पतित पूंजीवाद के दौर में शासक वर्ग और जनता

Published
Fri, 05/01/2026 - 15:50
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आज दुनिया के अधिकांश देशों में इजरायल-फिलिस्तीन और ईरान को लेकर शासक वर्ग और व्यापक जनता के बीच फर्क को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। इस मामले में दोनों अलग-अलग जमीन पर ही नहीं बल्कि आमने-सामने खड़े हैं। यह आज आम तौर पर ही शासक वर्ग और व्यापक जनता के बीच फर्क का एक विशिष्ट उदाहरण है। यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है कि पिछले कुछ दशकों में ऐसा लगता रहा है कि शासक वर्ग व्यापक जनता को भांति-भांति के तरीकों से अपने पीछे गोलबंद करने में कामयाब रहा है। पर यह बस प्रतीति-मात्र था, सच्चाई कुछ और थी। 

इसके कुछ उदाहरण देखें। 
    
ईरान पर अमेरिका के हमले की शुरूआत से ही अमेरिका की आधी से अधिक जनता इस हमले के खिलाफ थी। अब ऐसे लोगों की संख्या वहां दो-तिहाई हो गयी है। इसी तरह अब करीब आधे अमेरिकी फिलिस्तीन का समर्थन करते हैं जबकि केवल एक चैथाई ही इजरायल के पक्ष में हैं। अभी तीन साल पहले तक इसका उलटा था। युवा आबादी में तो इजरायल का विरोध और ज्यादा है। 
    
अमरीकी जनता के इस रुख के बरक्स अमरीकी शासक कहां खड़े हैं? अभी भी लगभग सारे रिपब्लिकन नेता इजरायल के साथ दृढ़तापूर्वक खड़े हैं और ईरान पर अमरीकी हमले का समर्थन कर रहे हैं। इसी तरह अभी भी ज्यादातर डेमोक्रेटिक नेता इजरायल के साथ खड़े हैं। वे केवल तकनीकी आधार पर ईरान पर हमले का विरोध कर रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे हैं कि ईरान के प्रति संपूर्ण अमरीकी रुख गलत और नाजायज है। कि पश्चिम एशिया में समस्या की जड़ ईरान नहीं बल्कि इजरायल है और उसे अमरीकी समर्थन बंद होना चाहिए। 
    
अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों के नेताओं का ईरान और इजरायल के प्रति यह रुख इस कारण नहीं है कि इनमें से नब्बे प्रतिशत से ज्यादा को इजरायली लाबी से पैसा मिलता है जिसके बिना ये चुनाव नहीं लड़़ सकते। बात इससे आगे की है। जिन्हें चुनाव नहीं लड़ना है वे भी ईरान के विरोधी और इजरायल के समर्थक हैं। समूचा प्रचारतंत्र, थिंक टैंक, विश्वविद्यालय, सरकारी नौकरशाही सब जगह यही हाल हैं। सब जगह ऊपरी स्तर के लोग यानी शासक वर्ग के हिस्से ईरान के विरोधी और इजरायल के समर्थक हैं। जहां तक एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग का सवाल है, वह तो ऐसा है ही। इसमें तो एक बड़ी संख्या यहूदियों की है जो इजरायली लाबी को पैसा देते हैं और स्वयं इजरायल को भी। इस तरह लगभग समूचा अमरीकी शासक वर्ग ईरान विरोधी और इजरायल समर्थक है। 
    
