दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जून से शुरू हुआ काकरोच जनता पार्टी का धरना प्रदर्शन जारी है। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ शुरू हुआ यह प्रदर्शन 28 जून से आमरण अनशन में बदल गया। आमरण अनशन करने वालों में सोनम वांगचुक व आईसा-एसएफआई के कार्यकर्ता शामिल हैं। बाकी ‘वामपंथी’ छात्र संगठन भी धरने पर जब तब पहुंच रहे हैं।
एक ओर संघर्षरत छात्र-युवा हैं जो पेपर लीक से लेकर बेरोजगारी, शिक्षा की दुर्दशा से त्रस्त हैं तो दूसरी ओर अड़ियल फासीवादी मोदी सरकार है। छात्र-युवा संघर्ष कर सरकार को झुकाना चाहते हैं और सरकार किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नहीं है। धर्मेन्द्र प्रधान संघर्षरत युवाओं को आतंकी करार देकर अपनी ही किरकिरी करा रहे हैं। मोदी सरकार के मंत्रियों ने इस संघर्ष पर मौन साधा हुआ है।
इंटरनेट पर पैदा हुई काकरोच जनता पार्टी व इसके नेता अभिजीत दिपके युवाओं-छात्रों के इस आक्रोश की लहर पर सवार होकर खुद को छात्रों-युवाओं के मसीहा के तौर पर स्थापित करने को प्रयासरत हैं। वहीं संसदीय वामपंथी भी काकरोच पार्टी के बहाने अपना जनाधार मजबूत करने को प्रयासरत हैं। जंतर-मंतर पर हर कोई अपने नारों-अपने मुद्दों के साथ प्रदर्शन में शामिल हो रहा है।
प्रदर्शनकारी छात्र संगठन व काकरोच पार्टी अलग-अलग भाषा बोल रहे हैं यह इसी से स्पष्ट हो जाता है कि मुख्य मंच पर सोनम वांगचुक व अभिजीत दिपके ही प्रमुखतः मौजूद हैं। अन्य अनशनकारी छात्र अलग मंच बनाकर प्रदर्शनरत हैं। मुख्य मंच से ‘भारत माता की जय’ के नारे हैं तो बाकी मंचों से इंकलाब के नारे हैं।
काकरोच पार्टी व इसके नेता अभिजीत दिपके व उनके प्रवक्ता बने 4-5 एनजीओ-पत्रकारिता व सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसरों का समूह इस आंदोलन पर अपनी पकड़ बनाये हुए हैं। ये केजरीवाल के नये संस्करण से लेकर नेपाल-बांग्लादेश की युवा क्रांति की तरह भारतीय युवा क्रांति के सूत्रधार बनने की महत्वाकांक्षा पाले हैं। इसीलिए ये केवल छात्रों-पेपर लीक व धर्मेन्द्र प्रधान के मुद्दे पर मुखर हैं बाकी मुद्दों पर ये अपनी अवस्थिति रखने से बच रहे हैं। उमर खालिद की गिरफ्तारी, राम मंदिर चंदा घोटाले से लेकर तमाम अन्य ज्वलंत मुद्दों पर ये मौन हैं। इनकी कुल राजनीति पूंजीवाद को कुछ भ्रष्ट नेताओं-नौकरशाहों से मुक्त करा आकर्षक रंगरोगन के साथ युवाओं के सम्मुख पेश करने की है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के खात्मे की बात तो ये भूलकर भी नहीं सोचते।
ऐसे में निश्चय ही पेपर लीक व अन्य गड़बड़ियों के लिए मोदी सरकार को घेरा जाना चाहिए। छात्रों-युवाओं को भगत सिंह की राह पर चलते हुए समाजवादी क्रांति के लिए तैयार किया जाना चाहिए। यह स्पष्टतः घोषित किया जाना चाहिए कि कुछ रंगरोगन से यह भ्रष्ट पूंजीवादी व्यवस्था युवाओं की हितैषी नहीं बन सकती। कि युवाओं को बेहतर भविष्य समाजवाद में ही मिल सकता है। यह सब करते हुए युवाओं को क्रांतिकारी राजनीति पर खड़ा करते हुए इस बात से सावधान रहा जाना चाहिए कि कहीं छात्रों का संघर्ष काकरोच पार्टी के चमकने का औजार न बन जायें।
मोदी सरकार के साथ उसके पालनहार अंबानी-अडाणी समेत भारतीय पूंजीपतियों को भी निशाने पर लिया जाना जरूरी है। यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि इन पूंजीपतियों के हित में ही लागू निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों ने शिक्षा व रोजगार की मौजूदा दुर्दशा पैदा की है। इसीलिए इन नीतियों को पलटे बगैर छात्रों-युवाओं के जीवन में मामूली सुधार भी संभव नहीं है। मुकम्मल सुधार तो इंकलाब से ही होगा।