मजदूरों के निडर बयान

Published
Fri, 05/01/2026 - 15:50
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देश में चल रही मजदूर उथल-पुथल के बीच मानेसर और नोएडा दो ऐसे केन्द्र के रूप में उभर कर आए जहां मजदूर संघर्ष फैक्टरी दायरों को लांघ कर आगे बढ़ गया। इन दो केन्द्रों में कई फैक्टरियों के मजदूर एक साथ आकर अपने आक्रोश को व्यक्त कर रहे थे। मजदूरों के भारी पैमाने पर सड़क पर उतरने की कार्यवाही ने मजदूरों के सवाल को देश के पैमाने पर चर्चा का मुद्दा बनाया। पूंजीवादी मीडिया भी मजबूर हुआ कि मजदूरों के जीवन और मजदूरों की बात को अपने पन्नों और वीडियो में जगह दे। सरकार द्वारा मजदूर आंदोलन और मजदूर संगठनों पर लगाये जाने वाले बे-सिर पैर के आरोपों को भी पूंजीवादी मीडिया ने एकतरफा तरीके से दिखाया और इस तरह अपनी पूंजीपति वर्ग के प्रति पक्षधरता के साथ पूरा न्याय किया। तब भी पूंजीवादी मीडिया में मजदूरों के हालात पर चर्चा ने दिखाया है कि मजदूरों के संघर्ष की अपनी एक ताकत है। मजदूरों के संघर्ष जब और ज्यादा एकजुट और सचेत होंगे तो इसकी ताकत और ज्यादा दिखाई देगी। 
    
मौजूदा मजदूर संघर्षों के दौरान मजदूरों ने अपनी दुर्दशा और पूंजीपतियों की निर्दयता को बगैर डर और संकोच के बयान किया। मजदूरों ने इस संघर्ष के दौरान शासन-प्रशासन के पूंजीपति वर्ग के पक्ष में बेशर्मी से खड़े हो जाने को भी अपनी आंखों से देखा। मौजूदा मजदूर संघर्ष ने मजदूरों को तमाम खट्टे-मीठे अनुभव दिये हैं। आने वाले समय में मजदूर वर्ग और इसका अगुआ हिस्सा इन सभी अनुभवों का समाहार करेगा और अपने आंदोलन को ऊंचे स्तर पर ले जायेगा। 
    
मौजूदा मजदूर संघर्षों के दौरान मजदूरों के द्वारा कही गयी बातें मजदूरों की मौजूदा चेतना के स्तर को दिखाती हैं। सचेत राजनीतिक संघर्षों की अनुपस्थिति में इस चेतना की सीमा है। तब भी इस चेतना के स्तर को समझना और विश्लेषण करना मजदूर आंदोलन से जुड़े सभी लोगों के लिए जरूरी बन जाता है। 
    
मजदूरों की चेतना और अनुभव की कुछ झलकियां प्रस्तुत करने के लिए यहां ‘दि प्रिंट’ और ‘न्यूजलांड्री’ की रिपोर्टों से मजदूरों के कुछ बयान उनके ही शब्दों में पेश हैं। ये सभी बयान नोएडा के मजदूरों के हैं और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि की घोषणा से पहले के हैं।
    
‘‘कारण ये है सर...सबसे पहली बात कि हमें सैलरी दी जाती है- सबसे स्टार्टटिंग सैलरी है जो हेल्पर है उसकी ग्रेड है साढ़े ग्यारह हजार के आस-पास...बरोबर...अब हमारे यहां पर ज्यादातर लोग- ज्यादातर वर्कर बाहर से आते हैं जैसे यू.पी, बिहार, बंगाल हो गया, यहां से आते हैं। अब ये समझिये कि ग्यारह हजार सैलरी में एक आदमी कमरा ले के रह रहा है, उसका एक बच्चा पढ़ रहा है। मतलब, अब गैस इतनी महंगी है अब एक आदमी कैसे पूरा कर पाएगा अपने घर का खर्च।...हमारी मांग यह है कि एक मिनिमम सैलरी कम से कम एक हेल्पर की सैलरी बीस हजार होनी चाहिए। हमें ओटी नहीं चाहिए। ओ टी कराने का मतलब ये है कि हमसे करीब 12-14 घंटे काम कराए जाते हैं। हम सुबह आठ-साढे आठ बजे आते हैं। 10-11 बजे रात को जाते हैं। न तो हम अपने परिवार को टाईम दे पाते हैं। कोई भी ए टू जेड न अपने बच्चे को टाईम दे पाता है। हमें ओटी से कोई मतलब नहीं। हमें ओटी नहीं चाहिए। हमें आठ घंटे काम चाहिए। आठ घंटे की हमारी मांग है, सैलरी उसकी 20 हजार होनी चाहिए। एक आम आदमी की। ....हमारे एस डी एम का बयान आया था आपने सुना होगा.....कोई महिला है। एस डी एम है शायद गौतमबुद्ध नगर की। उन्होंने हमें....मतलब...हम वर्कर मूर्ख हैं...उन्होंने हमें बताया कि हमारी सैलरी सात तारीख को मिलेगी, हमें एप्वाइंटमेंट लेटर दिया जायेगा, हमें डबल ओवरटाइम दिया जाएगा। लेकिन हमारी सैलरी की कोई बात नहीं करी उन्होंने। कोई प्रशासन हमारी...आज तक हमारी बीजेपी सरकार है...10 साल हो गये अपने योगीजी को। आज तक एक भी बयान कोई दिखा दे उन्होंने वर्कर के बारे में बात की हो जबकि यू.पी. में इतना बड़ा हब है लेबरों का, नोएडा में पूरा देखने जाएंगे आप। एक भी, एक भी बयान उनका नहीं है कि वर्करों के लिए हम ये कर रहे हैं, या वर्करों के लिए इतना सैलरी दी जाती है। बात करेंगे तो सरकारी कर्मचारियों की। हम कर्मचारी नहीं हैं। हम तो बेकार हैं। हम कीड़े-मकोड़े हैं।...अब आप ये सोचिए कि एक आदमी रेगुलर 12 घंटे, 13 घंटे, 14 घंटे कहीं एक स्थायी जगह पर बैठकर ....हमसे कहा जाए कि हमें इतने पीस चाहिए, इतना काम करके देना है, कैसे बैठे रहेगा वो। आप खुद सोचिए अपने आप से।’’
        केतन कुमार (स्रोत दि प्रिन्ट)
 