इसका क्या कारण है? इसकी वजह यह सीधा सा तथ्य है कि अमरीकी शासक वर्ग साम्राज्यवादी है और वह दुनिया भर में अपने साम्राज्यवादी मंसूबों के तहत ही विभिन्न देशों व उनके शासकों से रिश्ते बनाता-बिगाड़ता है। पश्चिम एशिया जैसे तेल-गैस से भरपूर व भू-राजनीतिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्र में उसने इजरायल को अपनी सैनिक चैकी की तरह स्थापित कर रखा है। अपने पिट्ठू शाह रजा पहलवी के खिलाफ विद्रोह और वहां एक अमरीकी साम्राज्यवाद विरोधी शासन की स्थापना के लिए अमरीकी साम्राज्यवादी शासकों ने ईरान को कभी माफ नहीं किया तथा 1979 से ही वे इस शासन को उखाड़ फेंकने के हर संभव प्रयास में लगे हुए हैं। इसके लिए उन्होंने आर्थिक प्रतिबंध से लेकर हत्याओं और सैनिक हमले जैसे सारे तरीके अपनाये हैं। अमरीकी साम्राज्यवादियों को पता है कि वर्तमान ईरानी निजाम पश्चिम एशिया में उनके प्रभुत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। जब तक यह चुनौती खत्म नहीं हो जाती वे चैन से नहीं बैठेंगे। 
    
पश्चिम एशिया में अपने इन साम्राज्यवादी मंसूबों के तहत उन्होंने ईरानी निजाम के बारे में अमरीकी जनमानस में बुरी से बुरी धारणा पैदा करने की कोशिश की। इसके लिए हर संभव दुष्प्रचार किया गया। ऐसा करके वे अपने उद्देश्य में एक हद तक सफल भी हो गये। अमरीकी जनता पश्चिमी एशिया में इजरायल को नायक और ईरान को खलनायक के रूप में देखने लगे। पर पिछले कुछ सालों में इस दुष्प्रचार का असर कम होने लगा है। इसके कई कारण हैं पर पिछले तीन सालों में इजरायल द्वारा गाजा में नरसंहार एक प्रमुख चीज है। इस नरसंहार ने अमरीकी जनमानस में शासकों द्वारा इजरायल की गढ़ी गई तस्वीर को किनारे कर उसका वास्तविक वीभत्स और क्रूर चेहरा सामने ला दिया। प्रकारांतर से इसका असर ईरान के बारे में दुष्प्रचार के बारे में किसी हद तक अविश्वास के रूप में सामने आया। आज भी अमरीकी जनमानस अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा ईरान और ईरानी जनमानस के बारे में गढ़ी गयी छवि से मुक्त नहीं हो पाया है पर वह इस छवि के आधार पर ईरान पर अमरीकी हमले के खिलाफ हो गया है। 
    
कमोबेश यही हाल यूरोपीय शासकों और यूरोपीय जनता का है। स्पेन जैसे इक्का-दुक्का देश हैं जिनकी सरकारें ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमले तथा इजरायल के खिलाफ हैं। ज्यादातर इस हमले और इजरायल के पक्ष में हैं। बस वे इस हमले में स्वयं शामिल नहीं होना चाहते। इसकी मुख्य वजह उनकी अपनी जनता का विरोध है। साथ ही वे डरते हैं कि वे इराक-अफगानिस्तान की तरह या उससे ज्यादा ईरान में फंस जायेंगे। यदि अमरीकी साम्राज्यवादियों ने कुछ दिनों में ईरान पर कब्जा कर लिया होता तो ये भी वहां बांट-बखरा करने पहुंच गये होते। यह याद रखना होगा परमाणु हथियार बनाने से रोकने के नाम पर ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध थोपने के मामले में यूरोपीय साम्राज्यवादी शासक पूरी तरह अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ हैं। इसके बरक्स वे इजरायल के परमाणु बमों पर चुप्पी साधते हैं और इजरायल की हर तरह से मदद करते हैं। इस समय इजरायल को हथियारों की आपूर्ति के मामले में जर्मनी काफी आगे है। पिछले दिनों इजरायल से आर्थिक संबंधों के नवीकरण को नकारने के स्पेनी प्रस्ताव पर ज्यादातर यूरोपीय सरकारों ने विरोध में मत दिया। 
    
