दुनिया में बढ़ता सैन्यीकरण, हथियार कंपनियों का बढ़ता मुनाफा और साम्राज्यवादी होड़

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
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दुनिया आज जिस दौर से गुजर रही है, उसे केवल अलग-अलग युद्धों और क्षेत्रीय संघर्षों के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संकट, अमेरिका-चीन के बीच बढ़ता तनाव, यूरोप का तेजी से सैन्यीकरण और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य तैयारियां एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करती हैं।
    
यह बदलाव है- पुरानी अमेरिकी वर्चस्व वाली विश्व व्यवस्था के सामने नई शक्तियों का उभार और उसके साथ बढ़ती साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा।
    
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में उभरा। सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका का वैश्विक वर्चस्व और मजबूत हुआ। लेकिन पिछले दो दशकों में चीन के साम्राज्यवादी ताकत के रूप में उभार तथा रूस का एक प्रमुख सैन्य-राजनीतिक शक्ति के रूप में पुनः सक्रिय होना इस अमेरिकी वर्चस्व वाली व्यवस्था को चुनौती देने लगा है।
    
इस बदलती शक्ति समीकरण का एक महत्वपूर्ण परिणाम है हथियारों की नई दौड़। SIPRI के अनुसार 2025 में दुनिया का सैन्य खर्च बढ़कर 2887 अरब डालर हो गया। यह लगातार ग्यारहवां वर्ष था जब वैश्विक सैन्य खर्च बढ़ा। पिछले दस वर्षों में दुनिया का सैन्य खर्च वास्तविक रूप से 41 प्रतिशत बढ़ चुका है।
    
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस खर्च का बड़ा हिस्सा दुनिया की प्रमुख शक्तियों के बीच केंद्रित है। 2025 में अमेरिका ने लगभग 954 अरब डालर, चीन ने 336 अरब डालर और रूस ने 190 अरब डालर सैन्य क्षेत्र में खर्च किए। इन तीनों का संयुक्त खर्च दुनिया के कुल सैन्य खर्च का लगभग 51 प्रतिशत था। यह आंकड़ा अपने आप में आज की विश्व राजनीति की दिशा को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण है।
    
अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। 2025 में उसका सैन्य खर्च दुनिया के कुल सैन्य खर्च का लगभग एक-तिहाई था। अमेरिका अपने सैन्य और राजनीतिक प्रभाव को यूरोप से लेकर पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत तक बनाए रखना चाहता है। लेकिन अमेरिकी वर्चस्व के सामने अब पहले जैसी स्थिति नहीं है। चीन आर्थिक, तकनीकी और सैन्य शक्ति के रूप में तेजी से आगे बढ़ रहा है। रूस के पास विशाल सैन्य क्षमता, परमाणु हथियार, ऊर्जा संसाधन और एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक स्थिति है। इसलिए आज की विश्व राजनीति में संघर्ष केवल सीमाओं का संघर्ष नहीं है। इसके पीछे बाजारों, संसाधनों, व्यापारिक मार्गों, तकनीक, ऊर्जा और भू-राजनीतिक प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा भी मौजूद है।
    
यही वह बिंदु है जहां हमें साम्राज्यवाद को समझना होगा। चीन का उभार आज की विश्व राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। SIPRI के अनुसार 2025 में चीन का सैन्य खर्च अनुमानतः 336 अरब डालर रहा, जो पिछले वर्ष से 7.4 प्रतिशत अधिक था। यह चीन के सैन्य खर्च में लगातार 31वां सालाना इजाफा था। चीन केवल सैन्य शक्ति नहीं बढ़ा रहा है; वह वैश्विक व्यापार, तकनीक, निवेश, बुनियादी ढांचे और ऊर्जा के क्षेत्र में भी अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। अमेरिका के लिए यह केवल चीन की सैन्य शक्ति का प्रश्न नहीं है। यह वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक नेतृत्व की चुनौती भी है। इसीलिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की सक्रियता, उसके सहयोगी देशों का सैन्यीकरण और चीन के आस-पास बढ़ती सैन्य गतिविधियां व्यापक शक्ति-संघर्ष का हिस्सा हैं।

रूस का पुनः उभार
    
सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की वैश्विक शक्ति कमजोर हुई थी, लेकिन पिछले वर्षों में रूस ने फिर से अपनी सैन्य और राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए विश्व राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश की है। यूक्रेन युद्ध इसी व्यापक टकराव के संदर्भ में भी देखा जाता है। रूस के लिए पूर्वी यूरोप और उसकी सीमाओं के आस-पास NATO का विस्तार गंभीर रणनीतिक चिंता का विषय है। दूसरी तरफ अमेरिका और NATO रूस को यूरोप की सुरक्षा के लिए प्रमुख चुनौती के रूप में देखते हैं।
    
इस टकराव का परिणाम केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रहा। यूरोप में बड़े पैमाने पर पुनः सैन्यीकरण शुरू हुआ है।
    
2025 में यूरोप का सैन्य खर्च 14 प्रतिशत बढ़कर 864 अरब डालर हो गया। रूस का सैन्य खर्च भी 5.9 प्रतिशत बढ़कर लगभग 190 अरब डालर हुआ। इस तरह रूस और NATO के बीच टकराव ने हथियारों की नई दौड़ को और तेज किया है। 
    
