल खिलाफ है। नालसा के तहत कहा गया था कि लिंग पहचान के लिए किसी चिकित्सकीय जांच की आवश्यकता नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट की सलाहकार समिति ने इस विधेयक को ‘‘निजता का पूर्ण उल्लंघन’’ बताया है। यह निजता के अधिकार पर हमला है। अब राज्य के डाक्टर तय करेंगे कि कौन ट्रांसजेंडर है कौन नहीं। यह बेहद अपमानजनक और उत्पीड़क भी है।
    
इस विधेयक में आपराधिक धाराएं भी जोड़ी गई हैं। एक धारा कहती है कि अगर कोई व्यक्ति किसी को ‘‘ट्रांसजेंडर बनने के लिए मजबूर करता है’’ तो उसे आजीवन कारावास हो सकता है। आलोचकों का कहना है कि इस अस्पष्ट धारा का इस्तेमाल ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथियों, सहायता समूहों या साझेदारों के खिलाफ किया जा सकता है। सबसे गंभीर बात यह है कि इस कानून में यौन हिंसा को बहुत हल्का अपराध बनाया गया है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) में सिसजेंडर महिला (जैविक रूप से और जेंडर पहचान के हिसाब से महिला) के साथ बलात्कार पर न्यूनतम 10 साल की सजा है। लेकिन इस विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ यौन शोषण पर अधिकतम सजा सिर्फ 2 साल रखी गई है। यह सीधा भेदभाव है और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
    
इस कानून को बनाने का तरीका संसदीय लोकतंत्र या जनवादी प्रक्रिया पर सीधे हमले का एक और कदम है। अपने फासीवादी आचरण के अनुरूप सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय से कोई सार्थक सलाह-मशविरा नहीं किया। राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद (NCTP) एक वैधानिक निकाय है। इस परिषद को हिंदू राष्ट्रवादियों ने कोई तवज्जो नहीं दी। जब विधेयक पेश हो गया, तो परिषद के चार सदस्यों को बहुत कम समय पर बुलाया गया। मंत्री ने उनसे मिलने से मना कर दिया। उनके सुझाव खारिज कर दिए गए। इसके विरोध में चारों सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। विपक्ष ने विधेयक को चयन समिति को भेजने की मांग की, लेकिन सरकार ने वह मांग ठुकरा दी। विपक्ष ने सदन से वॉकआउट किया और बिना बहस के ट्रांसजेंडर बिल पास कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर अधिकारों की रक्षा के लिए एक सलाहकार समिति बनाई थी। उस समिति ने साफ कहा था कि यह विधेयक नालसा (NALSA) फैसले के खिलाफ है और इसे वापस लिया जाए। सरकार ने उस सलाह को भी अनदेखा कर दिया। 88 से अधिक ट्रांसजेंडर संगठनों, 40,000 से अधिक हस्ताक्षरकर्ताओं और 20,000 ईमेल के जरिए विरोध दर्ज कराया गया, लेकिन सरकार ने सब नजरअंदाज कर दिया।
    
भारत में एल जी बी टी क्यू व्यक्तियों के लिए पहले से ही हर रोज संघर्ष भरा है। परिवार से निकाल दिया जाना सबसे आम शुरुआत है। जैसे ही किसी के सामान्य से अलग यौन अभिविन्यास या लिंग पहचान का पता चलता है, घरवाले अक्सर उसे त्याग देते हैं। इसके बाद सड़क, भीख, यौनकर्म या गायन ही आजीविका के सीमित साधन बचते हैं। शारीरिक हमले तो रोज की बात हैं। एक अध्ययन के मुताबिक सर्वेक्षण में शामिल 80 प्रतिशत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों ने कभी न कभी यौन हमले का सामना किया।
    