इसके बरक्स यूरोप की जनता है जो ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमले का विरोध कर रही है। अभी अस्सी लाख लोगों ने एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये जिसका मूल स्वरूप इजरायल विरोध का था। सारे ही देशों में ईरान पर हमले तथा इजरायल द्वारा गाजा में नरसंहार के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं जिनका सरकारें दमन कर रही हैं। 
    
यहां भी यूरोपीय शासकों और यूरोपीय जनता के बीच फर्क की वजह यूरोपीय साम्राज्यवादियों के मंसूबे हैं। वे भी पश्चिम एशिया में अमरीकी साम्राज्यवादियों के खेल के सहयोगी हैं। हालांकि उनकी अमरीकी साम्राज्यवादियों से प्रतिद्वन्द्विता है पर ईरान-इजरायल के मामले में वे अमरीकी जमीन पर ही हैं। उन्हें डर है कि पश्चिम एशिया में इजरायल का सिमटना और ईरान का वर्चस्व उनके हितों के लिए घातक होगा। इसीलिए वे भी ईरान को दबा कर रखना चाहते हैं। इसीलिए वे इजरायल और उसके द्वारा किये जाने वाले नरसंहार का समर्थन करते हैं। 
    
यूरोपीय-अमेरिकी साम्राज्यवादी देशों की जनता यदि आज अपने शासकों के दुष्प्रचार के मकड़जाल से बाहर आयी है और ईरान-इजरायल के मामले में अपने साम्राज्यवादी शासकों से अलग और उनके विरोध में खड़ी हो रही है तो इसकी दो वजहें हैं। एक तो यह कि आज कुल मिलाकर पहले के मुकाबले मजदूर-मेहनतकश जनता में जनवाद की चेतना पहले से कहीं ज्यादा है। बराबरी की भावना तथा अन्याय के प्रति गुस्सा आज पहले से ज्यादा है। जिसे आज दक्षिणपंथी ‘वोक संस्कृति’ कहते हैं वह क्रमशः लोगों की सहज चेतना का हिस्सा बनता जा रहा है। इसके खिलाफ जनमानस को खड़ा करने के लिए धुर दक्षिणपंथियों और फासीवादियों को विशेष प्रयास करना पड़ रहा है तथा अपने असल मंसूबों और चरित्र को छिपाना पड़ रहा है। भारत में तो पक्के जातिवादी-मर्दवादी हिन्दू फासीवादियों को स्वयं को दलितों-पिछड़ों व स्त्रियों के मुक्तिदाता के रूप में पेश करना पड़ रहा है। 
    
दूसरा कारण यह है कि साम्राज्यवादी देशों में भी साम्राज्यवादी शासकों ने ज्यादातर मजदूर-मेहनतकश जनता की जिन्दगी दूभर कर दी है। अमेरिका में आजकल सबसे बड़ा युद्ध ‘एफोर्डेबल क्राइसिस’ है। यानी कि मौजूदा आय में घर नहीं चल रहा है। पहले साम्राज्यवादी दुनिया में जो लूटपाट करते थे उससे अपनी जनता का जीवन स्तर कुछ उठाने में कामयब होते थे। तब उनका भांति-भांति का प्रचार जनता में कारगर होता था। लेकिन उदारीकरण-वैश्वीकरण के पिछले चार दशकों में साम्राज्यवादी शासकों ने बाकी दुनिया की मजदूर-मेहनतकश जनता की जिन्दगी बदहाल करने के साथ-साथ स्वयं अपने देशों की जनता की जिन्दगी भी बदहाल की है। वहां ‘मध्यम वर्ग’ सिकुड़ता गया है। ‘अभिजात मजदूर वर्ग’ की हालत खस्ता हुई है। डोनाल्ड ट्रंप ने इसी खस्ताहाल गोरे मजदूर वर्ग और मध्यम वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया यह कहकर कि वह दुनिया भर में अमरीकी युद्धों को बंद कर अमरीकी अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने पर ध्यान केन्द्रित करेगा। यह अलग बात है कि आज वह अमरीकी साम्राज्यवादियों के सरगना के तौर पर नये युद्ध छेड़ रहा है। 
    
