अमरीका-इजरायल द्वारा ईरान पर किये गये आक्रमण के लगभग दो महीने पूरे हो रहे हैं। इस दौरान अमरीकी साम्राज्यवादियों के मौजूदा सरगना ट्रम्प बार-बार घोषित कर रहे हैं कि ईरान को हमने तबाह-बर्बाद कर दिया है, कि उसके पास कुछ नहीं बचा है, कि उसकी वायुसेना, उसकी नेवी और उसकी सेना खतम हो गयी है, और कि उसके ड्रोन और मिसाइलों का भण्डार खत्म हो गया है। फिर भी वे धमकी देते रहे हैं कि ईरान सरेण्डर कर दे। फिर कहते हैं कि वह तुरंत वार्ता करे और अमरीकी शर्तों को मान ले। लेकिन ईरान की सेना है कि वह अमरीकी साम्राज्यवादियों पर लगातार प्रहार करती रही है। अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत के सैन्य ठिकाने और सैन्य अड्डे उसके हमले का निशाना बनते रहे हैं। यह पहली बर हुआ है कि ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों ने पश्चिम एशिया में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डों को तबाह-बर्बाद किया है।
अभी फिलहाल स्थिति यह है कि अमरीकी साम्राज्यवादियों ने होरमुज जलडमरूमध्य के बाहर नाकाबंदी कर रखी है और बड़े पैमाने पर ईरान की घेराबंदी कर दी है। दूसरी तरफ, उसने एक तरफा तौर पर युद्ध विराम घोषित कर रखा है। इसके अतिरिक्त, ईरान से समझौता वार्ता करने की मांग कर रहा है। उसने पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक बार वार्ता की। वह वार्ता भी अमरीकी साम्राज्यवादियों की शर्तों पर नहीं बल्कि ईरान द्वारा प्रस्तावित दस सूत्रीय मांगों के आधार पर स्वीकार की गयी। यह वार्ता असफल हो गयी। अमरीकी वार्ताकारों ने फिर से अपनी पुरानी ऐसी मांगों को रखा जिन्हें ईरानी हुकूमत ने पहले ही अस्वीकर कर दिया था। बहरआल, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने फिर से धमकी के साथ-साथ वार्ता करने के लिए ईरान को मनाने के लिए पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष को लगाया। लेकिन ईरान अपनी बात पर कायम रहा कि वह अपने आणविक कार्यक्रम को जारी रखेगा। ईरान पहले से ही कहता रहा है कि वह अपना आणविक कार्यक्रम अपनी नागरिक जरूरतों के लिए कर रहा है और कि यह उसकी सम्प्रभुता का प्रश्न है जिसमें वह कोई समझौता नहीं कर सकता। ईरानी सत्ता ने पहले से परमाणु बम न बनाने की घोषणा कर रखी है। इसके बावजूद अमरीकी साम्राज्यवादी यह मांग करते रहे हैं कि ईरान अपने यूरेनियम भण्डार को अमरीकी साम्राज्यवादियों को सौंप दे। दूसरे, ईरान ने होरमुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण के अपने अधिकार को अपनी सम्प्रभुता तथा सुरक्षा का बुनियादी अधिकार माना। अमरीकी साम्राज्यवादी ताकत के जरिए होरमुज जलडमरूमध्य से जहाजों और टैंकरों के पारगमन के लिए इसे खुलवाना चाहते हैं। होरमुज जलडमरूमध्य से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस का पारगमन होता है। यह बंद हो गया था। क्योंकि इजरायली यहूदी नस्लवादी सत्ता ने लेबनान में हमला जारी रखा था। ईरान ने कहा कि युद्धविराम की शर्तों में लेबनान में भी युद्धविराम शामिल था। मध्यस्थ पाकिस्तान ने भी इस बात की पुष्टि की। लेकिन जब इजरायल लेबनान पर हमले करता रहा तो होरमुज जलडमरूमध्य को ईरान ने बंद कर दिया। इससे मजबूर होेकर अलग से अमरीकी साम्राज्यवादियों ने लेबनान पर भी औपचारिक तौर पर युद्ध विराम लागू करवाया। तब भी लेबनान पर इजरायली हमले जारी रहे।
