महिला मजदूरों से नाईट शिफ्ट और पूंजीपतियों को सेल्फ सर्टिफिकेशन

Published
Wed, 04/01/2026 - 15:50
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व्यावसायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता, 2020 

व्यावसायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता, 2020 (Occupational Safety,  Health and Working Condition Code, 2020 ) के तहत पुराने 13 कानूनों को अब एक ही कानून में समेट दिया गया है। ये पुराने कानून- फैक्टरी अधिनियम,1948; बागान श्रमिक अधिनियम, 1951; खदान अधिनियम, 1952; श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचार पत्र कर्मचारी (सेवा शर्तें और विविध प्रावधान) अधिनियम, 1955; श्रमजीवी पत्रकार (वेतन दरों का निर्धारण) अधिनियम, 1958; मोटर परिवहन सड़क अधिनियम, 1961; बीड़ी और सिगार श्रमिक (रोजगार की शर्तें) अधिनियम, 1966; ठेका श्रमिक (नियमन और उन्मूलन) अधिनियम, 1970; सेल्स प्रमोशन कर्मचारी (सेवा शर्तें) अधिनियम, 1976; अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक (रोजगार और सेवा शर्तों का नियमन) अधिनियम, 1979; सिने कर्मचारी और सिनेमा थियेटर कर्मचारी अधिनियम, 1981; डाक श्रमिक (संरक्षा, स्वास्थ्य एवं कल्याण) अधिनियम, 1986 एवं भवन निर्माण और अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार और सेवा शर्तों का नियमन) अधिनियम, 1996 थे।
    
उक्त पुराने कानूनों के नाम से ही स्पष्ट है कि ये अलग-अलग क्षेत्र के मजदूरों के लिये बने विशिष्ट कानून थे। अब इन सबको एक ही कानून में समेटकर इनका सामान्यीकरण करना अस्पष्टता और जटिलता ही पैदा करेगा; और इस तरह यह मजदूरों के खिलाफ ही जायेगा। हालांकि, पुराने कानूनों के तहत भी मजदूर हितों का सम्बोधन ज्यादातर कागजी ही था, लेकिन तब भी यह कानूनी और आंदोलनात्मक लड़ाई को एक आधार प्रदान करता था। अब नये कानून में न सिर्फ इस आधार को कमजोर बना दिया गया है अपितु कई ऐसे बदलाव कर दिये गये हैं जो कि घोर मजदूर विरोधी हैं और देशी-विदेशी पूंजीपतियों की मांगों के अनुरूप हैं। 
    
इन बदलावों में फैक्टरी की परिभाषा में किया गया बदलाव; महिला मजदूरों से नाईट शिफ्ट और खतरनाक उद्योगों में काम कराने का प्रावधान; सेफ्टी कमेटियों के दायरे को सीमित करना, ठेका प्रथा को बढ़ावा देना, अप्रवासी मजदूरों की अनदेखी, लेबर इंस्पेक्टरों को फैसिलिटेटर बनाना व पूंजीपतियों को ‘सेल्फ सर्टिफिकेशन’ का अधिकार; तथा 8 घंटे कार्यदिवस के अधिकार को छीनने के हथकंडे व मजदूरों के लिये न्यायपालिका के दरवाजे भी बंद कर देना इत्यादि प्रमुख हैं। 
    
यहां सबसे पहले हम फैक्टरी की परिभाषा में किये गये बदलाव को लेते हैं-
    
पुराने फैक्टरी अधिनियम से भिन्न  व्यासायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता, 2020 की धारा - 2(w) (1, 2) के तहत अब फैक्टरी की परिभाषा को बदल दिया गया है। अब जिस फैक्टरी-संस्थान में उत्पादन में पावर (बिजली) का इस्तेमाल होता है वहां 20 मजदूर एवं जहां बिजली का इस्तेमाल नहीं होता है वहां 40 मजदूर होने पर ही उसे फैक्टरी माना जायेगा। जबकि पहले फैक्टरी की परिभाषा में मजदूरों की संख्या इसकी ठीक आधी थी। गौरतलब है कि भारत में उत्पादन में पावर (बिजली) का इस्तेमाल करने वाले कुल फैक्टरी-संस्थानों में ऐसे फैक्टरी-संस्थान जहां 20 से कम मजदूर काम करते हैं कि संख्या लगभग आधी है। इस तरह यह संहिता देश की लगभग आधी छोटी-छोटी फैक्टरियों के मजदूरों को संगठित क्षेत्र से असंगठित क्षेत्र में धकेल देती है और उनके भयंकरतम शोषण का रास्ता खोल देती है। इसका लाभ न सिर्फ इन छोटी-छोटी फैक्टरियों के मालिकों को होगा अपितु देशी-विदेशी बड़ी-बड़ी कंपनियों को भी होगा, क्योंकि आज उत्पादन के विकेंद्रित केंद्रीयकरण के दौर में मदर कंपनी से लेकर छोटी-बड़ी वेंडर कंपनियों एवं वर्कशॉपों व मजदूर बस्तियों तक उत्पादन की श्रंखला फैली हुई है; और नीचे से ऊपर तक बहुत से काम की आउटसोर्सिंग होती है।
    