साम्राज्यवादी देशों की यह खस्ताहाल जनता अब अपने साम्राज्यवादी शासकों के बहकावे में नहीं आ रही है। इन शासकों के प्रति उसका अविश्वास बहुत ज्यादा है। यह ‘एस्टाब्लिशनमेंट’ के प्रति अविश्वास में अभिव्यक्त होता है। धुर-दक्षिणपंथी और फासीवादी इसी का इस्तेमाल करते हैं। और खुद को सत्ता-प्रतिष्ठान से बाहरी व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं। वे जताते हैं कि सत्ता-प्रतिष्ठानों से बाहर का व्यक्ति होने के चलते वे जन भावनाओं को समझते हैं और उसके लिए काम करेंगे। यह अलग बात है कि वे सबसे खराब किस्म के शासक साबित होते हैं। 
    
अमरीकी-यूरोपीय देशों में आज यही कुछ देखने को मिल रहा है। लेकिन यह समझना भूल होगी कि पिछड़े पूंजीवादी देशों में स्थिति भिन्न है, कि यहां शासकों और जनता के बीच उस तरह का फर्क नहीं है। यहां भी वही फर्क देखने को मिलता है। बस कारण थोड़ा अलग है।
    
ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले के बाद जब ईरान ने खाड़ी के देशों में स्थित अमेरिकी सैनिक अड्डों पर हमले किये तो उन देशों में शासकों और जनता की प्रतिक्रिया एकदम अलग-अलग थी। शासक, जो अमेरिकी साम्राज्यवादियों के पिट्ठू हैं, नाराज हुए जबकि जनता ईरानी प्रतिरोध से खुश हुई। बहरीन जैसे देशों में तो स्थिति एकदम विकट हो गयी। वहां स्थानीय शासकों के खिलाफ जन-विद्रोह का खतरा पैदा हो गया। साम्राज्यवादी ईरान में निजाम बदलना चाहते थे। अब उनके पिट्ठुओं केे निजाम को ही खतरा पैदा गया। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि इन देशों की जनता अपने शासकों के साम्राज्यवादियों के पिट्ठू होने से जरा भी खुश नहीं है। वह समाज में जनवाद के साथ-साथ अपने देशों की संप्रभुता भी चाहती है। वह तेल-गैस बेचकर मिली खुशहाली को पर्याप्त नहीं मानती। 
    
दुनिया के अन्य पिछड़े देशों के शासकों और जनता की स्थिति इससे भिन्न नहीं है। जहां रूसी और चीनी साम्राज्यवादी शासकों ने अपने साम्राज्यवादी हितों की खातिर ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमले की निंदा की, वहीं ज्यादातर पिछड़े देशों के शासकों ने चुप्पी साध ली। हां, उन्होंने खाड़ी देशों में स्थिति अमरीकी सैनिक अड्डों पर ईरानी हमलों की निंदा जरूर की तथा इसे इन देशों की संप्रभुता का उल्लंघन बताया। उन्हें ईरान की संप्रभुता की चिंता नहीं हुई जो साम्राज्यवादी हमले का प्रतिरोध कर रहा था पर साम्राज्यवादी पिट्ठुओं की संप्रभुता की चिंता जरूर हुई। इसी से वह वीभत्स दृश्य पैदा हुआ- संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले की निंदा का प्रस्ताव पास नहीं हुआ पर ईरान द्वारा खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैनिक अड्डों पर हमले के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास हो गया। इसके तीस-चालीस प्रस्तावकों में भारत भी था। इस तरह पिछड़े देशों के शासकों ने खुद ही नाबदान से कीचड़ उठाकर अपने मुंह पर पोत लिया। 
    
