पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमरीका-ईरान समझौता वार्ता असफल हो गयी है। इस वार्ता से पहले 40 दिन तक अमरीकी-इजरायली हमलों में ईरान में व्यापक तबाही हुई है। इस युद्ध में ईरान के सर्वोच्च नेता समेत कई शीर्ष सैन्य नेताओं और सैकड़ों स्कूली बच्चों, 2 हजार से अधिक नागरिकों की हत्या कर दी गयी। ईरान के औद्योगिक संयंत्रों व नागरिक ठिकानों, स्कूलों, अस्पतालों और अवरचना की भारी तबाही करने के बावजूद अमेरिकी साम्राज्यवादी ईरान की सत्ता को बेदखल नहीं कर सके। बल्कि ईरानी सशस्त्र बलों ने इस क्षेत्र में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डों और इजरायली ठिकानों को मिसाइलों और ड्रोनों के हमलों के जरिए बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया। इससे आगे बढ़कर ईरानी हुकूमत ने होरमुज जलडमरूमध्य के समुद्री परिवहन रास्ते को बंद कर दिया। इससे तेल और गैस की आपूर्ति की ही नहीं बल्कि खाद और अन्य उद्योगों के लिए सामग्री का विश्वव्यापी संकट खड़ा होने लगा। इससे मजबूर होकर अमरीकी साम्राज्यवादी 14 दिनी युद्ध विराम करने को मजबूर हो गये और उन्होंने पाकिस्तानी मध्यस्थता में समझौता वार्ता करने की योजना बनायी।
इस 14 दिनी युद्ध विराम की घोषणा होने से पहले अमरीकी साम्राज्यवादी पहले 48 घण्टे, फिर 5 दिन और फिर 10 दिन के अंदर ईरान को आत्मसमर्पण करने और होरमुज जलडमरूमध्य को पूर्णतया खोलने की धमकी दे चुके थे। अमरीकी साम्राज्यवादी ईरान को धरती से मिटा देने, उसे पाषाण युग में पहुंचा देने और उसकी सभ्यता को नष्ट कर देने की धमकी दे रहे थे। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान के समक्ष अपनी 15 सूत्रीय मांगें रखीं थीं। इसे ईरान ने पूर्णतया रद्द कर दिया। इसके जवाब में ईरान ने अपना 10 सूत्रीय प्रस्ताव रखा। इसी प्रस्ताव को अमरीकी साम्राज्यवादी समझौता वार्ता के लिए आधार मानने के लिए सहमत हुए। इस 10 सूत्रीय ईरानी प्रस्ताव में होरमुज की खाड़ी के प्रबंधन में ईरान की अहम भूमिका, इस पर टोल टैक्स वसूलने का ईरानी अधिकार, युद्ध विराम लेबनान सहित समूचे क्षेत्र में लागू करने, ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध पूर्णतया हटाने, ईरान के अरबों डालर की विभिन्न बैंकों में जमाराशि को मुक्त करने, आणविक शक्ति के संवर्धन के उसके अधिकार को स्वीकार करने तथा इस क्षणिक युद्धविराम को स्थायी शांति की ओर ले जाने और इसकी गारण्टी करने कि आगे ईरान पर कोई हमला न हो सके आदि बातें शामिल थीं। इसके साथ ही समूचे पश्चिम एशिया से अमरीकी फौजी अड्डों को हटाने और उसके स्थान पर क्षेत्रीय देशों की सामूहिक सुरक्षा प्रणाली लागू करने की बात की गयी थी। ट्रम्प द्वारा वार्ता हेतु इसे स्वीकार करने के बावजूद इजरायल ने उसी दिन लेबनान में भयंकर बमबारी कर दी। उसने बेरूत शहर के नागरिक इलाकों सहित दक्षिणी लेबनान के इलाकों में सैकड़ों नागरिकों की हत्या और हजारों को घायल कर दिया। बहुत सारी इमारतों को नेस्तनाबूद कर दिया। लाखों लोगों को अपना घर व इलाका छोड़ने को मजबूर कर दिया गया। यह सब यहूदी नस्लवादी नेतन्याहू की सरकार ने यह कहकर किया कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है। इसके बाद ट्रम्प ने भी यह कहना शुरू कर दिया कि लेबनान उस 10 सूत्रीय समझौता वार्ता प्रस्ताव का हिस्सा नहीं है। ईरान की हुकूमत ने विरोधस्वरूप समझौता वार्ता में तब तक हिस्सा लेने से मना कर दिया जब तक लेबनान में इजरायली हमले रुक नहीं जाते।