अब हम महिला मजदूरों से नाईट शिफ्ट और खतरनाक उद्योगों में काम कराने के प्रावधान पर आते हैं। 
    
पुराने कानूनों के तहत महिला मजदूरों की सुरक्षा के मद्देनजर शाम 7 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक अर्थात नाईट शिफ्ट में उनसे काम कराने पर प्रतिबंध था। इसी तरह उनके स्वास्थ्य खासकर गर्भवस्था के मद्देनजर खनन, रासायनिक और विकिरण प्रभाव वाले खतरनाक उद्योगों में भी उनसे काम कराने पर प्रतिबंध था। लेकिन इस संहिता की धारा- 43 के तहत अब महिला मजदूरों से नाईट शिफ्ट में भी काम लेने का अधिकार पूंजीपतियों को सौंप दिया गया है। इसी तरह खतरनाक उद्योगों में उनसे काम कराने के प्रतिबंध को भी अब हटा दिया गया है। मोदी सरकार इसे काम का समान अधिकार और महिला सशक्तिकरण के रूप में प्रचारित कर रही है, जो कि सिवाय बेशर्मी के कुछ नहीं है। क्योंकि, जिस समाज में महिलायें दिन में भी सुरक्षित न हों वहां भला उनसे नाईट शिफ्ट को कैसे जायज ठहराया जा सकता है? परिवारों में बच्चा पालन व घरेलू कामों में महिलाओं के ही लगे होने के चलते इसका परिणाम पारिवारिक जीवन छिन्न-भिन्न होने के रूप में सामने आयेगा।   
    
सरकार तर्क दे रही है कि महिला मजदूरों की सहमति से ही उन्हें नाईट शिफ्ट में लगाया जायेगा। लेकिन, जब इन चार श्रम संहिताओं में मजदूरों के ट्रेड यूनियन और हड़ताल के अधिकार पर भारी हमले बोले गये हों और फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट (FTE) के तहत स्थायी रोजगार का अधिकार भी छीन लिया गया हो तब कैजुअल अथवा ठेके की नौकरी पर लगी महिला मजदूर की सहमति-असहमति का भला क्या मतलब रह जाता है? उसे वही करना होगा जो प्रबंधन कहेगा अन्यथा अपनी नौकरी गंवानी पड़ेगी!
    
दरअसल महिलायें सस्ते श्रम का स्रोत हैं। ज्यादातर जगहों पर पुरुष मजदूरों की तुलना में महिला मजदूरों को आधे से दो-तिहाई तक ही वेतन मिलता है; और यह संहिता महिला मजदूरों के सस्ते श्रम की हर जगह और अधिकतम उपलब्धता को सुनिश्चित करती है, ताकि पूंजीपति अधिक से अधिक मुनाफा कमा सकें। 
    
असल में तो नाईट शिफ्ट महिला हो या पुरुष सभी मजदूरों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती है। इसलिये केवल ऐसे उद्यम जिनमें चौबीसों घंटे प्लांट चलाना अनिवार्य होता है, को छोड़कर अन्य सभी जगहों पर नाईट शिफ्ट सभी मजदूरों के लिये प्रतिबंधित होनी चाहिये; और जहां अनिवार्य हो वहां मजदूरों को विशेष सुविधायें और भत्ते मिलने चाहिये।
        
अब हम सेफ्टी कमेटियों के दायरे को सीमित करना, ठेका प्रथा को बढ़ावा देना, प्रवासी मजदूरों की अनदेखी, लेबर इंस्पेक्टरों को फैसिलिटेटर बनाना व पूंजीपतियों को ‘सेल्फ सर्टिफिकेशन’ का अधिकार पर आते हैं। 
    
