....विगत 2 अप्रैल से गुड़गांव के मानेसर औद्योगिक क्षेत्र में होंडा कंपनी के ठेका मजदूरों से शुरू हुई मजदूरों की स्वतः स्फूर्त हड़तालें और प्रदर्शन मानेसर की अनेकों कंपनियों- मुंजाल शोवा, सत्यम आटो, रूप पालिमर्स, माडलेमा, रिचको, रिचा ग्लोबल, प्रिकोल, फोर्जा, सरिता हांडा, सिरमा एस जी एस इत्यादि को अपनी चपेट में लेते हुये अब नोएडा की दर्जनों कंपनियों एवं फरीदाबाद, पानीपत, भिवाड़ी तक पहुंचकर पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में एक लहर बन चुके हैं। मजदूरों की मांग सभी जगह सीधी सी है कि उनका वेतन बढ़ाया जाये और ओवर टाइम का कानूनन डबल भुगतान किया जाये। गौरतलब है कि यहां सभी जगहों पर सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम वेतन असल में इतना कम है कि उसे भुखमरी वेतन की ही संज्ञा दी जा सकती है; और उसे भी फैक्टरी मालिक अथवा पूंजीपति देने को तैयार नहीं हैं। ओवर टाइम का कानूनन डबल भुगतान करने के बजाय सिंगल और उससे भी कम भुगतान एकदम आम है। इसी तरह स्थायी प्रकृति के कामों पर गैर कानूनी तरीके से ठेके के तहत मजदूरों को नियोजित कर उनका भयंकर शोषण भी एकदम आम है। हमारे देश की केंद्र सरकार हो या विभिन्न राज्य सरकारें एवं श्रम विभाग के अफसर, इस बड़े पैमाने के गैर कानूनी श्रम अभ्यास (Unfair Labour Practice) से न सिर्फ भली-भांति वाकिफ हैं, बल्कि उन्हीं के संरक्षण में यह सब गोरखधंधा चल रहा है। देशी-विदेशी पूंजीपति मजदूरों का पसीना ही नहीं खून भी निचोड़कर बेशुमार मुनाफा कमा रहे हैं।
आखिर मजदूर सड़कों पर उतरने को क्यों मजबूर हुये?
असल में हरियाणा में पिछले 10 सालों से वेतनमान रिवाइज नहीं हुआ था। हरियाणा सरकार को 2020 में नये वेतनमान की घोषणा करनी थी जो कि उसने नहीं की। 2 मार्च, 2026 को बजट सत्र के दौरान महज 15,220 रु. प्रतिमाह न्यूनतम वेतन की घोषणा की गई। लेकिन इसका भी कोई नोटिफिकेशन नहीं जारी किया गया।
ऐसे में पहले से भयंकर महंगाई और 10-12 हजार रु. का वेतन, और फिर अमेरिका-इजराइल के ईरान के साथ युद्ध के बाद गैस की किल्लत और उसके बेतहाशा बढ़ते दामों से अब मजदूरों का धैर्य जबाव दे गया और एक के बाद दूसरी कंपनियों के ठेका मजदूर सड़कों पर आने शुरू हो गये। ......
9 अप्रैल को आखिर क्या हुआ?
