पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा युवा भारत में रहते हैं। आंकड़े बताते हैं कि पूरी दुनिया में लगभग हर पांचवां युवा भारत में रहता है। 15-24 आयु वर्ग के युवाओं की संख्या भारत में करीब 37 करोड़ है। और संयुक्त राष्ट्र संघ की जनसंख्या की रिपोर्ट को आधार बनाया जाए तो भारत की करीब 66 फीसरी आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। ये आंकड़े यह बतलाने के लिए पर्याप्त हैं कि भारत युवाओं का देश है। स्वाभाविक तौर पर ऐसे युवा आबादी वाले देश में युवाओं को ऐसा जीवन मिलना चाहिए जो उनकी ऊर्जा, क्षमता, प्रतिभा, रुचि के साथ पूरा न्याय करता हो। उनको ऐसे मौके देश उपलब्ध कराता हो जहां युवा अपनी ऊर्जा, क्षमता, प्रतिभा का उपयोग समुचित ढंग से कर पाते हों। इस मामले में हमारे देश की तस्वीर एकदम उलटी है। हमारा देश युवा और युवा सपनों की कत्लगाह बनता जा रहा है। कुछ आंकड़े भयावह है।
भारत में हर वर्ष करीब एक लाख सत्तर हजार लोग आत्महत्यायें करते हैं जिनमें से करीब 40 से 50 फीसदी 15-29 आयु वर्ग के लोग होते हैं। इन आत्महत्या करने वाले लोगों में करीब 7 प्रतिशत छात्र होते हैं। कोटा जैसे शहर जहां युवा अपने सपनों को परवान चढ़ाने के लिए जाते हैं वह छात्र आत्महत्या के मामले में कोचिंग ‘हब’ के साथ अब आत्महत्या का ‘हब’ भी बनता गया है। युवा आत्महत्या के मामले में ही नहीं अन्य मामलों में भी आसान शिकार बन रहे हैं। सड़क हादसों में जान गंवाने वालों में युवा प्रमुख हैं। इन सड़क हादसों में ऐसे युवा भी अक्सर होते हैं जो ‘जस्ट इन डिलीवरी’ के नाम पर ‘डिलीवर बाॅय’, ‘गिग वर्कर’ आदि का काम करते हैं। समय पर ‘डिलीवरी’ पहुंचाने के चक्कर में सड़क हादसों का शिकार हो जाते हैं। सड़क हादसों में मारे जाने वाले युवा हों अथवा आत्महत्या करने वाले युवा ये सब एक तरह से हमारे देश की व्यवस्था, व्यवस्था के संचालकों द्वारा की जाने वाली निर्मम हत्यायें हैं। इस तरह से हमारे देश का शासक, पूंजीपति वर्ग इन हत्याओं का दोषी है। वह एक हत्यारा वर्ग है।
ऐसा ही एक हत्याकाण्ड पिछले दिनों लखनऊ में रचा गया। जहां एक कोचिंग संस्थान में आग लगने से 15 से ज्यादा छात्र मारे गये। लखनऊ की घटना कोई पहली घटना नहीं है इससे पहले भी देश के कई बड़े शहरों में कोचिंग सेण्टरों में आग लगने से कई छात्र व युवा मारे जा चुके हैं। कोचिंग संस्थान चलाने वालों, ऐसी इमारतों के मालिकों से कहीं ज्यादा इस तरह के हत्याकाण्ड के लिए शासन-प्रशासन जिम्मेवार हैं। जो तब जागता है जब इस तरह के भयावह हत्याकाण्ड रच दिये जाते हैं। अब देश भर में कोचिंग संस्थानों में छापे मारकर जनता की आंखों में धूल झोंकी जा रही है।
आत्महत्या, सड़क हादसे या आगजनी जैसी घटनाओं में मारे जाने वाली युवा आबादी को आसानी से मौत के मुंह में जाने से रोका जा सकता था। परन्तु यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है तो इसका कारण सिवा इस बात के क्या है कि हमारी समाज व्यवस्था और उसको चलाने वाला शासक वर्ग ही अंततः इस सबके लिए दोषी है।
भारत की युवा आबादी में एक बहुत बड़ी संख्या भारत को छोड़कर जाने वालों की भी है। इनमें से एक वे हैं जो हमेशा-हमेशा के लिए भारत को अलविदा कह देते हैं और दूसरे वे हैं जो काम की तलाश में बाहर के देशों का रुख करते हैं। दोनों को ही हमारा देश वह उपलब्ध नहीं कराता है जिसकी उन्हें तलाश होती है। इस संदर्भ में भी आंकड़े भयावह हैं।
भारत की संसद में विदेश मंत्रालय द्वारा पेश किये गये आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच वर्षों में करीब 9 लाख लोगों ने भारत की नागरिकता छोड़ दी। यानी करीब-करीब 2 लाख लोग प्रतिवर्ष भारत की नागरिकता छोड़ रहे हैं। कौन हैं ये लोग? किस आयु वर्ग के हैं?