व्यावसायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता, 2020 की धारा- 22 (1,2) के तहत अब सामान्यतः सिर्फ वही फैक्टरी-संस्थान सेफ्टी कमेटियों के दायरे में आएंगे जहां 500 अथवा अधिक मजदूर काम करते हों। इसके अलावा खतरनाक प्रकृति के उद्योगों एवं निर्माण उद्योगों में 250 अथवा अधिक मजदूर एवं खनन में 100 अथवा अधिक मजदूर होने पर ही वहां सेफ्टी कमेटियां होंगी। जबकि पुराने कानून के तहत 100 अथवा अधिक मजदूरों वाले सभी फैक्टरी-संस्थानों में सेफ्टी कमेटियों का होना अनिवार्य था। इस तरह यह संहिता 98-99 प्रतिशत फैक्टरी-संस्थानों को सेफ्टी कमेटियों की निगरानी से मुक्त कर देती है। 
    
श्रम कानूनों की परिपालना के प्रति सचेतन उदासीन रवैय्या अपनाने के कारण उदारीकरण के दौर में औद्योगिक दुर्घटनायें लगातार बढ़ती चली गई हैं। अत्यधिक ओवरटाइम के कारण होने वाली थकान, सुरक्षा उपकरणों के अभाव, पुरानी खराब और बिना सेंसर वाली मशीनों में हाथ आ जाने, कंवेयर बेल्ट में फंस जाने, ऊंचाई से गिर जाने और आगजनी इत्यादि के कारण होने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में मजदूर बड़ी संख्या में बेमौत मारे जा रहे हैं अथवा अपाहिज हो रहे हैं। मुनाफाखोर पूंजीपति और सरकारें इसके लिये सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। लेकिन, अब इस संहिता में श्रम कानूनों की परिपालना में इस आपराधिक उदासीनता से आगे बढ़कर कानूनन ही सेफ्टी कमेटियों के दायरे को सीमित कर दिया गया है, तब तो औद्योगिक दुर्घटनायें निश्चित ही और अधिक बढ़ेंगी; और जिनमें पहले से अधिक मजदूर अपाहिज होंगे और मारे जायेंगे। लेकिन, निर्लज्ज मोदी सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे तो बस पूंजीपतियों के मुनाफों की चिंता है।
    
इस संहिता की धारा- 45 (1) के तहत अब 50 मजदूरों तक की आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों को लाइसेंस की कोई आवश्यकता नहीं होगी। जबकि पहले यह कानूनी छूट 20 मजदूरों की आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों तक सीमित थी। हालांकि पहले भी ये लाइसेंस लोडिंग-अनलोडिंग अथवा किसी अन्य ‘नानकोर वर्क’ के होते थे लेकिन श्रम कानूनों का घोर उल्लंघन कर मजदूरों से काम मुख्य उत्पादन में लिया जाता था। जाहिर सी बात कि सरकार की पूरी जानकारी में और श्रम विभाग की नाक के नीचे आगे भी यह गैर कानूनी श्रम अभ्यास जारी रहेगा।
    
पहले ठेका मजदूरों को वेतन भुगतान के दौरान मुख्य नियोक्ता (Principal Employer) की तरफ से किसी अधिकार प्राप्त व्यक्ति की उपस्थिति अनिवार्य थी, जिसे कि अब समाप्त कर दिया गया है। इस तरह यह संहिता गैर कानूनी ठेका प्रथा को और अधिक बढ़ावा देती है। 
    
पूंजीवादी व्यवस्था में कुछ इलाकों का औद्योगिक विकास होता है और कुछ पिछड़े रह जाते हैं। ऐसे में पिछड़े इलाकों से खेती से उजड़ रहे लोग रोजी-रोटी की खातिर औद्योगिक विकास वाले इलाकों में जाने को मजबूर होते हैं, जिन्हें कि अप्रवासी मजदूर कहा जाता है। इस संहिता के अध्याय-11 के भाग-2 में इन्हीं अप्रवासी मजदूरों के लिये प्रावधान है कि श्रम विभाग उन फैक्टरी-संस्थानों के अप्रवासी मजदूरों का रिकार्ड रखेगा जिनमें 10 या अधिक अप्रवासी मजदूर काम करते हैं। जबकि पुराने कानूनों के तहत यह संख्या 5 थी। हालांकि, पहले भी अप्रवासी मजदूरों का असल में कोई रिकार्ड नहीं रखा जाता था और यह कानून महज कागजों की ही शोभा बढ़ा रहा था। लेकिन अब सरकार ने कागजी तौर पर भी श्रम विभाग का काम हल्का कर दिया है। कोरोना काल में तो खुद मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बयान दिया था कि उसके पास अप्रवासी मजदूरों से संबंधित कोई रिकार्ड नहीं है। नई संहिता के प्रावधानों से सरकार का रुख स्पष्ट है कि अप्रवासी मजदूरों की यह अनदेखी आगे भी जारी रहेगी।
    