इस पृष्ठभूमि में अमरीकी साम्राज्यवादियों ने एक तरफ ईरान की घेराबंदी कर रखी है। ईरान के तेल के टैंकरों को आने-जाने से रोक रखा है। ईरान के दो टैंकरों पर कब्जा कर लिया है। इसके साथ ही, उसे समझौता वार्ता में आने को विवश कर रहा है। ईरान के टैंकरों पर कब्जे को ईरान ने समुद्री डकैती की संज्ञा दी है। इसके जवाब में ईरान ने भी कुछ जहाजों पर कब्जा कर लिया है। इस समय होरमुज जलडमरूमध्य जहाजों के पारगमन के लिए पूर्णतया बंद है। अमरीकी साम्राज्यवादी ईरान के बंदरगाहों से टैंकरों को आने-जाने नहीं दे रहे हैं और ईरान दुनिया के अन्य देशों के टैंकरों को होरमुज जलडमरूमध्य से आने-जाने से रोक चुका है।
इससे दुनिया भर में न सिर्फ तेल और गैस का संकट बढ़ गया है, बल्कि दूसरे पेट्रोकेमिकलों, खाद, यूरिया आदि का और बड़ा संकट सामने आ रहा है। दुनिया भर में आपूर्ति श्रंखला में भी बाधा आ खड़ी हुई है। तेल की और गैस की कीमतें बढ़ गयी हैं। इसका प्रभाव हर क्षेत्र में पड़ रहा है।
यहां यह ध्यान में रखने की बात है कि अमरीकी साम्राज्यवादी और यहूदी नस्लवादी इजरायली हुकूमत वह चीज समझौता वार्ता से हासिल करना चाहते हैं जो वे युद्ध के मैदान में नहीं हासिल कर सके। लेकिन ईरान की हुकूमत अपनी सम्प्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं कर सकती। वे इस पर डटे हुए हैं। ईरानी सरकार बार-बार यह घोषणा कर रही है कि वह युद्ध नहीं चाहती। लेकिन वे लम्बे समय तक के युद्ध के लिए तैयार हैं। वे पिछले 47 वर्षों से तरह-तरह के प्रतिबंधों, हमलों और हुकूमत गिराने के षड्यंत्रों का सामना करते रहे हैं। उन्होंने अपने शीर्ष नेतृत्व को खो दिया। इसके साथ ही, बड़े पैमाने पर उन्होंने अपने औद्योगिक संयंत्रों तथा अवरचना के अन्य क्षेत्रों को इस युद्ध में तबाह-बर्बाद होते हुए देखा है। नागरिकों की हत्यायें और रिहाइशी इलाकों की बर्बादी देखी है। इसके बावजूद हर रोज ईरानी जनता लाखों की तादाद में ईरान की सड़कों पर इकट्ठा होती है और अपनी सरकार व सेना के समर्थन में एकजुटता प्रदर्शित करती है। ईरान की व्यापक आबादी अमरीकी साम्राज्यवाद व इजरायली यहूदी नस्लवादी हमलावरों के विरुद्ध युद्ध को विजय तक ले जाने की मांग करती है।
यहां यह भी गौरतलब है कि ईरान की सरकार जहां एकतरफ युद्ध के मैदान में अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली शासकों को मुंहतोड़़ जवाद दे रही है, वहीं दूसरी ओर वह कूटनीति के क्षेत्र मंे भी अब हमलावर व सक्रिय भूमिका निभा रही है। अभी हाल ही में, उसके विदेशमंत्री अरागची ने पाकिस्तान, ओमान और रूस की यात्रा की और इस यात्रा के बाद ईरान की सरकार ने अमरीकी साम्राज्यवादियों के समक्ष तीन मंजिलों में समझौता वार्ता को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव के अनुसार, पहली मंजिल में युद्ध विराम को स्थायी तौर पर लागू किया जाये। इस मंजिल में अमरीकी घेरेबंदी हटे और इस बात की गारण्टी की जाये कि आगे किसी भी बहाने से ईरान या उसके सहयोगियों लेबनान के हिजबुल्ला, यमन के हौथी और फिलिस्तीन के हमास और अन्य प्रतिरोध संगठनों पर हमला न हो। यह गारण्टी किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था या बड़ी ताकत के जरिये ही हो सकती है। इसके बाद, दूसरी मंजिल मंे होरमुज जलडमरूमध्य को पूर्णतः खोलने और उसके प्रबंधन के बारे मंे समझौता वार्ता हो। इसके प्रबंधन के सम्बन्ध में ईरानी विदेश मंत्री ने ओमान के शासकों के साथ बात की। चूंकि समुद्र सम्बन्धी अंतर्राष्ट्रीय कानून के मुताबिक किसी भी देश की सीमा से सटे समुद्र के 12 समुद्री मील तक उस देश का अधिकार माना जाता है। होरमुज जलडमरूमध्य की चैड़ाई एक जगह 21 समुद्री मील की है। अतः यह स्थान ईरान और ओमान के संप्रभु मालिकाने का क्षेत्र बनता है। होरमुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन की जिम्मेदारी और इससे मिलने वाले टोल टैक्स में भागीदारी का प्रश्न इन दोनों देशों के बीच का प्रश्न है। इसमें