यह समझौता वार्ता ऐसी पृष्ठभूमि में शुरू हुयी जिसमें ईरान को अमरीकी साम्राज्यवादियों पर अपनी बातों पर टिके रहने पर कोई विश्वास नहीं रहा है। इसके पहले ओमान की मध्यस्थता में वार्ता चल ही रही थी, तब जून 2025 में इजरायल के साथ मिलकर अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान पर हमला कर दिया था। इस बार भी जब वार्ता चल रही थी, तभी इजरायल-अमरीका ने मिलकर ईरान पर अचानक हमला कर दिया और 40 दिनों तक युद्ध चला। अतः ईरान को अमरीकी साम्राज्यवादियों पर कोई विश्वास नहीं था। फिर भी वे वार्ता में शामिल हुए। वे इस समझौता वार्ता में शामिल होने का कारण यह बताते हैं कि वे अमरीकी साम्राज्यवादियों को यह कहने का मौका नहीं देना चाहते कि वे यह दिखावा कर सकें कि अमरीकी तो समझौता करना चाहते हैं लेकिन यह ईरान की सत्ता है जो युद्ध भड़का रही है। दूसरे, होरमुज जलडमरूमध्य के समुद्री रास्ते के बंद होने से वैश्विक पैमाने पर आर्थिक संकट गहरा गया है, इसे दूर करने के लिए ईरान इसके प्रबंधन का रास्ता तलाशने और उस पर अमल करने के लिए तैयार है। ईरान यह संदेश दुनिया भर के देशों को देना चाहता है। इसलिए समझौता वार्ता में शामिल हुआ।
लेकिन ईरान ने समझौता वार्ता शुरू होने से पहले यह मांग की कि ईरान की विभिन्न विदेशी बैंकों में जब्त जमाराशि मुक्त की जाए और लेबनान में इजरायली हमले बंद हों। यह समझौता वार्ता शुरू करने की पूर्वशर्त थी। पहली मांग पर सहमति बताई गयी। दूसरी मांग पर यह कहा गया कि इजरायल लेबनान के साथ अलग से समझौता वार्ता करेगा और यह वार्ता हिजबुल्ला के निरस्त्रीकरण से सम्बन्धित होगी। इजरायल दक्षिणी लेबनान पर हमले जारी रखेगा, बाकी लेबनान पर इजरायल ने हमला रोक दिया है।
इसके बावजूद वार्ता शुरू हुई। इधर इस्लामाबाद में वार्ताकार वार्ता कर रहे थे और उधर अमरीका में ट्रम्प लगातार यह बोले जा रहे थे कि अमरीका यह युद्ध जीत गया है। ईरान के पास कुछ नहीं बचा है, कि ईरानी नेतृत्व इसलिए बचा हुआ है ताकि वह वार्ता में बैठ सके। अमरीकी साम्राज्यवादी सरगना यह भी घोषणा कर रहा था कि अमरीका के पास सबसे ज्यादा और सबसे अच्छा तेल है। उसने यह भी कहा कि अमरीका की ओर दो खाली टैंकर तेल लेने आ रहे हैं। बीच-बीच में वह यह भी घोषित कर रहा था कि होरमुज जलडमरूमध्य के रास्ते की अमरीका को जरूरत नहीं है। उसके पास वैकल्पिक रास्ते हैं। इस रास्ते की जरूरत अन्य देशों को है, तो उन्हें इसे खुलवाने के प्रयास करना चाहिए।
