महिला हितैषी या पाखण्डी

Published
Fri, 05/01/2026 - 15:50
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पिछले दिनों भारत की संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष में महिला हितैषी होने की प्रतियोगिता चली। मौका था महिला आरक्षण बिल व परिसीमन पर चर्चा का। एक चतुर चुनावबाज पर महिलाओं को बेवकूफ समझने वाली मोदी सरकार ने ठीक बंगाल चुनाव के पहले महिला आरक्षण के जिन्न को अपने झोले से निकाल संसद में चर्चा के लिए रख दिया। मोदी सरकार ने महिला आरक्षण कानून में बदलाव कुछ इस तरह सूत्रित किया कि तत्काल परिसीमन कर अगले लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू हो जाये। सरकार जानती थी कि परिसीमन के मुद्दे पर विपक्षी नहीं मानेंगे और उसके पास दो तिहाई बहुमत न होने के चलते यह संविधान संशोधन संसद में गिर जायेगा व उसे जनता में विपक्ष को महिला विरोधी व खुद को महिला हितैषी साबित करने का मौका मिल जायेगा। व इस तरह वह बंगाल की महिला मतदाताओं को लुभा लेगी। 
    
मोदी सरकार की उम्मीद के मुताबिक संशोधन संसद में गिर गया। और फिर धूर्त संघी जगह-जगह रैलियां कर खुद को महिला हितैषी घोषित करने में जुट गये। विपक्षी सफाई देने लगे कि वे परिसीमन विरोधी हैं। महिला आरक्षण विरोधी नहीं। 
    
मोदी सरकार की यह नौटंकी कितनी कारगर रही यह तो विधानसभा चुनाव परिणामों से पता चलेगा। पर इस नौटंकी ने एक बार फिर दिखा दिया कि सत्ता क्या क्या जुगत बैठा महिला आरक्षण पर बीरबल की खिचड़ी को पकने से रोक सकती है। मजे की बात यही है कि इस खिचड़ी को पकने से रोकने की सत्ता पक्ष-विपक्ष दोनों की चाहत है पर दोनों ये दिखाना चाहते हैं कि वे जल्द से जल्द महिला आरक्षण लागू करना चाहते हैं। 
    
पुरुष वर्चस्व वाले भारतीय समाज में संसद में बैठे सांसद महिलाओं की बड़ी संख्या में संसद में प्रवेश को रोक कर बैठे हैं। वे महिलाओं के वोट तो चाहते हैं पर खुद महिलाओं की बड़ी संख्या संसद में नहीं चाहते। भाजपा से लेकर कांग्रेस तक में इस मामले में खास फर्क नहीं है। इसीलिए बीते 30-40 वर्षों से हर कोई महिला आरक्षण का समर्थक होने का दावा करता है पर संसद से इसे पारित नहीं होने देता। 
    
जहां तक संघ-भाजपा या मोदी के महिला हितैषी होने की बात है तो किसी को इस बात को समझने के लिए ज्यादा अक्ल की जरूरत नहीं कि ये सबसे अधिक महिला विरोधी हैं। इनकी पार्टी में सबसे ज्यादा महिला अपराधों के आरोपी सांसद-विधायक हैं। ये धुर महिला विरोधी मनुस्मृति के पुजारी हैं। ये हिटलर की तरह महिलाओं को घर में कैद कर बच्चे पैदा करने वाली मशीन में बदलना चाहते हैं। इनके संघ मंे महिलाओं को प्रवेश की भी जगह नहीं है। इनके ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म में महिलाओं की स्थिति पुरुषों के पैर की जूती से अधिक नहीं है। महिलाओं के जनवाद को बीते 11 वर्षों के शासन में इन्होंने हर तरह से कुचलने की ही कोशिश की है। 
    
वहीं विपक्षी कांग्रेस भी कम महिला विरोधी नहीं है। उसने सालों तक महिला आरक्षण को लटकाने में बराबर की भूमिका अदा की है। 
    
महिला आरक्षण (संसद-विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण) की मांग महिला आंदोलन की लम्बे वक्त से मांग रही है। इस मांग के पीछे ये सोच रही है कि महिलायें राजनीति में जायेंगी तो वे महिला हित में काम करेंगी। पर संसद में गयी महिलाओं का महिला मुद्दों पर रुख को देखते हुए इस बात की संभावना बहुत कम है कि ऐसा होगा। फिर भी महिला आरक्षण की मांग का इसीलिए समर्थन किया जाना चाहिए कि इसके पूरा होने पर ही समाज से यह भ्रम दूर हो पायेगा कि महिलाओं की बुरी दशा उनकी संसद मंे कम भागीदारी की वजह से नहीं है, बल्कि मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था व समाज में व्याप्त पुरुष प्रधानता महिलाओं की बुरी दशा के लिए जिम्मेदार हैं; व इससे संघर्ष कर ही महिलाओं की स्थिति सुधर सकती है। 
    
फिर भी महिला आरक्षण पर पूंजीवादी दलों की नौटंकी ही यह स्पष्ट करने के लिए काफी है कि ये किस हद तक महिला विरोधी हैं। इस नौटंकी में मोदी सरकार सबसे आगे है। चुनाव जीतने की खातिर इसने आर जी कर मामले की पीड़िता की मां को भी बंगाल चुनाव में भाजपा के टिकट पर उतार दिया। ऐसे में ये किसी भी हद तक जाकर पाखण्ड कर सकते हैं। वैसे भी ये महिलाओं को अपने पैरों की जूती से अधिक नहीं समझते। जब ये उसे देवी का दर्जा देने, नारी वंदना की बातें भी करते हैं तो भी उनका अर्थ यही होता है कि महिलायें कभी पूर्ण बराबरी के इंसान का दर्जा हासिल न कर पायें। 

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