जातिवादी न्यायपालिका

Published
Sat, 05/16/2026 - 15:50
/jaativadi-nyaaypalika

उड़ीसा के रायगड़ा जिले की अदालत और हाईकोर्ट ने बीते एक वर्ष के भीतर 8 ऐसे जमानती आदेश जारी किये जिससे उनके जातिवादी पूर्वाग्रह स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इन अदालतों ने दलितों-आदिवासियों को जमानत देते हुए उनसे पुलिस स्टेशनों, अस्पतालों, मंदिरों आदि की सफाई का निर्देश दिया था। हालांकि 4 मई को सुप्रीम कोर्ट ने मामलों की खबर प्रकाश में आने पर स्वतः संज्ञान लेकर उक्त सफाई कराने की शर्तों को रद्द कर दिया व निचली अदालतों को फटकार लगायी। 
    
सबसे प्रचारित मामले में एक व्यक्ति को 2 माह तक रोज सुबह 6 बजे से 9 बजे तक पुलिस स्टेशन की सफाई करने की शर्त पर जमानत दी गयी। इन मामलों में चोरी, हत्या आरोपी से लेकर आंदोलनकारियों सब तरीके के अभियुक्तों को इस तरह की घृणित शर्त पर जमानतें दी गयीं। 
    
उड़ीसा की तिजिमाली पहाड़ियों में वेदांता की बाक्साइट खनन परियोजना का दलित-आदिवासी विरोध करते रहे हैं। वे विस्थापन-पर्यावरण संरक्षण, वन अधिकार अधिनियम व पेसा के उल्लंघन के आधार पर इस परियोजना का विरोध करते रहे हैं। इस संघर्ष में गिरफ्तार दलितों-आदिवासियों को भी जमानत के एवज में सफाई की शर्त दरअसल जातिवादी दृष्टिकोण के साथ राज्य द्वारा संघर्ष को कमजोर करने का भी हथकण्डा है। 
    
भारतीय न्याय संहिता, 2023 भी सजा के बतौर सामुदायिक सेवा को मान्यता देती है। पर यह सजा के बतौर दोषसिद्ध के बाद इस तरह की सजा की छूट देती है। पर उड़ीसा में जमानत देते हुए ही इस तरह की शर्त दरअसल निचली जातियों को और नीचा दिखाने, सबक सिखाने के जातिवादी दम्भ के अलावा कुछ नहीं है। 
    
ऐसी शर्त दिखाती है कि न्यायपालिका सवर्ण आत्मा से लबरेज हो जमानत हेतु प्रस्तुत नीचे की जाति के अभियुक्तों को पहले से ही अपराधी किस्म का मानती रही है। इसीलिए जमानत का अहसान करते हुए वह इन्हें सबक सिखाना चाहती रही है। इसीलिए उन्हें उन थानों की ही सफाई का आदेश दे देती है जहां की पुलिस इन्हें गिरफ्तार करके लाती रही है और जहां ज्यादातर मामलों में इनको पुलिसिया उत्पीड़न से भी गुजरना पड़ता रहा है। ऐसे में अदालत जमानत के साथ-साथ इनके रोज अपमान का इंतजाम कर अपनी सवर्ण आत्मा को तुष्ट करती है। 
    
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत की इन शर्तों को घृणित, अपमानजनक, औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतिबिम्ब, मानवाधिकारों का उल्लंघन व न्याय के सिद्धांतों से असंगत बताते हुए अमान्य घोषित कर दिया व देश भर की अदालतों को भविष्य में इस प्रकार की शर्तें लगाने से रोकने के स्पष्ट निर्देश दिये। 
    
भारतीय अदालतों में न्यायधीशों के पद पर सवर्ण पृष्ठभूमि के जजों की भरमार व निचली जातियों की बेहद कम भागीदारी समूची न्यायपालिका की सवर्ण आत्मा कायम रखती है। इस सवर्ण आत्मा के चलते ही भंवरी देवी के बलात्कारियों को अदालत इस आधार पर बरी कर देती है कि सवर्ण भला दलित महिला को कैसे छू सकते हैं। इसी सवर्ण आत्मा के चलते अनगिनत जातिगत उत्पीड़न नारी उत्पीड़न के मसलों में सबूतों के अभाव में सवर्ण आरोपी बरी हो जाते रहे हैं। 
    
खुद सुप्रीम कोर्ट भी इस मानसिकता से बरी नहीं दिखती। अभी हाल में ही एस सी/एस टी एक्त के एक मामले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने जो निर्देश दिया वह इसकी मिसाल है। सर्वोच्च अदालत ने निर्देश दिया कि एस सी-एस टी एक्ट के लागू होने के लिए जरूरी है कि जाति सूचक गालियां ऐसी सार्वजनिक जगह पर दी गयी हों जहां आम लोग आते जाते हों। यानी घर के भीतर या अन्य किसी निजी जगह पर जातिसूचक गालियां या अपमान आगे से एस सी-एस टी एक्त लागू करने का जरिया नहीं बनेगा। इस आधार पर सर्वोच्च अदालत ने घर के भीतर जातिसूचक गाली दिये जाने के चलते एस सी-एस टी केस को खारिज कर दिया। यह निर्णय अपने आप में एस सी-एस टी एक्त को न केवल कमजोर करता है बल्कि जातिगत उत्पीड़न की संवेदनशीलता को कम करके देखता है।  

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।