मजदूरों के इन शांतिपूर्ण रूप से जारी प्रदर्शनों के दौरान 9 अप्रैल को विभिन्न कंपनी प्रबंधन से जुड़े लोगों और पुलिस-प्रशासन ने भाड़े के गुंडों की मदद से तोड़फोड़-आगजनी कर आंदोलन में अराजकता पैदा की; और पुलिस ने मौके का फायदा उठाकर मजदूरों पर लाठीचार्ज कर दिया, जिसमें बड़ी संख्या में मजदूर घायल हुये। इस दौरान पुरुष पुलिसकर्मियों ने खुलेआम महिला मजदूरों पर भी लाठियां भांजी। पुलिस ने 56 मजदूरों को गिरफ्तार कर लिया जिसमें से 20 महिला मजदूर हैं। इस दिन पुलिस ने दो एफ आई आर दर्ज कीं। पहली, माडलेम कंपनी के एच आर की ओर से 45 मजदूरों पर और दूसरी, रिचा ग्लोबल के एच आर की ओर से 11 मजदूरों पर। दोनों ही एफ आई आर में मजदूरों पर सरकारी काम में व्यवधान डालने, अवैध सभा करने, षड्यंत्र करने, बलवा-दंगा करने इत्यादि धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। जबकि दूसरी एफ आई आर के तहत 11 मजदूरों पर आगजनी और हत्या के प्रयास के तहत भी मुकदमा दर्ज किया गया है।
कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां
9 अप्रैल को पुलिस द्वारा इंकलाबी मजदूर केंद्र के श्यामवीर, अजीत और हरीश को रात को उनके कमरे से उठा लिया। इससे पूर्व 7 अप्रैल को भी इंकलाबी मजदूर केंद्र के राजू, हरीश, विकास और आकाश को धरना स्थल और श्यामवीर व अजीत को रात को उनके कमरे से उठा लिया गया था। उनसे जोर-जबरदस्ती अनुबंधों पर दस्तखत करवाये गये। दोनों ही बार उन्हें देर रात छोड़ा गया। इसके बाद 12 अप्रैल की देर रात बारह-एक बजे के करीब पुलिस ने इंकलाबी मजदूर केंद्र के श्यामवीर, अजीत, पिंटू यादव, हरीश, राजू और आकाश एवं सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन लाल को उठा लिया। इनमें अजीत और पिंटू यादव मानेसर में मारुति सुजुकी की वेंडर बेलसोनिका कंपनी के निष्कासित मजदूर हैं, जिनका मामला अन्य निष्काषित और निलंबित मजदूरों के साथ कोर्ट में विचाराधीन है। जबकि आकाश मुंजाल शोवा के मजदूरों के प्रतिनिधि हैं। श्यामवीर पिछले लंबे समय से औद्योगिक क्षेत्र में कई कंपनियों के कानूनी सलाहकार की हैसियत से काम कर रहे हैं जिन्हें फैक्टरी यूनियनों से लेकर विभिन्न मजदूर संगठनों के नेता भली-भांति जानते हैं। इसी तरह हरीश और राजू भी इंकलाबी मजदूर केंद्र के कार्यकर्ता हैं और जो मजदूरों को संगठित करने से लेकर उनकी कानूनी मदद भी करते हैं। इन कार्यकर्ताओं को ‘बाहरी तत्व’ बताकर बदनाम किया जा रहा है जबकि पुलिस-प्रशासन गुड़गांव में इन सभी के रहने की जगहों से भी भली-भांति वाकिफ है। इसीलिये पुलिस द्वारा इन्हें बार-बार इनकी रिहाईश से ही उठाया गया है। इनमें अजीत बेलसोनिका यूनियन के महामंत्री भी हैं। गौरतलब है कि बेलसोनिका मानेसर की वही यूनियन है जिसके द्वारा ठेका मजदूर को यूनियन की सदस्यता देने पर प्रबंधन के इशारे पर ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार द्वारा एकदम गैर कानूनी तरीके से यूनियन का पंजीकरण खारिज कर दिया गया था। रजिस्ट्रार महोदय की मानें तो ठेका मजदूरों को संविधान द्वारा प्रदत्त संगठित होने का अधिकार नहीं है। क्या वे देश के नागरिक नहीं हैं?