अमरीकी साम्राज्यवादियों के सरगना की परस्पर विरोधी बातों और दावों की इतनी भरमार है कि न तो अमरीकी साम्राज्यवादियों के सहयोगी और न ही विरोधी, कोई उसकी बातों या दावों का भरोसा नहीं करता। उसने कभी नाटो देशों और यूरोपीय संघ को कायर और कागजी शेर कहा तो कभी उनको अहसान फरामोश बताया। इससे वह नाटो और यूरोपीय संघ के देशों के साथ एक हद तक विरोध में आ गया। नाटो के देश अभी अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ बने इस गठबंधन से अलग नहीं हुए हैं, लेकिन ईरान पर हमले के मामले में कई यूरोपीय देश अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ नहीं हैं। कई देशों ने इस युद्ध में अपने देश के हवाई अड्डों का इस्तेमाल करने से अमरीकी साम्राज्यवादियों को साफ-साफ मना कर दिया है।
जहां तक खाड़़ी देशों का ताल्लुक है, वे लम्बे समय से अमरीकी साम्राज्यवादियों के सुरक्षा कवच के भरोसे थे। दूसरे वे पेट्रोडालर के जरिये अमरीकी साम्राज्यवादियों की वित्तीय प्रणाली को मजबूत कर रहे थे और अमरीकी साम्राज्यवादियों के बाजार में निवेश करके उनको लाभ पहुंचा रहे थे। इस युद्ध ने अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा दिये गये सुरक्षा कवच के ढांचे को अत्यधिक कमजोर कर दिया। इन देशों में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डे ईरान की मिसाइल और ड्रोन हमलों का शिकार हुए। इन अड्डों की राडार प्रणाली को ईरानी मिसाइलों ने ध्वस्त कर दिया। इसके अतिरिक्त इन देशों में अमरीकी परिसम्पत्तियों को ईरान ने नुकसान पहुंचाया। इनके तेल और गैस संयंत्रों को नुकसान पहुंचाया। इस कारण, अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा दिये गये सुरक्षा कवच पर इनका विश्वास डगमगा गया है। ये अमरीकी सुरक्षा कवच की वजह से ही ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के हमलों का शिकार बनते रहे हैं। इसलिए अपनी सुरक्षा के सम्बन्ध में ये वैकल्पिक रास्तों के बारे में ये सोचने लगे हैं। इसी प्रकार, ईरान ने यह भी धमकी दी है कि युद्ध जारी रहने की स्थिति में वह यमन के पास बाब-अल मंदेब गलियारे को भी बंद कर देगा। यदि बाब अल मंदेब बंद हो जाएगा तो लाल सागर से होकर गुजरने वाला समुद्री रास्ता बंद हो जायेगा। यदि होरमुज जलडमरूमध्य और बाब अल मंदेब दोनों समुद्री रास्ते बंद हो जायें तो विश्व व्यापार का करीब 40-50 प्रतिशत अवरुद्ध हो जायेगा। इससे साऊदी अरब और अन्य अरब देशों के तेल और गैस की निकासी पूर्णतया बंद हो जायेगी। इसके अतिरिक्त, ईरान होरमुज की खाड़ी से सभी जहाजों को, सिवाय अमरीका और इजरायल के, निकलने दे रहा है और प्रत्येक कन्टेनर जहाज से 20 लाख डालर ले रहा है। अभी वह टोल चीनी मुद्रा युवान में ले रहा था। अभी उसने घोषणा की है कि वह अब टोल अपनी मुद्रा रियाल में या क्रिप्टोकरेंसी में लेगा।
ईरान के इस फैसले से डालर की प्रभुत्वशील स्थिति में गिरावट आ सकती है। दुनिया के अलग-अलग देश ईरान की हुकूमत के साथ होरमुज के रास्ते उनके जहाजों को निकलने के बारे में अलग-अलग समझौता कर रहे हैं। डालर के प्रभुत्व को कमजोर करने की ईरानी कोशिशों का भी असर पड़ रहा है। इससे खाड़़ी के देशों को भी यह सोचने के लिए विवश होना पड़ रहा है कि वे अपने व्यापार को अन्य मुद्राओं में करने की ओर जाए। यह समूची स्थिति, पश्चिम एशिया में इन खाड़ी देशों को नये समीकरण बनाने की ओर धकेल रही है।
