महिला आरक्षण - परिसीमन और हड़बड़ी

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
/mahila-reservation-parisiman-aur-hadabadi

मोदी सरकार की कार्यशैली ही ऐसी हो गयी है कि उसे जनता को आश्चर्य में डालने व तंग करने में मजा आने लगा है। नोटबंदी, लॉकडाउन सरीखे फैसले अचानक घोषित कर सरकार ने जनता को भारी परेशानी में धकेल दिया था। अब मोदी सरकार महिला आरक्षण के मसले पर भी कुछ ऐसा ही करना चाह रही है। बीते कुछ दिनों से बंगाल-तमिलनाडु के चुनावों में लाभ की खातिर यह मुद्दा चर्चा में है और 16-18 अप्रैल को सरकार ने संसद का विशेष सत्र इसी मसले पर बुला डाला है। 
    
मोदी समाज में पूरा माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं कि सरकार तो महिला आरक्षण जल्द से जल्द लागू करना चाहती है पर विपक्ष रोड़े अटका रहा है। 2023 में जब इस संदर्भी कानून संसद में पारित हुआ तो सरकार ने खुद ही ऐसे प्रावधान कानून में शामिल कर दिये थे कि इसे 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू करना असम्भव हो जाये। तब कानून में दर्ज था कि देशव्यापी जनगणना, संसद की सीटों के परिसीमन के बाद इसे लागू किया जायेगा। 
    
अब अचानक 5 राज्यों के विधानसभाओं के चुनावों के बीच सरकार एक दिन नींद से जागती है। अगले दिन सारे प्रमुख अखबारों में प्रधानमंत्री का लेख होता है। सरकार विपक्ष के नेता से इस आरक्षण को लागू करने सम्बन्धी पत्र भेजती है। जिस पर विपक्षी नेता 5 राज्यों के चुनावों के बाद यानी 29 अप्रैल के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाने की बात करते हैं। पर सरकार भारी जल्दबाजी दिखाते हुए 16-18 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुला देती है। 
    
अब खबर आ रही है कि सरकार 2023 के महिला आरक्षण कानून में संशोधन, परिसीमन व इस आरक्षण को केन्द्र शासित राज्यों तक लागू करने संदर्भी 3 विधेयक संसद के विशेष सत्र में पेश करने की तैयारी में है। इन विधेयकों के संबंध में सरकार ने जनता ही नहीं विपक्ष को भी कोई जानकारी नहीं दी है और सरकार संसद के पटल पर इन्हें पेश कर सबको आश्चर्य में डालना चाहती है। मीडिया वालों से लेकर विपक्ष अब सरकार के इस विशेष सत्र के पीछे की मंशा पर कयास लगाने में जुटा है। कोई कह रहा है कि मोदी 2027 के उ.प्र. चुनावों से महिला आरक्षण लागू करना चाह रहे हैं। तो कोई इसे 2029 के लोकसभा चुनावों से लागू करने की बात कर रहा है। 
    
बहुत संभव है कि सरकार जनगणना के नतीजों का इंतजार किये बगैर परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने लगे। सरकार लोकसभा की सीटें 545 से बढ़ाकर 816 करना चाह रही है। जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों के होने के चलते इस परिसीमन में जनसंख्या वृद्धि में अग्रणी उत्तर भारत के राज्यों की सीटें बढ़ेंगी व दक्षिण भारत के राज्यों की हैसियत सापेक्षिक तौर पर कमजोर होगी। परिणामतः देश के संघीय ढांचे पर नई बहस खड़ी होगी। 
    
जहां तक चुनावों के बीच मोदी सरकार की इस कवायद का प्रश्न है तो स्पष्ट तौर पर बंगाल-तमिलनाडु में इस पर लाभ बटोरने की कवायद मोदी सरकार की नजर आती है। 
    
सत्ता-विपक्ष की चालों के बीच महिला आरक्षण का मुद्दा 30-35 वर्षों से लटकाया जा रहा है। हर कोई खुद को इसका समर्थक दिखाते हुए भी इसको टालने पर उतारू रहा है। खुद मोदी सरकार 2023 में कानून पारित कर 2029 से पहले उसे लागू करने को तैयार नहीं थी। अब अचानक इनको इसे लागू करने का दिखावा करने की सूझ पड़ी है।
    
सरकार की मंशा क्या है? यह ज्यादा खुलकर तो संसद सत्र के दौरान ही सामने आयेगा। इतना तो तय है कि संघ-भाजपा इस कवायद के पीछे भी अपने किन्हीं हितों को देखने से बाज नहीं आयेंगे। जहां तक नीयत की बात है तो महिला विरोधी होने के मामलों में ये संसद में अग्रणी रहे हैं। इनके तमाम नेता बलात्कार के आरोपी हैं। खुद प्रधानमंत्री तक पर महिला उत्पीड़न के आरोप लग चुके हैं। ऐसे में ये अगर महिला आरक्षण लागू कर संसद-विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना चाह रहे हैं तो इसके पीछे महिलाओं की आजादी-भागीदारी से इनके घृणित मंसूबे ही अधिक छिपे हैं। 
    
वैसे एक अनुमान यह भी लगाया जा रहा है कि 2024 के चुनावों में अपनी बुरी गत से अधिक बुरी गत 2029 के चुनावों में होने का इन्हें भय सताने लगा है। ऐसे में चुनाव आयोग के साथ सीटों का नये सिरे से परिसीमन कुछ इस तरह से करने की ये साजिश रच सकते हैं कि भाजपा लाभ की स्थिति में रहे। साथ ही ये इस गलतफहमी का भी शिकार हैं कि महिलायें 5 किलो राशन के चलते इनकी अधिक समर्थक हैं। ऐसे में महिला आरक्षण के जरिये भी ये 2029 में अपनी गद्दी किसी तरह बचाने को उत्सुक लग रहे हैं।
    
खैर वजह कुछ भी हो, देखने की बात यह होगी कि महिला आरक्षण के सत्ता व विपक्ष की खींचातानी में इस बार भी लागू होने की राह खुलती है या फिर इसे फिर से भविष्य के हवाले कर दिया जाता है। 
    
महिला आंदोलन की लम्बे समय से महिला आरक्षण की मांग रही है। इस मांग के व्यवहारतः लागू हो जाने से ही महिला आबादी को यह स्पष्ट होगा कि उनकी बदहाली-दोयम दर्जे की स्थिति किन्हीं आरक्षण के अभाव से नहीं बल्कि मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था के चलते है। इसीलिए महिला आरक्षण की मांग का समर्थन किया जाना चाहिए। साथ ही घोर महिला विरोधी संघ-भाजपा के खुद को महिला हितैषी दिखाने के पाखण्ड का पर्दाफाश जरूरी है। 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?