पिछड़े पूंजीवादी देशों के शासकों ने इस तरह पश्चिमी साम्राज्यवादियों के सुर में सुर क्यों मिलाया जबकि इनके देशों की जनता तो और भी ज्यादा ईरान के साथ थीं। इसका उत्तर भारत सरकार के रुख से मिल जाता है। भारत की जनता कितना ज्यादा ईरानी प्रतिरोध के साथ है यह भारत के सरकार समर्थक प्रचार तंत्र से पता चल जाता है। यह जानते हुए भी कि भारत की संघी सरकार नंगे तरह से इजरायली-अमेरिका के साथ है, इस प्रचार तंत्र को ईरानी मुकाबले को सलाम करना पड़ा। लेकिन भारत की संघी सरकार नंगे तरीके से इजरायल-अमेरिका के साथ क्यों है? क्योंकि भारत का शासक वर्ग अपना हित पश्चिमी साम्राज्यवादियों, खासकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों से सटने में देखता है। पिछले तीन-चार दशकों से भारतीय शासकों की यह आम नीति रही है, केन्द्र में चाहे जिस पार्टी की सरकार हो। इस समय यदि केन्द्र में कांग्रेस की सरकार होती तो वह भी कमोबेश वही कर रही होती जो इस समय मोदी सरकार कर रही है। बस राहुल गांधी हमले के ठीक पहले इजरायल नहीं गये होते। हिन्दू फासीवादियों को इजरायल-अमेरिका से विशेष प्रेम है। इस समय भी कांग्रेसी बयानों में इसे देखा जा सकता है जो इजरायल-अमेरिका की खुली भत्र्सना नहीं करते। 
    
आज अपने देशों की जनता के विपरीत पिछड़े पूंजीवादी देशों के शासक भी साम्राज्यवादी शासकों से सांठ-गांठ में ही अपना वर्गीय हित देखते हैं। इनमें से कुछ को परेशानी तब होती है जब साम्राज्यवादी कुछ ज्यादा ही बांह मरोड़ते हैं। कुछ तो पिट्ठू भी बनने को तैयार हो जाते हैं। यह वर्तमान दौर में दुनिया भर के पूंजीवादी शासकों के आपसी एकीकरण का द्योतक है जिसके पीछे है पूंजी का एकीकरण। पर चूंकि पूंजीपतियों की हैसियत अलग-अलग है, इसलिए उनके रिश्ते भी उसी हिसाब से हैं। साम्राज्यवादियों के आपसी रिश्ते अलग हैं (उनमें भी श्रेणी क्रम है) जबकि साम्राज्यवादियों और बाकी शासकों के अलग। इनमें सांठ-गांठ है तो टकराव भी। सांठ-गांठ की इस व्यवस्था में ईरान, उत्तरी कोरिया व क्यूबा के शासकों की स्थिति ही ऐतिहासिक वजहों से कुछ अलग है। इनके रूसी व चीनी साम्राज्यवादियों से विशेष रिश्ते हैं जबकि रूसी व चीनी साम्राज्यवादियों के बाकी साम्राज्यवादियों से टकराव बढ़ रहे हैं। 
    
मजदूर-मेहनतकश जनता की दुनिया भर में हो रही लूट के बंटवारे को लेकर शासकों में टकराव है जो भांति-भांति से प्रकट हो रहा है। यूक्रेन पर रूसी हमला तथा ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमला इसी का परिणाम है। पर स्वयं लूट के मामले में दुनिया भर के पूंजीवादी शासकों की एकता है। लूट के मामले में देशी-विदेशी पूंजी की एकता है जबकि लूूट के बंटवारे को लेकर इनके बीच टकराव है। 
    