ऐसा प्रतीत होता है कि इस युद्ध विराम के असफल होने के बाद, ईरान इजरायल के विरुद्ध मिसाइलों व ड्रोनों का बड़ा हमला कर सकता है। यह हिजबुल्ला पर, दक्षिणी लेबनान के इलाके के इजरायली हमलों के जवाब में होगा। यदि अमरीकी साम्राज्यवादी इजरायल के समर्थन में ईरान पर हमला करते हैं तो यह अमरीकी और ईरानी चौतरफा युद्ध में तब्दील हो जायेगा। इसके अतिरिक्त, अमरीकी साम्राज्यवादी होरमुज डमरूमध्य के समुद्री रास्ते को पुरानी स्थिति में खुले रास्ते के बतौर, यानी 28 फरवरी की पहले की स्थिति में, लाने के लिए ईरानी सेना पर हमला कर सकते हैं, इससे भी अमरीका-ईरान युद्ध भड़क सकता है। वे इस बहाने भी फिर से हमला कर सकते हैं कि ईरान परमाणु संवर्धन करके बम बनाने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन यह सब करने के लिए, इस समय ट्रम्प घरेलू स्तर पर भी घिरे हुए हैं। अमरीकी मजदूर-मेहनतकश आबादी तो व्यापक तौर पर ईरान पर हमले के विरोध में है। इसके अतिरिक्त, शासक वर्ग के एक बड़े दायरे में भी यह बात सामने आ रही है कि अमरीका अपनी लड़ाई नहीं बल्कि इजरायल की लड़ाई लड़ रहा है। इससे ‘अमरीका को फिर से महान बनाओ’ के ट्रम्प समर्थक भी एक हद तक विरोध में आ रहे हैं। इसी प्रकार, अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर यूरोप के देशों से इस मामले में ट्रम्प अलगाव में जा रहे हैं और खाड़ी देशों का भी अमरीका पर विश्वास कमजोर होता जा रहा है।
इस संदर्भ में रूस, चीन और ईरान का एक गठबंधन मजबूत होता जा रहा है। चूंकि ईरान ब्रिक्स और शंघाई सहकार संगठन का सदस्य है, इसीलिए न सिर्फ रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों के प्रभाव में ईरान है बल्कि ब्रिक्स और शंघाई सहकार संगठन के सदस्य के बतौर विभिन्न एशियाई और अफ्रीकी देशों के साथ उसकी एकजुटता बढ़ रही है। समूची दुनिया में ईरान के प्रति हमदर्दी के साथ दुनिया की सबसे बड़ी सैनिक, आर्थिक और राजनीतिक ताकत के विरुद्ध उसके वीरतापूर्ण संघर्षों को दुनिया के लोग एक प्रेरणा स्रोत के रूप में भी देख रहे हैं। ईरान की हुकूमत ने गाजा और पश्चिमी तट के फिलिस्तीनियों की आजादी के प्रश्न को, उनके वीरतापूर्ण संघर्षों को दुनिया के समक्ष मजबूती के साथ पेश कर दिया है। अब फिलिस्तीन की आजादी का प्रश्न फिर से मुखर होकर सामने आ गया है। इस 40 दिनी युद्ध ने इजरायल की वृहत्तर इजरायल की योजना और ट्रम्प की गाजा शांति योजना को काफी हद तक फिलहाल के लिए पीछे धकेल दिया है।
अब अमरीकी साम्राज्यवादियों के सामने इस युद्ध को व्यापक बनाने का रास्ता अत्यन्त जोखिम भरा है। ऐसी स्थिति में तो और भी जब नवम्बर में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं।
लेकिन इसके बावजूद, अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी रणनीतिक पराजय स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। यदि इसे वह स्वीकार कर लें तो उसकी धौंसपट्टी, हमले, हुकूमत परिवर्तन की सारी कोशिशों पर पलीता लग सकता है? वैसे भी दुनिया भर में उसकी साख गिर रही है और प्रभाव भी कमजोर होता जा रहा है।
क्या अमरीकी साम्राज्यवादी इसे फिर से बहाल करने के लिए व्यापक युद्ध की ओर जा सकते हैं? यदि वे उधर गये तो उनका पराभव और ज्यादा तेजी से होगा।