‘‘ऐसे कैसे चलेगा भईया...बताइये इतना महंगा सलेंडर हो गया है, हर चीज में महंगाई बढ़ रहा है, कैसे चलेगा। किराया भी बढ़ चुका है। बिजली बिल, पानी-उनी सारा चीज के व्यवस्था बढ़ा चुका है। हम लोग..बंदा...कैसे रह सकते हैं। बाल बच्चा को लेकर बाहर निकले हुए हैं। मालिक-सब कुछ नहीं सुनते हैं। मालिक सब सुनते तो हम लोग क्यों ऐसा करते। आगे हम लोगों का सैलरी बढ़ाए नहीं तो ऐसा ही हंगामा चालू रहेगा। कंपनी सारा बंद रहेगा।’’
      एक महिला मजदूर (स्रोत दि प्रिंट)

‘‘मेरा ये कहना है कि टारगेट तो ज्यादा ले लेते हैं। अगर मुझे वाशरूम लगती है तो कहते हैं बार-बार वाशरूम जाती हो, इसको यहां से भगा दूंगा। और कोई तबीयत भी खराब होती है तब भी जाने नहीं देते हैं। उसमें टी ब्रेक भी नहीं होता।....एक दिन की छुट्टी होती है तो 1350 रुपये कटता है। सैलरी भी बढ़ना चाहिए ओवरटाइम डबल होना चाहिए।’’ 
        मोहिनी पाल (स्रोत दि प्रिंट)

‘‘सैलरी नहीं बढ़ाते लेकिन साल में तीन बार टारगेट बढ़ा देते हैं। टारगेट बढ़ाने का नियम दे रखा है लेकिन सैलरी बढ़ाने का नियम नहीं दिया सरकार ने। पिछले साल सैलरी बढ़ी थी 29 रुपये। 29 रुपये देकर इन्होंने अहसान इतना बढ़ा दिया है, कहते हैं नौकरी करनी है टारगेट दो, नहीं करनी है तो यहां से निकल जाओ, रिजाइन मारो...इतनी इंसल्ट करते हैं हम लोगों की, कि जैसे इन लोगों ने हमें खरीद लिया है। हम यहां पर इज्जत की नौकरी करने आते हैं, लेकिन ये लोग बिल्कुल गधे की तरह नौकरी कराते हैं।’’
    एक महिला मजदूर (स्रोत न्यूज लाउंड्री)

‘‘ये जो पुलिस प्रशासन खड़ा है, गार्ड वालों के कहने पर लाठी चार्ज किया जा रहा है। हम लोग मदरसन परिवार एक आवाज नहीं उठा सकते। 10 हजार सैलरी में आठ घंटे-सोलह घंटे काम कर रहे यहां।’’
अभिनंदन, मदरसन का मजदूर (स्रोत न्यूज लाउंड्री)
    

मजदूरों की ये बातें मजदूरों के क्षोभ व गुस्से को दिखाती हैं। मौजूदा संघर्षों में मजदूरों ने सड़़क पर उतरकर अपने दर्द को बयां किया है। लाठीचार्ज और गिरफ्तारियां मजदूरों के गुस्से को और भड़काएगा ही। साथ ही वे राज्य के पूंजीपरस्त चरित्र से वाकिफ भी होंगे। पूंजीपति वर्ग स्वयं अपनी कब्र खोद रहा है।     -विशेष संवाददाता

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