बहुतेरे बहुत अधिक हुआ करते हैं
वे गायब हो जाएं, बेहतर होगा।
लेकिन वह गायब हो जाये, तो उसकी कमी खलती है।
वह संगठित करता है अपना संघर्ष
मजूरी, चाय-पानी
और राज्यसत्ता की खातिर।
वह पूछता है सम्पत्ति से:
कहां से आई तुम?
वह पूछता है विचारों से:
किसके फायदे में हो तुम?
जहां भी खामोशी हो
वह बोलेगा
और जहां शोषण का राज हो और किस्मत की बात की जाती हो
वह उंगली उठाएगा।
जहां वह मेज पर बैठता है
छा जाता है असन्तोष उस मेज पर
जायका बिगड़ जाता है
और कमरा तंग लगने लगता है।
उसे जहां भी भगाया जाता है,
विद्रोह साथ जाता है और जहां से उसे भगाया जाता है
असन्तोष रह जाता है।
अनुवाद: उज्ज्वल भट्टाचार्य