भारत की नागरिकता छोड़ने वालों में अमीर, अति अमीर के अलावा एक बड़ी संख्या भारत के मध्य वर्ग के लोगों की है और उनमें से भी अधिकांश युवा हैं। ये युवा अच्छी शिक्षा, अच्छे रोजगार, अच्छे जीवन की तलाश में भारत जैसे ‘गरीब, पिछड़े, अविकसित, गंदे देश’ को छोड़कर अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड जैसे साम्राज्यवादी विकसित देशों की ओर पलायन कर जाते हैं। इन लोगों के भारत से पलायन करने को हमारे देश की सरकार खासकर स्वघोषित राष्ट्रवादियों की सरकार कैसे देखती है। आये दिन ‘घुसपैठियों’ पर हल्ला मचाने वाले प्रधानमंत्री और उनका गृहमंत्री दूसरे देशों में इन पलायन करने वाले लोगों के पलायन को रोकने के लिए कुछ नहीं कर पाते हैं। खुद मोदी सरकार के कई मंत्रियों के बच्चे अच्छी शिक्षा, अच्छे रोजगार के लिए देश छोड़कर भागने वाले ‘भगोड़े’ बने हुए हैं।
प्रवासी भारतीयों की संख्या कितनी ज्यादा है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि करीब 3.54 करोड़ की आबादी वाला यह समुदाय दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। आज स्थिति यह है कि हर साल लगभग 25 लाख लोग रोजगार और शिक्षा के लिए विदेश जा रह हैं। शिक्षा और रोजगार के लिए इतनी बड़ी संख्या में लोग विदेश क्यों जा रहे हैं? क्यों हमारे देश की सरकार और व्यवस्था इन लोगों की बेहतर शिक्षा व बेहतर रोजगार की आकांक्षा को क्यों नहीं पूरा कर पा रही है?
विदेशों में रोजगार की तलाश में जाने वालों में एक ओर वे लोग होते हैं जो भारत में आई आई टी, एम्स आदि उच्च संस्थानों से शिक्षा व प्रशिक्षण हासिल करते हैं। ये पूरे पेशेवर होते हैं। और दूसरी ओर कुशल, अर्द्ध-कुशल मजदूर होते हैं जो भारत को भारी मात्रा में विदेशों से धन भेजते हैं। खाड़ी देशों में करीब 85 लाख कामगार हैं। संयुक्त अरब अमीरात (यू ए ई) की कुल आबादी का एक तिहाई तो भारतीय ही हैं। इस तरह से पेशेवर भारतीयों के रूप में ‘ब्रेन ड्रेन’ हो रहा है तो दूसरी ओर भारत के मजदूरों को अपने घर-परिवार से दूर जीवन यापन के लिए कठोर जीवन परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है। भारत को अपने युवाओं की मानसिक व कुशल श्रम शक्ति से वंचित होना पड़ रहा है। हर युवा ये चाहता है कि कैसे भी विदेश जाने का मौका मिल जाए और ढेरों मेहनतकश परिवार अपनी संतानों को विदेश भेजने के चक्कर में अपनी जमा-पूंजी, जमीन-जायदाद को गंवा कर कंगाल तक हो जा रहे हैं। देश के भीतर ऐसे लोगों की अच्छी-खासी संख्या है जो इस तरह कंगाल हो गये और इनकी युवा संतानंे विदेशों में नारकीय जीवन जीने को विवश हैं।
यहां यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्यों हमारा देश युवाओं और उनके सपनों की कत्लगाह बन गया है? क्यों इतनी बड़ी संख्या में युवा आत्महत्यायें कर रहे हैं? क्यों इतनी बड़ी संख्या में युवा नशे की गिरफ्त में जा रहे हैं? क्यों भारत को छोड़ने वालों की तादाद साल दर साल बढ़ती जा रही है।
इन सवालों का जवाब भारत का शासक वर्ग और उसकी व्यवस्था न तो सीधे तौर पर देना चाहती है और न दे सकती है। क्यों क्योंकि वही इस सब के लिए जिम्मेवार है। और जब से भारत की सरकार को हिन्दू फासीवादी भाजपा-संघ चला रहे हैं तब से हालात बद से बदतर होते गये हैं। आत्महत्यायें बढ़ रही हैं और भारत से पलायन भी बढ़ रहा है। ऐसे में भारत के युवाओं खासकर मध्य वर्ग और मजदूर-किसानों की संतानों के सामने दुहरा कार्यभार आ उपस्थित हो गया है। एक तात्कालिक है तो दूसरा दीर्घकालिक है। पहला कार्यभार मांग करता है छात्र-युवा खासकर मजदूर-मेहनतकशों की संतानें एकजुट हों और अपने संघर्ष के द्वारा शासक वर्ग पर इस बात का दबाव बनायें कि वह अपनी जनविरोधी नीतियां बदलें। उसके संघर्ष के परिणामस्वरूप कुछ सुधार संभव भी हो सकता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि भारत के युवा खासकर मजदूर-मेहनतकश युवा इस समाज व्यवस्था को बदलने के लिए, इंकलाब के लिए कितनी ऊर्जा लगाते हैं। इंकलाब का अर्थ वही है जो शहीद भगतसिंह ने कहा था। मानवद्रोही पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था का खात्मा और समाजवाद की स्थापना करना। सिर्फ समाजवादी भारत में ही युवा और उनके सपनों को उनकी अपनी जमीन और अपना आसमान मिल सकता है।