इस संहिता के प्रावधानों के तहत अब श्रम विभाग के इंस्पेक्टर, मददकर्ता अथवा फैसिलिटेटर्स होंगे। मतलब यह है कि अब उनके पास किसी फैक्टरी-संस्थान में औचक निरीक्षण करने का अधिकार नहीं होगा। किसी कंपनी में श्रम कानूनों के उल्लंघन की शिकायत पर पहले लेबर कमिश्नर की संस्तुति हासिल करनी होगी, तभी जाकर कंपनी में निरीक्षण करना संभव होगा। जाहिर सी बात है कि लेबर कमिश्नर की संस्तुति हासिल करना दुर्लभ ही होगा। इतना ही नहीं यह संहिता पूंजीपतियों को स्वः प्रमाणीकरण (Self Certification) का अधिकार भी प्रदान करती है। मतलब, पूंजीपतियों द्वारा यह घोषणा करना कि ‘‘उनके संस्थान में श्रम कानूनों की परिपालना होती है’’ को अब कानूनी मान्यता हासिल होगी। भले ही कंपनी के अंदर चाहे जितने गोरखधंधे चल रहे हों।
    
अब आखिर में हम 8 घंटे कार्यदिवस के अधिकार को छीनने के हथकंडे एवं मजदूरों के लिये न्यायपालिका के दरवाजे बंद कर देने पर आते हैं।
    
यूं तो यह संहिता 8 घंटे कार्यदिवस की ही बात करती है लेकिन बहुत चालाकी से ओवरटाइम के घंटों पर चुप्पी साधकर और इसे तय करने का अधिकार संबंधित सरकार को सौंपकर पिछले दरवाजे से मजदूर के कार्यदिवस को बढ़ाने का इंतजाम कर देती है। इसकी धारा-27 में ओवरटाइम के अधिकतम घंटे कितने हो सकते हैं इस पर कोई स्पष्ट बात नहीं की गई है और इसे संबंधित सरकार के हवाले कर दिया गया है। जबकि पुराने फैक्टरी अधिनियम में यह स्पष्ट दर्ज था कि मजदूर से हफ्ते में 50 घंटे और तीन महीने की अवधि में 50 घंटे से अधिक ओवरटाइम नहीं कराया जा सकता। बाद में सरकार ने इस संहिता द्वारा प्रदान की गई शक्ति का प्रयोग कर आराम की अवधि समेत एक मजदूर के कार्यदिवस को 12 घंटे तक विस्तारित कर दिया है। मतलब अब अगर पूंजीपति चाहें तो मजदूर से 8 घंटे की ड्यूटी के बाद 4 घंटे प्रतिदिन ओवर टाइम कानूनी तौर पर करवा सकते हैं। बाकी, सभी जानते हैं कि ओवरटाइम के डबल भुगतान का कानून पहले की तरह आगे भी ज्यादातर जगहों पर लागू नहीं होगा; और कुछ जगहों पर पहले की ही तरह आगे भी इसका सिंगल से भी कम भुगतान होगा। 
    
हालांकि, आज ज्यादातर कैजुअल और ठेका मजदूरों का वेतन इतना कम है कि वे खुद ही 12 घंटे की ड्यूटी ढूंढते हैं, क्योंकि इतनी महंगाई में 8 घंटे की ड्यूटी में परिवार का खर्च चलता ही नहीं है। असल में तो उदारीकरण के दौर में मजदूर 8 घंटे कार्यदिवस के अधिकार को व्यवहार में पहले ही गंवा चुके हैं। यह संहिता इसी को ओवरटाइम के घंटों पर चुप्पी साधकर कानूनी रूप प्रदान करती है। इसका नकारात्मक असर संगठित मजदूर आंदोलन पर भी पड़ेगा। क्योंकि अभी तक ट्रेड यूनियनें प्रबंधन पर दबाव बनाने के लिये ओवरटाइम बंद करने को एक रणकौशल के रूप में इस्तेमाल करती रही हैं लेकिन अब 4 घंटे प्रतिदिन तक ओवरटाइम कानूनी हो जाने के कारण  इसे बंद करना हड़ताल की श्रेणी में आ जायेगा।
    
व्यावसायिक संरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संबंधी संहिता, 2020 के तहत विवादों की सुनवाई का अधिकार हाईकोर्ट से नीचे किसी कोर्ट को नहीं होगा; और एक प्रशासनिक प्राधिकरण विवादों की सुनवाई करेगा। इस तरह यह संहिता मजदूरों के लिये न्यायपालिका के दरवाजे भी बंद कर देती है और उन्हें नौकरशाही के हवाले कर देती है।

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