पुलिस ने इंकलाबी मजदूर केंद्र के 6 कार्यकर्ताओं श्यामवीर, अजीत, पिंटू यादव, हरीश, राजू और आकाश पर 9 अप्रैल की घटना के साजिशकर्ता का आरोप मढ़कर उन पर बलवा-दंगा भड़काने, आगजनी, आपराधिक षड्यंत्र और हत्या के प्रयास जैसी संगीन धाराओं में फर्जी मुकदमे कायम कर दिये हैं; और उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भोंडसी जेल भेज दिया है। जबकि 7 और 9 अप्रैल को इन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने इनके फोन और व्हाट्सएप ग्रुप सभी को खंगाला था, लेकिन कुछ भी आपत्तिजनक न मिलने पर दोनों बार पुलिस को इनको छोड़ना पड़ा था। ऐसे में अब पुलिस द्वारा इनको साजिशकर्ता बताना स्पष्ट दर्शा रहा है कि असल में साजिश कौन कर रहा है।
इतना ही नहीं गुड़गांव पुलिस की अपराध शाखा ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इन कार्यकर्ताओं पर पेट्रोल बम से कंपनियों को जलाने की कोशिश जैसे अनेकों मनगढंत आरोप लगाकर सनसनी भी पैदा करने की कोशिश की। कार्यकर्ताओं का मीडिया ट्रायल शुरू कर दिया गया। दैनिक भास्कर में ‘‘मजदूर यूनियन रिचा हसवइंस 407“ नामक कथित व्हाट्सएप ग्रुप के स्क्रीन शॉट के साथ पुलिस की मनगढंत कहानी को जस का तस छाप दिया गया। असल में पुलिस-प्रशासन द्वारा इंकलाबी मजदूर केंद्र के कार्यकर्ताओं को साजिशन फंसाया जा रहा है। यहां यह रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि मानेसर की मारुति सुजुकी में प्रबंधन द्वारा रचे गये 18 जुलाई, 2012 के कांड में भी मजदूरों एवं मजदूर नेताओं पर साजिश के फर्जी आरोप लगाकर उन्हें सालों जेलों में सड़ाया गया है।
इसके अलावा गुड़गांव-मानेसर पुलिस द्वारा इंकलाबी मजदूर केंद्र के केंद्रीय अध्यक्ष खीमानंद को भी रात के समय फोन कर धमकाया गया। गुड़गांव-मानेसर में एक अन्य यूनियन के कार्यकर्ताओं को भी दो बार गिरफ्तार कर देर रात छोड़ा गया। नोएडा में भी 4 मजदूर कार्यकर्ताओं को उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा उठा लिया गया। जब उनके दो वकील और कुछ साथी सूरजपुर कोर्ट पहुंचे तो योगी की पुलिस ने मारपीट करते हुये उन्हें भी उठा लिया। साथ ही, सीटू के नेताओं जय भगवान और विनोद को फेसबुक पर भड़काऊ भाषण का आरोप लगाकर नोटिस जारी कर दिया गया। एक्टू के गौतमबुद्ध नगर जिला अध्यक्ष अमर सिंह और कई यूनियन नेताओं को घर में नजरबंद कर दिया गया। लखनऊ में 3 कार्यकर्ताओं एवं पत्रकारों को हिरासत में ले लिया गया। सभी पर मजदूरों को भड़काने का आरोप लगाकर उनका उत्पीड़न और दमन किया जा रहा है। गुड़गांव का एक आला अधिकारी तो खुलेआम घोषणा कर रहा है कि मजदूर संगठनों को मजदूरों को संगठित नहीं करने दिया जायेगा। स्पष्ट है कि देशी-विदेशी पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने की खातिर एक ओर 4 नये लेबर कोड़ लागू कर मजदूरों को गुलामी की नई बेड़ियों में जकड़ा जा रहा है, और दूसरी ओर मजदूरों की संगठित ताकत अर्थात यूनियनों एवं मजदूर संगठनों, उनके नेताओं-कार्यकर्ताओं एवं शुभेच्छुओं को साजिशन फर्जी मुकदमे लगाकर, उन्हें जेल भेजकर दबाने की कोशिशें की जा रही हैं।
ऐसे में जरूरत है कि व्यापक एकजुटता कायम कर इस फासीवादी दमन चक्र का विरोध किया जाये। आज जब कोर्ट तक ‘‘ट्रम्पियन दुनिया’’ का हवाला दे रही हो और एक के बाद दूसरे मजदूर विरोधी फैसले आ रहे हों, तब मजदूरों एवं अन्य मेहनतकशों की व्यापक एकजुटता और संघर्ष ही इंसाफ पाने का एकमात्र रास्ता बचता है।....... (इंकलाबी मजदूर केन्द्र के बयान का अंश)