वेतन बढ़ोत्तरी की मांग को लेकर पैदा हुआ भारत के मजदूरों का उभार लगातार जारी है। हरियाणा, उ.प्र., राजस्थान, उत्तराखण्ड, पंजाब आदि राज्यों में फैलते हुए यह लगभग समूचे उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले चुका है। सरकारें हरियाणा-उ.प्र. के बाद बाकी जगह भी मजदूरों को दमन के डंडे से हांकने की कोशिशें कर रही हैं। जगह-जगह मजदूरों-मजदूर कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां की जा रही हैं। मजदूरों के संघर्ष को पाकिस्तानी साजिश, नक्सली षड्यंत्र, विकास विरोधी करार दे लांक्षित करने की सरकार-पूंजीपतियों की कोशिशें लगातार जारी हैं।
एक हजार से अधिक मजदूरों-कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंसने के बावजूद मजदूर आक्रोश की लहर चेन रिएक्शन की तरह एक शहर से दूसरे शहर फैलती जा रही है। सरकार-प्रशासन की दमन की हर हरकत मजदूरों के गुस्से को और भड़का रही है।
भारी महंगाई, आसमान छूती रसोई गैस की कीमतों के बीच भुखमरी के स्तर के वेतन पर गुजारा करते मजदूरों की पीड़़ा का ज्वालामुखी एक न एक दिन फूटना ही था और वह अप्रैल माह में एक झटके के साथ फूट पड़ा। सरकारों ने नाम मात्र की वेतन बढ़ोत्तरी कर इस ज्वालामुखी को थामने का प्रयास किया। पर मजदूरों का आक्रोश थामने में वह विफल रही। दमन-जेलें व लांक्षित करने की कार्यवाहियां भी किसी काम नहीं आयीं। उल्टा ये संघर्ष को और विस्तारित करने का जरिया बन गयीं।
संघी शासकों की चहेती साम्प्रदायिक वैमनस्य पैदा करती लम्पटों की भीड़़ की जगह अप्रैल माह में अपने हक-हकूक की आवाज उठाते मजदूरों की आवाज ज्यादा मुखर होती गयी। मजदूरों की इस आवाज में सभी धर्मों-जातियों-लिंग-उम्र के लोग शामिल थे। साम्प्रदायिक उन्माद की जगह मजदूर आवाज हर ओर सुनाई देने लगी। नफरत फैलाने वाले और हिन्दू-मुसलमान झगड़ा पैदा करने वाले लम्पटों को अपने बिलों में दुबकना पड़़ा।
भले ही मजदूर एक-एक फैक्टरी, एक-एक शहर होते हुए सड़कों पर उतर रहे हैं पर वेतन वृद्धि की समान मांग ने इस मजदूर एकजुटता को एक हद तक वर्ग के तौर पर एकजुटता में बदल दिया। इस संघर्ष में मजदूरों ने अपनी ताकत को कुछ हद तक पहचाना। उन्होंने सरकार-पुलिस-प्रशासन का पूंजीपरस्त चेहरा देखा। उन्होंने आंदोलन को बदनाम करने वाले पूंजीवादी मीडिया को जाना। अदालतों में मजदूरों की जमानत अर्जी खारिज करती न्यायपालिका का रुख भी समझा। उन्होंने बयानबाजी तक सीमित पूंजीवादी पार्टियों को भी पहचाना तो केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों की निष्क्रियता को भी देखा। इसी तरह मजदूरों ने अपने पक्ष में खड़े छात्रों-युवाओं-किसानों व अन्य मेहनतकश तबकों-जनपक्षधर-बुद्धिजीवियों-वकीलों को देखा। कुल मिलाकर बेहद कम समय में अपने दोस्त व दुश्मनों को मजदूर पहचानने योग्य बन गये।
मजदूरों के इस स्वतः स्फूर्त उभार के वक्त सबसे अधिक आवश्यकता इस उभार को संगठित करने व क्रांतिकारी दिशा में मोड़ने की है। संगठित रूप ग्रहण कर यह उभार वर्तमान ताकत से कई गुना ताकतवर बन सकता है। पूंजी की संगठित ताकत के सामने अकेला-अकेला मजदूर कुछ नहीं है। पर एक वर्ग के बतौर एकजुटता कायम कर और अपनी क्रांतिकारी विचारधारा पर खड़ा हो मजदूर वर्ग समाज की सबसे क्रांतिकारी ताकत में बदल सकता है। ऐसा होने पर वह दुनिया को उलट-पुलट सकता है।
जरूरत है कि मजदूर वर्ग पूंजीवादी व्यवस्था और उसके हर अंग की मजदूर विरोधी हकीकत को पहचाने। इस सच्चाई को पहचाने कि पूंजीवादी व्यवस्था के रहते उसकी गुलामी सरीखी जीवन परिस्थितियां बदल नहीं सकतीं। कि मजदूर वर्ग की मुक्ति पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे व समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के जरिये वर्गविहीन शोषणविहीन समाज कायम करने से होगी। धरती पर समाजवाद-साम्यवाद कायम करना ही मजदूर वर्ग का ऐतिहासिक मिशन है। इस मिशन की दिशा में बढ़ने के लिए मजदूर वर्ग को अपनी क्रांतिकारी पार्टी में संगठित होना होगा।
भारत का मजदूर वर्ग पिछले कुछ दशकों में अपने बड़े उभारों में से एक से गुजर रहा है। वह कई दशकों से पूंजी द्वारा श्रम पर किये जा रहे हमलों का प्रत्युत्तर दे रहा है। उसकी पहलकदमी लुटेरे पूंजीवादी शासकों-पूंजीपतियों के दिलों में भय पैदा कर रही है। यह भय मजदूरों का खून-पसीना निचोड़कर बनाये गये उनके महल-दौलत, उनके स्वर्ग के छिन जाने का है। इसीलिए वे वहशी दरिंदों की तरह अपनी समूची राजसत्ता की ताकत के साथ मजदूर संघर्ष के दमन में जुटे हैं।
ऐसे में जरूरी है कि इस पहलकदमी को न सिर्फ बरकरार रखा जाये बल्कि सही दिशा की ओर बढ़ाने के पूरे प्रयास किये जायें।