जीतू मुंडा का दर्द

Published
Fri, 05/01/2026 - 15:50
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उड़ीसा के ओड़ीसा ग्रामीण बैंक की मल्लीपोसी शाखा में जो कुछ हुआ उसने बैंक की असंवेदनशीलता को एक झटके में पूरे देश के सामने ला दिया। जीतू मुंडा नामक एक आदिवासी की बहन की मृत्यु 26 जनवरी 2026 को हो गयी थी। बहन के खाते में 20,000 रुपये से कुछ कम की राशि जमा थी। जीतू मुंडा बैंक के कई चक्कर काटने के बावजूद यह रकम नहीं निकाल पाये। बैंक वाले बहन को बैंक लाने या मृत्यु प्रमाण पत्र व वारिस का कागज मांगने लगे। जीतू मुंडा बैंक वालों की बात नहीं समझ पाये। अंततः वे प्रमाण दिखाने के लिए जनवरी मंे मृत अपनी बहन का कंकाल गोद में लेकर बैंक पहुंच गये। 
    
कंकाल देख बैंक वाले डर कर पुलिस को बुला लेते हैं और फिर खबर फैलने पर अपनी साख बचाने के लिए बैंक से लेकर स्थानीय प्रशासन सब जीतू मुंडा की मदद करने में जुट जाते हैं। 
    
उक्त घटना में कानूनी प्रावधानों की जटिलता व उसे समझने में अक्षम भारतीय आदिवासियों की स्थिति एक झटके में सामने आ गयी। बैंकों ने प्रावधान कर रखा है कि किसी व्यक्ति के मरने पर उसके मृत्यु प्रणाम पत्र व वारिसाने के प्रमाण पर ही उसकी जमा राशि वारिस को दी जायेगी। अब आदिवासी लोग इन कागजों को बनाने की प्रक्रिया ही नहीं इन कागजों से भी अनजान हैं। ऐसे में जीतू मुंडा सरीखा कष्ट अनगिनत गरीब उठाते रहते हैं और बैंकों पर बगैर क्लेम की भारी राशि जमा होती जाती है। 
    
वैसे बैंक अधिकारी खुद जांच कर उक्त कागजी कार्यवाही को कम कर सकते हैं पर जनता के दर्द से असंवेदनशील व अपनी जान बचाने की खातिर वे यह रास्ता नहीं अख्तियार करते। 
    
जीतू मुंडा की गोद में उसकी मृत बड़ी बहन के कंकाल ने एक झटके में आदिवासियों के हालात, बैंकांे-संस्थानों का उनके प्रति असंवेदनशील रुख को सामने ला दिया। पर इतने पर भी न तो बैंक अपने प्रावधान बदलेंगे और न ही अगले जीतू मुंडा इस दर्द को भुगतने से बचेंगे।
    
गोद में अपनी बहन का कंकाल लिए खड़े जीतू मुंडा की तस्वीर आज के भारत की वह शर्मनाक तस्वीर है जिससे 2047 तक विकसित भारत बनने का सपना बेचते मोदी-शाह भी मुंह नहीं फेर सकते। 

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