आज बड़ी शक्तियां दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपने आर्थिक, राजनीतिक, सैन्य और रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करती हैं। प्राकृतिक संसाधनों, ऊर्जा, बाजारों, समुद्री मार्गों, तकनीक और निवेश पर नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस पूरी प्रक्रिया में आज साम्राज्यवादियों के विनाश के बाजार से मुनाफा कमाने की होड़ को भी समझने की जरूरत बनती है। मौतों से भी मुनाफा यही साम्राज्यवाद का क्रूर चेहरा है। जिसे हथियार उद्योग के बढ़ते मुनाफे से समझा जा सकता है। 
    
SIPRI के अनुसार दुनिया की 100 सबसे बड़ी हथियार कंपनियों की हथियार-संबंधी आय 2024 में बढ़कर 679 अरब डालर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई। यानी दुनिया में जहां युद्ध और सैन्य तनाव बढ़ रहे हैं, वहीं हथियार बनाने वाली कंपनियों का कारोबार व मुनाफा भी बढ़ रहा है।
    
युद्ध जनता के लिए विनाश है, लेकिन हथियार उद्योग के लिए बाजार। यही विरोधाभास हमें युद्ध की अर्थव्यवस्था और साम्राज्यवादी राजनीति के संबंध को समझने में मदद करता है। यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठता है- सुरक्षा किसकी? जब सरकारें अरबों-खरबों डालर हथियारों पर खर्च करती हैं, तब समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास और सामाजिक सुरक्षा के लिए उपलब्ध संसाधनों पर भी सवाल उठता है।
    
2025 में दुनिया का सैन्य खर्च 2887 अरब डालर था। प्रति व्यक्ति औसत सैन्य खर्च लगभग 352 डालर रहा। लेकिन दुनिया के करोड़ों लोगों के लिए सुरक्षित जीवन का अर्थ लड़ाकू विमान या मिसाइल नहीं है।
    
उनके लिए सुरक्षा का अर्थ है रोजगार, सम्मानजनक मजदूरी, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, इलाज की सुविधा, सुरक्षित घर और भोजन व सामाजिक सुरक्षा।
    
अगर किसी देश का नागरिक भूख, बेरोजगारी और महंगाई से जूझ रहा है तो केवल सैन्य शक्ति बढ़ा देना उसकी सामाजिक सुरक्षा की समस्या का समाधान नहीं करता।
    
भारत इस बदलती विश्व व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। वह अमेरिका, रूस और चीन- तीनों के साथ अलग-अलग स्तरों पर संबंध रखता है और अपने रणनीतिक हितों के अनुसार विदेश नीति संचालित करता है। आज भारत भी हथियारों को खरीदने की इस होड़ में लगा है। भारत भी इस दौड़ से बाहर नहीं है। SIPRI के अनुसार 2025 में भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश था। भारत का सैन्य खर्च 8.9 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 92.1 अरब डालर हो गया।
    
यहां सवाल ये बनता है कि, क्या किसी देश की सुरक्षा केवल मिसाइलों, टैंकों और लड़ाकू विमानों से तय होती है?
    
राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ा हुआ सवाल है। 
    
भारत के सामने वास्तविक सुरक्षा चुनौतियां हैं। लेकिन भारत जैसे विशाल और असमान समाज में राष्ट्रीय सुरक्षा की चर्चा को सामाजिक सुरक्षा से अलग नहीं किया जा सकता।
    
आज भारत ही नहीं साम्राज्यवादी देश व पिछड़े पूंजीवादी देश सभी की सरकारें अपने-अपने देश में जनता की सामाजिक सुरक्षा में कटौती कर रही हैं लेकिन सैन्य खर्च को लगातार बढ़ाती जा रही हैं। आज जनता को साम्राज्यवादी होड़ के लिए किए जा रहे युद्धों के द्वारा भी संकट में डाला जा रहा है। 
    
साम्राज्यवादी होड़ का सबसे बड़ा बोझ पिछड़े और कमजोर देश तो उठाते ही हैं साथ ही आम जनता को भी युद्धों की मार झेलनी पड़ती है। युद्धों में महिलाओं और बच्चों के साथ सबसे ज्यादा अमानवीय व्यवहार किया जाता है। फिलस्तीन जिसका उदाहरण है। मजदूर युद्ध में मरता है। किसान की जमीन युद्ध और सैन्य परियोजनाओं में जाती है। आम नागरिक महंगाई और करों का बोझ उठाता है। शरणार्थी अपना घर छोड़ने को मजबूर होता है।
    
जबकि हथियार उद्योग को नए बाजार मिलते हैं और बड़ी शक्तियों को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर।
    
इसलिए युद्ध और साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का विरोध केवल शांति की भावनात्मक अपील नहीं है। यह जनता के रोजगार, रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के सवाल से जुड़ा राजनीतिक प्रश्न है।
    
दुनिया के संसाधन मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए हैं, न कि अंतहीन हथियारों की दौड़ के लिए। आज मजदूर-मेहनतकश वर्ग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी एकजुटता की जरूरत है जो किसी एक महाशक्ति के पक्ष में खड़े होने के बजाय युद्ध, सैन्यीकरण और साम्राज्यवादी वर्चस्व की पूरी राजनीति का विरोध करे। और उसको उखाड़ फेंकने के लिए संघर्ष करें।
    
क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि दुनिया में कौन-सी शक्ति सबसे ताकतवर बनेगी। असली सवाल यह है कि दुनिया की ताकत और संपदा पर किसका अधिकार होगा। कुछ शक्तिशाली साम्राज्यवादी देशों और हथियार कंपनियों का, या दुनिया की मेहनतकश जनता का?

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