केन-बेतवा लिंक परियोजना: संघर्षरत आदिवासियों का दमन

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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बुंदेलखण्ड के आदिवासी केन व बेतवा नदी को जोड़ने वाली परियोजना के खिलाफ संघर्षरत हैं। इस परियोजना के तहत बनने वाले दैढ़न बांध में इन आदिवासियों का समूचा रिहाईश क्षेत्र डूब जाना है। आदिवासी बगैर सहमति उन्हें उजाड़े जाने के सरकारी प्रयासों के खिलाफ संघर्षरत हैं। साथ ही पुनर्वास योजना का लाभ किसे मिलेगा व किसे नहीं, इसके प्रति आशंकित हैं। 
    
संघर्ष के रूप के बतौर आदिवासियों ने पहले जल सत्याग्रह कर लम्बे समय तक पानी में खड़े रहने का काम किया। फिर उन्होंने अपनी चिताएं तैयार कर उस पर लेट कर चिता सत्याग्रह किया। अंत में फांसी सत्याग्रह के तहत गले में फांसी का फंदा डाल खड़े हो वे सरकार से इच्छा मृत्यु की मांग करने लगे। 19 जुलाई को पुलिस-प्रशासन ने बर्बरता के साथ आंदोलन को कुचलने के लिए धावा बोल दिया। ढेरों आदिवासियों व नेताओं को गिरफ्तार कर सरकार ने अपना असली दमनकारी चेहरा जगजाहिर कर दिया। इस संघर्ष की प्रक्रिया में उ.प्र. व म.प्र. सरकार 40 से अधिक मुकदमे आदिवासियों पर थोप चुकी है। 
    
दरअसल केन-बेतवा लिंक परियोजना देश में 37 नदियों को जोड़ने की प्रक्रिया की पहली कड़ी है। 45,000 करोड़ रु. की इस परियोजना के तहत बुंदेलखण्ड का फेफड़ा कहा जाने वाला पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा बांध में डूब जायेगा। जंगल का करीब 5578 हेक्टेयर हिस्सा जलमग्न हो जायेगा। इसी प्रक्रिया में कटने वाले 45 लाख पेड़ों का पर्यावरणीय प्रभाव 20 प्रतिशत बारिश घटने व तापमान बढ़ने के रूप में सामने आयेगा। ऐसे में पहले से गर्मी-सूखे की मार झेलता बुंदेलखण्ड और आपदा झेलने को मजबूर होगा। 
    
इस परियोजना पर इसलिए भी प्रश्न उठते रहे हैं कि केन नदी गर्मियों में सूख जाती रही है तो प्रस्तावित बांध में पानी कैसे आयेगा यह भी पता नहीं है। सरकार ने संविधान की छठी अनुसूची में आने वाले आदिवासी क्षेत्र में जमीन हस्तांतरण हेतु ग्रामसभा की मंजूरी के प्रावधान का भी पालन नहीं किया। बल्कि फर्जी हस्ताक्षरों से कागजों की खानापूरी कर ली। कई जगहों पर तो आदिवासियों को खदेड़ पहले दिया गया और जनसुनवाई बाद में की गयी। कुछ आदिवासी पुनर्वास पूरी तरह करने के बाद परियोजना का काम आगे बढ़ाने की बात करते रहे हैं। कहने को 450 करोड़ का पुनर्वास पैकेज घोषित किया गया है पर ढेरों लोगों को अभी तक एक रु. भी मुआवजा नहीं मिला है। 
    
आदिवासियों को सामान्य नागरिक भी न समझने का सरकारी रुख बार-बार आदिवासियों को संघर्ष के लिए मजबूर करता रहा है। बुंदेलखण्ड के आदिवासी भी दमन-मुकदमे झेलने के बावजूद संघर्ष का झण्डा उठाये हुए हैं। 

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