भारतीय दूल्हा और सर्वोच्च न्यायालय

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
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हमारा देश एक अनोखा देश है। इसकी हर चीज अनोखी है। यहां तक कि हमारे देश का अनोखापन हर जगह विराजमान है। हमारे देश के प्रधानमंत्री अनोखे हैं। हमारी संसद अनोखी है। और हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय की तो बात ही क्या है। 
    
ऐसा नहीं है कि आम जीवन, लोकजीवन अनोखा नहीं है। वह भी अनोखा है। सबसे अनोखा होता है भारतीय दूल्हा। घोड़ी पर सवार सेहरा बंधा हुआ, सूट-टाई पहना हुआ। यह भारतीय दूल्हा व शादी अनोखी है। कथित वैदिक परम्परा के साथ अति आधुनिक उपभोक्तावादी सामानों के साथ दहेज की मांग। 
    
जितना अनोखा भारतीय दूल्हा है उतना अनोखा हमारे देश का सर्वोच्च न्यायालय भी है। जैसा कौतूहल, हास्य-विनोद और उसके साथ खीज व क्षोभ भारतीय दूल्हे को देखकर होती है, वैसा ही कौतूहल, हास्य-विनोद, क्षोभ-खीज सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को देखकर होती है। आखिर क्यों हमारा भारतीय दूल्हा इतना अनोखा है और क्यों हमारा सर्वोच्च न्यायालय इतने अनोखे फैसले देता है। 
    
सर्वोच्च न्यायालय का हालिया मामला महिलाओं के हर माह होने वाले मासिक धर्म से जुड़ा है। मासिक धर्म से जुड़े एक मामले में फैसला दिया जा चुका है और एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय की एक बड़ी पीठ (नौ न्यायाधीश जिसमें मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं) में विचार हो रहा है, बहस चल रही है। एक पुराने प्रगतिशील फैसले की शव परीक्षा हो रही है। 
    
जिस मामले में फैसला दिया जा चुका है वह कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए अनिवार्य ‘मासिक धर्म अवकाश’ (पीरियड लीव) से सम्बन्धित है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर वह ऐसा फैसला देगा तो महिलाओं को नौकरी देने में नियोक्ता झिझकेंगे। उन्हें हिचकिचाहट होगी। और उनका कैरियर प्रभावित होगा। और फिर ‘यह नीतिगत मामला है’ जिसमें सरकार फैसला ले, कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया। मामला क्या है? देश में करोड़ों महिलाएं हैं जो मजदूर, सरकारी कर्मचारी और कई अन्य तरह के पेशे में हैं। मासिक धर्म के समय तीन-चार दिन का सवैतनिक अवकाश देने में भारत सरकार, राज्य सरकार स्वयं उच्चतम न्यायालय सहित पूरे पूंजीपति वर्ग को लाखों-करोड़ रुपये का नुकसान हो जायेगा। महिलाएं सस्ते श्रम का स्रोत हैं और तीन-चार दिन का अवकाश देने का मतलब होगा एक उजरती दास को इन दिनों के लिए खोना। इस फैसले ने दिखा दिया कि हमारे देश में ‘महिला सशक्तिकरण’ के नारे कितने खोखले हैं। समानता की बातें पूंजी की दहलीज पर एक पल में दम तोड़ देती हैं। 
    
अभी जिस मामले में बहस चल रही है वह भी महिलाओं खासकर मासिक धर्म के समय साबरीमाला मंदिर में प्रवेश से जुड़ा है। 
    
सितम्बर 2018 में उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की एक संवैधानिक पीठ ने 4-1 बहुमत से केरल के साबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष तक की महिलाओं (मासिक धर्म की आयुवाली) के प्रवेश पर लगी रोक को इस आधार पर खत्म कर दिया कि यह महिलाओं के ‘समानता के अधिकार, धार्मिक स्वंतत्रता और भक्ति में भेदभाव नहीं’ आदि का उल्लंघन है। अब यह मामला पुनर्विचार के लिए उस वक्त की पांच सदस्यीय पीठ के स्थान पर नौ सदस्यीय पीठ के पास पहुंच गया। इस मामले में इस वक्त की सुनवाई पर एक जज ने एक दिलचस्प टिप्पणी की कि कोई महिला तीन-चार दिन अछूत कैसे हो सकती है और फिर वह कैसे पवित्र हो सकती है। एक जज ने टिप्पणी की कि यह अदालत तय करेगी कि क्या धर्म है और क्या अंधविश्वास है। 
    
मासिक धर्म के समय वेतन सहित अवकाश देने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय कुतर्क और बहानेबाजी का सहारा ले रहा है वहीं साबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश पर प्रगतिशील कानूनों का झण्डा बुलंद कर रहा है। है न! हमारा सर्वोच्च न्यायालय कितना अनोखा है। बिल्कुल भारतीय दूल्हे की तरह अनोखा। मान लिया जाए कि इस बार भी 2018 की तरह साबरीमाला (या अन्य भेदभाव भी मस्जिद में मुसलमान महिलाओं व पारसी महिलाओं के अधिकार, महिला खतने पर पाबंदी आदि) मंदिर में अदालती फैसले से प्रवेश मिल भी जाए तो क्या हो जाएगा। 2018 के बाद जिन दो महिलाओं ने साबरीमाला में प्रवेश करने की कोशिश की उन्हें सामाजिक प्रताड़ना से लेकर पुलिस व अदालती कार्यवाहियों का सामना करना पड़ा। इस फैसले से कुछ धार्मिक आस्था वाली महिलाओं को शायद कभी जाकर फायदा मिले परन्तु यदि सर्वोच्च न्यायालय ‘मासिक धर्म’ के समय सभी कामकाजी महिलाओं व छात्राओं को अवकाश देने का फैसला देता तो करोड़़ों को लाभ होता। वैसे होना क्या है? ज्यादा उम्मीद है उच्चतम न्यायालय साबरीमाला वाले फैसले को पलटेगा। बहुमत धर्म, आस्था आदि के नाम पर वही खेल खेलेगा जो उसने पहले भी खेले हैं। अन्यथा सर्वोच्च न्यायालय साबरीमाला मामले में पुनर्विचार याचिका स्वीकार नहीं करता। हमारे देश के अनोखेपन से भला सर्वोच्च न्यायालय भी कैसे बचेगा। 
    
हमारे देश में अनोखापन कहां से आता है। यह अनोखापन दोगलेपन से आता है। और यह दोगलापन हमारी विरासत है। हमारे रोम-रोम में समाया हुआ है। और यह दोगलापन ही हमारे देश की हर चीज को, हर बात को, हर संस्था को, हर व्यक्ति को अनोखा बना देता है। 
    
और यह दोगलापन क्या है। यह दोगलापन पूंजी के हितों के प्रति असंदिग्ध निष्ठा व साथ ही मध्ययुगीन सामंती मूल्यों को जारी रखने से पैदा होता है। केन्द्र में सदा पूंजी के हित हैं। मुनाफा है। खुदगर्जी है। और लबादा ओढ़ना है सनातन का, मध्ययुगीन मूल्य-मान्यताओं का। अतीतग्रस्तता का शिकार ‘विश्वगुरू’ 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना चाहता है। 

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