किसी बाहरी ताकत के हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं बनता। इस बात के लिए ओेमान भी सहमत हो गया है। इस मंजिल या चरण में इसी मसले पर वार्ता का प्रस्ताव है। ईरानी विदेश मंत्री ने इसके पहले यह कहा था कि चूंकि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे टोल टैक्स लेने की प्रणाली प्रचलित है, अतः अब यह प्रणाली होरमुज जलडमरूमध्य में भी लागू होगी। इन दो मंजिलों की वार्ता में अन्य मसलों की चर्चा नहीं होगी। इसके बाद तीसरी मंजिल में आणविक मसले पर और अन्य मसले जैसे ईरान के अवरुद्ध किये गये अरबों डालर और परिसम्पत्तियों पर वार्ता की जाये। ईरान ने अपना तीन मंजिलों में समझौता वार्ता का प्रस्ताव अमरीकी साम्राज्यवादियों के पास पहुंचा दिया। अमरीकी साम्राज्यवादियों के सरगना ट्रम्प ने इस प्रस्ताव पर अपनी असंतुष्टि इस आधार पर व्यक्त की कि इसमें आणविक मसले पर चर्चा आखिर में की गयी है। वे चाहते हैं कि सबसे पहले आणविक मसले पर चर्चा हो।
इस दौरान अमरीकी साम्राज्यवादियों के शासक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि ट्रम्प सरकार ईरान से युद्ध करके इजरायली हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं। ईरान की सत्ता अमरीका के लिए कोई तात्कालिक खतरा नही है। और न ही उनका आणविक कार्यक्रम ऐसा है जो आणविक हथियार (बम) बनाने की स्थिति में हैं। यह तो इजरायली सत्ता का बृहत्तर इजरायल का एजेण्डा है, जो ईरान में न सिर्फ सत्ता परिवर्तन चाहता है बल्कि उसके टुकड़े-टुकड़े करना चाहता है। अमरीकी साम्राज्यवादियों के भीतर इसी बात को लेकर तीखे मतभेद सामने आ गये हैं। अमरीकी उप राष्ट्रपति जे डी वैंस ने पेण्टागन (रक्षा विभाग) पर यह प्रहार किया कि पेण्टागन ने ईरान पर हमला करके अपने हथियार और मिसाइलों को इतना ज्यादा खर्च कर दिया है कि यदि युद्ध का दूसरा चरण खुल जाय तो अमरीका के पास उसका मुकाबला करने के लिए पर्याप्त सैन्य साजो सामान नहीं बचा है। अमरीकी साम्राज्यवादी चीन को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी और दुश्मन घोषित किये हुए हैं। यदि इसी समय चीन के विरुद्ध युद्ध लड़ना हो तो अमरीकी साम्राज्यवादियों के पास पर्याप्त हथियार, गोला-बारूद नहीं बचा है। एशिया प्रशांत क्षेत्र से अपने जंगी बेेड़े, वायु रक्षा प्रणालियां और मैरीन पहले ही अमेरिका ने पश्चिम एशिया में बड़ी मात्रा में स्थानांतरित कर दी हैं। अमरीका की व्यापक आबादी तो इस युद्ध के विरोध में है ही, खुद शासकों के बीच इस बात के तीखे मतभेद उभरकर सामने आ गये हैं कि ट्रम्प यह युद्ध अमरीका नहीं बल्कि इजरायल के लिए लड़ रहे हैं। इसी समय, ट्रम्प द्वारा पत्रकारों को दिये गये एक भोज में उन पर हमला करने का एक व्यक्ति ने प्रयास किया है। इसे भी खुद ट्रम्प द्वारा प्रायोजित एक नाटक बताया जा रहा है। यह भी हो सकता है कि ईरान पर चैतरफा बड़़ा युद्ध थोपने के लिए आगे भी किसी बड़े आतंकी हमलों की साजिश अमरीकी साम्राज्यवादी करें, जैसे कि 9/11 के दौरान की गयी थी।
जहां तक इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत की बात है, वह लगातार युद्ध की स्थिति में रहना चाहती है। वह पश्चिम एशिया में अपनी वरीयता बनाये रखने के लिए हर हाल मंे ईरान को ताकतवर नहीं देखना चाहती। दूसरे पश्चिम एशिया में उसके वृहत्तर इजरायल के सपने के पूरा होने में सबसे बड़ी बाधा ईरान और उसके सहयोगी प्रतिरोध आंदोलन की ताकतें हैं। इजरायली यहूदी नस्लवादी सत्ता का यह सपना पूरा होगा, यह तो संदेह के घेरे में हैं, लेकिन इसके लिए वह सतत युद्ध में लगा रहेगा और चंूंकि वह इस युद्ध को अकेले नहीं चला सकता, इसलिए वह अमरीकी साम्रज्यवादियों को इस युद्ध में घसीटने में सफल हो गया है। चूंकि अमरीका में यहूदी नस्लवादी लाबी काफी ताकतवर है, इसलिए जनता के व्यापक विरोध के बावजूद, अमरीकी शासकों के बीच उनके पैसे का प्रभाव बहुत अधिक है।
