चीनी घुसपैठ पर पर्दा डालती मोदी सरकार

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आई टी बी पी) के महानिदेशक के एक भाषण के बाद से भारत-चीन सीमा विवाद एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। 2020 में गलवान में दोनों देशों की सेनाओं की झड़पों में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गयी थी। भारत सरकार उस समय से लेकर आज तक लगातार भारतीय सीमा में चीनी घुसपैठ की खबरों को नकारती रही है। गलवान की घटना के बाद सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने वह मशहूर बयान दिया था कि ‘न कोई सीमा में घुस आया है न कोई घुसा हुआ है’। 
    
इस वर्ष जुलाई माह से ही अरुणाचल प्रदेश की सीमा में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबरें आ रही थीं। अरुणाचल प्रदेश के कई स्थानीय यूट्यूबरों ने इस संबंध में वीडियो बनाकर प्रसारित किये थे। लेकिन सरकार और संसदीय कार्य मंत्री  किरण रिजजू (जो कि अरुणाचल प्रदेश से सांसद भी हैं) ने इन सभी खबरों को बेबुनियाद बताया। 
    
अब भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर के अलवर में अपने जवानों को संबोधित करते हुए दिये गये भाषण के बाद एक सवाल हवा में तैरने लगा है कि नरेन्द्र मोदी की 56 इंच की सरकार चीनी घुसपैठ को छिपाना क्यों चाह रही है। 
    
शत्रुजीत कपूर ने अपने भाषण में कहा, ‘‘अभी पीछे एक ....अरुणाचल के अंदर परिस्थितियां ऐसी बनीं कि कई जगहों पर ‘फेस आफ’ (आमना-सामना) हुआ..चीन का मुकाबला हम शायद जो परम्परागत तरीके हैं, उनसे करना अब शायद कठिन हो। क्योंकि उनकी जो पी एल ए और मीडिया की जो परंपरागत....जो भी उनकी कैपेबिलिटी (क्षमता) है वो उन्होंने उसमें बहुत इंवेस्ट भी किया है और बहुत मोर्डनाइजेशन (आधुनिकीकरण) भी...बहुत आगे निकल गये वो।’’ महानिदेशक कपूर ये सारी चीजें कहते हुए अपने बल के लिए ड्रोन की महत्ता को स्थापित करने के लिए कह रहे थे। 
    
महानिदेशक कपूर के भाषण के सार्वजनिक होने के बाद जब हर तरफ हल्ला कटना शुरू हुआ तो विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बयान दिया। इस बयान में उनकी पूरी कोशिश थी कि यह मामला ज्यादा गंभीर न लगे। झड़पों के बारे में कोई विस्तृत जानकारी उन्होंने नहीं दी और इसके लिए रक्षा मंत्रालय के पाले में गेंद डाल दी। झड़पों को उन्होंने पैट्रोलिंग (गश्त) के सामान्य तरीकों से विचलन के रूप में पेश किया और दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिये हल करने के तरीके की वकालत की। विदेश मंत्री ने भी एक साक्षात्कार में, इसी लाइन पर बात रखी और कहा कि बड़े देशों के बीच, बड़े पड़ोसियों के बीच मुद्दे रहते ही हैं।
    
स्वाभाविक ही है कि एक ऐसी सरकार जो बात-बात पर घर में घुसकर मारने की बात करती हो, चीन के संबंध में ज्ञानी लोगों की तरह प्रवचन देने लगे तो इसके पीछे के रहस्य पर भी चर्चा होने लगेगी। यह सवाल उठने लगे कि वह व्यक्ति जो विपक्ष में रहने पर चीन को आंखें लाल करके दिखाने की मांग करता हो, प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन के सामने पलकें क्यों झुका लेता है। 
    
हकीकत यही है कि मोदी सरकार की देशभक्ति की सारी बातें हिन्दू-मुसलमानों के बीच नफरत पैदा कर पूंजीपतियों के हित साधने के लिए हैं। इनके इस मकसद में पाकिस्तान का विरोध करना और जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान के खिलाफ युद्धोन्माद पैदा करना, मददगार साबित होता है। लेकिन चीन के खिलाफ युद्धोन्माद पैदा कर और कोई फायदा है या नहीं, यह एक अलग सवाल होगा, लेकिन हिन्दू-मुसलमानों के बीच दरार डालने वाला फायदा तो नहीं ही मिलेगा। 
    
चाहे अमेरिका हो या चीन, दोनों आज दुनिया की महाशक्तियां हैं। दोनों ही अपने साम्राज्यवादी हितों के लिए पिछड़े पूंजीवादी देशों पर दबाव डालते हैं। भारत की मोदी सरकार की नीति अमेरिकी साम्राज्यवादियों से नजदीकी कायम करने की रही है। इसलिए इसने अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा उठाए गये कई कदमों का विरोध करने की देश के भीतर से उठने वाली मांगों को दरकिनार भी किया और उलटा अनेकों मामलों में अमेरिकी साम्राज्यवादियों की ऐसी शर्तें भी मानीं, जिससे देश की मजदूर-मेहनतकश जनता के हितों को नुकसान पहुंचा। 
    
भारत, अमेरिका द्वारा चीन को घेरने की योजना में अलग-अलग कारणों से अमेरिका का साझीदार भी है। साम्राज्यवादी चीन के लिए भारत को दबाव में लेने की कोशिश का यह एक अतिरिक्त कारण बन जाता है। वैसे दबाव और धौंस पट्टी साम्राज्यवादियों की चारित्रिक विशेषता होती है। 
    
अमेरिका और चीन कितने भी ताकतवर क्यों न हों, भारत इनका डटकर मुकाबला कर सकता है। लेकिन इसके लिए शर्त यह है कि सरकार को जनता के खिलाफ लड़ाई लड़ना छोड़ना पड़ेगा और जनता को हर तरीके से सशक्त बनाना होगा। लेकिन यही काम भारत की पूंजीवादी सरकार नहीं कर सकती।   

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