दुनिया की मजदूर-मेहनतकश जनता अपनी सहज चेतना से इसे महसूस कर रही है। महसूस ही नहीं कर रही है बल्कि इसे प्रकट भी कर रही है। इसीलिए वह ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले तथा गाजा-लेबनान में इजरायली नरसंहार का विरोध कर रही है। वह शासकों के प्रचार में नहीं आ रही है। शासकों का प्रचार असफल साबित हो रहा है। यदि युद्ध के दौरान अमेरिकी साम्राज्यवादियों का समूचा प्रचारतंत्र कुछ ईरानी लड़ाकों के सामने पराजित हो गया तो दुनिया की जनता की ईरानी प्रतिरोध के प्रति सहानुभूति के कारण ही। 
    
अब यदि दुनिया की मजदूर-मेहनतकश जनता की सहज चेतना इतनी मजबूत है तो फिर वह धुर-दक्षिणपंथियों और फासीवादियों के प्रभाव में क्यों आ रही है? क्यों वह धार्मिक व नस्ली दंगों में उलझ रही है? क्यों इसके बदले वह इंकलाब की ओर नहीं बढ़ रही है?
    
पहले तो यह कि धुर-दक्षिणपंथियों और फासीवादियों के प्रचार के प्रभाव में आबादी का एक छोटा हिस्सा ही आ रहा है। यह अलग बात है कि इस छोटे हिस्से की मदद से ये कहीं-कहीं सत्ता में आ जा रहे हैं तथा फिर सत्ता की मदद से अपने प्रभाव का विस्तार कर रहे हैं। 
    
दूसरे, ये सारे ही जनता में वर्तमान व्यवस्था के प्रति आक्रोश को भुना रहे हैं। कोई भी धुर दक्षिणपंथी या फासीवादी यह नहीं कहता कि वह लूटपाट की पूंजीवादी व्यवस्था का समर्थक है। इसके उलट वे इस व्यवस्था की लानत-मलामत करते हैं। वे खुद को वर्तमान सत्ता-प्रतिष्ठान से बाहर का घोषित करते हैं। यानी वे उसी जनभावना को भुनाते हैं कि वर्तमान व्यवस्था जनता के लिए नहीं है, केवल पैसे वालों व सत्ताधारियों के लिए है। मोदी यूं ही नहीं बार-बार खुद को चाय वाला, फकीर, पिछड़ा इत्यादि बताते। 
    
लेकिन इसी के साथ ये धुर-दक्षिणपंथी या फासीवादी अपनी ‘बांटो व राज करो’ की नीति के तहत लोगों को नस्ली, भाषाई या धार्मिक आधार पर भड़काते हैं। ऐसा करते हुए वे लोगों की आदिम प्रवृत्तियों को उभारते हैं। वे जनवाद और बराबरी की भावना को कुंद करते हैं। वे यूं ही नहीं ‘लोक संस्कृति’ के विरोधी बने हैं। वे सब एक योजना के तहत यह कहते हैं और पूंजीपति वर्ग इसमें उनकी पैसे, प्रचारतंत्र इत्यादि से मदद करता है। पतित पूंजीपति वर्ग अपनी रक्षा में इसे अपनी अंतिम सुरक्षा पंक्ति मानता है। 
     
इस तरह आज जनता के एक हिस्से में आदिम प्रवृत्तियों का उभार सहज गति का परिणाम नहीं है। समाज की सहज गति तो जनवाद और बराबरी की भावना के विस्तार की है। शोषण, अन्याय-अत्याचार के विरोध की है। पर पतित शासक पूंजीपति वर्ग अपनी व्यवस्था की रक्षा में इन आदिम प्रवृत्तियों को भड़का रहा है। भारत से लेकर अमेरिका तक इसे देखा जा सकता है। 
    
लेकिन ठीक यहीं से इस बात की भी संभावना पैदा होती है कि लोगों को आदिम प्रवृत्तियों की ओर नहीं बल्कि और भी बेहतर समाज की ओर मोड़ा जा सके। शोषण, अन्याय-अत्याचार से मुक्त समाज की ओर प्रेरित किया जा सके। पतित पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति लोगों के आक्रोश को इंकलाब की ओर और फिर समाजवाद की ओर लक्षित किया जा सके। 

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