खाड़ी देशों के शासकों की स्थितियों में इधर कई परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन तो इजरायल के साथ घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं और वे अभी भी ईरान के विरुद्ध अमरीकी-इजरायली गठबंधन के आम तौर पर हिस्से बने रहेंगे। इन दोनों पर इजरायल के बाद सबसे ज्यादा ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमले हुए हैं। लेकिन साऊदी अरब और कतर की स्थिति भिन्न है। एक तरफ साउदी अरब, ईरान की बढ़ती ताकत से आशंकित है, दूसरी तरफ वह इस बात का कायल होता गया है कि अमरीकी साम्राज्यवादी उसकी सुरक्षा नहीं कर सकते। कतर भी मूलतया अमरीकी पक्ष में रहते हुए कुछ वैकल्पिक रास्तों की तलाश कर रहा है। ओमान ज्यादातर ईरान के पक्ष में आता गया है। कुवैत भी अमरीकी पक्ष में है, लेकिन डरा हुआ है।
इधर साऊदी अरब, मिश्र, तुर्की और पाकिस्तान एक नये गठबंधन की तैयारी कर रहे हैं। ये भी अमरीकी साम्राज्यवादियों की पूर्ण छत्रछाया से अपनी एक हद तक दूरी बनाने की कोशिश में है।
चूंकि होरमुज जलडमरूमध्य के बंद होने से सबसे अधिक नुकसान खाड़ी देशों के तेल और गैस की बिक्री पर पड़ा है, इसलिए वे इस संकट का जल्द से जल्द समाधान चाहते हैं।
यूरोपीय संघ और नाटो के देश अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ पूरी तौर पर अपने स्वायत्त रास्ते पर चल रहे हैं। वे पश्चिम एशिया में, खासकर ईरान के विरुद्ध युद्ध और होरमुज जलडमरूमध्य को खुलवाने में अमरीकी साम्राज्यवादियों से दूरी बनाये हुए हैं। वे यूक्रेन के मसले पर भी अमरीकी साम्राज्यवादियों से नाराज हैं। वे अभी भी रूस के विरुद्ध यूक्रेन की मदद कर रहे हैं।
इस समूचे प्रकरण में रूसी और चीनी साम्राज्यवादी सबसे ज्यादा फायदे में रहे हैं। वे ईरान का न सिर्फ कूटनीतिक तौर पर समर्थन कर रहे हैं बल्कि ईरान की हर तरह से मदद कर रहे हैं। इसका फायदा एक तरफ ईरान को युद्ध के दौरान मिला है और दूसरी तरफ ईरान ने भी रूस और चीन को आने-जाने वाले जहाजों को टोल मुक्त कर दिया है। चीनी साम्राज्यवादियों ने ईरानी तेल की 90 प्रतिशत खरीदारी की है, इसलिए भी वे हर तरह से ईरान की सत्ता की मदद करते रहे हैं। रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों के लिए ईरान की सत्ता का बने रहना अहम है। वे वैश्विक स्तर पर अपने प्रभाव क्षेत्र को फैलाने में ईरान को विशेष कड़ी मानते हैं।
एक बात निश्चित है कि इस युद्ध के दौरान ईरान पश्चिम एशिया में एक मजबूत बड़ी शक्ति के बतौर उभरा है। इसके हाथ में होरमुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण आना एक बड़ा हथियार है। उसने इस हथियार का बखूबी इस्तेमाल किया है।
इसने अमरीकी साम्राज्यवादियों की दादागिरी को चुनौती दी है। और इस चुनौती में होरमुज के हथियारीकरण की अहम भूमिका है। यह आणविक बम से भी अधिक कारगर भूमिका निभा रहा है।
यदि होरमुज जलडमरूमध्य के साथ-साथ बाब अल मंदेव भी बंद हो जाये तो समूची दुनिया में बड़े पैमाने का संकट और बढ़ जायेगा। अमरीकी साम्राज्यवादी और दुनिया की अन्य बड़ी ताकतें इसी से डर रही हैं।
इस युद्ध ने विश्व राजनीति में, शक्ति संतुलन मंे काफी बड़े परिवर्तन को अंजाम दिया है। इसमें होरमुज जलडमरूमध्य के हथियारीकरण की एक बड़ी भूमिका है। ये परिवर्तन वह भौतिक जमीन तैयार करने में मददगार साबित हो सकते हैं जो दुनिया की मजदूर-मेहनतकश आबादी के मुक्ति संघर्ष को आगे बढ़ने में मदद करें।