पुलिस थाने भी इनके लिए सुरक्षित जगह नहीं हैं। वहां अपमान, गाली-गलौज, वसूली और मनमानी गिरफ्तारियां आम हैं। अगस्त 2025 में केरल पुलिस ने एक गिरोह का भंडाफोड़ किया जो ग्राइंडर (geindr) जैसे डेटिंग ऐप के जरिए एल जी बी टी क्यू लोगों को निशाना बनाकर लाखों रुपये ऐंठता था। सबसे दर्दनाक बात यह थी कि अधिकांश पीड़ितों ने शिकायत ही नहीं दर्ज कराई क्योंकि उन्हें डर था कि शिकायत करने पर उनकी यौन पहचान उजागर हो जाएगी और सामाजिक दंड मिलेगा।
    
स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव शर्मनाक है। सरकारी अस्पतालों में डाक्टर ट्रांसजेंडर मरीजों को छूने से कतराते हैं, दूर से दवा लिखकर भगा देते हैं। भारत के 2017 की रक्तदान दिशानिर्देश तो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों और पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुषों (MSM) को आजीवन रक्तदान से वंचित रखती हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, लेकिन तब तक भेदभाव जारी है। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी केंद्रीय योजनाओं का लाभ भी बहुत कम ट्रांसजेंडर लोगों तक पहुंच पाया है। 2019 के कानून के तहत अब तक केवल 32,500 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ही पहचान पत्र मिल सका है। यह पत्र सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए अनिवार्य है।
    
हिंदू फासीवादियों की अपनी सोच को छोड़ भी दिया जाये तो कई लोग ऐसे भी हैं जो ट्रांसजेंडर समुदाय के एक छोटे से वर्ग द्वारा जबरन वसूली या भीख मांगने के लिए दबाव बनाने की प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया में इस विधेयक के पक्ष में दृढ़ता से खड़े हैं। लेकिन हकीकत यही है कि इस जबरन वसूली जैसे कृत्य के पीछे गहरी सामाजिक-आर्थिक वजहें हैं। सदियों से हाशिए पर धकेले जाने, शिक्षा-रोजगार से वंचित रहने और परिवार द्वारा निष्कासित किए जाने के कारण यह समुदाय जीविका के लिए पारंपरिक (भीख, गायन, सेक्स वर्क) और कभी-कभी अवैध तरीकों पर निर्भर हो गया। राज्य की उपेक्षा, पुलिस की मिलीभगत और सामाजिक उपेक्षा और तिरस्कार, कलंक आदि ने इस समस्या को जन्म दिया।     
    
संक्षेप में, यह नया ट्रांसजेंडर कानून नालसा और नवती सिंह जोहर जैसे ऐतिहासिक फैसलों को पलट देता है। यह हिंदुत्ववादी सोच का नतीजा है जो ‘हिजड़ा-किन्नर’ जैसी पुरानी पहचानों को तो मानता है, लेकिन ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, नान-बाइनरी जैसी आधुनिक पहचानों को ‘पाश्चात्य’ कहकर खारिज करता है। इस कानून ने आत्म-पहचान का अधिकार छीन लिया, मेडिकल बोर्ड के जरिए निजता पर हमला किया, यौन हिंसा को मामूली अपराध बना दिया और समुदाय के एक बड़े हिस्से को कानूनी दायरे से बाहर कर दिया। इसे बनाने का तरीका निरंकुशतापूर्ण रहा। 
    
हिंदू फासीवादियों का जनवाद और जनवादी अधिकारों पर हमला चौतरफा जारी है। पहले से ही उपेक्षित, तिरस्कृत और अपमान झेलने वाले एल जी बी टी क्यू समुदाय को बमुश्किल कुछ साल पहले संघर्षों से हासिल बेहद सीमित जनवादी अधिकार को भी खत्म कर दिया गया है। ऐसे में जरूरी है कि इस मौके पर एल जी बी टी क्यू समुदाय के प्रतिरोध के साथ खड़ा हुआ जाये और इस कानून को रद्द करवाने की मांग की जाय।

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